- भारत में सबसे पहले 2016 में तमिलनाडु में रूगोस स्पाइरलिंग व्हाइटफ्लाई की पुष्टि हुई थी।
- यह एक कीट है जो नारियल, केला, ताड़ और दूसरी फसलों पर हमला करता है।
- एक दशक बाद भी किसान इस कीट की वजह से पैदावार में भारी गिरावट की रिपोर्ट करते हैं।
पूरे भारत में, जलवायु परिवर्तन, अनियमित बारिश, बढ़ती लागत, मज़दूरों की कमी, और अस्थिर बाज़ारों से जूझ रहे किसानों को अब एक और खतरे का सामना करना पड़ रहा है: रगोज़ स्पाइरलिंग व्हाइटफ़्लाई (RSW)। एक आक्रामक रस चूसने वाला कीट, RSW (एल्यूरोडिकस रगियोपरकुलैटस) नारियल, केला, ताड़ और दूसरी फसलों पर हमला करता है और पत्तियों पर चिपचिपा हनीड्यू जमा कर देता है जिससे उस पर काली फफूंदी लग जाती है। इसके कारण पौधों में प्रकाश संश्लेषण (फ़ोटोसिंथेसिस) की प्रक्रिया रुक जाती है, पौधा कमजोर हो जाता है, और पैदावार में तेज़ी से कमी आती है।
जब RSW की पहली बार अमेरिका के फ्लोरिडा, जहां यह कभी एक बड़ी चिंता का विषय था, में पहचान हुई थी तब से इस कीट को वहां नियंत्रण में लाया गया है और फिर नियंत्रण मुक्त कर दिया गया। इसका अर्थ है कि अब इसे कोई बड़ा खतरा नहीं माना जाता है, इसलिए बंदरगाहों पर इसके लिए शिपमेंट की जांच नहीं की जाएगी।
लेकिन, भारत में RSW बिना रोक-टोक के फैल रहा है, जिससे पैदावार में भारी नुकसान हो रहा है और किसानों पर कर्ज़ बढ़ रहा है।
भारत की नारियल इकॉनमी
नारियल दक्षिण भारत की अर्थव्यवस्था का केंद्र है। साल 2023-24 में, चार दक्षिणी राज्यों में लगभग 20 लाख हेक्टेयर में नारियल की खेती की गई। केरला 7.65 लाख हेक्टेयर (0.77 मिलियन हेक्टेयर) के साथ सबसे आगे रहा, उसके बाद कर्नाटका 5.64 लाख हेक्टेयर (0.56 मिलियन हेक्टेयर), तमिलनाडु 4.93 लाख हेक्टेयर (0.49 मिलियन हेक्टेयर) और आंध्र प्रदेश 1.07 लाख हेक्टेयर (0.11 मिलियन हेक्टेयर) थे। नारियल डेवलपमेंट बोर्ड के डेटा के अनुसार, इन राज्यों में भारत के नारियल के कुल उत्पादन क्षेत्र का 80% से ज़्यादा हिस्सा है।
बहुत ज़्यादा बारिश, सूखे और लू की वजह से धान, गन्ना और केले की फसलों पर खतरा बढ़ गया है। ऐसे में नारियल की फसल सूखे से बचने का एक अच्छा ज़रिया बन गई। भारत में सन 2000 से नारियल की खेती 19% और इसका उत्पादन 69% बढ़ा है। हालाँकि, नारियल डेवलपमेंट बोर्ड के डेटा के मुताबिक, 2016 से उत्पादन 10% से ज़्यादा गिर गया है और उत्पादकता में 14% कमी आई है।
किसानों का कहना है कि RSW पैदावार में कमी का एक कारण है। वे कहते हैं कि ‘व्हाइटफ्लाई अटैक’ अब कभी-कभार होने वाली घटना नहीं है, बल्कि यह साल भर का डर है।

फ्लोरिडा के उपाय
वैज्ञानिकों ने RSW की उत्पत्ति को कैरिबियन और मध्य अमेरिका का बताया है। फ्लोरिडा के मौसम की वजह से शुरू में यह तेज़ी से फैला, जिससे इस पर कड़ी नज़र रखी गई, लेकिन इसकी शुरुआत फ्लोरिडा से नहीं हुई थी।
