- ग्रीन इकॉनमी की ओर बदलाव ने रेयर अर्थ एलिमेंट्स पर दुनिया भर में निर्भरता बढ़ा दी है, जिससे कई देश लोकल रिसोर्स को सुरक्षित करने के लिए मिलकर काम करने को बढ़ावा दे रहे हैं।
- भारत में, रेयर अर्थ रिज़र्व पारिस्थितिकी तौर पर कमज़ोर तटीय और नदी के इकोसिस्टम में हैं, जहाँ माइनिंग से बायोडायवर्सिटी, ग्राउंडवाटर, कटाव और लंबे समय तक पर्यावरण की स्थिरता को गंभीर खतरा है।
- ऐसे में देश और दुनिया की कंपनियाँ और रिसर्च संस्थान भी रेयर अर्थ एलिमेंट्स की रीसाइक्लिंग और रिकवरी की ओर रुख कर रहे हैं।
दुनिया के हरित अर्थव्यवस्था या ग्रीन इकॉनमी की तरफ़ बढ़ते झुकाव को जीवाश्म ईंधन के मुकाबले एक बेहतर विकल्प के रूप में देखा जा सकता है। लेकिन, यह विकल्प किसी भी तरह से पर्यावरणीय दिक्कतों से मुक्त नहीं है। पवन चक्कियों से लेकर इलेक्ट्रिक गाड़ी बनाने तक, हर चीज़ के लिए नियोडिमियम, डिस्प्रोसियम जैसे कई दुर्लभ खनिजों या रेयर अर्थ एलिमेंट्स (REEs) की ज़रूरत होती है। रक्षा उपकरणों में इन तत्वों का इस्तेमाल इनकी अहमियत को और भी बढ़ाता है।
REEs की बढ़ती ज़रूरत तब साफ़ हुई जब इस साल जनवरी में अमेरिका ने रेयर अर्थ सप्लाई चेन पर चर्चा करने के लिए वाशिंगटन में G7 देशों और उनके सहयोगियों की एक मंत्री-स्तरीय बैठक रखी। इस बैठक में रेयर अर्थ मिनरल्स के लिए चीन पर निर्भरता कम करने पर ध्यान दिया गया। भारत की तरफ से केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इस बैठक में भाग लिया।
“भारत की उत्पादन क्षमताओं और तेज़ी से बढ़ते इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर की मजबूती को बढ़ाने के लिए ज़रूरी मिनरल सप्लाई चेन को मजबूत करना बहुत ज़रूरी है,” वैष्णव ने बैठक के बाद सोशल मीडिया प्लेटफार्म X (पहले Twitter) पर एक पोस्ट में लिखा।
अमेरिका ने अपने कई साथी देशों के साथ मिलकर ‘पैक्स सिलिका’ नाम की एक पहल शुरू की है। इसका मकसद ज़रूरी खनिज (मिनरल) और ऊर्जा के इनपुट से लेकर उन्नत उत्पादन, सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इंफ्रास्ट्रक्चर और लॉजिस्टिक्स तक एक मजबूत की सप्लाई चेन बनाना है। यह कदम रेयर अर्थ्स समेत ज़रूरी मिनरल के लिए चीन पर निर्भरता कम करने की बड़ी कोशिशों का हिस्सा है। भारत में अमेरिका के राजदूत सर्गेई गोर ने बाद में X पर लिखा कि भारत को इस पहल में शामिल होने के लिए बुलाया जाएगा।
विश्व भर में हो रही दूसरी गतिविधियां भी रेयर अर्थ सप्लाई चेन को नियंत्रित करने की उभरती भू-राजनैतिक कोशिशों को दिखाती हैं। सितंबर 2025 में, शेंगहे रिसोर्सेज़ नामक कंपनी, जिसका कुछ हिस्सा चीनी सरकार के पास है, ने ऑस्ट्रेलियाई माइनिंग कंपनी पीक रेयर अर्थ्स को खरीदा। पीक रेयर अर्थ्स तंजानिया में काम करती थी। इस तरह के अधिग्रहण के साथ-साथ ज़रूरी मिनरल्स की प्रोसेसिंग पर बड़े कंट्रोल के साथ, चीन REE की वैश्विक सप्लाई चेन में आगे बना हुआ है, जिससे उसे भू-राजनीति में बढ़त मिलती है।
