- चांगथांग के घुमंतू चांगपा चरवाहे अनियमित बर्फबारी, अत्यधिक ठंड, चारे की कमी और सिकुड़ते चारागाहों के कारण अपने मवेशियों को बड़ी संख्या में खो रहे हैं।
- जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम का पैटर्न बदल रहा है, जिससे उनके पारंपरिक प्रवास के मार्ग प्रभावित हो रहे हैं। उनकी मुश्किलें बढ़ रही हैं और वे पशुपालन छोड़ने को मन बना रहे हैं।
- हालाँकि, एकीकृत ऊन विकास कार्यक्रम के तहत इस क्षेत्र में पश्मीना के विकास के लिए बजट दिया गया है, लेकिन पशु बीमा की कमी और बकरियों में बीमारियों के प्रकोप के कारण पशुपालन व्यवस्था खतरे में है।
सेरिंग नामग्याल लद्दाख में चांगथांग पठार के देबरिंग मैदानों में अपनी बकरियों के झुंड के साथ आगे बढ़ रहे हैं। दूर-दूर तक फैले इस इस ट्रांस-हिमालयी क्षेत्र में एक तरफ तेज धूप की चुभन है तो दूसरी ओर ठंडी हवाएं भी हैं। इन बकरियों को ‘चांगथांगी बकरी’ कहा जाता है। जब ये बकरियां मिमिआते हुए यहां की जमी हुई ज़मीन पर अपने खुर मारती हैं हैं तो झुंड के ऊपर धूल के गुबार उठने लगते हैं। हवा में मिट्टी, घास और पश्मीना ऊन की महक महसूस की जा सकती है।
यह बेहद ऊबड़-खाबड और ठंडा इलाका, चांगथांग के उन घुमंतू चांगपा चरवाहों का सदियों से सहारा रहा है जिनका जीवन बदलते मौसम और मवेशियों के झुंड के साथ प्रवास से गहराई से जुड़ा है। हालाँकि, अब मौसम का यह पारंपरिक चक्र बदल रहा है।
नामग्याल अपने मवेशियों को चराते हुए रास्ते में रुककर दूसरे चरवाहों के साथ बातचीत करने लगते हैं। उन्हीं में से एक हैं तोबगा दोरजी, जो शायद हमेशा के लिए चांगथांग छोड़ने का मन बना चुके हैं। तोबगा अपनी बची हुई 54 बकरियों को बेचकर लेह जाना चाहते हैं। उन्हें उम्मीद है कि उन्हें वहां मजदूरी का कोई न कोई काम मिल ही जाएगा।
मार्च और अप्रैल 2025 के बीच, खराब मौसम के कारण तोबगा की 80 बकरियां मर गईं थीं। पास ही की पूगा घाटी के कई चांगपा परिवार अपने मौसमी प्रवास के दौरान खार्नाक की ओर जा रहे थे, तभी अचानक हुई भारी बर्फबारी और भीषण ठंड ने मेमनों की जान ले ली। इस कारण कुछ ही दिनों में उनके झुंड बहुत छोटे हो गए और उनका यह सामान्य सफर अस्तित्व बचाने के संघर्ष में बदल गया।
लगभग 35,000 वर्ग किलोमीटर में फैला चांगथांग क्षेत्र भारत के लद्दाख और हिमाचल प्रदेश से लेकर तिब्बत तक फैला हुआ है। यह यहां की दूर-दूर बसी चरवाहा आबादी का घर है, जिनकी आजीविका मुख्य रूप से इन बकरियों से मिलने वाला पश्मीना ऊन और याक के दूध के उत्पादों पर टिकी है।
आज पूरे चांगथांग में, जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम का बिगड़ता मिजाज चरवाहों के जीवन को अस्त-व्यस्त कर रहा है। मवेशी मर रहे हैं, चारागाह सिमट रहे हैं और चरवाहा परिवारों को अपनी पीढ़ियों पुरानी जीवन शैली को बदलने पर विचार करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।

अनियमित मौसम और मवेशियों की मौत
पिछले साल फरवरी और मार्च की भीषण ठंड के दौरान चांगथांग में हजारों मवेशियों की मौत हो गई। दिल्ली के एक गैर-सरकारी संगठन ‘सस्टेनेबल एनवायरनमेंट एंड इकोलॉजिकल डेवलपमेंट सोसाइटी’ (SEEDS) के अनुसार, 10 फरवरी से 31 मार्च 2025 के बीच चांगथांग के निवासियों ने भारी संख्या में अपने मवेशियों को खोया। इसमें 5,888 भेड़ें और बकरियां शामिल थीं।
