- भारत के बंगाल टाइगर को कंबोडिया के जंगलों में बसाया जाएगा, जहां बाघों की स्थानीय आबादी खत्म हो चुकी है।
- कंबोडिया की इन बाघों को कार्डामम के पहाड़ों में फिर से बसाने की योजना है जो दशकों पहले वहां से खत्म हो गए। इस योजना के बाद पारिस्थितिकी से जुड़ी तैयारी, शासन और समुदाय पर पड़ने वाले असर को लेकर बहस शुरू हो गई है।
- भारत से बाघों को कंबोडिया ले जाने की योजना पर जानकार चिंता जता रहे हैं। उनका कहना है कि वहां के जंगलों में शिकार की संख्या कम है, इसलिए बाघों के लिए लंबे समय तक जीवित रहना और स्थायी आबादी बनाना मुश्किल हो सकता है।
- बाघों को छोड़े जाने वाले प्रस्तावित क्षेत्र के नजदीक बसे ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें यहां के जंगलों में बाघ लाए जाने की योजना के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है, जिनसे उनकी आजीविका चलती है।
छप्पन साल के साट बॉर्न को वह दिन आज भी याद है जब उन्होंने पहली बार उस बाघ को देखा था। तब वे जंगल के प्रवेश द्वार पर ही डर के मारे ठिठक गए थे। ‘उसका सिर इतना बड़ा था,’ वे आंखें फैलाते हुए कहते हैं और जानवर का आकार दिखाने के लिए अपने हाथों को फैलाते हैं।”
अब केले और ड्यूरियन की खेती करने वाले बॉर्न साल 2001 की उस सुबह को याद करते हुए दक्षिण-पश्चिमी कंबोडिया के कार्डामम पहाड़ों के वर्षावनों में बसे ट्रापेआंग छेउ त्राव गांव के अपने घर से वापस उसी रास्ते पर आगे बढ़ते हैं। जंगल की छतरी से ऊपर उठती एक पहाड़ी पर चढ़ते हुए वे सड़क पर एक जगह की ओर इशारा करते हैं। ‘वह यहीं था। जब मैंने बाघ को देखा, तब सुबह के 9 बज रहे थे,’ वह कहते हैं। ‘सच में, मैं बहुत डर गया था… मुझे समझ नहीं आ रहा था कि बाघ मेरी ओर आ रहा है या नहीं।’
बॉर्न की इस क्षणिक मुलाकात के महज छह साल बाद यानी साल 2007 में कंबोडिया में बाघ की आखिरी तस्वीर एक कैमरा ट्रैप में दर्ज की गई। 1990 के दशक में इस देश में सैकड़ों जंगली इंडोचाइनीज बाघ पाए जाने का अनुमान था, लेकिन दशकों तक चले अवैध शिकार के दबाव ने उनकी संख्या को गंभीर रूप से प्रभावित किया। 2016 में बाघों (पैंथेरा टाइग्रिस\Panthera tigris) को आधिकारिक रूप से कंबोडिया में विलुप्त घोषित कर दिया गया।”
हालांकि, भारत से बंगाल टाइगर की छोटी आबादी को जल्द ही कंबोडिया लाए जाने की योजना के साथ यह स्थिति बदल सकती है।”

हालांकि वन्यजीवों को फिर से बसाने की कई योजनाएं सफल रही हैं, लेकिन यह योजना कुछ गंभीर सवाल खड़े करती है। कंबोडिया ऐसे बाघ को क्यों बसाना चाहता है जो स्थानीय प्रजाति का नहीं है? क्या इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों से पर्याप्त सलाह-मशविरा किया गया है? क्या लाए जाने वाले बाघ इस नए आवास को अपना घर बना पाएंगे? क्या वहां उनके जीवित रखने के लिए पर्याप्त शिकार उपलब्ध है और अगर नहीं, तो जब भूखे बाघ मवेशियों का शिकार करेंगे, तब सरकार इस समस्या से किस तरह निपटेगी? साथ ही, पेड़ों की कटाई और निर्माणाधीन पांच नए बांधों के बीच बाघों के प्रस्तावित आवास का भविष्य क्या होगा?
और शायद सबसे बड़ा सवाल यह है: अगर व्यापक अवैध शिकार ने कंबोडिया के बाघों को खत्म कर दिया था और आज भी एशिया के अवैध बाजारों में बाघों के अंगों की भारी मांग बनी हुई है, तो कंबोडिया यह कैसे पक्का करेगा कि ऐसा फिर ना हो?
