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भारत में पेड़ लगाने की रफ्तार तेज, फिर भी कमजोर असर

लखनऊ में सालाना वृक्षारोपण अभियान के तहत पौधे लगाते हुए उत्तर प्रदेश सरकार के कर्मचारी। सांकेतिक तस्वीर। (AP फोटो/राजेश कुमार सिंह)

लखनऊ में सालाना वृक्षारोपण अभियान के तहत पौधे लगाते हुए उत्तर प्रदेश सरकार के कर्मचारी। सांकेतिक तस्वीर। (AP फोटो/राजेश कुमार सिंह)

  • एक नए अध्यन में पेड़-पौधों की संख्या और उनका रकबा बढ़ाने के मकसद से शुरू की गई आठ प्रमुख सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों तथा उनके असर की जांच की गई।
  • इनमें से सिर्फ एक कार्यक्रम ने पेड़-पौधों की संख्या बढ़ाने में मदद की। यहा कार्यक्रम सीधे तौर पर कृषि वानिकी को अपनाने से जुड़ा है।
  • अध्ययन के लेखकों का सुझाव है कि पेड़ लगाने से जुड़े कार्यक्रमों में जैव-विविधता को बचाए रखने के साथ-साथ समुदायों की आजीविका और उनके वन अधिकारों को अहमियत दी जानी चाहिए।

भारत सहित कई देशों में जैव-विविधता और पारिस्थितिकी तंत्रों में सुधार के लिए पेड़-पौधों की संख्या और उनका रकबा बढ़ाना जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को खत्म करने की योजनाओं का मुख्य हिस्सा बन गया है। हर साल भारत में लाखों पौधे लगाने के संकल्प के साथ वन महोत्सव जैसे वृक्षारोपण अभियान आयोजित होते हैं। साथ ही, ग्रीन इंडिया मिशन (GIM), राष्ट्रीय वनीकरण कार्यक्रम (NAP) और कृषि वानिकी उप-मिशन (SMAF) जैसी वृक्षारोपण योजनाओं को वनीकरण समाधान में सबसे ज्यादा प्राथमिकता दी जा रही है। हालांकि, यह सवाल बार-बार उठता है कि इन पहलों का असल में कितना असर हो रहा है?

एनवायरनमेंटल रिसर्च कम्युनिकेशन्स जर्नल में छपे एक नए अध्ययन में आठ प्रमुख सरकारी नीतियों और कार्यक्रमों की जांच करके और जंगलों के बाहर मौजूद वृक्षों (ToF) पर उनके प्रभाव का आकलन करके इस सवाल का जवाब खोजने की कोशिश की गई है।

अध्ययन की सह-लेखिका, शोधकर्ता और फिकस रिसर्च कंसल्टिंग की संस्थापक पूजा चोकसी कहती हैं कि इन कार्यक्रमों में कई राज्य की वित्तीय मदद से चलाए जाते हैं। इसका मतलब हुआ कि विभिन्न पहलों के लिए नागरिकों के टैक्स का पैसा खर्च किया जाता है। इसलिए, यह समझना जरूरी है कि असल में इस पैसे का इस्तेमाल किस तरह किया जा रहा है।

इसके अलावा, भारत के पास जमीन और वानिकी पर आधारित सबसे बड़े राष्ट्रीय स्तर पर तय योगदान (NDCs) हैं। NDC ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने की देशों की योजनाएं हैं। वह बताती हैं, “इससे बहुत ज्यादा दबाव बनता है: इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए नागरिकों के व्यवहार और जमीन के इस्तेमाल में बड़े बदलावों की जरूरत है, क्योंकि सरकार के पास जमीन बहुत कम है और वह भी जंगल के रूप में अधिक हैं।”

इससे एक जरूरी सवाल भी उठता है। चोकसी पूछती हैं, “मौजूदा (पेड़ लगाने के) कार्यक्रमों का इस्तेमाल करके हम असल में इन NDC को किस तरह पूरा करेंगे, खासकर तब जब हर कुछ सालों में नए कार्यक्रम शुरू किए जाते हैं?”