दिसंबर 2025 में, भारत सरकार ने ₹72.8 बिलियन (₹7,280 करोड़) के इन्वेस्टमेंट के साथ रेयर-अर्थ परमानेंट मैग्नेट की उत्पादन स्कीम शुरू करने के लिए सात साल के एक प्लान की घोषणा की। वैष्णव के अनुसार, इससे इन ज़रूरी मिनरल्स की सप्लाई के स्वदेशी स्रोतों को बढ़ाकर देश की आत्मनिर्भरता और रणनीतिक स्वायत्तता को बढ़ावा दिया जा सकेगा।
हालाँकि, इन महत्वपूर्ण तत्वों का बड़ा हिस्सा, जिसकी मात्रा लगभग 7.23 मिलियन टन (72.3 लाख टन) है, भारत के तटीय क्षेत्रों और जलोढ़ रेत वाले पारिस्थितिकी तंत्रों में पाया जाता है।

रणनीतिक खनिज और संवेदनशील परिदृश्य
साल 2019 की संशोधित तटीय विनियमन क्षेत्र नीति के अनुसार, एटॉमिक मिनरल या परमाणु खनिज का खनन विनियमित (रेगुलेटेड) श्रेणी में आता है। सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी, इंडियन रेयर अर्थ्स लिमिटेड (IREL) के ज़रिए, परमाणु ऊर्जा विभाग के पास अभी ओडिशा, तमिलनाडु और केरल में खदानें हैं। मोनाज़ाइट — भारत में रेयर अर्थ एलिमेंट का एक बड़ा स्त्रोत — आंध्र प्रदेश, ओडिशा, तमिलनाडु, केरल, पश्चिम बंगाल, झारखंड, गुजरात और महाराष्ट्र में समुद्र तट और नदी के किनारे की रेत में पाया जाता है, और गुजरात और राजस्थान में हार्ड रॉक डिपॉजिट में और भी रेयर अर्थ रिज़र्व पाए जाते हैं।
साल 2022 की एक स्टडी के अनुसार, मोनाज़ाइट जैसे भारी मिनरल के लिए समुद्र तट और एल्यूवियल रेत की माइनिंग में आमतौर पर स्ट्रिप माइनिंग शामिल होती है, जिसमें लगभग 30 मीटर की गहराई तक टॉपसॉइल को हटा दिया जाता है। यह क्षेत्र माइनिंग के बाद निकलने वाले वेस्ट या टेलिंग्स से भर जाता है।
अकेले REEs की मांग पहले से ही आपूर्ति से ज़्यादा होने वाली है। ऐसे में समुद्र तटों और नदियों में रेत का खनन प्राकृतिक तौर पर रेत के बनने की दर से कहीं ज्यादा है जो ज़रूरी समुद्री और नदी पारिस्थितिकी को खतरे में डालता है। जानकारों का कहना है कि रणनीतिक स्वायत्तता और दीर्घकालिक सतत विकास के लक्ष्यों को साथ लाने की ख़ास ज़रूरत है। कई शोधकर्ता पहले से ही ‘रिड्यूस एंड रीसायकल’ यानी इस्तेमाल को कम करने और पुनः चक्रण के सिद्धांत पर आधारित रेयर-अर्थ एक्सट्रैक्शन के विकल्प खोजकर उस पर काम कर रहे हैं।
काउंसिल फॉर क्रिटिकल मिनरल डेवलपमेंट इन द ग्लोबल साउथ, जो कई संस्थाओं का एक साझा मंच है, के को-फाउंडर, संदीप पाई, इसी सिद्धांत को दोहराते हैं और मानते हैं कि “बड़े माइनिंग इकोसिस्टम में रेयर अर्थ माइनिंग का कुल हिस्सा बहुत कम है। इसके बावजूद भी हमें अलग-अलग माइन टेलिंग्स, या वेस्ट, एसिड माइन ड्रेनेज और फ्लाई ऐश जैसे कोल वेस्ट से इन तत्वों को निकालने (रिकवरी) जैसे विकल्पों पर ध्यान देना चाहिए।” जब कई देश आपूर्ति बढ़ाने के लिए नई माइनिंग की खोज की ओर देख रहे हैं, भारत के लिए रिकवरी और मांग में कमी के कुछ ज़रूरी उदाहरण हैं जिन पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

ज़रूरी मिनरल्स तक सर्कुलर रास्ता
