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कीटनाशक प्रबंधन विधेयक पर विवाद तेज, विशेषज्ञों ने सुरक्षा ढांचे को कमजोर बताया

भारत में 1952 में कीटनाशकों का उत्पादन शुरू होने के बाद से इस क्षेत्र में काफी वृद्धि हुई है। तस्वीर- प्रज्ञा अलीमकर, विकिमीडिया कॉमन्स (CC BY-SA 4.0).

भारत में 1952 में कीटनाशकों का उत्पादन शुरू होने के बाद से इस क्षेत्र में काफी वृद्धि हुई है। तस्वीर- प्रज्ञा अलीमकर, विकिमीडिया कॉमन्स (CC BY-SA 4.0).

  • कीटनाशक प्रबंधन विधेयक का मसौदा 1968 के पुराने कानून को बदलकर भारत में कीटनाशक नियमों को आधुनिक बनाने का प्रयास करता है।
  • भारत का कीटनाशक उद्योग आज कई अरब रुपए का क्षेत्र बन चुका है, लेकिन इसके साथ ही स्वास्थ्य, पर्यावरण और खाद्य सुरक्षा को लेकर चिंताएं भी बढ़ी हैं।
  • विशेषज्ञ इस नए मसौदे की आलोचना कर रहे हैं। उनका मानना है कि यह सुरक्षा के जरूरी नियमों को कमजोर करता है, शक्तियों का केंद्रीकरण करता है, जवाबदेही कम करता है, और जनहित के मुकाबले व्यापार को अधिक प्राथमिकता देता है।

कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय ने कीटनाशक नियमों को आधुनिक बनाने के घोषित उद्देश्य के साथ, ‘कीटनाशक अधिनियम 1968’ और ‘कीटनाशक नियम 1971’ को बदलने के लिए ‘कीटनाशक प्रबंधन विधेयक’ का एक नया मसौदा जारी किया है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि प्रस्तावित कानून स्वास्थ्य, सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी लंबे समय से चली आ रही चिंताओं को उचित तरीके से दूर करने का प्रयास करता नजर नहीं आ रहा है।

भारत में 1952 में कीटनाशकों का उत्पादन शुरू होने के बाद से इस क्षेत्र में काफी वृद्धि हुई है। साल 2023 तक इसका उत्पादन लगभग 2,58,000 मीट्रिक टन तक पहुंच गया और इस उद्योग का मूल्य करीब ₹500 बिलियन हो गया।

जैसे-जैसे इस उद्योग का विस्तार हुआ है, इसके दुष्प्रभावों को लेकर चिंताएं भी बढ़ी हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के तहत कीटनाशक अवशेषों पर अखिल भारतीय नेटवर्क परियोजना के आंकड़े बताते हैं कि 2018 और 2023 के बीच जांचे गए भोजन के 28% नमूनों में कीटनाशकों के अवशेष पाए गए। भारत ने कीटनाशकों के संपर्क में आने से जुड़ी गंभीर स्वास्थ्य आपदाएं भी देखी हैं, जैसे केरला का मामला, जहां एंडोसल्फान के इस्तेमाल से पैदा हुए संकट की तुलना अक्सर भोपाल गैस त्रासदी से की जाती है।

दूसरी ओर, भारत कीड़ों, खरपतवार और बीमारियों के कारण अपने संभावित फसल उत्पादन का अनुमानित 20-30% प्रतिशत हिस्सा खो देता है। यह स्थिति फसल की सुरक्षा और स्वास्थ्य सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखने की जटिल चुनौती को दर्शाती है।

विशेषज्ञों का तर्क है कि इस समय किसानों की सुरक्षा, पर्यावरण प्रदूषण और भोजन में कीटनाशकों के अवशेषों से निपटने के लिए मौजूदा पुराना कानून अब पर्याप्त नहीं है।

इस कानून को बदलने के प्रयास 2008 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार के तहत शुरू हुए थे, जब उसने कीटनाशक प्रबंधन विधेयक पेश किया था। इसके बाद राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार ने 2017 में इस मसौदे में संशोधन किया और जनता से सुझाव मांगे। मार्च 2020 में इसका एक संशोधित संस्करण राज्यसभा में पेश किया गया। इस विधेयक को कृषि मामलों की संसद की स्थायी समिति के पास भेजा गया, जिसने दिसंबर 2021 में अपनी रिपोर्ट सौंपी। केंद्र सरकार ने 7 जनवरी 2026 को एक नया मसौदा जारी किया और इस पर 4 फरवरी तक सुझाव मांगे थे।