शिकार से विलुप्त हुई मशहूर प्रजाति
1979 में खमेर रूज शासन के पतन के बाद कंबोडिया लंबे समय तक संघर्ष और गृहयुद्ध जैसी परिस्थितियों से जूझता रहा। इसी दौरान देश क्षेत्रीय वन्यजीव व्यापार का हिस्सा बन गया और बाघों के अंगों की आपूर्ति अंतरराष्ट्रीय अवैध बाजारों, खासकर चीन तक होने लगी, जहां उनका इस्तेमाल पारंपरिक दवाओं और विलासिता की चीजों में किया जाता था।”
बाघों का अवैध शिकार बेरोकटोक जारी रहा। शिकारी बाघों को मारने के लिए फंदे, बंदूकें, गड्ढे वाले जाल और यहां तक कि लैंड माइंस तक का इस्तेमाल कर रहे थे।”
बॉर्न लगभग तीन दशक पुराने दिनों को याद करते हुए कहते हैं, ‘कई शिकारी बाघों को फंदों में पकड़ते थे।’ ‘उस समय कानून-व्यवस्था लगभग चरमरा गई थी।’ 2005 में कंबोडिया की एक अदालत ने कुख्यात शिकारी योर न्गुन को सात साल कैद की सजा दी। उसने 1970 के दशक से 600 से अधिक वन्यजीवों के शिकार की बात कबूली थी, जिसमें 19 बाघ शामिल थे।
बाघों के खत्म हो जाने के बाद भी अन्य प्रजातियों का अवैध शिकार बेरोकटोक जारी रहा। 2023 में देश ने एक और मशहूर बड़ी बिल्ली की प्रजाति खो दी, जब इंडोचाइनीज तेंदुए (पैंथेरा पार्डस डेलाकोरी) को कंबोडिया में पूरी तरह विलुप्त घोषित कर दिया गया।”
भारतीय संरक्षण समूह ‘द कॉर्बेट फ़ाउंडेशन’ के ट्रस्टी निर्मल घोष कहते हैं, “यह विडंबना ही है कि हम भारत के सबसे अधिक संरक्षित जीवों में से एक और अपनी मुख्य प्रजाति को ऐसे देश में भेज रहे हैं, जिसका वन्यजीव संरक्षण का रिकॉर्ड सबसे खराब देशों में गिना जाता है और जहां फंदों से शिकार और वन्यजीवों का अवैध व्यापार बड़े स्तर पर जारी है।”
“इसके बावजूद, 2016 में कंबोडिया ने राष्ट्रीय बाघ कार्य योजना को मंजूरी दी और 2022 में भारत-कंबोडिया समझौता हुआ। इसके बाद भारत बंगाल टाइगर का छोटा समूह कंबोडिया को उपलब्ध कराने की तैयारी कर रहा है। इन बाघों को कार्डामम की पहाड़ियों के जंगलों में बसाकर वहां बाघों की आबादी फिर से बढ़ाने की कोशिश की जाएगी।”

इस कार्यक्रम की कई बातों की तरह ही बाघों के समूह की पक्की जानकारी अभी तक अस्पष्ट है।
भारत के संरक्षण समूह ‘आरण्यक’ के उप निदेशक और कंबोडिया के पर्यावरण मंत्रालय के लिए टाइगर को फिर से बसाने के अंतरराष्ट्रीय कंसल्टेंट जिमी बोराह कहते हैं, “इस ऐक्शन प्लान में चार या छह बाघ शामिल हैं। इनमें चार मादा और एक या दो नर बाघ हो सकते हैं। हमने शुरुआती तौर पर यही योजना बनाई है।”
हालांकि, भारत में इस प्रोजेक्ट की देखरेख कर रहे भारतीय वन्यजीव संस्थान के वैज्ञानिक के. रमेश का अनुमान है कि 11 बाघों को बसाया जाएगा।
घोष कहते हैं, “अगर यह कोशिश नाकाम हो जाती है और कुछ बाघ मर जाते हैं, तो भारत में इसका जबरदस्त विरोध होगा।” वह चेतावनी देते हैं कि कंबोडिया में बाघों के विलुप्त होने की वजहों को दूर किए बिना, उन्हें वहां दोबारा बसाना खतरनाक साबित हो सकता है।
भारत में बाघों की संख्या बढ़ाने की कोशिशें 1973 में शुरू हुई थीं। उस समय बाघों के संरक्षण का मुख्य कार्यक्रम ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ लॉन्च किया गया था। तब से बाघों की संख्या दोगुनी से भी ज्यादा हो गई है। 2022 की गिनती के अनुसार, यह संख्या अनुमानित 1,800 से बढ़कर 3,600 हो गई है।
