- जम्मू-कश्मीर में बेमौसम बर्फबारी से पशुपालक गुज्जर-बकरवाल परिवारों के सालाना प्रवास में रुकावट आ रही है, जिससे उन्हें पहाड़ी रास्तों पर मुश्किल हालात का सामना करना पड़ रहा है।
- चराई की अवधि छोटी होने से मवेशियों की मृत्यु दर बढ़ रही है और पशुपालक समुदायों के लिए मौसमी प्रवास अनिश्चित होता जा रहा है, जिससे उन्हें “मजबूरन अनुकूलन” की स्थिति से गुजरना पड़ रहा है।
- शोधकर्ताओं और पशुपालन के जानकारों का कहना है कि समुदाय अपनी पुश्तैनी चारागाहों को छोड़कर अनजान या अधिक जोखिम वाले इलाकों में जा रहे हैं।
मई में जम्मू-कश्मीर के राजौरी जिले का एक गुज्जर परिवार अपने मवेशियों के झुंड के साथ कई दिनों से यात्रा कर रहा था और कश्मीर के ऊंचे इलाकों में मौजूद चारागाहों की ओर बढ़ रहा था।
जब परिवार अपने गंतव्य शोपियां से लगभग 50 किलोमीटर दूर ‘पीर की गली’ पहुंचा, तो ताजा बर्फबारी के कारण उन्हें अपना सफर रोकना पड़ा। अधिकारियों ने मुगल रोड पर ट्रैफिक रोक दिया था। यह सड़क शोपियां को राजौरी और पुंछ जैसे कम ऊंचाई वाले जिलों से जोड़ती है। इस वजह से परिवार को सड़क के किनारे रुकना पड़ा। इस ठंडे मौसम में उनके सिर पर छत भी नहीं थी। उन्हें यह भी नहीं पता था कि वे अपना सफर वापस कब शुरू कर पाएंगे।
इससे पहले उन्हें मई के आखिर में इस रास्ते पर बर्फबारी का सामना कभी नहीं करना पड़ा था।
जिन समुदायों का जीवन प्रवास पर निर्भर है, उनके लिए अब चुनौती सिर्फ मुश्किल मौसम नहीं, बल्कि मौसम को लेकर बढ़ती अनिश्चितता भी है।
वसंत के मौसम में अर्ध-घुमंतू जनजातियां गुज्जर और बकरवाल अपने मवेशियों के साथ कश्मीर और चिनाब घाटी के ऊपरी इलाकों की ओर यह मौसमी प्रवास करती हैं। एक महीने से भी अधिक समय तक चलने वाली यह यात्रा उन रास्तों से आगे बढ़ती है जो पीढ़ियों से बर्फबारी के पैटर्न, चरागाहों के चक्र और पारंपरिक पारिस्थितिकी ज्ञान के आधार पर तय होते आए हैं।
लेकिन, अब यह क्रम टूटने लगा है।

अपने मवेशियों के साथ सुंदरबनी (दक्षिण) से शोपियां (उत्तर) की यात्रा कर रहे गुज्जर खानाबदोश तालिब हुसैन कहते हैं, “इस सफर को पूरा करने में हमें लगभग एक महीना लग जाता है। अब यह सफर बहुत अनिश्चित हो गया है। यहां तक कि ये मवेशी भी अब हमारा ठीक से गुजारा नहीं करा पाते। कुछ जानवर मर जाते हैं, तो कुछ बीमार पड़ जाते हैं। हम पूरी तरह से इन्हीं जानवरों पर निर्भर हैं। हमारे पास खेती के लिए जमीन या आमदनी का दूसरा जरिया नहीं है।”
प्रवास के दौरान होने वाली देरी का मतलब महज सफर में रुकावट नहीं है। लंबे समय तक प्रतिकूल मौसम के संपर्क में रहना, भोजन की कमी, मवेशियों का कमजोर पड़ना और रास्तों का बंद हो जाना उन आजीविकाओं के लिए सीधा खतरा बन सकते हैं, जो पूरी तरह मौसमी आवाजाही पर निर्भर हैं।
दक्षिण एशिया में खानाबदोश आबादी (जो मौसम के अनुसार एक जगह से दूसरी जगह जाती है) का बड़ा हिस्सा जम्मू-कश्मीर में रहता है। इसमें मुख्य रूप से गुज्जर और बकरवाल समुदाय शामिल हैं।
जम्मू और कश्मीर में पलायन
हर साल लगभग 6.12 लाख लोग ऊंचाई वाले चरागाहों की ओर यह मौसमी प्रवास करते हैं, जिन्हें ढोक कहा जाता है। इनमें से करीब 30,000 परिवार जम्मू प्रांत से कश्मीर की ओर सफर करते हैं। ये परिवार राष्ट्रीय राजमार्ग-44 तथा मुगल रोड जैसी सड़कों का इस्तेमाल करते हैं।
