- बिहार के भोजपुर जिले के सेमरिया, ओझवलिया, बंधु छपरा और बबुरा जैसे गांवों में लोग लंबे समय से भूजल में आर्सेनिक की समस्या से जूझ रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि सुरक्षित पानी की व्यवस्था कमजोर है और कई परिवार अब भी संदिग्ध पानी पर निर्भर हैं।
- प्रभावित गांवों में लोग कैंसर, लिवर, किडनी और त्वचा रोगों के मामलों को दूषित पानी से जोड़कर देखते हैं। हालांकि, किसी व्यक्ति की बीमारी को सीधे आर्सेनिक से जोड़ने के लिए मेडिकल रिकॉर्ड और विशेषज्ञ पुष्टि जरूरी है।
- अध्ययन के मुताबिक, भोजपुर के आर्सेनिक प्रभावित इलाकों में भूजल में आर्सेनिक WHO सीमा से करीब 55 गुना, गेहूं में करीब 8 गुना, चावल में 4 गुना और आलू में 3 गुना तक ज्यादा मिला। स्तन दूध में आर्सेनिक की अधिकतम मात्रा अध्ययन में इस्तेमाल की गई सीमा से करीब 716 गुना ज्यादा दर्ज की गई।
बिहार में भोजपुर जिले के शाहपुर ब्लॉक के सेमरिया गाँव के 68-वर्षीय ललन ओझा पेशे से किसान हैं। उनके दो बेटे हैं जो दिल्ली और गुजरात में काम करते हैं। गाँव में मुलाकात के दौरान वे अपने घर के बरामदे में बैठे मिलते हैं। शरीर कमजोर है और बातचीत के बीच वे बार-बार अपनी बीमारी का जिक्र करते हैं। उनके हाथों और पैरों की त्वचा पर कड़े घाव जैसे निशान हैं। पीठ पर काले दाग पड़ चुके हैं।
ललन बताते हैं कि करीब 10 साल पहले उनके पेट में तेज दर्द शुरू हुआ था। पहले स्थानीय स्तर पर इलाज कराया, फिर आरा सदर अस्पताल और उसके बाद पटना के इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (आईजीआईएमएस) पहुंचे। जाँच के बाद डॉक्टरों ने उन्हें लिवर सिरोसिस बताया। बाद में उन्हें दिल्ली एम्स या पीजीआई चंडीगढ़ जाने की सलाह दी गई, जहां इस बीमारी की फिर पुष्टि हुई।
बीमारी बढ़ने के बाद वे फिलहाल अपने एक बेटे के पास दिल्ली में रहकर इलाज करवा रहे हैं।
ललन अपनी बीमारी को गांव के पानी से जोड़कर देखते हैं। वे कहते हैं, “डॉक्टरों ने कहा कि पानी शुद्ध करके पीना चाहिए। लेकिन हम जैसे गरीब आदमी के लिए हर समय शुद्ध पानी और इलाज का खर्च जुटाना आसान नहीं है। इलाज के लिए जो मेडिकल किट आती है, वह 5,600 रुपये की है।”
सेमरिया और इसके आसपास के ओझवलिया, बंधु छपरा और बबुरा जैसे गाँव गंगा नदी के किनारे बसे हैं। इन गाँवों में लंबे समय से भूजल में आर्सेनिक की शिकायतें सामने आती रही हैं।

सेना से वर्ष 2021 में सेवानिवृत्त होकर आए प्रभाकर ओझा ने पिछले कुछ ही वर्षों के भीतर अपने तीन जवान बेटों को खो दिया। तीनों बेटों की उम्र महज़ 25 से 35 वर्ष के बीच थी।
प्रभाकर ओझा अपने बेटों को खोने का दर्द बयां करते हैं, “हमारे पहले दो बेटों की मौत हार्ट और लीवर की समस्या से हुई। हमने ऑपरेशन भी कराया, दवा भी कराई। डॉक्टरों ने हमें सिर्फ इतना बताया कि इन्हें हार्ट की बीमारी है, वे कभी यह लिखकर नहीं देते कि यह आर्सेनिक वाले पानी की वजह से हो रहा है। इसके बाद हमारा तीसरा बेटा छः महीने तक अस्पताल में तड़पता रहा और पीलिया (जॉन्डिस) के कारण उसने दम तोड़ दिया। जब गाँव में जांच करने बाहर से लोग (जाधवपुर यूनिवर्सिटी और पीएचईडी के लोग ) आए थे, तब पानी और मिट्टी में आर्सेनिक निकला था।”