“फिर भी, बेहतर संरक्षण और बाघों की बढ़ती आबादी के बावजूद आवासों का सिकुड़ना, अवैध शिकार और मानव-वन्यजीव संघर्ष जैसी चुनौतियां भारत में बाघों की सुरक्षा के लिए लगातार खतरा बनी हुई हैं।”

![अगर बाघों को दोबारा बसाने का प्रोजेक्ट आगे बढ़ता है, तो फेप को बाघों के हमले की कोई चिंता नहीं है। उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि यह अच्छा [प्रोजेक्ट] है, क्योंकि इससे हम जंगली जानवरों को नहीं खोएंगे।" तस्वीर: एंडी बॉल/मोंगाबे।](https://imgs.mongabay.com/wp-content/uploads/sites/35/2026/06/26160233/Tigers-Cambodia_Mongabay_Andy-Ball-7-768x512-1.jpg)
बाघों के लिए शिकार की कमी
मांसाहारी जीवों के जीवविज्ञानी और बाघ विशेषज्ञ के. उल्लास कारंत इस बात पर जोर देते हैं कि आखिरकार बाघों का अस्तित्व शिकार प्रजातियों के घनत्व पर निर्भर करता है। एक वयस्क बाघ लगभग हर हफ्ते हिरण या गाय के आकार के एक जानवर का शिकार करता है, जबकि प्रजनन करने वाली बाघिन को इससे भी ज्यादा शिकार की जरूरत हो सकती है। वे इसकी तुलना सावधि जमा के ब्याज पर जीवनयापन करने से करते हैं। उनका कहना है कि शिकार प्रजातियों की आबादी सालाना शिकार की संख्या से लगभग 10 गुना अधिक होनी चाहिए, तभी वह स्थिर बनी रह सकती है। यानी, अगर एक बाघ साल में लगभग 50 बड़े शिकार करता है, तो उसके लिए लगभग 500 बड़े शिकार-योग्य जानवरों की उपलब्धता जरूरी है। कारंत कहते हैं, “इसके बिना बाघों को ‘खाली’ जंगलों में छोड़ देने से कोई फायदा नहीं होता।” वे बताते हैं कि 1990 के दशक में कंबोडिया में शिकार प्रजातियों की कमी और अवैध शिकार के कारण बाघों की संख्या में भारी गिरावट आई थी और उनके अनुसार ऐसे दबाव आज भी वहां बने हुए हैं।
बाघों को 9,26,123 हेक्टेयर (2.29 मिलियन-एकड़) वाले क्रावान नेशनल पार्क में छोड़े जाने की योजना है जो कार्डामम के पहाड़ों में फैले संरक्षित वन तंत्र का हिस्सा है। हालांकि, यह इलाका कंबोडिया के सबसे सुरक्षित और अक्षुण्ण इलाकों में से एक है। फिर भी, कुछ विशेषज्ञों को इस बात पर संदेह है कि क्या यहां बाघों की आबादी को बनाए रखने के लिए पर्याप्त शिकार मौजूद हैं।
साल 2020 में कंजर्वेशन साइंस एंड प्रैक्टिस जर्नल में छपे एक शोध में पाया गया कि “बाघों की ठीक-ठाक आबादी को बनाए रखने के लिए पर्याप्त शिकार नहीं होने का जोखिम इतना ज्यादा है कि फैसला लेने वाले बाघों को दोबारा बसाने के विचार को मंजूरी नहीं दे सकते।” इस अध्ययन को वाइल्डलाइफ अलायंस (इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने वाली गैर-लाभकारी संस्था) और नॉर्वेजियन इंस्टीट्यूट फॉर नेचर रिसर्च ने मिलकर किया था। अध्ययन में अनुमान लगाया गया कि इस इलाके में 25 वयस्क बाघों के रहने लायक संसाधन होने की संभावना 25% से भी कम है। अध्ययन में यह भी पाया गया कि जंगल में पांच बाघों की छोटी आबादी के लिए पर्याप्त शिकार होने की संभावना 80% है लेकिन, छोटी आबादी में अक्सर आपस में प्रजनन (इनब्रीडिंग) की समस्या हो जाती है और इससे उनके लंबे समय तक जीवित रहने की संभावना कम हो जाती है।
घोष पूछते हैं, “ऐसे इलाके में बाघों को क्यों लाया जाए जो शुरू से ही उनके रहने के लिए बहुत अच्छा नहीं है?”
