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पन्ना टाइगर रिजर्व: क्यों सिर्फ बाघ लौटना काफी नहीं होता जंगल बचाने के लिए

दो मौसमों के दौरान ली गई चालीस हजार से ज़्यादा कैमरा ट्रैप तस्वीरों के एक स्टडी से पता चला है कि शिकारी जानवर, पारिस्थितिकी तंत्र को नियंत्रित करने वाले अकेले जीव के तौर पर काम करने के बजाय, शिकार की मौजूदगी से गहराई से जुड़े होते हैं। बाघों की मौजूदगी का चीतल और सांभर से मजबूत संबंध पाया गया। तस्वीर: सुप्रतिम दत्ता।

दो मौसमों के दौरान ली गई चालीस हजार से ज़्यादा कैमरा ट्रैप तस्वीरों के एक स्टडी से पता चला है कि शिकारी जानवर, पारिस्थितिकी तंत्र को नियंत्रित करने वाले अकेले जीव के तौर पर काम करने के बजाय, शिकार की मौजूदगी से गहराई से जुड़े होते हैं। बाघों की मौजूदगी का चीतल और सांभर से मजबूत संबंध पाया गया। तस्वीर: सुप्रतिम दत्ता।

  • मध्य प्रदेश के पन्ना टाइगर रिजर्व में किए गए एक अध्ययन में इस बात का विश्लेषण किया गया कि इलाके में बाघों को दोबारा बसाने के बाद अलग-अलग प्रजातियां एक-दूसरे के प्रति कैसा व्यवहार करती हैं।
  • इससे पता चला कि शिकारी जानवर पहले से ही प्रचुर मात्रा में उपलब्ध शिकार-आधार पर काफी हद तक निर्भर थे और लकड़बग्घे जैसे मृतभक्षी जीवों का भी पेट भरते थे। इससे पता चलता है कि नियंत्रण और सुविधा प्रदान करने जैसी स्थितियों एक साथ काम कर रही थी।
  • अध्ययन से पता चला कि सिर्फ शिकारी प्रजातियों को फिर से बसाना ही किसी पारिस्थितिकी तंत्र के लिए पर्याप्त नहीं है। पारिस्थितिकी तंत्र को संवारने के लिए वहां शिकार की आबादी बढ़ाना, सुरक्षित आवास तथा पानी जैसे जरूरी संसाधनों की उपलब्धता जरूरी है।

साल 2009 की बात है। मध्य प्रदेश के पन्ना टाइगर रिजर्व में अवैध शिकार के कारण सभी बाघ खत्म हो गए थे। कुछ साल बाद उन्हें वहां फिर से बसाया गया और तब से उनकी आबादी फिर बढ़ रही है।

वैसे, मांसाहारी जीवों को दोबारा बसाने को पारिस्थितिकी संतुलन बहाल करने की अहम रणनीति माना जाता है, लेकिन हाल के एक अध्ययन से पता चलता है कि शिकार की उपलब्धता और आवास की गुणवत्ता भी इसमें अहम भूमिका निभाती है।

भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) के शोधार्थी और इस अध्ययन के लेखकों में शामिल सुप्रतिम दत्ता कहते हैं, “सिर्फ सबसे बड़े शिकारी (पारिस्थितिकी तंत्र को बेहतर बनाने के लिए) पर ध्यान देना पूरी कवायद का महज छोटा-सा हिस्सा है। असल जवाब उन स्तनधारी जानवरों के बड़े समूह में छिपा है जो उन्हें सहारा देते हैं। असली सवाल यह नहीं है कि बाघ वापस आए या नहीं, बल्कि यह है कि उनकी वापसी किस वजह से मुमकिन हो पाई।”

चरम स्थितियों पर बना रिजर्व

मध्य प्रदेश का पन्ना टाइगर रिजर्व 1,574 वर्ग किलोमीटर में फैला है। इसमें 542 वर्ग किलोमीटर का मुख्य इलाका और बड़ा बफर जोन शामिल है। यहां की जमीन ऊबड़-खाबड़ है और केन नदी यहां से होकर गुजरती है जो पानी का एकमात्र बारहमासी जरिया है। गर्मियों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है और सर्दियों में तापमान 5 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है। यहां मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन पाए जाते हैं।

