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पेड़ों की जगह मोबाइल टावरों पर घोंसले बना रहीं समुद्री चीलें, लेकिन बढ़ रहा खतरा

नवंबर 2024 में ओडिशा में एक मोबाइल टावर पर अपने अंडों को सेती हुई एक सफेद पेट वाली समुद्री चील। बार-बार आने वाले चक्रवातों और शहरी विकास के कारण ये शिकारी पक्षी अब ज्यादातर मोबाइल टावरों और बिजली के खंभों पर घोंसले बनाने लगे हैं। नए शोध से पता चलता है कि हालांकि ये ऊंचे ढांचे शिकार करने के लिए बेहतरीन जगह देते हैं, फिर भी टावरों पर बने घोंसलों से लगातार कम बच्चे पैदा हो रहे हैं। तस्वीर- शक्ति प्रसाद पटनायक

नवंबर 2024 में ओडिशा में एक मोबाइल टावर पर अपने अंडों को सेती हुई एक सफेद पेट वाली समुद्री चील। बार-बार आने वाले चक्रवातों और शहरी विकास के कारण ये शिकारी पक्षी अब ज्यादातर मोबाइल टावरों और बिजली के खंभों पर घोंसले बनाने लगे हैं। नए शोध से पता चलता है कि हालांकि ये ऊंचे ढांचे शिकार करने के लिए बेहतरीन जगह देते हैं, फिर भी टावरों पर बने घोंसलों से लगातार कम बच्चे पैदा हो रहे हैं। तस्वीर- शक्ति प्रसाद पटनायक

  • ओडिशा के तटीय इलाकों में किए गए एक नए अध्ययन से पता चला है कि मोबाइल या बिजली के टावरों पर घोंसला बनाने वाली सफेद पेट वाली समुद्री चील पेड़ों पर घोंसला बनाने वाली चीलों की तुलना में कम बच्चे पैदा कर पा रही हैं।
  • इंसानी बस्तियों के नजदीक और पानी के स्रोतों से दूर बने घोंसलों में प्रजनन की सफलता दर काफी कम देखी गई।
  • शोधकर्ताओं का कहना है कि ये कृत्रिम ढांचे इन पक्षियों के लिए ‘पारिस्थितिकी जाल’ साबित हो रहे हैं। इसलिए इनके प्राकृतिक पेड़ों को दोबारा लगाने और प्रजनन के मौसम में इंसानी दखल को रोकने की सख्त जरूरत है।

ओडिशा के चक्रवात-संभावित तटीय इलाकों में अक्सर होने वाली तेज बारिश और आंधी उन ऊंचे पेड़ों को उखाड़ देती हैं, जो कभी व्हाइट-बैलिड सी ईगल (सफेद पेट वाली समुद्री चील) के प्राकृतिक घोंसले हुआ करते थे। बार-बार आने वाले तूफानों और शहरी विकास के कारण इन शिकारी पक्षियों के रहने की जगह बदल रही है। यही वजह है कि ये पक्षी अब मोबाइल टावरों और बिजली के खंभों पर अपना घोंसला बनाने लगे हैं। लेकिन, ‘जर्नल फॉर नेचर कंजर्वेशन’ में प्रकाशित एक नए शोध ने आगाह किया है कि तेजी से बदलते इस परिवेश में, ये कृत्रिम ढांचे इन पक्षियों के लिए एक इकोलॉजिकल ट्रैप साबित हो सकते हैं।

हालाँकि, ये टावर काफी ऊंचे होते हैं और यहां से इनके लिए शिकार पर नजर रखना आसान होता है, फिर भी इसके नुकसान ज्यादा हैं, अध्ययन में बताया गया। साल 2021 से 2025 के बीच (प्रजनन के चार चक्रों के दौरान) पेड़ों पर बने घोंसलों के मुकाबले टावरों पर बने घोंसलों में प्रजनन की दर में कमी देखी गई।