कंबोडिया सरकार में संरक्षित क्षेत्रों की देखरेख करने वाले कार्यालय के उप निदेशक फान चन्ना के अनुसार, अभी सबसे जरूरी काम बाघों के विलुप्त होने की वजहों को दूर करना और उन्हें दूसरी जगह ले जाने से पहले उनके शिकार की आबादी को फिर से बढ़ाना है। चन्ना का कहना है कि यह काम सख्त कानून लागू करके, जाल बिछाने को पूरी तरह रोककर, गश्त बढ़ाकर और प्रजनन व दूसरी जगहों से लाकर शिकार की आबादी को फिर से बढ़ाकर किया जाएगा।
चन्ना ने यह नहीं बताया कि शिकार की आबादी को फिर से बढ़ाने और कानून लागू करने की कोशिशों की समय-सीमा उस योजना के साथ किस तरह मेल खाएगी, जिसके तहत हाल तक बाघों को 2025 के आखिर तक कंबोडिया लाने का लक्ष्य रखा गया था।
एक अन्य चिंता शिकार की अलग-अलग प्रजातियों को लेकर है। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के ग्लोबल टाइगर प्रोग्राम से जुड़े और 2020 के अध्ययन के सह-लेखक थॉमस ग्रे कहते हैं कि कार्डामम के पहाड़ों पर बाघों के आहार का मुख्य हिस्सा शायद जंगली सूअर होंगे। हालांकि, यहां गौर, सांभर हिरण और सेरो (बकरी-जैसा जंगली खुरदार स्तनपायी) जैसी प्रजातियां भी पाई जाती हैं, लेकिन उपलब्ध शिकार का अधिकांश हिस्सा जंगली सूअरों से बना है। ग्रे कहते हैं, “बाघों को फिर से बसाने की सफलता काफी हद तक जंगली सूअरों के घनत्व और उनकी संख्या पर निर्भर करेगी। यह इस बात पर भी निर्भर करेगा कि बाघ ऐसे आहार के साथ कितनी अच्छी तरह तालमेल बिठा पाते हैं, जिसमें मुख्यतः जंगली सूअर शामिल हों, लेकिन पूरी तरह नहीं।” वे यह भी जोड़ते हैं कि जंगली सूअरों पर ज्यादा निर्भरता कोई असामान्य बात नहीं है। दक्षिण एशिया के कुछ हिस्सों और यहां तक कि रूस के सुदूर पूर्वी इलाके में रहने वाले बाघ भी अपने भोजन के लिए काफी हद तक जंगली सूअरों पर निर्भर रहते हैं।
करंथ का कहना है कि बाघों का गुजारा तभी हो सकता है जब सुअरों की संख्या ज्यादा हो। साथ ही, उन्हें कंबोडिया में शिकार के घनत्व पर हुए ऐसे किसी ठोस अध्ययन की जानकारी नहीं है जो इस बात की पुष्टि करता हो।

उप-प्रजातियों से जुड़े सवाल
स्थानांतरण के लिए चुने जाने वाले बाघों के प्रकार को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
कार्डामम के पहाड़ों में कभी विचरण करने वाले बाघों को ऐतिहासिक रूप से इंडो-चाइनीज उप-प्रजाति (पैंथेरा टाइग्रिस कॉर्बेटी) के तौर पर पहचाना जाता था; इनकी छोटी आबादी आज भी थाईलैंड और म्यांमार में मौजूद है। इसके उलट, भारत से लाए जाने वाले बाघ बंगाल उप-प्रजाति (पैंथेरा टाइग्रिस टाइग्रिस) से हैं, जिनकी संख्या कहीं ज्यादा है।
क्या ये आबादियां वास्तव में अलग-अलग उप-प्रजातियों का प्रतिनिधित्व करती हैं, यह विषय लंबे समय से वैज्ञानिक बहस का हिस्सा रहा है। वैश्विक वन्यजीव संरक्षण प्राधिकरण इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (आईयूसीएन) के अनुसार, विभिन्न वैज्ञानिक पद्धतियों से मिले असंगत नतीजों के कारण इस सवाल पर अभी तक पूरी तरह सहमति नहीं बन पाई है। कुछ शोध जिनमें 2015 में जर्नल साइंस एडवांसेज में छपा एक अध्ययन भी शामिल है, इस नतीजे पर पहुंचा कि मुख्यभूमि एशिया के सभी बाघ एक ही उप-प्रजाति (पी टी टाइग्रिस) से संबंधित हैं। इस वर्गीकरण में भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बाघ एक ही उप-प्रजाति के माने जाते हैं। वहीं इंडोनेशिया के द्वीपों पर पाए जाने वाले बाघ (जिसमें सुमात्रा के बाघ और अब विलुप्त हो चुके जावा और बाली के बाघ भी शामिल हैं) दूसरी उप-प्रजाति (पी टी सोनाडायका) में शामिल किए गए हैं। इसके विपरीत, अन्य वैज्ञानिक पद्धतियां और 2018 में पत्रिका करेंट बायोलॉजी में प्रकाशित शोध यह मानते हैं कि वर्तमान में बाघों की छह जीवित उप-प्रजातियां हैं। इस वर्गीकरण के अनुसार बंगाल टाइगर और इंडोचाइनीज बाघ अलग-अलग उप-प्रजातियां हैं।