हिमाचल प्रदेश में वन विभाग की ओर से तैयार की गई एक नर्सरी। तस्वीर: पूजा चोकसी।
हिमाचल प्रदेश में वन विभाग की ओर से तैयार की गई एक नर्सरी। तस्वीर: पूजा चोकसी।

कृषि-वानिकी क्यों कारगर

अध्ययन के लेखकों ने यह पता लगाया कि वृक्षारोपण कार्यक्रमों पर किए गए वित्तीय निवेश (2013 से 2019 के बीच) का पेड़ों के आवरण में हुए बदलाव (2017 से 2023 के बीच) पर क्या असर पड़ा। उन्होंने पाया कि SMAF जैसे कृषि-वानिकी को सीधे बढ़ावा देने वाले कार्यक्रम वृक्ष आवरण में बढ़ोतरी के साथ लगातार और मजबूत सकारात्मक संबंध दिखाते हैं।

अध्ययन के लेखकों के अनुसार कम से कम सरकारी स्वामित्व वाले जंगलों के बाहर की भूमि पर SMAF के असरदार होने की मुख्य वजह है कि यह किसानों को अपनी खेती की जमीन पर पेड़ लगाने के लिए सीधे प्रोत्साहन देता है। पूजा चोकसी बताती हैं कि कृषि वानिकी को शायद इसलिए बढ़ावा दिया जा रहा है, क्योंकि अधिकांश लोग वैसे पेड़ लगाते हैं जो सीधे तौर पर उनके काम के हैं। वह कहती हैं, “इसका स्वाभाविक मतलब यह है कि लोग ऐसी प्रजातियां चुनते हैं जो उन्हें पारिस्थितिकी तंत्र की कुछ खास सेवाएं देती हैं।”

SMAF किसानों को उनके उपयोग के हिसाब से लचीले विकल्प प्रदान करता है। इनमें खेत की मेड़ या सीमाओं पर पेड़ लगाना, फसलों की कतारों के बीच पेड़ लगाना, पूरे खेत में पेड़ लगाना या बागवानी। इनमे पौधरोपण का घनत्व भी अलग-अलग हो सकता है।

चोकसी बताती हैं कि SMAF की कार्यप्रणाली की बड़ी खासियत यह है कि इसके तहत राज्यों को पहले अपनी जरूरतों का आकलन करना होता है, यह विश्लेषण करना होता है कि स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से उनके लिए सबसे असरदार क्या होगा और उसके बाद उसी विश्लेषण के आधार पर केंद्र सरकार से वित्तीय सहायता का अनुरोध करना होता है।

वह कहती हैं, “दूसरे शब्दों में, राज्यों को सिर्फ अंधाधुंध धनराशि ही नहीं दी जाती जिसे तय समय सीमा में खर्च करना हो। वे पहले विश्लेषणात्मक काम करते हैं और फिर उसी के आधार पर धन की मांग करते हैं।”

हिमाचल प्रदेश वन विभाग के वन अधिकारी पुष्पेंद्र राणा बताते हैं कि कार्यक्रम तब सफल होते हैं जब लोगों का उनके नतीजों में सीधा आर्थिक हित जुड़ा हो। उनका कहना है कि सफल कृषि-वानिकी वाले इलाकों में किसान यह देख सकते हैं कि अगर वे पांच से दस साल तक कोई खास पौधा उगाते हैं, तो उन्हें पक्का फ़ायदा होगा। राणा इस अध्ययन से जुड़े नहीं हैं।

लेखकों का यह भी कहना है कि दक्षिण-पूर्व एशिया से मिल रहे नए साक्ष्यों से पता चलता है कि कम समय में जंगलों की कटाई में कमी का कारण कृषि-वानिकी है। इसलिए, SMAF जैसी नीतियां निजी जमीन पर विकल्प उपलब्ध कराकर लकड़ी और लकड़ी के अलावा अन्य उत्पादों के लिए मौजूदा जंगलों पर दबाव कम करने में मदद कर सकती हैं।

मध्य प्रदेश के सतपुड़ा क्षेत्र में खेत और जंगल की सीमा पर खड़ा बरगद का विशाल पेड़। SMAF खेतों की मेड़ों या सीमाओं पर वृक्षारोपण जैसे विकल्प प्रदान करता है। अपनी कृषि भूमि पर लगाए गए पेड़ों की देखभाल करने वाले किसानों को कुछ सालों बाद उनसे मिलने वाली विभिन्न पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं से फायदा होता है। तस्वीर- पूजा चोकसी
मध्य प्रदेश के सतपुड़ा क्षेत्र में खेत और जंगल की सीमा पर खड़ा बरगद का विशाल पेड़। SMAF खेतों की मेड़ों या सीमाओं पर वृक्षारोपण जैसे विकल्प प्रदान करता है। अपनी कृषि भूमि पर लगाए गए पेड़ों की देखभाल करने वाले किसानों को कुछ सालों बाद उनसे मिलने वाली विभिन्न पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं से फायदा होता है। तस्वीर- पूजा चोकसी