इस रिपोर्टर के साथ ईमेल पर बातचीत में, यूनाइटेड स्टेट्स डिपार्टमेंट ऑफ़ एग्रीकल्चर ने बताया कि RSW कॉन्टिनेंटल यूनाइटेड स्टेट्स के लिए नॉन-क्वारंटाइन है और हवाई और प्यूर्टो रिको के लिए क्वारंटाइन है। जवाब में कहा गया, “2023 में, यूएस डिपार्टमेंट ऑफ़ एग्रीकल्चर की एनिमल एंड प्लांट हेल्थ इंस्पेक्शन सर्विस के प्लांट प्रोटेक्शन एंड क्वारंटाइन (PPQ) ने डीरेगुलेशन इवैल्यूएशन ऑफ़ एस्टैब्लिश्ड पेस्ट्स (DEEP) रिव्यू प्रोसेस के ज़रिए इस कीड़े को डीरेगुलेट किया। इस प्रक्रिया के तहत डीरेगुलेट किए गए कीट को अगर इंपोर्टेड शिपमेंट्स में पकड़ा भी जाता है तो भी एंट्री पोर्ट्स पर उनके खिलाफ एक्शन लेने की ज़रूरत नहीं है।”
इस आधिकारिक जवाब में कहा गया, “रूगोस स्पाइरलिंग व्हाइटफ्लाई को मैनेज करने का सबसे असरदार लंबे समय का तरीका बायोलॉजिकल कंट्रोल है। यह तरीका पहले ही कई इलाकों में सफल साबित हो चुका है, जहाँ इस कीट को अब लगातार चलने वाली समस्या नहीं माना जाता है।” व्हाइटफ्लाई कंट्रोल में काम करने वाली सबसे आम पैरासाइटॉइड प्रजाति एन्कार्सिया ग्वाडेलूपे विगियानी और एन्कार्सिया नोयेसी थीं।
अमेरिका ने चार साल के अंदर इस चुनौती को अच्छे से मैनेज कर लिया, जबकि भारत में एक दशक से भी ज़्यादा के समय से कोशिशें करने के बावजूद भी जमीनी स्तर पर इस कीट से राहत नहीं मिल पाई है।
भारत में RSW का पहला केस
भारत में RSW का पहला आधिकारिक रिकॉर्ड 2016 में तमिलनाडु के कोयंबटूर जिले के पोलाची में मिला। लेकिन किसान कहते हैं कि यह कीड़ा कई साल पहले दिखाई दिया था। अड़सठ साल के ए.ई. श्रीनिवासन, जो B.Sc. एग्रीकल्चर ग्रेजुएट हैं और लगभग चार दशकों से नारियल की खेती कर रहे हैं, कहते हैं, “मैंने पहली बार 2010 की शुरुआत में व्हाइटफ्लाई के लक्षण देखे थे, 2016 से बहुत पहले। इससे हाइब्रिड किस्मों को ज़्यादा नुकसान होता है। पत्तियां काली हो जाती हैं, पेड़ कमजोर हो जाता है, और पैदावार कम हो जाती है।”
उनका कहना है कि शुरुआती सालों में, इस कीट को गंभीर खतरा नहीं माना गया। “शुरू में, किसी ने इसे कोई बड़ा कीट या बड़ी समस्या नहीं माना। इसे कीटों की एक आम समस्या की तरह देखा गया। इसके लिए कोई चेतावनी नहीं दी गई। जब तक सरकार ने इसे समस्या माना, तब तक यह हर जगह फैल चुका था। हर राज्य ने धीरे-धीरे रिएक्ट किया, और अब यह यहाँ बस चुका है।”

श्रीनिवासन पहले हर हाइब्रिड पेड़ से हर साल 200-300 नारियल लेते थे, लेकिन अब उन्हें 100-120 ही मिलते हैं। पारंपरिक लंबी किस्मों से 90-120 नारियल मिलते थे जो अब घटकर 50-70 रह गए हैं। उनका कहना है कि गुणवत्ता भी गिर गई है। “नारियल का आकार, स्वाद और पानी की मात्रा खत्म हो जाती है। ग्राहक ऐसे फल नहीं खाते जो खराब दिखते हैं। सरकार की सलाह जैसे येलो स्टिकी ट्रैप, नीम स्प्रे, वॉटर जेटिंग और एन्कार्सिया रिलीज़ का इस्तेमाल काम नहीं कर रहा है। मैंने इन्हें 10 साल तक इस्तेमाल किया है और कोई नतीजा नहीं निकला है। खेत में कुछ भी काम नहीं करता।”
पेड़ों को ज़िंदा रखने के लिए, वह उन्हें कैल्शियम नाइट्रेट, मैग्नीशियम सल्फेट, NPK, सिलिकॉन फ़र्टिलाइज़र, नीम केक और ऑर्गेनिक खाद देते हैं।