आईयूसीएन के कैट स्पेशलिस्ट ग्रुप के सह-अध्यक्ष सुगोतो रॉय जैसे कुछ लोगों के लिए यह मामला अब तय हो चुका है: इंडोचाइनीज़ बाघ को आज एक अलग उपप्रजाति के रूप में मान्यता नहीं दी जाती। वह कहते हैं, “इसलिए कंबोडिया में बाघों को फिर से बसाने की किसी भी योजना में मुख्यभूमि वाली उप-प्रजाति शामिल होगी, जो वही उप-प्रजाति है।”
बेंगलुरु स्थित भारत के नेशनल सेंटर फॉर बायोलॉजिकल साइंसेज की मॉलिक्यूलर बायोलॉजिस्ट और इकोलॉजिस्ट उमा रामकृष्णन का कहना है कि दोबारा बसाने जैसे फैसलों में आनुवंशिक विविधता, स्थानीय माहौल के हिसाब से ढलने की क्षमता और आपस में प्रजनन के जोखिम को कम करने को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
रामकृष्णन कहती हैं, “कंबोडिया जैसी जगहों पर, जहां बाघों की स्थानीय आबादी को विलुप्त घोषित कर दिया गया है, वहां बंगाल टाइगर को लाना पारिस्थितिक नजरिए से सही हो सकता है। हालांकि, ये कंबोडिया के मूल बाघों जैसे नहीं हैं।”
वह एक और संभावित चिंता की ओर इशारा करती हैं: “अगर भविष्य में यह आबादी दक्षिण-पूर्व एशिया की मूल आबादी से जुड़ती है, तो आनुवंशिक घालमेल हो सकता है।”

2021 में, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ ने कंबोडिया के पूर्वी मैदानों में बाघों को फिर से बसाने की अपनी योजना रोक दी, क्योंकि सर्वे के बाद खुर वाले जानवरों की संख्या में तेजी से कमी पाई गई थी। शिकार बनने वाले जानवरों की आबादी में इस कमी के लिए मुख्य रूप से फंदों को जिम्मेदार माना गया; पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया में बाघों की संख्या घटने की मुख्य वजह इन्हीं फंदों को माना जाता है।
कंबोडिया में दशकों का अनुभव रखने वाले संरक्षणवादी और फौना एंड फ्लोरा इंटरनेशनल की कार्डमम पर 1999 की रिपोर्ट में मदद करने वाले मार्कस हार्ड्टके का कहना है कि परियोजना क्षेत्र और पूरे देश में शिकार का दबाव “अभी भी बहुत ज्यादा” है। इसमें न सिर्फ फंदे लगाकर शिकार करना शामिल है, बल्कि खास तौर पर निशाना बनाकर शिकार करना भी शामिल है। वह कहते हैं, “पहले कार्डमम में ऐसे गिरोह सक्रिय थे जो खास तौर पर बड़ी बिल्लियों (जैसे बाघ, तेंदुए) का शिकार करते थे और इसके लिए वे कई तरीकों के साथ-साथ विस्फोटक वाले फंदों का भी इस्तेमाल करते थे।”
कंबोडिया में जंगल कटने की दर एक और बड़ी चिंता का विषय है। अकेले 2024 में देश ने 93,000 हेक्टेयर (2,30,000 एकड़) से ज़्यादा जंगल खो दिए, जिनमें से लगभग आधे संरक्षित इलाकों में थे।
कार्डमम की पहाड़ियों में लकड़ी काटने के काम और पांच नए पनबिजली बांधों के निर्माण से बाघों के संभावित रहने की जगह को खतरा है। बाघों को छोड़ने वाले स्टेशन से सिर्फ सात किलोमीटर दूर 100-मेगावाट के ‘वील थ्मोर कंबोट’ पनबिजली बांध के निर्माण के लिए पहले से अछूते जंगल के कुछ हिस्सों को खोल दिया गया है। क्रावान नेशनल पार्क के अंदर एक और जगह, 2025 की शुरुआत में शुरू हुए सिंचाई बांध के कारण लगभग 7,300 हेक्टेयर (18,000 एकड़) जंगल साफ होने की आशंका है।