तेलंगाना स्थित एक स्वतंत्र रिसर्च सेंटर सेंटर फॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर (सीएसए) के जी.वी. रामंजनेयुलु ने कहा कि यह देरी नीति बनाने की प्रक्रिया में एक गहरी समस्या को दर्शाती है। उन्होंने कहा, “1960 के दशक में विज्ञान और पर्यावरण की जो समझ थी, वह 2025 की हमारी समझ से बहुत अलग थी। इसके बावजूद हमारे कानूनों को वर्तमान जानकारी के आधार पर समय के साथ बदला नहीं जा रहा है।”

पंजाब के कलानौर में बासमती चावल की फसल। मई 2025 में, राज्य सरकार ने कीटनाशक अवशेषों से जुड़े निर्यात जोखिमों का हवाला देते हुए,1 अगस्त से 60 दिनों के लिए बासमती फसलों पर 11 कीटनाशकों के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया था। तस्वीर- विकिमीडिया कॉमन्स (CC BY-SA 4.0).
पंजाब के कलानौर में बासमती चावल की फसल। मई 2025 में, राज्य सरकार ने कीटनाशक अवशेषों से जुड़े निर्यात जोखिमों का हवाला देते हुए,1 अगस्त से 60 दिनों के लिए बासमती फसलों पर 11 कीटनाशकों के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया था। तस्वीर- विकिमीडिया कॉमन्स (CC BY-SA 4.0).

नया नियामक ढांचा

इस मसौदा विधेयक में एक केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड बनाने का प्रस्ताव दिया गया है। इसकी अध्यक्षता कृषि, रसायन, स्वास्थ्य या पर्यावरण क्षेत्र का अनुभव रखने वाले अतिरिक्त सचिव स्तर के अधिकारी करेंगे। यह बोर्ड केंद्र और राज्य सरकारों को सलाह देगा, मंजूरी के लिए कीटनाशकों की सिफारिश करेगा और कीटनाशकों के निर्माण, कीट नियंत्रण, उन्हें बाजार से वापस लेने, निपटान, प्रयोगशाला परीक्षण, श्रमिकों की सुरक्षा और विज्ञापनों से जुड़े मानक तय करने में मदद करेगा।

मसौदे में एक पंजीकरण समिति का भी प्रस्ताव है, जो कीटनाशकों की मंजूरी पर फैसला करेगी, पंजीकरण की शर्तें तय करेगी, उनकी सुरक्षा और प्रभावशीलता की समीक्षा करेगी, जरूरत पड़ने पर पंजीकरण रद्द करेगी और एक डिजिटल राष्ट्रीय कीटनाशक रजिस्टर बनाए रखेगी। इसके अलावा, मसौदे में केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड और पंजीकरण समिति के अध्यक्ष व सदस्यों के पद छोड़ने के बाद तीन साल की कूलिंग-ऑफ अवधि का भी प्रावधान किया गया है। इस अवधि के दौरान, वे कीटनाशक उद्योग या उससे जुड़े क्षेत्रों में किसी प्रबंधकीय पद पर काम नहीं कर सकते और न ही किसी कंपनी के बोर्ड में शामिल हो सकते हैं।

पेस्टिसाइड एक्शन नेटवर्क (पीएएन) इंडिया के सीईओ ए.डी. दिलीप कुमार ने कहा कि यह मसौदा जैव-कीटनाशकों और पारंपरिक ज्ञान पर आधारित उत्पादों को बढ़ावा देता है। साथ ही, यह कीटनाशकों से विषाक्तता के मामलों के लिए मानक चिकित्सा प्रोटोकॉल का प्रस्ताव करता है और सुरक्षित विकल्पों व पर्यावरण-अनुकूल कृषि पद्धतियों के शोध को अनिवार्य बनाता है।

हालाँकि, उन्होंने यह भी कहा कि बोर्ड और पंजीकरण समिति का समग्र ढांचा संरचना के मामले में काफी हद तक पुराने कानून जैसा ही है। यह सुरक्षा उपायों को और कमजोर करता है।