ये समुद्री चील सालों तक एक ही घोंसले का इस्तेमाल करती हैं, जिससे उनके आवास में बदलाव का उन पर बेहद खराब असर पड़ता है। भारत में इन्हें पहले भी टावरों पर घोंसला बनाते देखा गया है, लेकिन यह अध्ययन इस बदलाव से होने वाले नुकसान को बारीकी से समझने की कोशिश करता है। ओडिशा की बेरहामपुर यूनिवर्सिटी में पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रमुख और इस अध्ययन के मुख्य लेखकों में से एक बी. अंजन कुमार प्रुस्टी कहते हैं, “भारत में यह अपनी तरह का पहला शोध है, जहां हमने साफ तौर पर देखा है कि अलग-अलग तरह के ढांचों (पेड़ बनाम टावर) पर घोंसला बनाने से इन शिकारी पक्षियों की प्रजनन क्षमता पर क्या फर्क पड़ता है।”

साल 2021 में आए 'यास' चक्रवात में उखड़े पेड़ों को हटाते हुए अग्निशमन और बचाव कर्मी। ओडिशा के चक्रवात प्रभावित तटीय इलाकों में अक्सर ऐसे ऊंचे पेड़ उखड़ जाते हैं, जो कभी इन समुद्री चीलों के प्राकृतिक आशियाने हुआ करते थे (एपी तस्वीर)
साल 2021 में आए ‘यास’ चक्रवात में उखड़े पेड़ों को हटाते हुए अग्निशमन और बचाव कर्मी। ओडिशा के चक्रवात प्रभावित तटीय इलाकों में अक्सर ऐसे ऊंचे पेड़ उखड़ जाते हैं, जो कभी इन समुद्री चीलों के प्राकृतिक आशियाने हुआ करते थे (एपी तस्वीर)

घोंसलों की निगरानी

बेरहामपुर यूनिवर्सिटी के पीएच.डी. के छात्र और इस अध्ययन के मुख्य लेखक शक्ति प्रसाद पटनायक बताते हैं कि दूसरे देशों में ऑस्प्रे और व्हाइट-टेल्ड ईगल जैसे शिकारी पक्षियों पर हुए कुछ अध्ययनों में देखा गया कि उन्होंने कृत्रिम ढांचों पर ज्यादा बच्चे पैदा किए। वह आगे कहते हैं, “लेकिन, मैंने यहां इसके बिल्कुल उलट देखा है।”

इसकी वजह समझने के लिए, वैज्ञानिकों की टीम ने ओडिशा के सुवर्णरेखा मुहाने से लेकर बाहुदा नदी के बीच फैले 574 किलोमीटर लंबे तटीय इलाके में 33 घोंसलों की निगरानी की। साल 2021 से 2025 के बीच, उन्होंने हर 10 दिन में इन घोंसलों का सर्वे किया। इस दौरान उन्होंने पक्षियों द्वारा घोंसला बनाने और अंडे देने की 91   कोशिशों को रिकॉर्ड किया, जिनमें से ज्यादातर कोशिशें मोबाइल या बिजली के टावरों पर थीं।

शोधकर्ताओं ने सफलता को मापने के लिए फ्लैज रेट का इस्तेमाल किया। इसका मतलब है: कुल फूटे हुए अंडों में से कितने बच्चे सुरक्षित बड़े होकर घोंसले से उड़ पाए। प्रुस्टी समझाते हैं, “हमने बच्चों के उड़ने की दर को इसलिए चुना क्योंकि यह अंडों से बच्चे निकलने के बाद होने वाले नुकसान को भी दिखाती है, जिसे सामान्य ‘सफलता या विफलता’ के आंकड़ों से नहीं समझा जा सकता।”

टीम ने हर घोंसले के चारों तरफ 2.1 किलोमीटर के दायरे में पानी के स्रोतों, इंसानों द्वारा किए गए निर्माण और अन्य भौगोलिक चीजों का हिसाब लगाया। उन्होंने सड़कों और बस्तियों से दूरी, आबादी की सघनता और रात की रोशनी की चमक को भी मापा, ताकि शहरीकरण के असर को समझा जा सके।