संरक्षित क्षेत्र विभाग के चन्ना का कहना है कि बांध से वन्यजीवों को कोई बड़ा खतरा नहीं है। उनके अनुसार, शिकार और बीमारियां ज्यादा बड़ी समस्याएं हैं। वह कहते हैं, “अगर हम शिकार और बीमारियों को नियंत्रित कर लें, तो हम इलाके का प्रबंधन कर सकते हैं।” वह यह भी कहते हैं कि जलाशय वन्यजीवों के लिए पानी की उपलब्धता को स्थिर बनाए रखने में मदद कर सकते हैं।
अपनी बात के समर्थन में वे पुराने अनुभव का जिक्र करते हैं। 2018 में एक इलाके में बांध बनने से पहले, उन्हें और उनकी टीम को चिंता थी कि इससे मगरमच्छों की आबादी को नुकसान पहुंचेगा। वह कहते हैं, “लेकिन बांध के चालू होने के बाद मगरमच्छ वापस आ गए।” उन्हें दूसरे वन्यजीवों की संख्या में बढ़ोतरी भी याद है; कार्डमम इलाके में पक्षियों की कुछ ऐसी प्रजातियां भी बाद में देखी गईं, जो पहले बहुत कम नजर आती थीं।
हालांकि, बाघ पानी का जीव नहीं हैं और ट्रॉपिकल इलाकों में बने बांधों पर हुए कई अध्ययन में जैव-विविधता के नुकसान की बात सामने आई है। ‘नेचर’ में 2021 में छपे एक अध्ययन में लेखकों ने पाया कि पनबिजली के विकास से जमीन पर रहने वाली प्रजातियों के आवास का बड़े पैमाने पर सीधा नुकसान होता है, क्योंकि बांध में पानी भरने से इलाका डूब जाता है। बाघ और जगुआर जैसे बड़े इलाके में घूमने वाले शीर्ष शिकारी पर इसका बहुत ज्यादा असर पड़ता है, क्योंकि उनकी आबादी कम होती है और उन्हें रहने के लिए अधिक जगह चाहिए।
यह भी अच्छी तरह से स्थापित है कि बुनियादी ढांचे के विकास से जुड़ी सड़क निर्माण और जंगल के टुकड़ों में बंटने की प्रक्रिया, शिकारियों और लकड़ी काटने वालों के लिए आवाजाही को आसान बना देती है।

अनिश्चित तैयारी
हालांकि, भारत और कंबोडिया के बीच 2022 के समझौते में 2025 के आखिर तक भारत से बाघों के आने की बात कही गई थी, लेकिन अभी तक एक भी बाघ नहीं भेजा गया है और उन्हें छोड़े जाने की कोई स्पष्ट समय-सीमा भी तय नहीं है।
एक समस्या मुख्य समर्थक कंबोडिया स्थित वाइल्डलाइफ अलायंस से मिलने वाली वित्तीय सहायता में कमी आना है। इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने तक संस्था ने मोंगाबे के सवालों का जवाब नहीं दिया था। चन्ना के अनुसार, सरकार इस परियोजना के लिए अतिरिक्त वित्तपोषकों की तलाश कर रही है, जिसकी अनुमानित लागत पहले पांच सालों में 4.3 करोड़ अमेरिकी डॉलर (लगभग ₹4.12 अरब) है।
चन्ना कहते हैं, “हमें उम्मीद है कि हम जल्द ही शुरुआत कर पाएंगे।” इसके लिए ‘सॉफ्ट-रिलीज़’ रणनीति बनाई गई है, जिसके तहत बाघों को लगभग 40 हेक्टेयर (100 एकड़) के बाड़े में तब तक रखा जाएगा, जब तक वे वहां के माहौल में ढल न जाएं।
अस्पष्ट समय-सीमा के कारण, कार्डामम के पहाड़ों में रहने वाले समुदाय भी इस बात को लेकर निश्चित नहीं हैं कि बाघों की वापसी का उनके जीवन पर क्या असर पड़ेगा। 2025 में मोंगाबे ने कार्डामम के पहाड़ों के दो नेशनल पार्कों में बीस लोगों का इंटरव्यू लिया, जिससे बाघों को दोबारा बसाने की संभावना पर अलग-अलग राय सामने आईं। हालांकि, एक बात जो बार-बार सामने आई, वह थी इस प्रोजेक्ट के बारे में जानकारी की कमी।
जिनसे बात की गई, उनमें से सिर्फ दो लोगों ने कहा कि अधिकारियों ने उन्हें आधिकारिक बैठकों के जरिए जानकारी दी थी। बाकी लोगों को रेंजर, वाइल्डलाइफ अलायंस के कर्मचारी, पड़ोसियों, समाचार या सोशल मीडिया से अनौपचारिक रूप से पता चला। कम्यून प्रमुख सहित छह लोगों ने इस प्रोजेक्ट के बारे में सुना ही नहीं था। अनलॉन्ग वाक में गेस्टहाउस के मालिक टेप माला ने कहा, “मुझे लगता है कि उन्हें हमसे पहले सलाह-मशविरा करना चाहिए।” उन्होंने कहा, “मेरी गुजारिश है कि वे हमें बाघ को छोड़े जाने की जगह की स्पष्ट सीमाएं और सटीक जगह बताएं, क्योंकि हम जंगल में आते-जाते रहते हैं।”

