- रणथंभौर टाइगर रिज़र्व में बाघों के मल के नमूनों पर हुए एक नए अध्ययन में पुरानी पद्धतियों की तुलना नई ‘डीएनए मेटाबारकोडिंग’ तकनीक की सटीकता से की गई, जिसमें पाया गया कि मेटाबारकोडिंग बाघों द्वारा खाए जाने वाले शिकार की कहीं अधिक विस्तृत विविधता का पता लगाने में सक्षम है।
- अध्ययन के मुताबिक, हालाँकि चीतल और सांभर जैसे जंगली जानवर अभी भी बाघों के लिए महत्वपूर्ण शिकार हैं, लेकिन धीरे-धीरे मवेशी भी उनके भोजन का एक बड़ा हिस्सा बनने लगे हैं।
- यह अध्ययन संरक्षित क्षेत्रों की सीमाओं के बाहर मवेशियों की सुरक्षा को मजबूत करने और मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने की तत्काल आवश्यकता पर जोर देता है।
बड़े मांसाहारी जानवर क्या खाते हैं, यह समझना उनके संरक्षण के लिए बहुत जरूरी है। बाघ जैसे बड़े शिकारियों को रहने के लिए बड़े इलाकों और पर्याप्त शिकार की जरूरत होती है। इसलिए, उनके खान-पान में आने वाला एक छोटा सा बदलाव भी पर्यावरण और उनके आस-पास के माहौल पर बड़ा असर डाल सकता है। लेकिन वैज्ञानिकों के लिए बाघों के ‘आहार’ का सटीक पता लगाना आज भी एक बड़ी चुनौती है।
सालों से वैज्ञानिक बाघों के मल की जांच करके उनके शिकार की पहचान करते आ रहे हैं। इस पारंपरिक तरीके में मल को धोकर, उसमें से बाल और हड्डियों के टुकड़े निकाले जाते हैं और माइक्रोस्कोप से उनकी जांच की जाती है। हालांकि यह तरीका काफी लोकप्रिय है, लेकिन इसकी अपनी कुछ सीमाएं हैं। इसमें कभी-कभी वे जीव नहीं दिख पाते जिनके शरीर के अंग कोमल होते हैं, ऐसे में दुर्लभ शिकार छूट जाते हैं, या फिर उन जानवरों की पहचान करने में गलती हो सकती है जिनके बाल एक जैसे दिखते हैं। साथ ही, इसके नतीजे इस बात पर भी निर्भर करते हैं कि जांच करने वाले को कितना अनुभव है।
राजस्थान के रणथंभौर टाइगर रिजर्व में हुए एक नए अध्ययन में यह जानने की कोशिश की गई है कि क्या ‘डीएनए मेटाबारकोडिंग’ नाम की नई तकनीक इन कमियों को दूर कर सकती है। यह तकनीक सीधे मल से शिकार का डीएनए निकालकर उसकी पहचान करती है, ताकि यह पता चल सके कि बाघों ने असल में क्या खाया है। इस अध्ययन के सह-लेखक और नेशनल सेंटर फॉर बायोलॉजिकल साइंसेज (एनसीबीएस) के वन्यजीव जीवविज्ञानी सारंग मिश्रीकोटकर कहते हैं, “दोनों तरीकों की सीधी तुलना करके, हमारा मकसद शिकार का पता लगाने, उनकी विविधता और वर्गीकरण में आने वाले अंतर को समझना था। हम यह जानना चाहते थे कि क्या यह नई तकनीक हमें बाघों के खानपान की एक ज्यादा बेहतर और निष्पक्ष जानकारी दे सकती है, खासकर उन दुर्लभ या छोटे जीवों के बारे में जो पुराने तरीके से पकड़ में नहीं आते थे।”
रणथंभौर में बाघों के खान-पान पर रिसर्च
दिसंबर 2019 से फरवरी 2020 के बीच, शोधकर्ताओं ने रणथंभौर टाइगर रिजर्व के अलग-अलग इलाकों में जाकर सर्वे किया। इस दौरान उन्होंने रिजर्व के जंगलों में बने रास्तों पर बार-बार चक्कर लगाए। पांच बार किए गए इस सर्वे में उन्होंने 2,000 किलोमीटर से भी ज्यादा का सफर तय किया और बाघों के बिल्कुल ताजा मल के नमूने इकट्ठा किए।