इस रिजर्व में स्तनधारी जीवों की बड़ी आबादी पाई जाती है। बाघ और तेंदुए यहां के सबसे बड़े शिकारी हैं। खाद्य श्रृंखला में उनसे नीचे भेड़िये, सियार और लकड़बग्घे हैं। इनके शिकार में चीतल, सांभर, नीलगाय और जंगली सूअर शामिल हैं। बफर जोन में बनी बस्तियों में लगभग तीस हजार लोग रहते हैं।

केन नदी पन्ना के सभी स्तनधारी जीवों और बफर जोन में रहने वाले लगभग तीस हजार लोगों के लिए पारिस्थितिक आधार का काम करती है। तस्वीर: सुप्रतिम दत्ता।
केन नदी पन्ना के सभी स्तनधारी जीवों और बफर जोन में रहने वाले लगभग तीस हजार लोगों के लिए पारिस्थितिक आधार का काम करती है। तस्वीर: सुप्रतिम दत्ता।

यह समझने के लिए कि अलग-अलग जीव इस इलाके का इस्तेमाल कैसे करते हैं, शोधकर्ताओं ने 2019 में बड़े पैमाने पर कैमरा ट्रैप सर्वे किया। हर कैमरा एक महीने से ज्यादा अवधि तक लगातार चलता रहा और रास्तों, नदी के किनारों और जंगल की सड़कों पर घूमते हुए जानवरों की तस्वीरें लेता रहा। कुल मिलाकर, कैमरों ने सर्दियों में 475 जगहों और गर्मियों में 338 जगहों की तस्वीरें लीं।

अध्ययन के दौरान जानवरों का पता लगाने वाली लगभग 40,308 तस्वीरें प्राप्त हुईं। इन तस्वीरों में लगभग 10 प्रमुख प्रजातियों की पहचान की गई। तस्वीरों में मवेशी सबसे अधिक देखे गए, इसके बाद चितल और सांभर का रहे। मांसाहारी जीवों में लकड़बग्घा सबसे अधिक देखे गए। इसके बाद सुनहरे सियार और तेंदुआ दर्ज किए गए।

हर जगह पर टीम ने पानी, गांवों, जंगल और ढलान जैसी चीजों का भी रिकॉर्ड रखा। दत्ता कहते हैं, “एक ही जगह पर बाघ और चीतल का दिखना दो बहुत अलग-अलग बातें हो सकती हैं। हो सकता है कि बाघ शिकार का पीछा कर रहा हो या फिर शिकार बाघ से बच रहा हो।”

इस जटिल संबंध को समझने के लिए शोधकर्ताओं ने ऐसे मॉडलिंग तरीके का इस्तेमाल किया, जो एक साथ कई प्रकार के संबंधों का परीक्षण कर सकते हैं। उन्होंने इसके तीन अलग-अलग मॉडल तैयार किए। पहले मॉडल में यह मानकर विश्लेषण किया गया कि पारिस्थितिकी तंत्र को मुख्य रूप से शिकारी प्रजातियां चलाती हैं। दूसरे मॉडल में यह परिकल्पना रखी गई कि शिकार प्रजातियों की उपलब्धता ही इसे चलाती है। तीसरे मॉडल में इन दोनों कारकों को पर्यावरण से जुड़ी परिस्थितियों के साथ जोड़कर विश्लेषण किया गया। “हमें ऐसे ढांचे की जरूरत थी, जो दोनों दिशाओं में काम करने वाले संबंधों का मॉडल तैयार कर सके और उनके अलग-अलग योगदान को स्पष्ट रूप से समझा सके,” सुप्रतिम दत्ता कहते हैं।