किसानों पर बढ़ता तनाव
पोल्लाची के पास अनाइमलाई के रहने वाले 60 साल के पट्टेश्वरन ए. के परिवार की पीढ़ियों से उगाई जा रही फसलें लगातार बिगड़ते मौसम की वजह से खत्म हो रही थीं। ऐसे में पटेश्वरन ने नारियल की खेती शुरू की। वे कहते हैं, “कई सालों तक हमने 20 एकड़ में धान, गन्ना और केले की खेती की। लेकिन खराब मॉनसून, अचानक सूखा, बादल फटना और सालों तक पानी की कमी ने इन सबको नामुमकिन बना दिया।” इस वजह से मजबूर होकर, उन्होंने 16.5 एकड़ ज़मीन पर हाइब्रिड नारियल की खेती शुरू की।
इस कीट की समस्या, जो कभी मामूली थी, अब बहुत बढ़ गई है। “मानसून में, कालिख वाली फफूंदी धुल जाती है और पेड़ फिर से सांस लेने लगते हैं। लेकिन गर्मियों में, व्हाइटफ्लाई बेकाबू होकर बढ़ जाती हैं। पैदावार गिर जाती है और पैसे का बहुत नुकसान होता है।” पट्टेश्वरन को ऐसी स्थिति में सहायता की कमी सबसे ज़्यादा निराश करती है। “हमने ज़्यादा पानी मांगने वाली फसलें छोड़ दीं क्योंकि क्लाइमेट चेंज ने हमारे पास कोई चारा नहीं छोड़ा। अब नारियल भी खत्म हो रहा है। किसान कैसे ज़िंदा रहेंगे?”
तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय के नारियल रिसर्च स्टेशन से सिर्फ़ 14 किलोमीटर दूर रहने के बावजूद, उनका कहना है कि उन्हें कोई मदद नहीं मिली है। “एनकार्सिया कार्ड, स्टिकी ट्रैप, वॉटर जेटिंग… मैंने सात साल तक यह सब किया। कुछ भी काम नहीं आया… स्टिकी ट्रैप, नीम का तेल, पानी के स्प्रे, चावल का स्टार्च, कुछ भी इन्फेक्शन कम नहीं करता,” वे कहते हैं।
“असली उपाय के लिए हम कब तक इंतज़ार करेंगे? हर साल हमारी आमदनी कम होती जा रही है,” उन्होंने आगे कहा।
तमिलनाडु के नारियल उगाने वाले क्षेत्रों के किसानों का भी कहना है कि वो मोनोक्रोटोफॉस, एक खतरनाक कीटनाशक है जिस पर बहुत ज़्यादा प्रतिबन्ध हैं, का इस्तेमाल करते हैं। प्रतिबंधित होने के बावजूद भी इसकी बिक्री गैर-कानूनी तरीके से जारी है क्योंकि सफेद मक्खी के लगातार हमले के खिलाफ उनके पास कुछ ही असरदार तरीके बचते हैं। मोनोक्रोटोफॉस एक बहुत ज़हरीला कीटनाशक है जो एसिटाइलकोलिनेस्टरेज़ को रोककर नर्वस सिस्टम को खराब करता है, जिससे इंसानों, जंगली जानवरों और फायदेमंद कीटों के लिए गंभीर खतरा पैदा होता है। यह अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया समेत कई देशों में प्रतिबंधित है या इस पर बहुत ज़्यादा रोक है। भारत में भी इसका इस्तेमाल तेज़ पॉइज़निंग और इकोलॉजिकल नुकसान के खतरे के कारण कम है। सेहत को होने वाले खतरों को जानने के बावजूद, कुछ किसान पैसे की तंगी की वजह से इसका इस्तेमाल करते हैं, क्योंकि बताए गए बायोकंट्रोल के तरीके खेतों में काम नहीं करते हैं।


घटती आमदनी
केरला के पालक्कड़ ज़िले की एरुथेनपथी पंचायत में भी हालात तमिलनाडु जैसे ही हैं। सरिता मुरुगनंदम बचपन से अपने परिवार के 10.5 एकड़ के नारियल के खेत में काम करती आ रही हैं। उनके लिए व्हाइटफ़्लाई का हमला पूरी तरह से प्रशासनिक चुप्पी के बीच हुआ है।