सावधानी से ज्यादा व्यापार को प्राथमिकता

इस मसौदा विधेयक का उद्देश्य “…किसानों के लिए गुणवत्तापूर्ण कीटनाशकों की आपूर्ति सुनिश्चित करना और छोटे-मोटे अपराधों को गैर-आपराधिक बनाना है, जिससे जीवन जीने की सुगमता के साथ-साथ व्यापार करने की सुगमता (ईज ऑफ डूइंग बिजनेस) को बढ़ावा मिले।” हालांकि, आलोचकों का तर्क है कि इसके प्रावधान सुरक्षा से जुड़े नियमों को मजबूत करने के बजाय व्यापार को बढ़ावा देने की तरफ ज्यादा झुके हुए हैं।

इसका एक बड़ा उदाहरण कीटनाशकों की पंजीकरण प्रक्रिया है। विधेयक में यह अनिवार्य किया गया है कि पंजीकरण समिति को 12 महीनों के भीतर आवेदन को स्वीकार या अस्वीकार करना होगा, जिसमें बहुत हुआ तो छः महीने का विस्तार दिया जा सकता है। अगर “जेनेरिक कीटनाशकों” के लिए 18 महीनों के भीतर कोई निर्णय नहीं लिया जाता है, तो उनका पंजीकरण स्वतः मंजूर मान लिया जाएगा।

केरला में कीटनाशक का छिड़काव करते हुए एक किसान। कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय ने कीटनाशक अधिनियम 1968 को बदलने के लिए कीटनाशक प्रबंधन विधेयक का एक मसौदा जारी किया है। तस्वीर- जोसेफ एनडी, विकिमीडिया कॉमन्स (CC BY-SA 4.0). 
केरला में कीटनाशक का छिड़काव करते हुए एक किसान। कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय ने कीटनाशक अधिनियम 1968 को बदलने के लिए कीटनाशक प्रबंधन विधेयक का एक मसौदा जारी किया है। तस्वीर- जोसेफ एनडी, विकिमीडिया कॉमन्स (CC BY-SA 4.0).

रामंजनेयुलु के मुताबिक, यह दृष्टिकोण गलत प्राथमिकताओं को दर्शाता है। उन्होंने कहा, “हमें सबसे पहले यह स्वीकार करने की जरूरत है कि कीटनाशक हानिकारक हैं और इनसे स्वास्थ्य को गंभीर खतरा है। हमारा उद्देश्य इनका उपयोग कम से कम करना होना चाहिए। नियमों का ध्यान कीटनाशकों को नियंत्रित करने पर होना चाहिए, न कि उद्योग को बढ़ावा देने पर। लेकिन इस विधेयक को पढ़कर ऐसा लगता है जैसे इसका मुख्य उद्देश्य व्यापार को आसान बनाना है।”

सरकार के भीतर से मिलने वाले संकेत भी कीटनाशकों के अधिक उपयोग को बढ़ावा देने की ओर इशारा करते हैं। रसायन और उर्वरक संबंधी संसदीय स्थायी समिति की 2023 की एक रिपोर्ट में खेद व्यक्त करते हुए कहा गया था कि भारत दूसरा सबसे बड़ा कृषि उत्पादक होने के बावजूद, यहां कीटनाशकों की खपत केवल 0.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है, जबकि कुछ अन्य देशों में यह 17 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है।

रामंजनेयुलु ने इस बात को चुनौती दी। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय औसत के आंकड़े असल असमानता को छुपाते हैं। उन्होंने कहा, “लगभग 20-30% खेत औसत से तीन से चार गुना अधिक कीटनाशकों का उपयोग करते हैं, जबकि 50-60% खेतों में कीटनाशकों का बिल्कुल भी उपयोग नहीं होता है। समस्या कुल कम खपत की नहीं है, बल्कि एक छोटे हिस्से द्वारा अत्यधिक उपयोग किए जाने की है।”