मिले-जुले मॉडल ने सबसे अच्छा प्रदर्शन किया, जिससे पता चलता है कि सिस्टम को किसी एकमात्र कारक से नहीं समझा जा सकता।

अकेली वजह नहीं

शिकारी जीव पारिस्थितिकी तंत्र को नियंत्रित करने वाले अकेले कारक के तौर पर काम करने के बजाय, शिकार के बंटे होने से गहराई से जुड़े हुए दिखाई देते हैं। बाघों की मौजूदगी का सीधा संबंध चीतल और सांभर से था। वहीं, तेंदुए की मौजूदगी नीलगाय, खरगोश और जंगली सूअर की उपलब्धता से जुड़ी हुई थी।

जो चीजें वहां नहीं थीं, वे भी उतनी ही जरूरी थीं। शिकारियों द्वारा शिकार की संख्या कम करने का जो पैटर्न उम्मीद के मुताबिक था, वह आखिरी मॉडल में साफ तौर पर नहीं दिखा। दत्ता कहते हैं, “बाघों ने अपने शिकार की संख्या को घटाकर संतुलन की स्थिति में नहीं पहुंचाया। वे शिकार के उस समूह का पीछा करते थे जो पहले से ही बड़ी संख्या में मौजूद था और खास इलाके में फैला हुआ था।”

साथ ही, अध्ययन में यह भी पाया गया कि शिकारी और शिकार, दोनों मिलकर इस पारिस्थितिकी तंत्र की संरचना को प्रभावित करते हैं और इनमें से कोई भी अकेले इसकी गतिशीलता को नियंत्रित नहीं करता।

पन्ना में एक सियार और एक बाघ। तस्वीर: सुप्रतिम दत्ता।
पन्ना में एक सियार और एक बाघ। तस्वीर: सुप्रतिम दत्ता।

पन्ना के मामले में, दोबारा बसाने की कोशिश शायद इसलिए सफल रही, क्योंकि वहां शिकार और आवास पहले से ही मौजूद थे।

वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन ट्रस्ट के अध्यक्ष और सीईओ अनीश अंधेरिया कहते हैं “किसी पारिस्थितिकी समुदाय के कामकाज को तय करने में शिकार प्रजातियां उतनी ही अहम हैं जितने कि शिकारी। शिकारी प्रजातियों को फिर से बसाना शिकार की सघनता पर निर्भर करता है, ठीक वैसे ही जैसे शिकार प्रजातियों की आबादी शिकारियों से प्रभावित होती है। पन्ना में बाघ शिकार प्रजातियों की कमी के कारण नहीं, बल्कि अवैध शिकार के कारण खत्म हुए थे। अन्य कई परिदृश्यों में स्थिति ऐसी नहीं है।” वे इस अध्ययन से सीधे तौर पर नहीं जुड़े थे।

दूसरे शिकारियों की मदद करते शिकारी जीव

अधिकांश पारिस्थितिकी तंत्रों में यह उम्मीद की जाती है कि बड़े शिकारी छोटे मांसाहारी जीवों की संख्या या गतिविधियों को सीमित करेंगे। इसके विपरीत, पन्ना में अध्ययन ने इनके बीच मजबूत सकारात्मक संबंध पाए। लकड़बग्घे उन क्षेत्रों में ज्यादा पाए गए जहां बाघ और तेंदुए मौजूद थे। दत्ता कहते हैं, “दबाए जाने के बजाय, लकड़बग्घों ने बाघों और तेंदुओं के साथ मजबूत सकारात्मक संबंध दिखाया।”

इसकी संभावित वजह मृतक जानवरों को खाना है। बड़े शिकारी जानवर मृतकों के अवशेष छोड़ देते हैं, जो लकड़बग्घों का भोजन बन जाते हैं।

इस अध्ययन में इसे पोषण संबंधी सहायता बताया गया है, जिसमें शिकारी जीव परोक्ष तौर पर अन्य प्रजातियों की मदद करते हैं, जबकि संभावित रूप से उनसे प्रतिस्पर्धा भी करते हैं। दत्ता कहते हैं, ” वास्तव में ऐसे नतीजे की उम्मीद नहीं थी। शीर्ष शिकारी जीव मृत जीवों का मांस उपलब्ध कराकर सफाईकर्मी जीवों के समूह की मदद कर रहे थे।”