रिलीज स्टेशन पर मौजूद एक स्थानीय अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि समुदायों को अभी इस वापसी के बारे में जानकारी नहीं दी गई है। टाटाई क्रोम के कम्यून प्रमुख ओउ चेन ने कहा कि वह इस प्रोजेक्ट का समर्थन करते हैं, लेकिन उन्होंने स्पष्ट बातचीत पर जोर दिया, ताकि ग्रामीणों को पता चल सके कि किन इलाकों से बचना है।
भारत की संस्था ‘आरण्यक’ के बोराह का कहना है कि पर्यावरण मंत्रालय से मंजूरी मिलने के बाद, जल्द ही हितधारकों की एक बैठक बुलाए जाने की उम्मीद है।
आलोचकों का कहना है कि निर्माण शुरू किए जाने से पहले बातचीत की जानी चाहिए थी। बातचीत को लेकर ऐसी ही चिंताएं पहले भी वाइल्डलाइफ अलायंस और पर्यावरण मंत्रालय से जुड़ी पहलों में सामने आ चुकी हैं: 2024 में ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा था कि वाइल्डलाइफ अलायंस ने पर्यावरण मंत्रालय के साथ मिलकर चलाए जा रहे ‘सदर्न कार्डमम्स REDD+ कार्बन क्रेडिट प्रोजेक्ट’ इलाके में रहने वाले मूल निवासी चोंग समुदायों की स्वतंत्र, पहले से और पूरी जानकारी के साथ दी गई सहमति नहीं ली थी।
वाइल्डलाइफ अलायंस ने मोंगाबे के सवालों का जवाब नहीं दिया, लेकिन संगठन पहले भी इन दावों को सार्वजनिक रूप से खारिज कर चुका है।
चन्ना का कहना है कि 2020 के आस-पास सैद्धांतिक मंजूरी मिलने के बाद से ही लोगों के बीच जाना रोडमैप की प्राथमिकता रही है, लेकिन कर्मचारियों की कमी, फंडिंग की दिक्कतों और कोविड-19 की वजह से इसे लागू करने में देरी हुई। वे बताते हैं कि अब लोगों तक पहुंचने की योजनाओं में समुदाय के साथ बैठक, स्कूल में कार्यक्रम, हितधारकों की कार्यशाला और समर्पित आउटरीच यूनिट शामिल हैं।
मोंगाबे ने क्रावान नेशनल पार्क के अंदर ऐसे 17 गांवों की पहचान की, जो इस प्रोजेक्ट के तहत बनाए गए टाइगर रिलीज स्टेशन से 50 किलोमीटर (30 मील) के दायरे में थे। इनमें से कई गांव उस संरक्षित इलाके के कोर जोन से बस कुछ ही किलोमीटर दूर हैं, जहां बाघों को छोड़ा जाएगा। मोंगाबे को क्रावान नेशनल पार्क के अंदर रहने वाले समुदायों की आबादी के बारे में कोई आधिकारिक डेटा नहीं मिल सका।

हालांकि, चन्ना का कहना है कि जानवरों को छोड़े जाने वाली जगह से सबसे नजदीकी बस्तियां “शायद 30 किलोमीटर दूर” हैं, लेकिन वे यह भी कहते हैं कि उन्हें सही दूरी के बारे में पक्का पता नहीं है। उनका कहना है कि टकराव के जोखिम को समझा गया है और इसे कम करने की कोशिशें की जा रही हैं। इनमें आईयूसीएन की जानवरों को दूसरी जगह बसाने से जुड़ी गाइडलाइन के मुताबिक लोगों से संपर्क करना और पालतू जानवरों व कुत्तों में बीमारी के जोखिम का पता लगाना शामिल है।
अरेन्ग वैली के समरोआंग गांव में चे प्रेआह तीन दशक पहले राल वाले पेड़ों से राल निकालते समय बाघ से बाल-बाल बचने का किस्सा सुनाती हैं। वह कहती हैं कि बाघों के प्रति उनकी भावनाएं नहीं बदली हैं। वह कहती हैं, “क्योंकि हम जंगल जाते हैं, इसलिए हमें डर रहता है कि कहीं बाघ हमें काट न ले।”

प्रेआह सैमरोंग के फल इकट्ठा करके साल में एक हजार से दो हजार अमेरिकी डॉलर कमाती हैं। उन्हें डर है कि यह कमाई बंद हो जाएगी। “अगर वे बाघों को छोड़ते हैं, तो मैं किसी भी हाल में जंगल वापस नहीं जाऊंगी… अगर हम जंगल नहीं जा पाएंगे, तो और क्या करेंगे?”