वृक्षारोपण कार्यक्रमों में कमियां

अध्ययन में पाया गया कि प्रतिपूरक वनीकरण निधि प्रबंधन एवं योजना प्राधिकरण (CAMPA), NAP, GIM और RKVY जैसे भारत के कई प्रमुख और बड़े बजट वाले वृक्षारोपण कार्यक्रम ToF में बढ़ोतरी के साथ या तो कोई संबंध नहीं दिखाते हैं, या फिर उनका संबंध नकारात्मक पाया गया है।

चोकसी का कहना है कि वह ऐसा कोई पक्का दावा नहीं कर रही हैं कि जंगलों के बाहर पेड़ लगाने के कार्यक्रम असरदार नहीं हैं। हालांकि, नतीजों से पता चलता है कि ऐसे कई कार्यक्रम बिना जंगल वाले क्षेत्रों में अपने मकसद को पूरा नहीं कर पा रहे हैं; इनमें खराब और बंजर जमीन के साथ-साथ वे जंगल भी शामिल हैं जो पहले से ही सुरक्षित हैं।

“जो कार्यक्रम उम्मीद के मुताबिक नतीजे नहीं दे पाए, वे मुख्य रूप से जमीन के बड़े हिस्सों पर आधारित थे, जैसे JFM (संयुक्त वन प्रबंधन) के जरिए चलने वाला NAP। JFM आम तौर पर समुदाय की ओर से देखरेख वाले जमीन के बड़े हिस्से पर काम करता है और वहीं पर हमें खर्च का कोई खास असर नहीं दिखा,” वह कहती हैं।

एक अहम बात यह सामने आई है कि GIM का कानूनी तौर पर तय जंगलों के बाहर कोई खास असर नहीं दिखा। GIM पेड़-पौधों का दायरा बढ़ाने और जैव-विविधता को बेहतर बनाने के मकसद से शुरू किया गया जाना-माना कार्यक्रम है और जिसके लिए काफी बजट भी रखा गया है। लेखकों के लिए यह बात “खास तौर पर चिंताजनक” है, क्योंकि GIM देश की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फिर से बहाली और जलवायु परिवर्तन से निपटने की प्रतिबद्धताओं का हिस्सा है।

भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) की ओर से 2023 में प्रकाशित नवीनतम भारत वन स्थिति रिपोर्ट (ISFR) के अनुसार, GIM कानूनी रूप से अधिसूचित वन क्षेत्रों में काम कर रहा है, क्योंकि रिपोर्ट दिखाती है कि वहां पेड़ों के आवरण में बढ़ोतरी हुई है। हालांकि, चोकसी इस बात पर सवाल उठाती हैं कि आखिर बढ़ रहा वृक्ष आवरण किस प्रकार का है। वह कहती हैं, “ऐसी रिपोर्टों में उपलब्ध आंकड़े पूरे भारत के स्तर पर काफी सामान्य होते हैं। हमारे पास इस बात की गहराई से जानकारी नहीं होती कि कौन-सी प्रजातियां लगाई गईं, उनका घनत्व कितना था, कौन-सी झाड़ियां शामिल थीं और प्रजाति की विविधता कैसी थी। इस जानकारी के बिना हम किसी कार्यक्रम के असल असर को नहीं समझ सकते।”

मध्य प्रदेश के एक ग्रामीण घर के बगीचे में सहजन का पेड़ फूलों से लदा हुआ है। भारत की कई प्रमुख और महंगी वृक्षारोपण योजनाएं जंगलों के बाहर वृक्ष आवरण से सकारात्मक संबंध दिखाने में कमजोर साबित होती हैं। तस्वीर: पूजा चोकसी।
मध्य प्रदेश के एक ग्रामीण घर के बगीचे में सहजन का पेड़ फूलों से लदा हुआ है। भारत की कई प्रमुख और महंगी वृक्षारोपण योजनाएं जंगलों के बाहर वृक्ष आवरण से सकारात्मक संबंध दिखाने में कमजोर साबित होती हैं। तस्वीर: पूजा चोकसी।