साल 2010 में, जापानी तटरक्षकों ने विवादित सेनकाकू द्वीपों पर जापानी जहाजों से टकराने के बाद एक चीनी मछली पकड़ने वाली नाव को रोक लिया था। जवाबी कार्रवाई में चीन ने जापान को REEs का निर्यात रोक दिया। इसके बाद जापान ने एक दीर्घकालिक रणनीतिक योजना शुरू की, ताकि न केवल REEs के लिए चीन पर वो अपनी निर्भरता कम कर सके, बल्कि REEs पर अपनी निर्भरता पूरी तरह से कम कर सके। हालाँकि, जापान के REE इस्तेमाल का लगभग 60% हिस्सा अभी भी चीनी आयात होता है, लेकिन REE की डिमांड और सप्लाई को लेकर जापान और यहां तक कि अमेरिका जैसे देशों के तरीकों से पर्यावरण के लिए ज़रूरी सबक सीखे जा सकते हैं।
पहला कदम REEs के विकल्प पहचानने और रेयर अर्थ-फ्री मैग्नेट बनाने से जुड़ा है। होंडा और डाइडो स्टील ने 2016 में घोषणा की थी कि उन्होंने डिस्प्रोसियम जैसे भारी REE को हटाने के लिए नियोडिमियम मैग्नेट के प्रोडक्शन में बदलाव किया है। डाइकिन ने पारंपरिक मॉडल की तुलना में 95% कम REEs वाले एयर कंडीशनर लॉन्च करने की भी घोषणा की, जिससे डिस्प्रोसियम जैसे भारी रेयर अर्थ की ज़रूरत ख़त्म हो गई। हालाँकि, यह सिर्फ भारी रेयर अर्थ से मुक्त है, न कि REEs की मीडियम और लाइट कैटेगरी से। अमेरिकन केमिकल सोसाइटी – सस्टेनेबल केमिस्ट्री एंड इंजीनियरिंग में 2023 में छपी एक और स्टडी ने दिखाया है कि रेयर अर्थ एलिमेंट से पूरी तरह मुक्त मैग्नेट न केवल संभव हैं, बल्कि ये मैग्नेट, इसके लाइफ-साइकल असेसमेंट के अनुसार, कार्बन फुटप्रिंट में 95% की कमी भी लाते हैं।
दूसरा तरीका मौजूदा इलेक्ट्रॉनिक्स को रीसायकल करके उनके रेयर अर्थ एलिमेंट्स को रिकवर करने पर केंद्रित है। पाई ने जिन तरीकों के बारे में बताया है, उनके अलावा, क्योटो यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स ने लोगों और उद्योंगो द्वारा इस्तेमाल किये जाने वाले सामानों में इस्तेमाल होने वाले मैग्नेट से REEs को अलग करने और रीसायकल करने जैसे उपाय निकाले हैं। इसे सेलेक्टिव एक्सट्रैक्शन-इवैपोरेशन-इलेक्ट्रोलिसिस (SEEE) प्रोसेस के नाम से जाना जाता है, इसने लैब टेस्ट में नियोडिमियम (Nd) के लिए लगभग 96% और डिस्प्रोसियम (Dy) के लिए 91% रिकवरी रेट दिखाए। ये रेयर अर्थ हाई-परफॉर्मेंस मैग्नेट में मुख्य घटक हैं, जिनका इस्तेमाल इलेक्ट्रिक गाड़ियों और विंड टर्बाइन जैसी टेक्नोलॉजी में होता है।
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अमेरिका में उसके औद्योगिक साथियों ने बेकार हो चुकी हार्ड ड्राइव और सर्वर के हार्डवेयर से REEs, साथ ही उच्च गुणवत्ता वाला सोना, तांबा और स्टील रिकवर किया है। वे उन्हें वापस इलेक्ट्रिक गाड़ियों, इलेक्ट्रॉनिक्स और विंड एनर्जी प्रोडक्शन में लगा रहे हैं। उद्योगों में इस्तेमाल के लिए इन उपायों को और आगे बढ़ाने के लिए और ज़्यादा पुनरावृत्तियों की ज़रूरत है, लेकिन वे ज़्यादा सुरक्षित, साफ़ विकल्प दिखाते हैं।
वाशिंगटन में हुई बैठक के बाद वैष्णव ने रीसाइक्लिंग के महत्व पर भी ज़ोर दिया, क्योंकि यह “वेस्ट प्रोडक्ट्स से मिनरल्स निकालने का एक अच्छा तरीका है।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 16 जनवरी, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: पवन चक्कियों से लेकर इलेक्ट्रिक गाड़ियों तक, आधुनिक हरित प्रौद्योगिकी नियोडिमियम और डिस्प्रोसियम जैसे तत्वों पर निर्भर करती हैं। तस्वीर – हिरल राणा द्वारा विकिमीडिया कॉमन्स (CC BY-SA 4.0) के माध्यम से।