भारी बर्फबारी के बाद, SEEDS ने जलवायु से जुड़ी आपदाओं से निपटने के लिए समुदायों को पहले से तैयार करने के उद्देश्य से एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया। इस संगठन के प्रोग्राम लीडर याज़दी रहमान ने बताया, “हमने रुपसो, खार्नाक और कोरज़ोक के तीन घुमंतू समुदायों को पशु आहार और जौ बांटे थे।”
उन्होंने आगे कहा, “इसके बाद, हमने चांगपा समुदाय को ऐसी आपदाओं के दौरान बरती जाने वाली सावधानियों (क्या करें और क्या न करें) के बारे में सिखाने के लिए कार्यशालाएं और प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए। इस दौरान हमें यह पता चला कि चारे-पानी की कमी से होने वाला कुपोषण पशुओं की मौत की एक बड़ी वजह था।”
पिछले कुछ वर्षों में, अनियमित और अप्रत्याशित मौसम ने यहां के लोगों को भारी नुकसान पहुंचाया है। असमय भारी बर्फबारी, अनियमित बारिश, अचानक बादल फटने और लंबे सूखे जैसी घटनाओं ने उन प्राकृतिक चारागाहों को नष्ट कर दिया है जहां भेड़ें और पश्मीना बकरियां चरती हैं। इससे चरवाहों का जोखिम काफी बढ़ गया है।
अपने मवेशियों को जिंदा रखने के लिए तोबगा और नामग्याल को नए चारागाहों की तलाश में अपने सदियों पुराने रास्तों को बदलना पड़ा है। तोबगा कहते हैं, “ऐसा महसूस होता है जैसे यह जमीन हर साल बदल रही है।”

चारे की कमी के कारण
पश्मीना एक उच्च गुणवत्ता वाली कश्मीरी ऊन है। यह दुनिया की सबसे बेहतरीन और सबसे मुलायम ऊनों में से एक मानी जाती है, जिसके एक धागे की मोटाई मात्र 12 से 16 माइक्रोमीटर होती है।
समुद्र तल से 4,000 से 7,000 मीटर की ऊंचाई पर चांगपा लोग दशकों से प्रवास करते आ रहे हैं। वे हर चारागाह पर 20 से 30 दिनों तक रुकते हैं और बर्फबारी, बारिश, सर्दियों और गर्मियों के चारागाहों के अपने पारंपरिक कैलेंडर का पालन करते हैं।
कश्मीर यूनिवर्सिटी की शोधकर्ता डेशियन चोस्नेट चांगथांग के चरवाहों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का अध्ययन कर रही हैं। वह बताती हैं कि बढ़ते तापमान के कारण चरवाहों ने मार्च की शुरुआत में ही अपना वसंत ऋतु का प्रवास शुरू कर दिया था।
उन्होंने कहा, “लेकिन इसमें एक मुश्किल भी है। पूगा घाटी और सोकर दोनों क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर चल रही विकास परियोजनाओं के कारण सर्दियों के चारागाहों पर दबाव बढ़ रहा है। इससे चरवाहे समय से पहले ही वहां से हटने के लिए मजबूर हो जाते हैं। ऐसे में जब अचानक बर्फबारी या बाढ़ जैसी मौसम की मार पड़ती है, तो समुदाय इसके लिए तैयार नहीं होता और पशु मारे जाते हैं।”
लेह के मौसम विज्ञान विभाग के प्रमुख सोनम लोटस बताते हैं कि पिछले तीन-चार वर्षों में चांगथांग में मार्च और अप्रैल के महीनों में भारी बर्फबारी देखी गई है, जबकि ये महीने पारंपरिक रूप से तेज हवाओं के लिए जाने जाते थे। उन्होंने बताया, “इस अचानक होने वाली बर्फबारी से तापमान बहुत अधिक गिर जाता है, जिससे पश्मीना बकरियों के मेमनों की बड़े पैमाने पर मौत हो जाती है।”
लोटस ने आगे बताया कि मुख्य मौसमों के दौरान बहुत कम बारिश या बर्फबारी होने के कारण चारागाह दोबारा ठीक से पनप नहीं पाते, जिससे चारे की भारी कमी हो जाती है। इसके अलावा, अचानक तेज बारिश और बर्फ पिघलने से आने वाली बाढ़ चारागाहों, पशुओं के रहने की जगहों और उनके रास्तों को नुकसान पहुंचा रही है। उन्होंने कहा, “मौसम के इन गंभीर बदलावों से चारे का भारी संकट खड़ा हो गया है। इस कारण चरवाहों को या तो अपने पशुओं की संख्या कम करनी पड़ती है या फिर मजबूरी में पलायन करना पड़ता है।”