गाँव के ही एक अन्य बुजुर्ग, रघुराज ओझा कहते हैं कि लगभग 8,000 की आबादी वाले इस गाँव में कैंसर, लीवर और त्वचा रोगों ने हर घर को डरा रखा है। रघुराज ओझा बताते हैं, “मजबूरी में हम लोग क्या करें? यहाँ पानी की टंकी तो लगी है, लेकिन न तो कभी उसकी सफाई होती है और न ही उसमें कोई फिल्टर लगा है। कई जगहों पर पाइपलाइनें टूटी-फूटी हैं, जिससे गंदा पानी आता है। जब से टंकी लगी है, प्रशासन की तरफ से एक बार भी उसकी सफाई नहीं कराई गई।”
गाँव के इसी सामूहिक दर्द और व्यवस्था की बेरुखी पर 73-वर्षीय कामता प्रसाद ओझा कहते हैं, “यहाँ का पानी तो बहुत पहले से खराब है। इसे पीकर गाँव के न जाने कितने लोग मर गए। किसी का लीवर खराब है, किसी की किडनी खराब है, तो किसी को कैंसर है। चर्म रोग तो अंधाधुंध फैला हुआ है।”

कामता प्रसाद इस संकट के सबसे ताज़ा और भयावह उदाहरणों की ओर इशारा करते हुए कहते हैं, “अभी तुरंत हमारे ही गाँव का रामानंद ओझा मर गया। महज़ 25-30 साल का नौजवान लड़का था, इसी पानी को पीता था और उसे लीवर कैंसर हो गया। एक और लड़का है पंकज कुमार, उसकी भी यही स्थिति है।”
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, पीने के पानी में आर्सेनिक की अधिक मात्रा लंबे समय तक शरीर में जाने से गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा हो सकते हैं। इससे त्वचा, फेफड़े, मूत्राशय और किडनी के कैंसर का खतरा बढ़ता है। इसके अलावा त्वचा पर मोटापन, दाग-धब्बे और रंग बदलने जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं। अधिक मात्रा में घुलनशील अकार्बनिक आर्सेनिक शरीर के लिए जहरीला होता है और इससे पेट से जुड़ी तकलीफें, दिल और नर्वस सिस्टम पर असर, और गंभीर मामलों में मौत तक हो सकती है। WHO के अनुसार, पीने के पानी में आर्सेनिक की सुरक्षित या वांछनीय सीमा 10 माइक्रोग्राम प्रति लीटर है।
पानी के गिलास से निकलकर थाली में पहुँचा जहर
रघुराज बताते हैं कि सात-आठ वर्ष पहले पश्चिम बंगाल की जादवपुर यूनिवर्सिटी और महावीर कैंसर संस्थान की टीमें यहाँ मिट्टी और पानी की जांच करने आई थीं, जिसमें आर्सेनिक की पुष्टि हुई थी। टीम ने यहाँ के चापाकालों (हैंडपंप) के पानी की भी जांच की थी। पानी में आर्सेनिक की मात्रा तय मानकों से कई गुना ज़्यादा मिलने के बाद, टीम ने सेमरिया ओझापट्टी के कई गाँवों में दर्जनों हैंडपंपों पर लाल रंग का निशान लगा दिया था।
ग्रामीण बताते हैं कि करीब आठ साल पहले जिन पुराने हैंडपंपों पर लाल निशान लगाए गए थे, उनके निशान अब मिट चुके हैं। उनकी चिंता यह है कि नए या हाल में लगाए गए हैंडपंपों की भी नियमित जांच नहीं हो रही है।