अगर RKVY की बात करें, जिसमें वृक्षारोपण का भी एक हिस्सा शामिल है, तो चोकसी का कहना है कि हो सकता है लोग इसे न अपना रहे हों। वे ऐसा  खाद पर मिलने वाली सब्सिडी जैसे दूसरे फायदों के लिए कर रहे हों। 2023 में, ‘सब-मिशन ऑन एग्रोफॉरेस्ट्री’ (SMAF) को ‘राष्ट्रीय कृषि विकास योजना’ (RKVY) के तहत कृषि-वानिकी वाले हिस्से के तौर पर फिर से तैयार किया गया। वह कहती हैं, “अब जब SMAF, RKVY में शामिल हो गया है, तो यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या खेती से जुड़ी दूसरी ज्यादा बड़ी सब्सिडी वाली योजनाओं के मुकाबले, पेड़ लगाने वाली इस योजना को अधिक अपनाया जाता है या नहीं।”

पेड़ लगाने में एक और चुनौती कैम्पा नीति को लागू करने के तौर-तरीके से जुड़ी है। नीति के मुताबिक, जिस जंगल वाले इलाके में पेड़ काटे गए हैं, वहीं दोबारा पेड़ लगाने होंगे। चोकसी आगे बताती हैं, “लेकिन अक्सर ऐसा करना मुमकिन नहीं होता; लगातार पेड़ लगाने के लिए खराब हो चुकी जंगल की जमीन ही काफी नहीं है। इसलिए हो यह रहा है कि आप अंडमान और निकोबार में जंगल काट रहे हैं और फिर हरियाणा में पेड़ लगा रहे हैं; इससे कोई फायदा नहीं होगा, क्योंकि वहां के जीव-जंतु अलग-अलग हैं।”

कई कमियां

राणा कहते हैं कि वृक्षारोपण कार्यक्रमों का असर पूरी तरह उनके डिजाइन पर निर्भर करता है। उनका कहना है कि अधिकांश कार्यक्रमों का क्रियान्वयन ऊपर से नीचे (टॉप-डाउन) नजरिए से होता है। वे उदाहरण देते हुए बताते हैं कि अक्सर सालाना लक्ष्य तय कर दिए जाते हैं, जैसे किसी खास अवधि के भीतर तय संख्या में पौधे लगाना। ऐसे कार्यक्रमों में ध्यान अकसर लक्ष्य पूरा करने पर होता है, न कि इस बात पर कि लगाए गए पौधे कितने समय तक जीवित रहते हैं, स्थानीय परिस्थितियों के मुताबिक हैं या नहीं या क्या इससे समुदाय की असल जरूरतें पूरी होती हैं।

वह कहते हैं, “अक्सर ऐसा बिना किसी लचीलेपन, स्थानीय हालात पर ध्यान दिए, पुराने पौधारोपण कार्यक्रमों से मिले अनुभव को समझे बिना या स्थानीय वन संसाधनों पर निर्भर समुदायों के असरदार योगदान के बिना किया जाता है। यह सख्त और सिर्फ लक्ष्य पर केंद्रित तरीका गलत है और यही इन कार्यक्रमों के नाकाम होने की एक वजह है।”

मैनचेस्टर विश्वविद्यालय से अपने डॉक्टरेट के लिए वन परिदृश्य की बहाली (फॉरेस्ट लैंडस्केप रिस्टोरेशन) का अध्ययन करने वाले पर्यावरण शोधकर्ता धनपाल जी बताते हैं कि (भारतीय) सरकार सफलता को सिर्फ पेड़ों की छतरी (ट्री कैनोपी कवर) के आधार पर मापती है।

“नेचर सस्टेनेबिलिटी में प्रकाशित 2021 के एक अध्ययन जैसे बहुत कम अध्ययन हैं जो इस बात का मूल्यांकन करते हैं कि वृक्षारोपण वास्तव में जैव-विविधता में सुधार करता है, स्थानीय समुदायों की मदद करता है या घास के मैदानों के पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचाता है। सरकारी रिपोर्टें वृक्ष आवरण में सफलता का दावा करती हैं, लेकिन असल पर्यावरणीय या सामाजिक नतीजों का आकलन नहीं करती हैं। यह बड़ी कमी है,” वन परिदृश्य बहाली और जलवायु परिवर्तन अनुकूलन पर शोध करने वाले धनपाल बताते हैं।