ओडिशा के तटीय इलाके में एक बिजली के ऊंचे खंभे पर सफेद पेट वाली समुद्री चील का घोंसला। ऐसे खंभे इन शिकारी पक्षियों को कई तरह के खतरों में डालते हैं, जैसे मेंटेनेंस कर्मचारियों द्वारा घोंसलों को हटा दिया जाना और करंट लगने की आशंका। तस्वीर- शक्ति प्रसाद पटनायक
ओडिशा के तटीय इलाके में एक बिजली के ऊंचे खंभे पर सफेद पेट वाली समुद्री चील का घोंसला। ऐसे खंभे इन शिकारी पक्षियों को कई तरह के खतरों में डालते हैं, जैसे मेंटेनेंस कर्मचारियों द्वारा घोंसलों को हटा दिया जाना और करंट लगने की आशंका। तस्वीर- शक्ति प्रसाद पटनायक

अध्ययन के नतीजों से पता चला कि जिन चीलों ने प्राकृतिक पेड़ों पर घोंसले बनाए थे, उनकी सफलता दर 100% रही, यानी हर घोंसले से कम से कम एक बच्चा सुरक्षित बड़ा होकर उड़ा। इसके उलट, टावरों और खंभों (कृत्रिम ढांचों) पर की गई 39% कोशिशें पूरी तरह नाकाम रहीं। और जो कामयाब रहीं, उनमें भी पेड़ों के मुकाबले बहुत कम बच्चे पैदा हुए।

अध्ययन में यह भी पाया गया कि जिन इलाकों में इंसानी आबादी ज़्यादा थी, जो सड़कों और बस्तियों के नज़दीक थे लेकिन पानी के स्रोतों से दूर थे, वहां बहुत कम बच्चे बड़े हो पाए। मोबाइल और बिजली के टावर आमतौर पर इन्हीं इंसानी इलाकों में होते हैं। पटनायक कहते हैं, “इससे साफ पता चलता है कि प्राकृतिक पेड़ों की तुलना में ये बनावटी ढांचे बहुत असुरक्षित माहौल में मौजूद हैं।”

प्रजनन के समय पक्षियों के आस-पास इंसानों की मौजूदगी से उनका तनाव बढ़ जाता है, जिससे वे अपने घोंसले या बच्चों को छोड़कर भाग सकते हैं। चूंकि ये शिकारी पक्षी भोजन के लिए मछली और समुद्री सांपों जैसे जलीय जीवों पर निर्भर रहते हैं, इसलिए पानी के पास घोंसला होने से उन्हें शिकार ढूंढने में कम समय और ऊर्जा लगानी पड़ती है, जिससे बच्चों के बचने की संभावना बढ़ जाती है। पिछले शोधों की तरह इस अध्ययन में भी यही सामने आया कि भोजन की आसान पहुंच और इंसानी दखलंदाजी से दूरी ही इन चीलों के बच्चों के जिंदा बचने के सबसे बड़े कारणों में से एक है।

बदलते माहौल में इकोलॉजिकल ट्रैप

पेड़ों और टावरों पर बच्चों के पैदा होने में आए इस साफ अंतर को देखकर शोधकर्ताओं का मानना है कि ये कृत्रिम ढांचे इन पक्षियों के लिए एक ‘ट्रैप या धोखा’ साबित हो रहे हैं। प्रुस्टी समझाते हैं, “देखा जाए तो यह शोध टावरों पर घोंसला बनाने की आदत को एक साधारण ‘सफलता की कहानी’ (यानी पक्षियों का नए माहौल में ढल जाना) मानने के बजाय, एक गंभीर चिंता के रूप में सामने लाता है। ये बनावटी ढांचे पक्षियों को ऐसे अशांत इलाकों में अंडे देने के लिए मजबूर कर रहे हैं, जिससे आगे चलकर अगर पक्षी सिर्फ इन्हीं जगहों पर घोंसले बनाने लगे, तो उनकी पूरी आबादी ख़तरे में पड़ सकती है।”