सिर्फ देखकर यह पहचानना मुश्किल होता है कि मल बाघ का ही है या नहीं, इसलिए शोधकर्ताओं ने जेनेटिक टेस्टिंग का सहारा लिया। एक बार जब यह पुष्टि हो गई कि मल बाघ का ही है, तो हर एक सैंपल पर दोनों तरीकों का इस्तेमाल किया गया। पहला, पारंपरिक तरीका (मल को धोकर हड्डियां और बाल अलग करना) और दूसरा, डीएनए मेटाबारकोडिंग। इससे टीम को यह तुलना करने में मदद मिली कि दोनों में से कौन सा तरीका उनके आहार के बारे में ज्यादा सटीक जानकारी दे सकता है।
इस प्रक्रिया में कई चुनौतियां भी थीं। मल एक ऐसा सैंपल होता है जिसमें बाहरी गंदगी मिलने का खतरा सबसे ज्यादा होता है और इसमें शिकार का डीएनए भी काफी खराब हालत में मिलता है। इस जोखिम को कम करने के लिए केवल ताजे मल के नमूने ही इकट्ठे किए गए। साथ ही, सैंपल लेते समय पूरी सावधानी बरती गई और साफ-सुथरे दस्ताने, सर्जिकल मास्क व खास औजारों का इस्तेमाल किया गया।
इन नमूनों को सुरक्षित रखना भी उतना ही जरूरी था। अध्ययन की सह-लेखिका और नेचर कंजर्वेशन फाउंडेशन की एकेडमिक डीन मौसमी घोष-हरिहर बताती हैं, “विश्लेषण के लिए लाए गए सभी नमूनों पर अलग-अलग लेबल लगाए गए, उन्हें सिलिका जेल के साथ जिप-लॉक बैग में रखा गया और -21°C पर फ्रीज़ कर दिया गया। ट्रांसपोर्ट के दौरान डीएनए को खराब होने से बचाने के लिए इस तापमान को बनाए रखना बहुत जरूरी था। इन नमूनों को लैब तक ‘ड्राई आइस’ में ले जाया गया और वहां भी डीएनए निकालने तक उन्हें -21°C पर सुरक्षित रखा गया।”
लैब में, हर मल के नमूने को लिक्विड नाइट्रोजन की मदद से अच्छी तरह से मिलाकर एकसार किया गया, ताकि बाल और हड्डियों के टुकड़ों सहित सभी हिस्सों से डीएनए निकाला जा सके। जांच के दौरान बाघ का अपना डीएनए शिकार के डीएनए दबा न दे, इसके लिए शोधकर्ताओं ने एक ‘ब्लॉकिंग मॉलिक्यूल’ का भी इस्तेमाल किया।
डीएनए से शिकार की अधिक विविधता का पता चला
दोनों तरीकों के नतीजों में बहुत बड़ा अंतर देखने को मिला। डीएनए मेटाबारकोडिंग के जरिए पारंपरिक तरीके यानी मैकेनिकल सॉर्टिंग की तुलना में कहीं ज्यादा प्रजातियों और लगभग दोगुने शिकार के सबूत मिले। जहां पुराने तरीके से एक मल के नमूने में औसतन केवल एक शिकार की जानकारी मिलती थी, वहीं डीएनए जांच में एक ही नमूने में दो से तीन शिकारों के सबूत मिले।
इस जेनेटिक तरीके ने उन दुर्लभ शिकारों का भी पता लगा लिया जिन्हें पारंपरिक तरीका पूरी तरह से नजरअंदाज कर देता था, जैसे रोडेंट, पक्षी और स्लॉथ बीयर। मिश्रीकोटकर कहते हैं, “पारंपरिक तरीके से आमतौर पर एक मल में एक ही शिकार का पता चलता था, जिससे ऐसा लगता था कि बाघ एक बार में एक ही जानवर खाता है। लेकिन मेटाबारकोडिंग ने एक कहीं ज्यादा जटिल और विस्तृत तस्वीर सामने रखी है।”
मैकेनिकल सॉर्टिंग से जिन शिकार प्रजातियों की पहचान की गई थी, उनमें से एक भी डीएनए मेटाबारकोडिंग से नहीं छूटी। इससे यह साफ हो गया कि जेनेटिक तरीका कितना संवेदनशील और सटीक है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस डीएनए विश्लेषण ने रणथंभौर में बाघों के आहार को लेकर हमारी समझ को पूरी तरह से बदल दिया है।