धनपाल कहते हैं कि अधिकांश वन विभाग तेजी से बढ़ने वाली व्यावसायिक प्रजातियां, खास तौर पर सागौन (टीक) और यूकेलिप्टस लगाते हैं। ये जल्दी बढ़ते हैं और इनकी व्यावसायिक कीमत भी होता है। हालांकि, स्थानीय आदिवासी और वन-आश्रित समुदाय महुआ, तेंदू और साल जैसे देसी पेड़ों पर निर्भर रहते हैं। वे बताते हैं, “जब एक ही प्रजाति के पेड़ इन देसी प्रजातियों की जगह ले लेते हैं, तो समुदाय अपनी पारंपरिक आजीविकाएं खो देते हैं। फिर भी, सरकारी आंकड़े दिखाते हैं कि वृक्ष आवरण में सुधार हुआ है।”

धनपाल घास के मैदानों और खुले वन क्षेत्रों में पेड़ लगाने को लेकर भी चिंता जताते हैं; ये ऐसे पारिस्थितिकी तंत्र हैं जिन्हें सुरक्षित रखा जाना चाहिए। “शोधकर्ता ने बार-बार चेतावनी दी है कि घास के मैदान अलग तरह के पारिस्थितिकी तंत्र होते हैं, जो जैव-विविधता के लिहाज से कीमती होते हैं और उन्हें बचाया जाना चाहिए। उन पर पेड़ लगाने से वहां रहने वाले जीवों का आवास खत्म हो जाता है।”

हालांकि, पेड़ लगाने के कार्यक्रमों के लिए अच्छा-खासा फंड मिलता है, लेकिन इनकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उस पैसे का इस्तेमाल कितनी अच्छी तरह किया जाता है। राणा अपनी 2022 के अध्ययन का जिक्र करते हुए कहते हैं कि हिमाचल प्रदेश में पेड़ लगाने के कार्यक्रमों पर होने वाले कुल खर्च का लगभग आधा हिस्सा उन इलाकों में खर्च किया जाता है जहां पहले से ही पेड़-पौधे हैं या जहां पेड़ लगाने के लिए हालात ठीक नहीं हैं। वह कहते हैं, “बाकी बचे 50% का भी बड़ा हिस्सा शायद ही बच पाए, क्योंकि हम लोगों की जरूरतों या स्थानीय हालात को ध्यान में नहीं रखते।”

तमिलनाडु के नीलगिरी में चाय के बागानों से घिरी एक जगह पर देसी पौधों और घास में पानी डाल रहे पेड़-पौधों को फिर से लगाने का काम करने वाले लोग। सांकेतिक तस्वीर- (AP Photo/Aijaz Rahi)
तमिलनाडु के नीलगिरी में चाय के बागानों से घिरी एक जगह पर देसी पौधों और घास में पानी डाल रहे पेड़-पौधों को फिर से लगाने का काम करने वाले लोग। सांकेतिक तस्वीर- (AP Photo/Aijaz Rahi)

स्पष्ट आंकड़ों की जरूरत

भारत में बारीक स्तर पर खर्च के आंकड़ों का भी अभाव है। चोकसी बताती हैं कि जिला या उप-जिला स्तर का डेटा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। धनपाल आगे कहते हैं कि भारत स्थानिक डेटा प्रकाशित नहीं करता। साथ ही, देश में एक हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्रफल वाली और 10 प्रतिशत से अधिक वृक्ष आवरण वाली किसी भी भूमि को वन की श्रेणी में शामिल कर लिया जाता है। इस वजह से निजी भूमि पर मौजूद अनेक वृक्षारोपण भी वन में शामिल हो जाते हैं। वह कहते हैं, “और जब हम सिर्फ टैबुलर आंकड़ों को देखते हैं, तो भारत में हमें सिर्फ वन आच्छादन में बढ़ोतरी ही दिखाई देती है।”

