- आईआईटी खड़गपुर और केरल यूनिवर्सिटी ऑफ फिशरीज एंड ओशन स्टडीज, कोच्चि के अध्ययन में बताया गया है कि लू के दौरान जमीन के पास ओजोन प्रदूषण बढ़ जाता है।
- यह अध्ययन नेचर पोर्टफोलियो की पत्रिका एनपीजे क्लीन एयर में प्रकाशित हुआ है। इसमें 2004 से 2024 तक के आंकड़ों का अध्ययन किया गया है।
- अध्ययन के अनुसार, 2024 में लू के दौरान ओजोन प्रदूषण से जुड़ी सांस और दिल की बीमारियों के कारण 26,500 से ज्यादा मौतों का अनुमान लगाया गया।
- अध्ययन के लेखक कहते हैं कि लू से बचाव की योजनाओं में अब हवा की गुणवत्ता, ओजोन की चेतावनी और सेहत से जुड़ी सलाह को भी शामिल करना चाहिए।
भारत में लू को आमतौर पर तेज गर्मी, शरीर में पानी की कमी, बेहोशी, लू लगना और हीट स्ट्रोक से जोड़ा जाता है। लेकिन एक नया अध्ययन बताता है कि लू के दौरान खतरा सिर्फ तापमान बढ़ने से नहीं होता। तेज गर्मी जमीन के पास मौजूद ओजोन प्रदूषण को भी बढ़ा सकती है। यह प्रदूषण फेफड़ों और दिल के लिए नुकसानदेह है।
यह अध्ययन आईआईटी खड़गपुर के कोरल यानी सेंटर फॉर ओशन्स, रिवर्स, एटमॉस्फियर एंड लैंड साइंसेज से जुड़े प्रोफेसर जयनारायणन कुट्टिपुरथ और केरल यूनिवर्सिटी ऑफ फिशरीज एंड ओशन स्टडीज, कोच्चि की पी. संगीता ने किया है। अध्ययन का शीर्षक है, “Heatwaves trigger severe surface ozone pollution in India: regional hotspots, trends and health effects.” यह शोध नेचर पोर्टफोलियो की पत्रिका एनपीजे क्लीन एयर में प्रकाशित हुआ है।
मोंगाबे हिन्दी से बातचीत में कुट्टिपुरथ ने कहा, “भारत में लू को अब केवल अत्यधिक तापमान की घटना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसे वायु प्रदूषण और सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थिति के रूप में भी पहचानना होगा, क्योंकि लू सतही ओजोन प्रदूषण को काफी बढ़ा देती है। इससे सांस और दिल की बीमारियों का अतिरिक्त और अक्सर अनदेखा बोझ पैदा होता है।”
ओजोन का नाम सुनते ही अक्सर लोग आसमान में मौजूद ओजोन परत के बारे में सोचते हैं। यह परत सूरज की हानिकारक पराबैंगनी किरणों यानी अल्ट्रावायलेट रेडिएशन से धरती की रक्षा करती है। लेकिन जमीन के पास मौजूद ओजोन अलग समस्या है। इसे सतही ओजोन या सरफेस ओजोन कहा जाता है। यह सीधे किसी चिमनी या गाड़ी से नहीं निकलता। यह हवा में मौजूद कुछ गैसों और तेज धूप की रासायनिक प्रतिक्रिया से बनता है।
पी. संगीता कहती हैं, “ओजोन पूरे वातावरण में रासायनिक रूप से सक्रिय होती है। लेकिन स्ट्रैटोस्फियर यानी वायुमंडल की ऊपरी परत में इसके बनने और टूटने के बीच एक प्राकृतिक संतुलन रहता है। इसी से यह हानिकारक अल्ट्रावायलेट रेडिएशन से बचाने वाली स्थिर ढाल बनाती है। इसके उलट ट्रोपोस्फेरिक ओजोन यानी जमीन के पास की ओजोन एक सेकेंडरी पॉल्यूटेंट है। यह धूप की मौजूदगी में प्रदूषक गैसों से बनती है और धरती की सतह के पास जमा हो सकती है, जहां लोग रहते और सांस लेते हैं।”

लू के दिनों में कैसे जहरीली होती है हवा
अध्ययन में 2004 से 2024 के बीच भारत में लू और ओजोन प्रदूषण के संबंध को देखा गया। इसके अनुसार, लू के दौरान भारत के सभी क्षेत्रों में जमीन के पास ओजोन का स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ की 70 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की सीमा से ऊपर पाया गया। माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर हवा में किसी प्रदूषक की मात्रा मापने की इकाई है।
उत्तर-पश्चिम भारत, उत्तर-मध्य भारत, गंगा के मैदान, पूर्वोत्तर और पश्चिमी हिमालय ज्यादा प्रभावित क्षेत्रों के रूप में सामने आए। कई जगहों पर लू के दौरान ओजोन का स्तर 85 से 110 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुंचा। पश्चिमी हिमालय में 2024 में ओजोन का स्तर डब्ल्यूएचओ की सीमा से 115 प्रतिशत ज्यादा पाया गया।