मोंगाबे ने जिन दूसरे निवासियों से बात की, उनमें से कई जंगली फलों, सब्ज़ियों और राल जैसी चीजों के लिए जंगल पर निर्भर हैं और वे भी हमलों को लेकर वैसी ही चिंता जताते हैं। अरेन्ग घाटी के एक निवासी का कहना है कि उन्हें इस बात की चिंता रहती है कि कहीं बाघ उनकी भैंसों का शिकार न कर लें।
यह डर उनके पुराने अनुभव की वजह से है। फौना एंड फ्लोरा इंटरनेशनल की 1999 की रिपोर्ट में कार्डमम को कंबोडिया की “इकलौती ऐसी जगह” बताया गया था, जहां आदमखोर बाघों की बड़ी समस्या की बात सामने आई थी। हालांकि, कोई आधिकारिक आंकड़े मौजूद नहीं हैं, लेकिन खबरों के मुताबिक 1990 के दशक के आखिर में दर्जनों लोगों पर हमले हुए और वे मारे गए।
क्रावान नेशनल पार्क के “कोर जोन के अंदरूनी हिस्से” में बाघों को छोड़ने की योजना है, लेकिन वहां कोई भौतिक सीमा नहीं होगी। ऐसे में यह स्पष्ट नहीं है कि आम तौर पर 40-55 वर्ग किलोमीटर के इलाके में विचरण करने वाले बंगाल टाइगर की निगरानी कैसे की जाएगी या उन्हें कैसे रोका जाएगा, ताकि उनकी और आस-पास रहने वाले लोगों की सुरक्षा पक्की की जा सके।
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चन्ना कहते हैं कि इस तरह के डर स्वाभाविक हैं। वह कहते हैं, “अभी यूरोप में भी भेड़ियों को लेकर ऐसा ही देखने को मिल रहा है।” वे सियामीज मगरमच्छों को दोबारा बसाने की घटना का उदाहरण देते हैं, जिससे भी लोगों में चिंता पैदा हुई थी। “जानवरों के वापस आने से पहले लोग बहुत चिंतित रहते हैं। लेकिन जब वे देखते हैं कि साथ-साथ रहना मुमकिन है, तो डर कम हो जाता है।” वाइल्डलाइफ अलायंस के साथ मिलकर बनाए गए बचाव के उपायों में मवेशियों के नुकसान के लिए बीमा या मुआवजा, शुरुआती चेतावनी देने वाले सिस्टम और समुदाय में जागरूकता बढ़ाने वाले कार्यक्रम शामिल हैं।
अरेन्ग घाटी में हर कोई बाघों की वापसी का विरोध नहीं करता है। च्रक रुएसी गांव के 70 वर्षीय हॉर्न किम हेंग कहते हैं, “मुझे खुशी है कि यहां बाघ और दूसरे तरह के जानवर होंगे, ताकि आने वाली पीढ़ी उनके बारे में जान सकेगी।”
मूल निवासी ‘चोंग’ समुदाय के सदस्य किम हेंग और उनके पति योंग टुक के लिए बाघों का आध्यात्मिक महत्व है। वे कहती हैं, “बाघों और इंसानों के बिना, हम इसे जंगल नहीं कहते।” बाघों को ‘नीक ता’ का साथी माना जाता है; ‘नीक ता’ पूर्वजों की आत्माएं होती हैं जिनके बारे में माने जाता है कि वे पेड़ों, नदियों, धान के खेतों और पहाड़ों में रहती हैं।
कई दशकों के संघर्ष और बाघों की घटती संख्या ने इन परंपराओं में खलल डाला, लेकिन किम हेंग जैसी कुछ महिलाएं अभी भी इन्हें निभाती हैं। वह कहती हैं, “जंगल में बाघों का होना ठीक है; वे हमें नुकसान नहीं पहुंचाएंगे। पूर्वजों की आत्मा कभी भी लोगों को नुकसान नहीं पहुंचाती।”
अब जब प्रोजेक्ट और योजना आगे बढ़ चुकी है, तो संभावना है कि बाघों का पहला जत्था जल्द ही कंबोडिया पहुंच जाएगा। यह देखना अभी बाकी है कि क्या ये जानवर आने वाले समय में सचमुच जंगल में आजादी से घूम पाएंगे या नहीं।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 4 जून, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: रणथंभौर टाइगर रिजर्व में बंगाल टाइगर। दूसरी जगह बसाने के लिए चुने गए बाघों के प्रकार को लेकर सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि कार्डमम के पहाड़ों में जो बाघ कभी विचरण करते थे, वे इंडोचाइनीज उप-प्रजाति (पैंथेरा टाइग्रिस कॉर्बेटी) के थे, जबकि भारत से लाए गए बाघ बंगाल उप-प्रजाति (पैंथेरा टाइग्रिस टाइग्रिस) आबादी के हैं। तस्वीर – एलन हॉपकिंस\फ्लिकर (CC BY-NC-ND 2.0)।
उद्धरण
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