गाँव में पानी तक पहुंच अब आर्थिक हैसियत से भी तय हो रही है। स्थानीय लोगों के अनुसार, जिन परिवारों के पास साधन हैं, उन्होंने 300 से 400 फीट गहराई तक निजी बोरिंग करा रखी है। ग्रामीणों का कहना है कि इतनी गहराई से मिलने वाला पानी अपेक्षाकृत बेहतर माना जाता है, हालांकि ऐसे परिवार भी उसे आरओ से फिल्टर करने के बाद ही पीते हैं।
लेकिन गांव के कई परिवार इतनी गहरी बोरिंग कराने में सक्षम नहीं हैं। ये परिवार लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (पीएचईडी) के वाटर प्लांट पर निर्भर थे, लेकिन प्लांट बंद पड़े होने के कारण उन्हें फिर से हैंडपंपों का सहारा लेना पड़ रहा है। ग्रामीणों का दावा है कि हाल में लगाए गए कुछ हैंडपंपों से निकलने वाले पानी में भी आर्सेनिक की समस्या है। इसके बावजूद, सुरक्षित विकल्प न होने के कारण कई परिवार इन्हीं स्रोतों से पीने का पानी ले रहे हैं।’

शाहपुर क्षेत्र के कनीय अभियंता (जेई) चंद्रभूषण राम द्वारा साझा किए गए आंकड़ों के मुताबिक, क्षेत्र में चार बड़े पाइप सप्लाई और 272 छोटे वाटर प्लांट हैं, और बिहार सरकार ने 2021 में अपने दिशा निर्देशों में 24 घंटे में मोटर और पाइपलाइन की मरम्मत का नियम बनाया। लेकिन कामता प्रसाद बताते हैं कि टंकी में फिल्टर या आरओ है या नहीं, किसी को नहीं पता। पीएचईडी कभी पानी की जांच करने नहीं आता, और गाँव का वाटर प्लांट महीनों से बंद है क्योंकि मुख्य स्विच बोर्ड जल चुका है।
महावीर कैंसर संस्थान और अनुसंधान केंद्र, पटना के वैज्ञानिक अरुण कुमार और उनके सहयोगियों के एक शोध में आर्सेनिक का प्रभाव सामने आया है। अरुण कुमार के नेतृत्व में हुए और 2024 में प्रकाशित हुए इस शोध के दायरे में गंगा के कछार पर स्थित बिहार के 11 मुख्य आर्सेनिक प्रभावित जिले, भोजपुर, बक्सर, पटना, सारण, वैशाली, समस्तीपुर, बेगूसराय, खगड़िया, मुंगेर, दरभंगा, और नालंदा, शामिल थे।
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दूषित भूजल से लगातार होने वाली सिंचाई के कारण आर्सेनिक अब इस प्रभावित पट्टी की खाद्य श्रृंखला में प्रवेश कर चुका है। इसे वैज्ञानिक भाषा में ‘बायोमॅग्निफिकेशन’ और ‘सोइल-टू-क्रॉप ट्रांसफर’ कहा जाता है।
ओझवलिया, बंधु छपरा और बबुरा जैसे जिले के दर्जनों गाँव दूषित भूजल की सीधी मार झेल रहे हैं। खेतों के रास्ते अनाज में आर्सेनिक का यह खतरनाक फैलाव मुख्य रूप से सेमरिया और उसके आसपास के ही कृषि क्षेत्रों में शोध के दौरान सामने आया है।
अनाज से लेकर मां का दूध तक प्रभावित
वैज्ञानिकों ने सेमरिया और आसपास के खेतों से अनाज, मिट्टी और सब्जियों के नमूने जांच के लिए लिए। जांच में गेहूं सबसे ज्यादा प्रभावित मिला। गेहूं के 63% नमूनों में आर्सेनिक की मात्रा सुरक्षित सीमा से अधिक थी और कुछ नमूनों में यह 775 माइक्रोग्राम प्रति किलोग्राम तक पाई गई। चावल के 14% नमूनों में भी आर्सेनिक सीमा से ऊपर मिला, जहां अधिकतम मात्रा 821 माइक्रोग्राम प्रति किलोग्राम