बढ़ती मुश्किलें
चरवाहों का कहना है कि पशुपालन और भेड़ पालन विभाग से मदद अक्सर तब पहुंचती है जब पशुओं की मौत हो चुकी होती है। नामग्याल ने कहा, “भारी बर्फबारी और अचानक आने वाली बाढ़ के समय मदद अकसर 10 दिनों के बाद आती है, और जो पशु आहार मिलता है वह कभी भी पर्याप्त नहीं होता। इस दौरान घास बिल्कुल भी नहीं मिलती। हमारे पास अपने पशुओं के लिए कोई बीमा योजना भी नहीं है।”
भेड़ पालन विभाग के एक अधिकारी सेरिंग लामचुंग ने माना कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव चांगथांग में आजीविका के रूप में किए जाने वाले पशुपालन के लिए एक बड़ी चुनौती बन गए हैं।
वह आगे कहते हैं, “यहां के घुमंतू समुदायों के सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा के लिए मौसम के अनुकूल चारागाह प्रबंधन, चारा सहायता प्रणाली, समय से पहले चेतावनी देने वाली व्यवस्था और आजीविका के नए तरीकों की सख्त जरूरत है।” आंकड़े सीमित होने की बात स्वीकार करते हुए लामचुंग ने बताया कि उपलब्ध रिकॉर्ड पशुओं की मौत में भारी बढ़ोतरी दर्शाते हैं। साल 2017-2018 में लगभग 7,151 जानवरों की मौत हुई थी, जबकि 2021-2022 तक यह संख्या बढ़कर लगभग 21,000 तक पहुंच गई।
उन्होंने कहा, “अत्यधिक ठंड, मौसम में अचानक बदलाव और तेज हवाएं पश्मीना बकरियों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर रही है। उन्हें सांस की बीमारियों का खतरा बहुत बढ़ जाता है।” वह आगे कहते हैं, “मौजूदा समय में चांगथांगी बकरियों में फैलने वाली ‘कंटेजियस कैपराइन प्लुरोनिमोनिया’ नामक फेफड़ों की बीमारी के प्रकोप का सामना कर रहा है। हमारे पास अभी तक इस बीमारी का टीका भी उपलब्ध नहीं है।”
लामचुंग के मुताबिक, विभाग चरवाहों की मदद के लिए खराब मौसम और सर्दियों के आने से पहले चारा उपलब्ध कराता है। उन्होंने बताया, “साल 2024-25 में इस समुदाय को लगभग 1,000 क्विंटल चारा बांटा गया था। इसके अलावा, हर साल 75% सब्सिडी पर पौष्टिक पशु आहार दिया जाता है, और वित्तीय वर्ष 2025-2026 में (अब तक) लगभग 6,750 क्विंटल आहार बांटा जा चुका है।”

पर्यावरण और आर्थिक दबाव
आर्थिक चुनौतियों से निपटने के लिए चांगपा लोगों ने ऊन के उत्पादन और अपनी आय को बढ़ाने के नए तरीके अपनाए हैं। हालांकि, पशुओं की संख्या बढ़ने से इस संवेदनशील सूखे इलाके के चारागाहों पर दबाव बढ़ गया है, जिससे अत्यधिक चराई, पशुओं के पैरों से ज़मीन का दबना और मिट्टी का कटाव हो रहा है। साल 1997 और 2019 के बीच बकरियों की संख्या में 45% की वृद्धि हुई, जबकि भेड़ों की संख्या में 26% की गिरावट आई।
चोस्नेट कहती हैं कि पहले पारंपरिक झुंड में चरवाहे भेड़ और बकरियों का अनुपात 50:50 हुआ करता था। उन्होंने कहा, “दोनों तरह के पशुओं की बराबर संख्या होने से पश्मीना बकरियों को गर्म रखने में मदद मिलती थी। लेकिन, जलवायु परिवर्तन के कारण चारागाहों के सिमटने और वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास सुरक्षा चिंताओं के कारण, अब झुंड में भेड़ों की संख्या घटकर केवल 30% रह गई है।”