उन्होंने आगे कहा, “हम अभी भी उन रसायनों का उपयोग कर रहे हैं जिन्हें कई देश पहले ही बैन कर चुके हैं।” उनके मुताबिक, भारत की श्रम-प्रधान कृषि प्रणाली एक और बड़ी चिंता है। “विकसित देशों में कीटनाशकों का छिड़काव ज्यादातर मशीनों से किया जाता है। भारत में लोग खुद अपने हाथों से छिड़काव करते हैं और खेतों में पशु भी चरते हैं। यह स्थिति रसायनों के संपर्क को इंसानों और पशुओं दोनों के लिए कहीं अधिक खतरनाक बना देती है।”

यह विधेयक सरकारी अधिकारियों और नियामक संस्थाओं को कानूनी सुरक्षा भी प्रदान करता है। इसमें कहा गया है कि ‘सद्भावना’ में किए गए कार्यों के लिए सरकार, उसके अधिकारियों, केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड, पंजीकरण समिति या उनकी उप-समितियों के खिलाफ कोई मुकदमा या कानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकती है।

पैन (PAN) इंडिया के दिलीप कुमार ने चेतावनी दी कि यह प्रावधान जवाबदेही को कमजोर कर सकता है। उन्होंने कहा, “यह प्रभावी रूप से अधिकारियों और समितियों को नियमों के पालन में विफल रहने की जिम्मेदारी से बचाता है। इससे भ्रष्टाचार के रास्ते खुल सकते हैं और नियामक प्रक्रिया कमजोर हो सकती है।” उन्होंने तर्क दिया कि नियमों को कानूनी छूट के बजाय पारदर्शी वैज्ञानिक तौर-तरीकों पर आधारित होना चाहिए।

मसौदा विधेयक में बिना पंजीकरण वाले कीटनाशकों के निर्माण या आयात के लिए तीन साल तक की कैद और 10 लाख से 40 लाख रुपए तक के जुर्माने का प्रस्ताव है। बार-बार अपराध करने पर और अधिक जुर्माना लगाया जाएगा।

हालांकि, कई तरह के उल्लंघनों को “समझौते” (कंपाउंडिग) के जरिए सुलझाया जा सकता है, जिसके तहत दोषी मुकदमा झेलने के बजाय एक तय जुर्माना देकर बच सकते हैं। एक बार मामला सुलझ जाने के बाद उस उल्लंघन के लिए कोई और कानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकती। हालाँकि, बार-बार अपराध करने वालों पर अधिक जुर्माना लगाया जाता है और तीसरी बार अपराध करने वालों को इस समझौते की सुविधा से बाहर रखा गया है, फिर भी आलोचकों का तर्क है कि यह प्रावधान कड़े दंड के डर को कमजोर करता है।

किसानों के स्वयंसेवी नेटवर्क आशा-किसान स्वराज की संस्थापक कविता कुरुगंती ने कहा, “इस मसौदा विधेयक में उन मामलों में भी अपराधों के लिए भी जुर्माना देकर मामला सुलझाने की अनुमति दी जा रही है, जहां वास्तव में आपराधिक धाराएं लगाई जानी चाहिए।”

तमिलनाडु में धान की कटाई करतीं महिलाएं भारत की श्रम-प्रधान कृषि प्रणाली को दर्शाती हैं, जो विकसित देशों की बड़े पैमाने पर मशीनीकृत कृषि के विपरीत है। तस्वीर- मैके सैवेज, विकिमीडिया कॉमन्स (CC BY 2.0)
तमिलनाडु में धान की कटाई करतीं महिलाएं भारत की श्रम-प्रधान कृषि प्रणाली को दर्शाती हैं, जो विकसित देशों की बड़े पैमाने पर मशीनीकृत कृषि के विपरीत है। तस्वीर- मैके सैवेज, विकिमीडिया कॉमन्स (CC BY 2.0)

राज्यों के पास सीमित अधिकार

इस मसौदा विधेयक में हानिकारक कीटनाशकों को नियंत्रित करने के लिए राज्य सरकारों को बहुत सीमित अधिकार दिए गए हैं। हालांकि यह मसौदा केंद्र या राज्य सरकार को सुरक्षा के आधार पर किसी कीटनाशक की बिक्री, वितरण या उपयोग पर एक वर्ष तक के लिए अस्थायी रोक लगाने की अनुमति देता है, लेकिन अंतिम निर्णय लेने का अधिकार पंजीकरण समिति के पास ही रहेगा। समिति को अपनी समीक्षा एक वर्ष के भीतर पूरी करनी होगी और अगर डेटा अपर्याप्त है, तो 180 अतिरिक्त दिन दिए जा सकते हैं। यह प्रतिबंध केवल तब तक लागू रहेगा जब तक समिति अपना निर्णय नहीं दे देती, जिसे सार्वजनिक करना आवश्यक है।