दर्ज की गई। आलू के सिर्फ 3% नमूनों में आर्सेनिक की मात्रा सुरक्षित सीमा से अधिक थी, लेकिन कुछ नमूनों में यह 1450 माइक्रोग्राम प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई, यानी सुरक्षित सीमा से लगभग तीन गुना ज्यादा। संयुक्त राष्ट्र खाद्य और कृषि संगठन के मानकों के अनुसार, गेहूं में आर्सेनिक की सीमा 100 माइक्रोग्राम प्रति किलोग्राम, चावल में 200 माइक्रोग्राम प्रति किलोग्राम और आलू में 500 माइक्रोग्राम प्रति किलोग्राम मानी गई है।
इस अध्ययन में आर्सेनिक प्रभावित जिलों से स्तनपान कराने वाली माताओं और उनके बच्चों के नमूने भी लिए गए।
अध्ययन में शामिल 378 स्तनपान कराने वाली महिलाओं में से 210 महिलाओं के स्तन दूध में आर्सेनिक की मात्रा तय सीमा से अधिक पाई गई। सबसे अधिक मात्रा 458 माइक्रोग्राम प्रति लीटर दर्ज की गई। इसी तरह 184 शिशुओं के मूत्र नमूनों में से 124 में आर्सेनिक की मात्रा अनुमेय सीमा से अधिक मिली। शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि शिशुओं के शरीर से मूत्र के जरिए आर्सेनिक निकलने की दर करीब 50 प्रतिशत थी, यानी बाकी मात्रा शरीर में जमा रह सकती है। अध्ययन ने इसे शिशुओं के भविष्य के स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय बताया है।

अध्ययन के अनुसार, स्तन दूध में आर्सेनिक के लिए WHO की अनुमेय सीमा 0.64 माइक्रोग्राम प्रति लीटर बताई गई है। अध्ययन में स्तन दूध में आर्सेनिक की अधिकतम मात्रा 458 माइक्रोग्राम प्रति लीटर दर्ज की गई, जो इस सीमा से करीब 716 गुना ज्यादा है।
अरुण कुमार इस भयावह स्थिति पर कड़ी चेतावनी देते हुए स्पष्ट करते हैं, “जब किसान लगातार आर्सेनिक युक्त भूजल से सिंचाई करते हैं, तो मिट्टी की ऊपरी परतें इस जहर को सोख लेती हैं। फसलों में इसका पहुंचना जनस्वास्थ्य के लिए एक टाइम-बम की तरह है, क्योंकि यह सीधे हमारे शरीर के आंतरिक अंगों पर हमला करता है। यदि हमने तुरंत वाटर फिल्टरेशन और कृषि प्रबंधन के तौर-तरीकों को नहीं बदला, तो यह संकट आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य को पूरी तरह तबाह कर देगा।”
खेती और सिंचाई के जरिए अनाज में घुलते इस जहर का असर अब गाँव की अगली पीढ़ी पर सीधे दिख रहा है। रघुराज ओझा कहते हैं, “गाँव के स्कूल में सरकारी स्तर पर एक फिल्टर तो लगाया गया है, लेकिन वह कभी चालू ही नहीं हुआ। स्कूल के छोटे-बच्चे आज भी वही आर्सेनिक युक्त और गंदा पानी पीने को मजबूर हैं। जिनके पास पैसा है, वे तो गर्मियों में पानी खरीदकर पी लेते हैं या घरों में आरओ लगवा रहे हैं, लेकिन गरीब आबादी और बच्चों के पास इस धीमे जहर को निगलने के अलावा कोई रास्ता नहीं है।”
बैनर तस्वीरः भोजपुर के ओझवलिया गांव में इंद्रजीत ओझा अपने आंगन में लगे चापाकल से पानी निकालते हुए। गंगा किनारे बसे कई गांवों में भूजल में आर्सेनिक की समस्या लंबे समय से दर्ज की जाती रही है। तस्वीर: हिमांशु प्रवीण/मोंगाबे