“दस साल से ज़्यादा का समय बीत जाने के बावजूद हमारे खेत में एक भी कृषि अधिकारी नहीं आया है। तमिलनाडु में, कम से कम किसानों को सब्सिडी वाले स्टिकी ट्रैप या सलाह मिलती है। यहाँ, हमें कुछ नहीं मिलता,” उन्होंने बताया।
कोई सलाह या मार्गदर्शन न मिलने पर, सरिता और उनके छः पड़ोसी किसानों ने एक निजी पेस्टिसाइड एजेंट, जो व्हाइटफ्लाई का इलाज देने का दावा करता था, की मदद ली। “हमने प्रति एकड़ (एजेंट को) ₹4,400 दिए। उन्होंने जड़ वाले हिस्से में एक केमिकल इंजेक्ट किया और जल्दी आराम का वादा किया। कुछ नहीं बदला। बाद में हमें पता चला कि यह एक नकली पेस्टिसाइड रैकेट था। हमने पैसे गंवाए, और यह कीट फैलता रहा।”
एक अन्य किसान, एम. कन्नप्पन कहते हैं कि उन्होंने अपने खेत में कभी किसी कृषि अधिकारी को नहीं देखा। “मैं कभी स्कूल नहीं गया; मुझे सिर्फ़ खेती ही आती है। एक ताड़ के पेड़ से कभी 90-110 फल मिलते थे। व्हाइटफ्लाई के बाद, यह घटकर 45-55 रह गए। हमारी आधी आमदनी चली गई है।”
पूरे पालक्कड़ में, भारी नुकसान, गिरती पैदावार और 10 साल के घाटे के बावजूद कोई खास सरकारी या केंद्रीय मदद न मिलना किसानों को परेशान कर रहा है।

एक राष्ट्रीय चुनौती
इस रिपोर्टर ने व्हाइटफ्लाई के उपायों पर जानकारी के लिए तमिलनाडु एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी (TNAU) के अधिकारियों और अलियार कोकोनट रिसर्च स्टेशन से संपर्क किया। इस आर्टिकल के छपने तक तक वहां से कोई आधिकारिक जवाब नहीं मिला था।
केरला के कासरगोड में ICAR–CPCRI (इंडियन काउंसिल ऑफ़ एग्रीकल्चरल रिसर्च-सेंट्रल प्लांटेशन क्रॉप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट) में क्रॉप प्रोटेक्शन के हेड विनायक हेगड़े ने मोंगाबे-इंडिया से बात की। उन्होंने कहा, “हमने सबसे पहले 2016 में पोलाची में रूगोस स्पाइरलिंग व्हाइटफ्लाई की पुष्टि की थी, जब किसानों ने बहुत ज़्यादा इन्फेक्शन की खबर दी थी।” उन्होंने आगे कहा कि यह कीट शायद फ्लोरिडा या आस-पास के इलाकों से लाए गए पौधों के सैंपल के ज़रिए भारत में आया होगा।
वे बताते हैं कि भारत की शुरुआती प्रतिक्रिया फ्लोरिडा की शुरुआती नीति के आधार पर थी, जिसमें वॉटर जेटिंग, येलो स्टिकी ट्रैप, नीम ऑयल स्प्रे, पैरासाइटॉइड एन्कार्सिया को छोड़ना और नेचुरल प्रीडेटर्स को बचाना शामिल है। “ये पूरी तरह से बायोकंट्रोल के तरीके हैं। ये लैब में और कंट्रोल्ड कंडीशन में बहुत अच्छा काम करते हैं। लेकिन भारत की जमीनी परिस्थितियों में RSW को कंट्रोल करना बहुत मुश्किल है।”
उनका कहना है कि जलवायु परिवर्तन ने इस संकट को और बढ़ा दिया है। “पिछले 20 सालों में, बढ़ते तापमान ने व्हाइटफ्लाई के प्रजनन को तेज़ कर दिया है। हमने तेज़ी से फैलाव और आबादी में भारी बढ़ोतरी देखी है।”

उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि भारत में बागानों की पृष्ठभूमि अमेरिका से बिल्कुल अलग है। “फ्लोरिडा में नारियल बहुत कम और सजावटी पौधों के तौर पर उगाया जाता है। यहाँ, यह रोज़ी-रोटी का ज़रिया है। हम प्रति एकड़ 70 पेड़ उगाते हैं। इतने घने प्लांटेशन में किसी भी चीज पर नियंत्रण रखना कहीं ज़्यादा मुश्किल हो जाता है। हम भारत की तुलना फ्लोरिडा से नहीं कर सकते।”
व्हाइटफ्लाई के हमले से निपटने के लिए पैरासाइटॉइड एन्कार्सिया के इस्तेमाल के बारे में, हेगड़े ने समझाया कि एन्कार्सिया लैबोरेटरी कंडीशन में अच्छा काम करता है और खेत में भी काम कर सकता है, लेकिन इसका असर इस बात पर निर्भर करता है कि किसी दिए गए इलाके के सभी किसान इसे एक साथ छोड़ें। वे आगे कहते हैं कि किसानों के बीच समन्वय सबसे बड़ी रुकावट है। “व्हाइटफ्लाई कंट्रोल के लिए, एक इलाके के हर किसान को एक ही समय में एक ही तरीका अपनाना होगा। अगर कुछ भी (किसान) ऐसा नहीं करते हैं, तो कीट वापस आ जाता है। भारत में यह तालमेल बनाना बहुत मुश्किल है।”
उन्होंने यह भी कहा कि तापमान, कीड़ों की संख्या का घनत्व और खुले मैदान में एन्कार्सिया के बसने और बढ़ने की क्षमता जैसे कारक नतीजों पर काफी असर डालते हैं। “खेती करने वाले समुदायों में एक साथ इसे अपनाने की कमी एक मुख्य कारण है कि एन्कार्सिया-बेस्ड कंट्रोल ने अब तक भारत में लगातार फील्ड-लेवल नतीजे नहीं दिए हैं।”
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श्रीनिवासन और चेन्नई की पर्यावरण पर काम करने वाली एक गैर-सरकारी संस्था के खेती के एक्सपर्ट (इंस्टीट्यूशनल दिक्कतों की वजह से नाम न बताने की शर्त पर) सलाह देते हैं कि भारत को तुरंत एक नेशनल इनवेसिव पेस्ट अलर्ट सिस्टम, डिस्ट्रिक्ट-लेवल सर्विलांस टीम, बायोकंट्रोल एजेंट्स का बड़े पैमाने पर उत्पादन और आसानी से मिलने वाली सप्लाई, जलवायु से जुड़े पेस्ट फोरकास्टिंग मॉडल, कम्युनिटी-बेस्ड सिंक्रोनाइज़्ड इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट (IPM) लागू करने, और नकली पेस्टिसाइड मार्केट को रोकने के लिए मज़बूत रेगुलेशन की ज़रूरत है। एक ही पेस्ट दो इकोलॉजिकल और गवर्नेंस के मामलों में बहुत अलग तरह से काम करता है।
लेकिन हेगड़े के मुताबिक, RSW अब एक राष्ट्रीय स्तर की समस्या है, जो केरला, तमिलनाडु और कर्नाटका से दूसरे राज्यों में फैल रही है और अब केले, कोको और दूसरी फसलों को भी प्रभावित कर रही है। वे कहते हैं, “हमने अभी तक किसी इंसेक्टिसाइड की सलाह नहीं दी है। हम स्टडी कर रहे हैं कि क्या कुछ खास केमिकल ऑप्शन मदद कर सकते हैं, लेकिन इसके लिए और सबूत चाहिए।”
यह खबर मोंगाबे-इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेज़ी वेबसाइट पर 19 जनवरी, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: सफेद मक्खी के हमलों से पोषक तत्वों में आई कमी के कारण कच्चे नारियल का रंग बदल गया है और उनकी गुणवत्ता में कमी आई है। किसानों का कहना है कि सफेद मक्खी के हमलों के कारण उनकी पैदावार और आमदनी दोनों में काफ़ी कमी आई है। तस्वीर – प्रशांत शनमुगसुंदरम।