इसके अलावा, टावरों पर बने घोंसलों के साथ कुछ और भी खतरे जुड़े हैं जैसे, टावरों की मरम्मत या मेंटेनेंस के काम के दौरान इन घोंसलों को हटा देना, या फिर हाई-वोल्टेज बिजली के खंभों पर करंट लगने से पक्षियों की जान जाने का डर।

तमिलनाडु की अन्नामलाई यूनिवर्सिटी के ‘सेंटर ऑफ एडवांस्ड स्टडी इन मरीन बायोलॉजी’ में तटीय पक्षियों के विशेषज्ञ एच. बायजू (जो इस शोध टीम का हिस्सा नहीं थे) के मुताबिक, सफेद पेट वाली समुद्री चीलों पर अब तक बहुत कम अध्ययन हुए हैं। बायजू ने कहा, “भारत में इस खास प्रजाति पर किया गया यह पहला इतना बड़ा और विस्तृत अध्ययन है। इससे पहले के सभी अध्ययन सिर्फ उनकी आबादी, वे कहां दिखे और कहां घोंसला बनाया, इन्हीं रिकॉर्ड्स तक सीमित थे। लेकिन यह शोध उससे कहीं आगे जाकर बच्चों के पैदा होने की सफलता दर को दिखाता है, जो इस पक्षी के जीवन और पर्यावरण को समझने के लिए एक बेहतरीन जानकारी है।”

साल 2023 में सफेद पेट वाली समुद्री चील द्वारा झऊ कैसुआरिना के पेड़ पर बनाया गया एक घोंसला। ये पेड़ भले ही स्थानीय नहीं हैं, लेकिन ओडिशा के तटीय इलाकों में लकड़ी और चक्रवात के असर को कम करने के लिए इन्हें बड़े पैमाने पर लगाया जाता है। तस्वीर- शक्ति प्रसाद पटनायक
साल 2023 में सफेद पेट वाली समुद्री चील द्वारा झऊ कैसुआरिना के पेड़ पर बनाया गया एक घोंसला। ये पेड़ भले ही स्थानीय नहीं हैं, लेकिन ओडिशा के तटीय इलाकों में लकड़ी और चक्रवात के असर को कम करने के लिए इन्हें बड़े पैमाने पर लगाया जाता है। तस्वीर- शक्ति प्रसाद पटनायक

तमिलनाडु में, साल 2023 में बायजू द्वारा पहली बार ध्यान दिए जाने के बाद से, बिजली के ऊंचे खंभों पर इन शिकारी पक्षियों के घोंसला बनाने के कई और मामले सामने आए हैं। उन्होंने कहा, “अब यह एक तय ढर्रे या पैटर्न की तरह दिखने लगा है।”

बार-बार आने वाले समुद्री चक्रवातों के अलावा, झऊ (कैसुआरिना) के बागान और शहरों के विस्तार जैसी गतिविधियां भी ओडिशा के तटीय इलाकों को बदल रही हैं। सफेद पेट वाले समुद्री चील अक्सर उन झऊ या नीलगिरी के पेड़ों पर घोंसला बनाना पसंद करते हैं, जिन्हें चक्रवात के असर को कम करने के लिए लगाया जाता है। झऊ का पेड़ बहुत तेजी से बढ़ता है और इसकी लकड़ी का इस्तेमाल व्यापार के लिए किया जाता है, लेकिन यह यहां का स्थानीय पेड़ नहीं है। इन पेड़ों के बारे में पटनायक कहते हैं, “ये पेड़ यहां की प्राकृतिक जैव विविधता को बढ़ावा देने में मदद नहीं करते।”

चूंकि ये चील अपने इलाके की शीर्ष शिकारी हैं, इसलिए तटीय इलाकों में इनकी मौजूदगी बताती है कि वहां का पर्यावरण स्वस्थ और सुरक्षित है। लेकिन, पूर्वी तट पर तेजी से बदलते माहौल के कारण ये पक्षी अपना प्राकृतिक आशियाना खो रहे हैं और अब एक ऐसे माहौल में रह रहे हैं जिसे बायजू “असुरक्षित और अस्थिर” कहते हैं।