पानी से जुड़ी हर चीज

प्रजातियों के फैलाव पर असर डालने वाले पर्यावरण से जुड़े कारकों में पानी के स्रोत से नजदीकी अहम चीज थी। अलग-अलग प्रजातियों के मामले में, पानी के स्रोत से दूरी बढ़ने पर जानवरों के दिखाई देने की संभावना कम हो जाती थी।

पन्ना जैसे सूखे इलाके में ऐसा होना स्वाभाविक है। दत्ता कहते हैं, “केन नदी की पूरे स्तनधारी समुदाय के पारिस्थितिकी तंत्र में बेहद अहम भूमिका है।”

अलग-अलग प्रजातियों में पानी से दूरी बढ़ने पर जानवरों के दिखाई देने की संभावना कम हो गई। तस्वीर: सुप्रतिम दत्ता।
अलग-अलग प्रजातियों में पानी से दूरी बढ़ने पर जानवरों के दिखाई देने की संभावना कम हो गई। तस्वीर: सुप्रतिम दत्ता।

जंगल के फैलाव ने भी जानवरों के वितण पर असर डाला। तेंदुए और सांभर घने जंगल वाली जगहों को अधिक पसंद करते थे, जबकि सियार ऐसी जगहों से दूर ही रहते थे।

इंसानों की मौजूदगी का मिला-जुला असर देखा गया। ज्यादातर जंगली जानवर गांवों से दूर रहते थे, जबकि मवेशी और जंगली सूअर इंसानी बस्तियों के आस-पास अधिक देखे जाते थे।

मौजूदा चीजों पर निर्भर बहाली

अध्ययन के समग्र नतीजे बताते हैं कि पन्ना में फिर से बसाने को सिर्फ एक वजह, जैसे कि बाघों को फिर से बसाने से नहीं समझाया जा सकता। यह शायद इसलिए सफल हुआ, क्योंकि पारिस्थितिकी तंत्र के कई अहम घटक पहले से ही मौजूद थे और काम कर रहे थे। यह नतीजा संरक्षण को देखने के नजरिए में बदलाव लाता है। अनीश अंधेरिया कहते हैं, “शिकारी प्रजातियों को फिर से बसाना स्वस्थ शिकार आधार और सुरक्षित आवास से प्रेरित होता है। इनके बिना फिर से बसाने की प्रक्रिया धीमी पड़ जाती है।”


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पारिस्थितिकी तंत्र को संवारने का आधार सिर्फ शिकारी प्रजातियां नहीं हो सकती। इसमें शिकार प्रजातियों, आवास और पानी जैसे बुनियादी संसाधनों को भी ध्यान में रखना जरूरी है। इनके बिना शिकारी प्रजातियों को फिर से बसाना सफल नहीं हो सकता। दत्ता कहते हैं, “किसी शिकारी प्रजाति की फिर से बसाई गई आबादी अपने आप में किसी पारिस्थितिकी तंत्र को संवार नहीं सकती; बल्कि यह बताती है कि क्या वहां पहले से ही स्थिर और स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र मौजूद है।


यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर  27 मई, 2026 को प्रकाशित हुई थी।


बैनर तस्वीर: दो मौसमों के दौरान ली गई चालीस हजार से ज़्यादा कैमरा ट्रैप तस्वीरों के एक स्टडी से पता चला है कि शिकारी जानवर, पारिस्थितिकी तंत्र को नियंत्रित करने वाले अकेले जीव के तौर पर काम करने के बजाय, शिकार की मौजूदगी से गहराई से जुड़े होते हैं। बाघों की मौजूदगी का चीतल और सांभर से मजबूत संबंध पाया गया। तस्वीर: सुप्रतिम दत्ता।

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