आलोचकों का तर्क है कि यह व्यवस्था सहकारी संघवाद को कमजोर करती है। जननीति अभियानकर्ता नरसिम्हा रेड्डी दोंथी के मुताबिक, यह विधेयक अत्यधिक केंद्रीकृत है और सार्वजनिक स्वास्थ्य व कृषि में राज्यों की भूमिका की अनदेखी करता है। उन्होंने कहा, “कीटनाशक नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय मानकों की आवश्यकता है, लेकिन इसे लागू करने और नियंत्रित करने का अधिकार राज्यों के पास ही रहना चाहिए।”

राष्ट्रीय किसान महासंघ के राष्ट्रीय समन्वयक के.वी. बीजू ने भी ऐसी ही चिंताएं व्यक्त कीं। उन्होंने कहा कि कृषि और स्वास्थ्य मुख्य रूप से राज्यों के विषय हैं, फिर भी राज्यों के पास कीटनाशकों पर प्रतिबंध लगाने का अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा, “इससे पता चलता है कि यह कानून मुख्य रूप से कॉरपोरेट की सुविधा के लिए तैयार किया गया है। कई राज्य खतरनाक कीटनाशकों पर प्रतिबंध लगाना चाहते हैं, लेकिन उन्हें ऐसा करने से रोक दिया गया है। आदर्श रूप से, कीटनाशकों की हर दस साल में समीक्षा की जानी चाहिए।”

बीजू ने ऐसे कई उदाहरणों का जिक्र किया जहां राज्य सरकारों ने प्रतिबंध लगाने की कोशिश की लेकिन वे असफल रहीं। मई 2025 में, पंजाब ने कीटनाशकों के अवशेषों से जुड़े निर्यात के जोखिमों का हवाला देते हुए, 1 अगस्त से शुरू होने वाले 60 दिनों के लिए बासमती फसलों पर 11 कीटनाशकों के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया था। हालाँकि, उद्योग संघों की याचिकाओं के बाद अगस्त 2025 में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने इस प्रतिबंध पर रोक लगा दी थी।

उन्होंने कहा कि यदि सरकार सचमुच सार्वजनिक स्वास्थ्य को लेकर चिंतित है, तो उसे केवल एक नया विधेयक पेश करने के बजाय सबसे पहले उन कीटनाशकों की समीक्षा करनी चाहिए जो अन्य देशों में पहले से ही प्रतिबंधित हैं, लेकिन भारत में अभी भी उनके उपयोग की अनुमति है।

उन्होंने आगे कहा, “हम 2012 से इस मुद्दे पर काम कर रहे हैं और हमने खुद सुप्रीम कोर्ट में दो मामले दायर किए हैं। हालाँकि, न तो अदालत ने और न ही केंद्र सरकार ने इन मामलों को उचित महत्व दिया है। हम समीक्षा की इस प्रक्रिया से बेहद निराश हैं।” उन्होंने सुझाव दिया कि विदेशों में प्रतिबंधित कीटनाशकों को भारत में पंजीकरण मिलने से रोकने के लिए, आवेदन के समय ही आवेदकों के लिए यह अनिवार्य किया जाना चाहिए कि वे खुलासा करें कि क्या वह कीटनाशक किसी अन्य देश में प्रतिबंधित है या सीमित उपयोग के लिए है।

: हिमाचल प्रदेश में सब्जी का खेत। आईसीएआर के आंकड़े बताते हैं कि 2018 और 2023 के बीच जांचे गए खाद्य पदार्थों के 28% नमूनों में कीटनाशकों के अवशेष पाए गए थे। तस्वीर- सीआईएटी, विकिमीडिया कॉमन्स (CC BY-SA 2.0).
: हिमाचल प्रदेश में सब्जी का खेत। आईसीएआर के आंकड़े बताते हैं कि 2018 और 2023 के बीच जांचे गए खाद्य पदार्थों के 28% नमूनों में कीटनाशकों के अवशेष पाए गए थे। तस्वीर- सीआईएटी, विकिमीडिया कॉमन्स (CC BY-SA 2.0).