प्रजनन के मौसम के लिए दिशानिर्देश

इस हालिया अध्ययन में बिजली के खंभों से निकलने वाली इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड (ईएमएफ) के असर को नहीं मापा गया था, लेकिन शोधकर्ताओं का सुझाव है कि आगे के अध्ययनों में इसकी जांच जरूरी और साथ ही वॉलंटियर्स को नियमित रूप से इन घोंसलों वाले इलाकों की निगरानी भी करनी होगी।

इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (आईयूसीएन) ने सफेद पेट वाले समुद्री चील को सुरक्षित प्रजाति की सूची में रखा है। हालाँकि, 2023 की स्टेट ऑफ इंडिया बर्ड रिपोर्ट बताती है कि लंबी अवधि में इनकी संख्या बहुत तेजी से घटी है। भारत में इनके घोंसलों की संख्या भी लगातार कम हो रही है।

अध्ययन के लेखकों का कहना है कि ऊंचे पेड़ों को बचाकर उनके प्राकृतिक आशियानों को सुरक्षित रखना और पानी के स्रोतों के पास चक्रवात का सामना करने वाले स्थानीय पेड़ लगाना बेहद जरूरी है। पटनायक के अनुसार, इन पेड़ों में बरगद (फिकस बेंगालेंसिस), नारियल या फिर मैंग्रोव जैसी प्रजातियां शामिल हो सकती हैं। प्रुस्टी ने यह भी बताया कि पहले ये शिकारी पक्षी पीपल (फिकस रिलिजियोसा) के पेड़ों पर भी घोंसले बनाया करते थे।

चूंकि ये पक्षी फिलहाल झऊ के पेड़ों और कृत्रिम ढांचों को ज्यादा पसंद कर रहे हैं, इसलिए अक्टूबर से मई तक चलने वाले उनके प्रजनन के मौसम के दौरान टावरों पर मरम्मत या मेंटेनेंस का काम न करना भी उतना ही ज़रूरी है। पटनायक कहते हैं कि आगे चलकर मोबाइल और बिजली के टावरों को ऐसी सही जगहों पर लगाया जाना चाहिए, जहां इंसानी दखल बिल्कुल न के बराबर हो। साथ ही, इन टावरों और बिजली के खंभों में तकनीकी सुधार और इंसुलेशन करने की भी जरूरत है, ताकि पक्षी सुरक्षित रह सकें।


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तटीय पक्षियों के विशेषज्ञ बायजू स्थानीय लोगों की भूमिका पर ज़ोर देते हुए कहते हैं, “बिना सामुदायिक हस्तक्षेप के पर्यावरण और जीवों का संरक्षण मुमकिन नहीं है।” वह आगे कहते हैं कि इस काम में स्थानीय समुदायों को शामिल करना और टावरों की देखरेख करने वाले कर्मचारियों के बीच जागरूकता बढ़ाना बेहद जरूरी है। “अगर ऐसा किया जा सके, तो यह इन पक्षियों को प्रजनन के मौसम में सुरक्षित रखने और उन्हें बचाने में बहुत मददगार साबित होगा।”


यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 16 फरवरी 2026 को प्रकाशित हुई थी।


बैनर तस्वीर: नवंबर 2024 में ओडिशा में एक मोबाइल टावर पर अपने अंडों को सेती हुई एक सफेद पेट वाली समुद्री चील। बार-बार आने वाले चक्रवातों और शहरी विकास के कारण ये शिकारी पक्षी अब ज्यादातर मोबाइल टावरों और बिजली के खंभों पर घोंसले बनाने लगे हैं। नए शोध से पता चलता है कि हालांकि ये ऊंचे ढांचे शिकार करने के लिए बेहतरीन जगह देते हैं, फिर भी टावरों पर बने घोंसलों से लगातार कम बच्चे पैदा हो रहे हैं। तस्वीर- शक्ति प्रसाद पटनायक

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