अध्ययन बताता है कि लू के दिनों में तेज धूप और अधिक तापमान हवा में रासायनिक प्रतिक्रियाओं को तेज कर सकते हैं। इससे ओजोन का स्तर बढ़ता है। यह समस्या केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं है। अलग-अलग मौसम, भूगोल, प्रदूषण के स्रोत और हवा की दिशा इसे अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न तरीकों से प्रभावित करते हैं।
अध्ययन के अनुसार, 2024 में लू के दौरान ओजोन प्रदूषण से जुड़ी सीओपीडी और इस्केमिक हार्ट डिसीस से कुल 26,513 मौतों का अनुमान लगाया गया। सीओपीडी फेफड़ों की एक लंबी बीमारी है, जिसमें सांस लेने में दिक्कत होती है। इस्केमिक हार्ट डिसीस दिल की बीमारी है, जिसमें दिल तक खून और ऑक्सीजन पर्याप्त मात्रा में नहीं पहुंच पाती। अध्ययन में 15,615 मौतें इस्केमिक हार्ट डिसीस और 10,898 मौतें सीओपीडी से जुड़ी बताई गई हैं।
इन आंकड़ों को समझने में सावधानी भी जरूरी है। पी. संगीता ने कहा, “प्री-हीटवेव स्थिति की तुलना में सीओपीडी और आईएचडी के 834 अतिरिक्त मामले सामने आते हैं। लेकिन इस अनुमान में कुछ अनिश्चितताएं हैं। इनमें ओजोन के संपर्क का आकलन, बीमारी और प्रदूषण के रिश्ते से जुड़े आंकड़े, आबादी के आंकड़े, मौतों की आधार दर, लोगों की अलग-अलग संवेदनशीलता, दूसरे प्रदूषक और अन्य कारण शामिल हैं जिन्हें पूरी तरह अलग करके नहीं देखा जा सकता।”
इसका मतलब है कि मौतों का अनुमान एक महत्वपूर्ण चेतावनी देता है, लेकिन इसे अंतिम और बिल्कुल सटीक संख्या की तरह नहीं पढ़ना चाहिए। यह बताता है कि लू और ओजोन मिलकर स्वास्थ्य जोखिम बढ़ा सकते हैं, खासकर उन लोगों के लिए जिन्हें पहले से सांस या दिल की बीमारी है।
अध्ययन का एक और महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि लू खत्म होते ही ओजोन का खतरा तुरंत खत्म नहीं होता। कई क्षेत्रों में ओजोन का स्तर सामान्य होने में करीब तीन से चार दिन लग सकते हैं। तापमान से जुड़ा असर भी चार से सात दिन तक बना रह सकता है। यानी मौसम विभाग की लू चेतावनी खत्म होने के बाद भी सेहत पर असर बना रह सकता है।

हीट एक्शन प्लान में क्या बदलना होगा
भारत में कई राज्यों और शहरों ने हीट एक्शन प्लान बनाए हैं। हीट एक्शन प्लान यानी लू से बचाव की योजना। इनमें आमतौर पर गर्मी की चेतावनी, पानी की व्यवस्था, अस्पतालों की तैयारी, मजदूरों के लिए सलाह और कमजोर लोगों की पहचान जैसी बातें शामिल होती हैं। लेकिन यह अध्ययन बताता है कि सिर्फ तापमान देखकर तैयारी करना काफी नहीं है।
प्रो. जयनारायणन कुट्टिपुरथ ने मोंगाबे हिन्दी को दिए जवाब में कहा, “ओजोन पूर्वानुमान और हवा की गुणवत्ता से जुड़ी स्वास्थ्य सलाह को लू की चेतावनियों में शामिल किया जाना चाहिए। अध्ययन दिखाता है कि लू सतही ओजोन प्रदूषण और उससे जुड़ी मौतों को काफी बढ़ाती है। इसका मतलब है कि केवल तापमान पर आधारित चेतावनी अत्यधिक गर्मी के दौरान सार्वजनिक स्वास्थ्य जोखिम को कम करके आंक सकती है।”
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अध्ययन के अनुसार, यह भारत जैसे देश के लिए अहम है, जहां बड़ी संख्या में लोग खुले में काम करते हैं। निर्माण मजदूर, किसान, सफाईकर्मी, ट्रैफिक पुलिस, डिलीवरी कर्मचारी और सड़क किनारे काम करने वाले लोग गर्मी और प्रदूषित हवा दोनों के संपर्क में आते हैं। बुजुर्ग, बच्चे, गर्भवती महिलाएं और अस्थमा, सीओपीडी या दिल की बीमारी वाले लोग भी ज्यादा खतरे में हो सकते हैं।
लेखकों का मानना है कि लू की चेतावनी में सिर्फ यह बताना पर्याप्त नहीं होगा कि तापमान कितना रहेगा। लोगों को यह भी बताया जाना चाहिए कि हवा में ओजोन या दूसरे प्रदूषक खतरनाक स्तर पर हैं या नहीं। स्वास्थ्य सलाह में बाहर काम करने का समय घटाने, दोपहर की तेज धूप से बचने, सांस और दिल के मरीजों को अतिरिक्त सावधानी रखने और अस्पतालों को तैयार रखने जैसी बातें शामिल की जा सकती हैं।
तस्वीरः रेहड़ी वाले और दिहाड़ी मजदूर बढ़ती गर्मी से सबसे ज़्यादा प्रभावित होने वाले तबकों में से एक हैं। विकिमीडिया कॉमन्स (CC BY SA 4.0) के जरिए अवात्रावा की तस्वीर।