गुज्जर-बकरवालों की मौसमी पशुपालक प्रवास व्यवस्था को लंबे समय से पारिस्थितिकी के हिसाब से खुद को ढालने के तरीके के रूप में देखा जाता रहा है, जिसमें पशुपालक समुदाय बदलती पर्यावरणीय परिस्थितियों के हिसाब से सावधानीपूर्वक समयबद्ध मौसमी आवाजाही के जरिए खुद को ढालते हैं।
यह सफर अपने आप में जलवायु के हिसाब से खुद को ढालने का एक तरीका है, जो न सिर्फ पर्यावरण के पैटर्न पर, बल्कि पहले से इसका अनुमान लगाए जा सकने की क्षमता पर भी निर्भर करता है।
2025 के एक अध्ययन के अनुसार, ये प्रवासी मार्ग सिर्फ एक जगह से दूसरी जगह तक की शारीरिक यात्रा भर नहीं हैं। वे पीढ़ियों से संचित पारंपरिक ज्ञान पर आधारित हैं जो परिदृश्य, मौसम और जीवित रहने की रणनीति को आपस में जोड़ता है।

जीविका पर संकट
आदिवासी समुदायों के साथ काम करने का लगभग तीन दशकों का अनुभव रखने वाले शोधकर्ता जावेद राही का कहना है कि अनियमित बर्फबारी और मौसम के बदलते पैटर्न से पारंपरिक प्रवास कैलेंडर पर अब उतना भरोसा नहीं किया जा सकता। राही ने कहा, “पारंपरिक तौर पर प्रवास पुरखों से मिली जानकारी और पर्यावरण की समझ पर निर्भर करता है, जैसे कि बर्फ कब पिघलनी शुरू होती है और कौन-से रास्ते खुले रहते हैं।” “लेकिन मौसम के बदलते पैटर्न इन परंपरागत तरीकों को बदलने लगे हैं।”
उन्होंने आगे कहा कि हाल ही में “रिवर्स माइग्रेशन” यानी वापस लौटने की नई प्रवृत्ति शुरू हुई है, जिसमें कई खानाबदोश परिवारों को बीच रास्ते से ही लौटना पड़ रहा है। “इससे सिर्फ आवाजाही ही नहीं, बल्कि समय भी बर्बाद हो रहा है।”
यह व्यवधान जमीनी स्तर पर मुश्किल फैसले लेने को मजबूर कर रहा है।
जम्मू-कश्मीर में कार्यरत मानव-विज्ञानी इरफान अली बांका के अनुसार, अनिश्चित और बेमौसम बर्फबारी पारंपरिक चरागाहों और प्रवास रास्तों में गंभीर बाधाएं पैदा कर रही है, खास तौर पर ऊंचाई वाले पीर पंजाल पर्वत श्रृंखला क्षेत्र में। बर्फ पिघलने से जब खतरनाक जलधाराएं बन जाती हैं और बर्फ की फिसलनभरी परतें रास्तों को जोखिमपूर्ण बना देती हैं, तब पशुपालक समुदायों को अपने पारंपरिक मार्ग बदलने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
पर्यावरण के साथ अपने घनिष्ठ संबंध के बावजूद, हिमालयी क्षेत्र में पशुपालक समुदाय जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित होने वाले समूहों में से एक हैं।

एक अध्ययन के अनुसार जो जलवायु परिवर्तन के प्रति गुज्जर और बकरवाल समुदायों की धारणाओं पर केंद्रित था, सर्दियों के दौरान निचले इलाकों में बढ़ते तापमान और जल स्रोतों के सूखने से पशुपालक अपने पारंपरिक समय से पहले ही प्रवास शुरू करने के लिए मजबूर हो रहे हैं। हालांकि, इससे अलग तरह के जोखिम भी जुड़े हुए हैं।
अध्ययन कहता है, “जब समुदायों को वसंत के मौसम में सामान्य से पहले प्रवास करने के लिए मजबूर होना पड़ता है, तो वे अक्सर ऐसे ग्रीष्मकालीन चरागाहों तक पहुंच जाते हैं जहां बर्फ पूरी तरह पिघलती नहीं है। इसका मतलब है कि उन क्षेत्रों में पशुओं के लिए पर्याप्त चराई उपलब्ध नहीं होती। चारे की इस कमी के साथ-साथ तापमान में अचानक गिरावट नवजात पशुओं की मृत्यु दर बढ़ा देती है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति को और ज्यादा नुकसान होता है।”