लामचुंग बताते हैं कि लेह जिले में भेड़ और बकरियों की कुल संख्या साल 2014 में 3,02,760 थी, जो 2024 में घटकर 2,97,840 रह गई। वहीं, शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, लेह के वैज्ञानिक फिरोज दीन शेख के अनुमान के अनुसार, फिलहाल चांगथांग में लगभग 2,00,000 पश्मीना बकरियां और 48,000 भेड़ें पाली जा रही हैं।
साल 2021 में, केंद्रीय कपड़ा मंत्रालय ने लद्दाख में पश्मीना व्यापार को बढ़ावा देने के लिए ‘एकीकृत ऊन विकास कार्यक्रम’ (आईडब्लूडीपी) के तहत लगभग 29 करोड़ रुपए मंजूर किए थे। जुलाई 2025 में लोकसभा में दिए गए एक जवाब में बताया गया कि लद्दाख में पश्मीना विकास के लिए अब तक 18.56 करोड़ रुपए जारी किए जा चुके हैं। इसमें से संबंधित एजेंसियां 14 करोड़ रुपए से अधिक का उपयोग कर चुकी हैं।
लामचुंग के अनुसार, जारी की गई राशि में से भेड़ पालन विभाग को लगभग 9 करोड़ रुपए मिले हैं और बाकी राशि पश्मीना विकास में सहायता करने वाले अन्य संबंधित विभागों को दी गई थी। इस राशि का उपयोग कौशल विकास और बुनियादी ढांचे के निर्माण में किया जा रहा है।

अनिश्चित भविष्य
चीन और भारत के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास चुशुल गांव में रहने वाले एक चरवाहे ताशी दोरजी बताते हैं कि यहां के 150 घुमंतू परिवारों में से अब केवल 40 परिवार ही पशुपालन कर रहे हैं। बाकी लोग या तो लेह पलायन कर गए हैं या फिर सेना में कुली के रूप में काम करने लगे हैं।
वैज्ञानिक फिरोज दीन ने कहा, “पूरे हिमालय क्षेत्र में मौसम का बदलता चक्र चरवाहा समुदायों की खाद्य सुरक्षा को प्रभावित कर रहा है, क्योंकि वे अपने भरण-पोषण के लिए पूरी तरह से अपने पशुओं से मिलने वाले उत्पादों पर ही निर्भर हैं।”
वह आगे बताते हैं कि अगले दो दशकों में, नई पीढ़ी शायद यहां की भीषण सर्दियों और जलवायु परिवर्तन के कारण पैदा होने वाली कठिनाइयों को सहने के लिए तैयार हो। उन्होंने कहा, “कई युवा पढ़ाई के लिए पहले ही चांगथांग छोड़ चुके हैं। हमने ‘कमर्शियल कम्युनिटी पास्टोरलिज्म फार्मिंग’ नाम का एक मॉडल सरकार के सामने रखा है, जिसमें सरकार युवाओं को तय वेतन पर काम पर रखेगी। इससे पारंपरिक पशुपालन भी बचा रहेगा और युवाओं को एक सुरक्षित भविष्य भी मिलेगा।”
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हिमालय के चारागाहों पर केंद्रित इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (आईसीआईएमओडी) की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि कई हिमालयी देशों ने विकास में पशुधन की भूमिका को नजरअंदाज किया है और वे पारंपरिक पशुपालन व्यवस्था की उपयोगिता को समझने में असफल रहे हैं। दीन के मुताबिक, “ऐसी नीतियों की तत्काल आवश्यकता है जो इन स्थानीय समुदायों की मदद करें, क्योंकि वास्तव में यही लोग ऊंचाई पर स्थित इस संवेदनशील पर्यावरण के असली रक्षक हैं।”
उन्होंने कहा, “साल 2026 को संयुक्त राष्ट्र द्वारा ‘अंतरराष्ट्रीय चारागाह और चरवाहा वर्ष’ घोषित किया गया है। इसका उद्देश्य चरवाहों के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय अधिकारों की रक्षा करना है। दरअसल, लद्दाख में ये घुमंतू चरवाहे आज भी अपने अस्तित्व और पहचान के लिए एक मौन संघर्ष कर रहे हैं।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 17 फरवरी, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: ताशी दोरजी चांगथांग के मैदानों में खार्नाक के एक अस्थायी बाड़े में पारंपरिक कैंची से एक भेड़ की ऊन काटते हुए। तस्वीर: सफीना वानी