बाघों के भोजन में अब भी जंगली शिकार का एक बड़ा हिस्सा शामिल है। चीतल और सांभर (हिरण की दोनों बड़ी प्रजातियां) आज भी उनके भोजन का मुख्य जरिया हैं। इसके साथ ही वे नीलगाय, जंगली सूअर और चिंकारा का भी शिकार करते हैं। हालांकि, इस अध्ययन में घरेलू मवेशी उनके अहार में एक बड़े हिस्से के रूप में सामने आए हैं। बाघों के मल के जितने भी नमूने लिए गए, उनमें से 75% से ज़्यादा नमूनों में गाय-बैलों के अवशेष पाए गए और बाघों के भोजन में सबसे बड़ा हिस्सा इन्हीं का था। अगर गाय-बैलों और भैंसों दोनों को मिला दिया जाए, तो बाघों द्वारा खाए जाने वाले कुल मांस का लगभग 40% हिस्सा पालतू मवेशियों का ही था। अध्ययन की सह-लेखिका मौसमी घोष-हरिहर कहती हैं, “जहां पुराने पारंपरिक तरीके से ऐसा लग रहा था कि बाघ सबसे ज़्यादा सांभर का शिकार करते हैं, वहीं डीएनए विश्लेषण से यह साफ हुआ कि उनके भोजन में सबसे आम हिस्सा पालतू मवेशियों का है, जिसके बाद चीतल और सांभर का नंबर आता है।”
नतीजों में किसी भी तरह के पूर्वाग्रह या गड़बड़ी की आशंका को कम करने के लिए, शोधकर्ताओं ने लैब जांच के हर स्तर पर ‘नेगेटिव कंट्रोल’ का इस्तेमाल किया। इसके साथ ही उन्होंने यह भी जांचा कि जिन शिकारों की पहचान की गई है, वे वहां के स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र में पाए जाने वाले जीवों से मेल खाते हैं या नहीं। मिश्रीकोटकर कहते हैं, “पालतू जानवरों और दुर्लभ शिकार जीवों की पहचान के सटीक विश्लेषण के लिए यह प्रक्रिया विशेष रूप से मददगार रही। इससे यह सुनिश्चित हुआ कि हमारे नतीजे पारिस्थितिक दृष्टिकोण से बाघों के वास्तविक और स्वाभाविक आहार को ही दर्शाते हैं।”
संरक्षण के लिए इसके मायने
इन निष्कर्षों का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि बाघों ने वन्य जीवों का शिकार करना बंद कर दिया है। इसके बजाय, ये नतीजे प्राकृतिक शिकार के साथ-साथ पालतू मवेशियों पर उनकी बढ़ती निर्भरता की ओर इशारा करते हैं, जो मानव-बाघ संघर्ष की घटनाओं को ओर बढ़ा सकते हैं।
रणथंभौर एक छोटा और एक संकरा रिजर्व है, जो चारों तरफ से गांवों और कृषि भूमि से घिरा हुआ है। यहां बाघ अक्सर रिजर्व की सीमाओं से बाहर निकल जाते हैं, वहीं मवेशी भी आमतौर पर जंगल के अंदर खुले में चरते हुए मिल जाते हैं। अध्ययन में पाया गया कि मवेशियों के अवशेषों वाले मल केवल रिजर्व के किनारों तक सीमित नहीं थे, बल्कि पूरे पार्क में बिखरे हुए थे। हालांकि, लेखकों ने सचेत किया है कि जिस जगह मल मिला है, जरूरी नहीं कि शिकार भी उसी जगह किया गया हो; पार्क की संकरी बनावट को देखते हुए, पूरी संभावना है कि कई बाघ बाहरी इलाकों (पेरिफेरल एरिया) तक जाते हों, जहां वे मवेशियों को अपना शिकार बनाते हैं।
रणथंभौर के इलाके में मवेशियों का शिकार होना पहले से ही मानव- बाघ संघर्ष का सबसे बड़ा कारण है। ऐसे में, गाय-भैंसों जैसे मवेशियों पर बाघों की बढ़ती निर्भरता इस टकराव को और बढ़ा सकती है। नतीजा यह होगा कि ग्रामीणों की तरफ से जवाबी कार्रवाई जैसे बाघों को जहर देना या मारने का खतरा बढ़ सकता है, जिससे पहले से ही अलग-थलग पड़ चुकी बाघों की इस आबादी पर दबाव और अधिक बढ़ जाएगा।