राणा बताते हैं कि इस बात की भी जानकारी नहीं है कि कौन-सी प्रजातियों के पेड़ कहां लगाए जा रहे हैं और पर्यावरण पर उनका क्या असर हो रहा है। वह कहते हैं, “पेड़ लगाने के इन कार्यक्रमों में, कभी-कभी यह पता लगाना मुश्किल होता है कि किस तरह की प्रजातियां लगाई गई हैं।” राणा का कहना है कि इन जानकारियों के बिना, “जलवायु रणनीति के तौर पर पेड़ लगाने के काम का सही ढंग से मूल्यांकन करना” मुश्किल है।

शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि नीति बनाने वाले इनमें से कुछ कार्यक्रमों पर दोबारा विचार करेंगे और उन्हें नए सिरे से तैयार करेंगे, खासकर उन कार्यक्रम पर जो आजीविका और पेड़ लगाने की कोशिशों को जोड़ने का काम करते हैं। चोकसी कहती हैं, “SMAF ने साबित किया कि सोच-समझकर बनाई गई नीति काम करती है। इसलिए, काम नहीं कर रहे कार्यक्रमों को बंद करने के बजाय, हमें दूसरे तरीकों को आजमाना चाहिए और जो हमने सीखा है, उसके आधार पर उन्हें नए सिरे से डिजाइन करना चाहिए। हालांकि, कुछ कार्यक्रमों पर पूरी तरह से नए सिरे से सोचने की जरूरत है। ज्यादातर अध्ययनों से पता चला है कि नाजुक पारिस्थितिकी के नुकसान की भरपाई करना बहुत मुश्किल है।”

वह निष्पक्ष और निगरानी के स्वतंत्र तरीके बनाने की वकालत भी करती हैं, जो किए गए दावों का सत्यापन कर सकें और असल नतीजों पर पारदर्शी एवं विश्वसनीय आंकड़े उपलब्ध करा सकें।

राणा कहते हैं कि संख्या के बजाय गुणवत्ता पर ध्यान दिया जाना चाहिए। वे इस बात पर जोर देते हैं कि भारत के पास पेड़ लगाने के लंबे समय के लक्ष्य तो हैं, लेकिन कई मामलों में ध्यान असल नतीजे पाने के बजाय सिर्फ लक्ष्य पूरे करने पर ही रहता है। वह जोड़ते हैं, “हमने जो पेड़ लगाए हैं, उनकी निगरानी और मूल्यांकन के लिए एक प्रणाली की जरूरत है। पेड़ लगाने के कार्यक्रमों को लेकर जवाबदेही और पारदर्शिता कम है, जिसे मजबूत किया जाना चाहिए।”

धनपाल कहते हैं कि इससे भी जरूरी बात यह है कि पेड़ लगाने के लिए सही जमीन की पहचान करने और प्राकृतिक रूप से दोबारा पेड़-पौधे उगने देने या स्थानीय प्रजातियों के पौधे लगाने जैसे तरीकों को अपनाने के लिए वैज्ञानिक तरीका अपनाया जाना चाहिए।


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चोकसी का कहना है कि वृक्षारोपण कार्यक्रमों और नीतियों के असर का पता लगाने के लिए क्षेत्र-आधारित अध्ययन बहुत जरूरी हैं। वह कहती हैं, “अगर सरकार हमें इन वृक्षारोपण वाली जगहों की जानकारी उपलब्ध कराए, तो हम रिमोट सेंसिंग डेटा को जमीनी सर्वेक्षणों के साथ जोड़कर उन पहलुओं का आकलन कर सकते हैं, जिन्हें सिर्फ रिमोट सेंसिंग डेटा के आधार पर समझ पाना संभव नहीं है।”

धनपाल का कहना है कि जब जैव-विविधता को बेहतर बनाने और उत्सर्जन कम करने के मकसद से पेड़ लगाने पर विचार किया जाता है, तो लक्ष्य सिर्फ पेड़ लगाकर जलवायु संबंधी लक्ष्यों को पूरा करने तक ही सीमित नहीं होने चाहिए। वह कहते हैं, “नीतियों में समुदाय की आजीविका, सामुदायिक वन अधिकारों और जैव-विविधता के संरक्षण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।”


यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर  3 जून, 2026 को प्रकाशित हुई थी।


बैनर तस्वीर: लखनऊ में सालाना वृक्षारोपण अभियान के तहत पौधे लगाते हुए उत्तर प्रदेश सरकार के कर्मचारी। सांकेतिक तस्वीर। (AP फोटो/राजेश कुमार सिंह)

 

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