महत्वपूर्ण कमियों की अब भी अनदेखी

जननीति अभियानकर्ता नरसिम्हा रेड्डी दोंथी, जिन्होंने इस मसौदे पर अपने सुझाव भेजे हैं, ने कहा कि यह मसौदा विधेयक कई उभरते हुए और लंबे समय से चले आ रहे जोखिमों को दूर करने में विफल है। उन्होंने रेखांकित किया कि इसमें एक बड़ी कमी डिजिटल प्लेटफॉर्मों के नियमन का न होना है। उन्होंने कहा, “ई-कॉमर्स और ऑनलाइन कीटनाशकों की बिक्री अब बहुत आम हो गई है, फिर भी यह विधेयक डिजिटल, अंतरराष्ट्रीय या अन्य अधिसूचित बाजारों को न तो मान्यता देता है और न ही नियंत्रित करता है।”

दोंथी ने तथाकथित “सामान्य उपयोग के कीटनाशकों” के नियमन में भी गंभीर कमियों की ओर इशारा किया। हालाँकि, विधेयक ऐसे उत्पादों को केवल घरों, कार्यालयों और इसी तरह के परिसरों में उपयोग किए जाने वाले कीटनाशकों के रूप में परिभाषित करता है, लेकिन इसमें इनकी बिक्री या उपयोग को नियंत्रित करने के लिए कोई ठोस प्रावधान नहीं हैं। उन्होंने कहा, “भारत में खेती में होने वाले दुरुपयोग की तुलना में सामान्य घरेलू उपयोग के कीटनाशकों के कारण अधिक मौतें होती हैं, फिर भी वे इस विधेयक के तहत पूरी तरह से अनियंत्रित हैं।”


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उन्होंने आगे कहा कि विधेयक विषाक्तता को मुख्य रूप से केवल काम के दौरान होने वाले संपर्क के रूप में परिभाषित करता है। इसमें घरों में दुर्घटनावश होने वाले संपर्क, भोजन के दूषित होने और पर्यावरण में प्रदूषण फैलने को शामिल नहीं किया गया है। यह संकीर्ण परिभाषा अस्पतालों द्वारा ऐसे मामलों की रिपोर्टिंग को कमजोर करती है, कानूनी जिम्मेदारी को सीमित करती है और एक राष्ट्रीय विषाक्तता रजिस्ट्री बनाने में बाधा डालती है, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य की निगरानी के लिए बेहद जरूरी है।

यह मसौदा कीटनाशकों का उपयोग करने वाले किसानों और श्रमिकों की व्यक्तिगत सुरक्षा के उपायों पर भी मौन है। जहां कीटनाशक अधिनियम 1968 में उपयोगकर्ताओं की सुरक्षा को मान्यता दी गई थी और कीटनाशक नियम 1971 में व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरणों पर विस्तृत दिशानिर्देश दिए गए थे, वहीं इस नए विधेयक में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। पैन इंडिया के दिलीप कुमार ने कहा, “इन सुरक्षा उपायों को हटाना इस जमीनी हकीकत की अनदेखी करना है कि खेतों में वास्तव में कीटनाशकों का उपयोग कैसे किया जाता है।”

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को एक ऐसे कीटनाशक कानून की आवश्यकता है जो वर्तमान वैज्ञानिक समझ, सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुरक्षा और पर्यावरण की सावधानी पर आधारित हो। हालांकि इस मसौदा विधेयक में कुछ प्रगतिशील तत्व शामिल किए गए हैं, लेकिन आलोचकों का तर्क है कि इसका मूल ढांचा अभी भी सुरक्षा के बजाय उद्योग की सुविधा को प्राथमिकता देता है।

 


यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 20 जनवरी 2026 को प्रकाशित हुई थी।


बैनर तस्वीर- भारत में 1952 में कीटनाशकों का उत्पादन शुरू होने के बाद से इस क्षेत्र में काफी वृद्धि हुई है। तस्वीर- प्रज्ञा अलीमकर, विकिमीडिया कॉमन्स (CC BY-SA 4.0).

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