सुरक्षित क्षेत्रों से बाहर टकराव को कम करने की जरूरत
हालाँकि, इस अध्ययन से यह साफ है कि ‘डीएनए मेटाबारकोडिंग’ तकनीक से बाघों के शिकार की पहचान बेहतर तरीके से होती है, फिर भी कुछ अनिश्चितताएं बनी हुई हैं। यह तकनीक यह तो भरोसेमंद तरीके से बता देती है कि बाघ ने किस जीव का शिकार किया है, लेकिन इससे यह सटीक अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि उसने उस शिकार का कितना हिस्सा खाया था।
इसके अलावा, बाघों के व्यवहार से जुड़े कुछ अहम सवालों के जवाब अभी भी नहीं मिल पाए हैं। इस जांच में शिकार के डीएनए पर ध्यान केंद्रित करने के लिए बाघ के अपने डीएनए को अलग रखा गया था, इसलिए अपनी ही प्रजाति को खाने या मरे हुए जीवों को खाने जैसी दुर्लभ आदतों का इस तकनीक से पता चलना मुश्किल है। भले ही मवेशियों के शिकार के आंकड़े काफी ज्यादा हों, लेकिन इसके पीछे के मुख्य कारण पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं। मौसमी घोष-हरिहर कहती हैं, “यह अभी साफ नहीं है कि बाघों द्वारा मवेशियों को खाया जाना केवल एक अस्थायी अवसर (आसान शिकार मिलना) का फायदा उठाना है, या फिर उनके खानपान की आदतों में कोई स्थायी बदलाव आ रहा है।”
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अध्ययन से मिले नतीजे बाघों के खानपान के अध्ययन के तरीकों में बदलाव की जरूरत की ओर इशारा करते हैं, विशेष रूप से उन इलाकों में जहां इंसानों और वन्यजीवों की आबादी आसपास रहती है। रणथंभौर और इसके जैसे अन्य रिजर्व के लिए यह अध्ययन चेतावनी देता है कि सुरक्षित वन क्षेत्रों की सीमाओं से बाहर भी इंसानों और बाघों के बीच होने वाले टकराव को रोकने के प्रयासों को तुरंत मजबूत किया जाए। इसमें मवेशियों के मारे जाने पर पशुपालकों को समय पर और उचित मुआवजा देना, मवेशियों की रखवाली के तरीकों को बेहतर बनाना और इस जोखिम से निपटने के लिए बीमा योजनाओं का लाभ उठाना शामिल है। इसके साथ ही, स्थानीय समुदायों को इन प्रयासों में सक्रिय रूप से भागीदार बनाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
एनसीबीएस की प्रोफेसर और सह-शोधकर्ता उमा रामकृष्णन का कहना है, “खानपान जैसी महत्वपूर्ण प्राकृतिक आदतों का विश्लेषण कर पाना यह साबित करता है कि संकटग्रस्त प्रजातियों के अध्ययन के लिए डीएनए-आधारित तकनीकें बहुत ही कारगर हैं। जैसे-जैसे इंसानों, मवेशियों और वन्यजीवों का आपसी टकराव बढ़ रहा है, वैसे-वैसे ऐसी तकनीकों का सूझबूझ और सटीक रणनीति के साथ इस्तेमाल करना बेहद जरूरी हो गया है।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 2 फरवरी 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: यह अध्ययन प्राकृतिक शिकार के साथ-साथ पालतू मवेशियों पर बाघों की बढ़ती निर्भरता को दर्शाता है, जिससे मानव-बाघ संघर्ष बढ़ने का गंभीर खतरा है। तस्वीर: रैस्नर, विकिमीडिया कॉमन्स (CC BY-SA 3.0)