गुज्जर-बकरवाल महासभा के अध्यक्ष चौधरी नवाब नजीर ने मोंगाबे-इंडिया को बताया कि चूंकि उनकी अर्थव्यवस्था लगभग पूरी तरह से पशुपालन पर निर्भर है, इसलिए मौसम में होने वाले ये बदलाव उनकी घुमंतू जीवनशैली के लिए अस्तित्व का संकट पैदा कर रहे हैं। उन्होंने आगे कहा, “पलायन के दौरान बेमौसम बर्फबारी होने से चत्तरगल्ला और सरथल जैसे पहाड़ी रास्तों पर छोटी बकरियों, भेड़ों और कमजोर घोड़ों की मौत हो रही है।”
पलायन वाले रास्ते पर हाल ही में हुई बर्फबारी में अपनी तीन बकरियों को खो देने को याद करते हुए राजौरी की गुज्जर चरवाहा जरीना ने कहा कि इनकी मौत उनके परिवार के लिए बहुत बड़ा झटका थी। “हमारी पूरी आजीविका इन्हीं जानवरों पर निर्भर है। कुछ बकरियों के खोने का मतलब है परिवार के लिए कई महीनों की कमाई और आजीविका का नुकसान।”
बर्फबारी का बदलता पैटर्न
जानकार कहते हैं कि समस्या सिर्फ बर्फबारी में कमी नहीं, बल्कि इसके बदलते चक्र से है।
हिमालयी पशुपालन प्रणालियों पर किए गए अध्ययनों से पता चलता है कि बेमौसम बर्फबारी और बदलते मौसमी चक्र उन खानाबदोश समुदायों के लिए उभरती चुनौतियां हैं जो पारिस्थितिकी समय और चरागाह तक पहुंच पर निर्भर हैं।
मौसम का पूर्वानुमान लगाने वाले स्वतंत्र विशेषज्ञ फैजान आरिफ ने बताया कि 2019-2020 के बाद से जम्मू-कश्मीर में लगातार सात सर्दियां ऐसी रही हैं जिनमें बारिश और बर्फबारी कम रही है। 2025-2026 की सर्दी के मौसम में इस इलाके में सामान्य से लगभग 65% कम बारिश और बर्फबारी देखी गई, जबकि फरवरी में यह कमी लगभग 90% रही।
आरिफ ने कहा, “हम अभी जो देख रहे हैं, वह सिर्फ बर्फबारी में कमी नहीं है, बल्कि इसके समय और इसकी नियमित चक्र में भी बदलाव है। बर्फबारी अब अनियमित हो रही है; सर्दियों के पीक समय में लंबे समय तक सूखा रहता है और उसके बाद अचानक और बेमौसम बर्फबारी होती है, जो वसंत के आखिर तक चलती है।”

सर्दियों में कई महीनों तक बारिश और बर्फबारी की कमी के बाद, मार्च के मध्य और यहां तक कि मई में भी कश्मीर और पीर पंजाल के ऊंचे इलाकों में बेमौसम बर्फबारी और बारिश हुई, जिससे मुगल रोड जैसे रास्ते कुछ समय के लिए बंद हो गए।
कश्मीर विश्वविद्यालय के भू-सूचना विज्ञान विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर इरफान रशीद ने कहा कि हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र जलवायु परिवर्तनशीलता और चरम मौसमी घटनाओं के प्रति लगातार ज्यादा संवेदनशील होते जा रहे हैं।
1950 के बाद से हिमालय में तापमान बढ़ने की रफ्तार दुनिया के औसत से 50% अधिक रही है। रशीद ने कहा, “इस बदलाव की मुख्य वजहें तेजी से बढ़ता तापमान, बारिश के बदलते पैटर्न, ग्लेशियर का पिघलना और पहाड़ों के नाजुक इलाकों पर इंसानी गतिविधियों का लगातार बढ़ता दबाव हैं।”
बढ़ता तापमान, बारिश के बदलते पैटर्न और बर्फ पिघलने के समय में बदलाव से चरागाहों का प्राकृतिक चक्र बदल रहा है। इससे पलायन की अवधि कम हो रही है और चारे की उपलब्धता पर संकट पैदा हो रहा है।
कश्मीर विश्वविद्यालय में पौधों की जैव-विविधता और कश्मीर हिमालय की पारिस्थितिकी पर काम कर रहे प्रोफेसर अंजार ए. खुरू ने कहा कि क्षेत्र के अल्पाइन घास के मैदान बर्फबारी और तापमान के पैटर्न में होने वाले परिवर्तनों के प्रति अत्यंत संवेदनशील हैं। इस कारण प्रवासी पशुपालक समुदाय जलवायु संबंधी व्यवधानों की वजह से लगातार ज्यादा असुरक्षित होते जा रहे हैं।
खुरू ने कहा, “वनस्पतियों का बढ़ना नमी की उपलब्धता, तापमान और उनके मौसमी वितरण पर बहुत ज्यादा निर्भर करती है। इसलिए बर्फबारी या बारिश के सामान्य पैटर्न में किसी भी प्रकार का बदलाव उन घास के मैदानों को गंभीर रूप से प्रभावित करता है, जिन पर पशुपालक समुदाय अपनी आजीविका के लिए निर्भर हैं।”
जब प्रवास चक्र के दौरान मौसम बहुत खराब होता है, तो इसका सीधा असर चारागाहों में घास के फिर से उगने पर पड़ता है और चराई की अवधि कम हो जाती है।

बदलते हिमालय में पशुपालन
चरवाहों की आजीविका की सुरक्षा के लिए काम करने वाली गैर-लाभकारी संस्था हिमालयन पेस्टोरल ट्रस्ट (HPT) के संस्थापक शाहिद सुलेमान के अनुसार जलवायु का दबाव न सिर्फ पलायन के रास्तों को बाधित कर रहा है, बल्कि व्यापक चरवाहा प्रणाली को भी कमजोर कर रहा है।
सुलेमान ने बताया कि HPT के चल रहे शोध से पता चलता है कि पश्चिमी हिमालय के कुछ हिस्सों में प्रवास का समय 15 से 20 दिन आगे खिसक गया है, जबकि पिछले दो दशकों में चराई वाले इलाके आधे रह गए हैं।
सुलेमान ने “घोस्ट पास्चरिंग” यानी अनजान चारागाहों के उभरने की ओर इशारा किया, जिसमें चरवाहों को पर्यावरण के दबाव और पारिस्थितिकी अस्थिरता के कारण अपनी पुश्तैनी चरागाह जमीनें छोड़ने और अनजान या ज्यादा जोखिम वाले इलाकों में जाने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
सुलेमान ने मोंगाबे-इंडिया को बताया, “अचानक बर्फबारी या बर्फ के देर से पिघलने के कारण चरवाहे अक्सर तय चरागाहों तक नहीं पहुंच पाते हैं, जिससे परिवारों और मवेशियों को अनजान जगहों, जैसे कि निजी खेती वाली जमीन पर जाना पड़ता है। इससे स्थानीय समुदायों के साथ तनाव बढ़ता है।”
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उन्होंने कहा कि कई खानाबदोश परिवार अभी भी रेडियो से मिलने वाली जानकारी पर निर्भर हैं, जो अक्सर देर से मिलती है और प्रवास के बारे में तुरंत फैसला लेने के लिए काफी नहीं होती। राही ने यह भी बताया कि जानकारी पहुंचाना बड़ी चुनौती है। “खानाबदोश और मौसमी प्रवास करने वाले समूह अक्सर ऊंचाई वाले और पहाड़ों पर बने जिन चारागाहों में आते-जाते हैं, वहां अभी भी मोबाइल कनेक्टिविटी नहीं है। नतीजतन, भले ही मौसम का पूर्वानुमान बेहतर हो जाए, लेकिन मौसम से जुड़ी चेतावनियों की समय पर जानकारी देना मुश्किल ही रहेगा, जब तक कि इन दूर-दराज के इलाकों में मोबाइल नेटवर्क, सैटेलाइट-आधारित सिस्टम या मौसम की चेतावनी देने वाले खास सिस्टम जैसी संचार की आधारभूत संरचनाओं का विस्तार न किया जाए।”
पशुपालक समुदायों के भीतर चल रहे इस बदलाव को “मजबूरन अनुकूलन” बताते हुए सुलेमान ने कहा कि परिवारों को सदियों पुरानी परंपराओं और जीवन के तरीकों में बदलाव करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। यह सब उन्हें ऐसे समय में करना पड़ रहा है, जब उनके पास पशुधन बीमा, आपातकालीन आश्रय या जलवायु-आधारित प्रवास सहायता जैसी संस्थागत मददगार व्यवस्थाएं उपलब्ध नहीं हैं।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 4 जून, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: सालाना मौसमी प्रवास के दौरान कश्मीर के ऊपरी इलाकों की ओर जाता हुआ एक गुज्जर परिवार। पिछले महीने एक गुज्जर परिवार को बेमौसम बर्फबारी का सामना करना पड़ा, जिससे उनका लंबा सफर रुक गया और वे रास्ते में फंस गए। तस्वीर: फासिल रजा।