- वायनाड में आदिवासी समुदाय बिना खेती वाले मौसम में औषधीय पौधों का संग्रह करके गुजारा करते हैं, लेकिन बाजार में बढ़ती मांग के बावजूद स्थिर या पर्याप्त आय की गारंटी नहीं मिलती।
- अंधाधुंध संग्रह, आक्रामक प्रजातियां और जलवायु आपदाओं की वजह से औषधीय पौधे ‘कुरुंथोटी’ की उपलब्धता में काफी कमी आई है, जिससे
- इसे इकट्ठा करना और भी मुश्किल और अनिश्चित हो गया है। मांग होने के बावजूद घटती आय से पता चलता है कि उचित मूल्य निर्धारण, संग्रहण के टिकाऊ तरीकों और मददगार नीतिगत हस्तक्षेपों की जरूरत है।
- इस टिप्पणी में विचार लेखकों के अपने हैं।
भारत में आदिवासी समुदाय जंगली पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं। ऐसा भोजन और दवा के मामले में ज्यादा देखा जाता है। पश्चिमी घाट के कई आदिवासी समुदायों के लिए पिछले कुछ दशकों में औषधीय पौधों को इकट्ठा करना और बेचना मुश्किल समय में गुजारा करने का जरिया बन गया है। इससे कभी घरेलू उपचार किया जाता था, लेकिन धीरे-धीरे इसका संग्रह बाजार से जुड़ गया है; यह बदलाव वायनाड के अपेक्षाकृत हाशिए पर रहने वाले तबकों में खास तौर पर देखने को मिलता है जिनमें पानियन, आदियन, उराली कुरुमा और कट्टुनायकन समुदाय शामिल हैं।
कुरुंथोटी या बाला (सिदा कोरडीफोलिया) सालाना संग्रहित किए जाने वाली जड़ी-बूटी में मुख्य औषधीय पौधा है। इसका व्यापक इस्तेमाल होता है और खास तौर पर केरल में आयुर्वेदिक औषधि उद्योग में इसकी मांग बहुत अधिक है। हालांकि, देशभर में 90% से अधिक औषधीय पौधों की प्रजातियां बहुत ज्यादा और अस्थिर दोहन, जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल और संग्रहण के अव्यवस्थित/गैर-कुशल तरीकों के कारण खतरे में बताई जाती हैं (गोथामी और अन्य., 2021)।
वायनाड में कुरुंथोटी सड़कों के किनारे, बंजर जमीनों, जंगलों और उसके आसपास उगती है और इसका संग्रहण कम आय वाले मौसम के दौरान आमदनी का बड़ा जरिया है। सितंबर से नवंबर (मलयालम महीनों कन्नी और तुलाम) तक चलने वाला इसका संग्रह काल धान जैसी प्रमुख फसलों की कटाई के बाद आता है जो केरल के मुख्य फसल उत्सव ओणम के आसपास पूरा होता है। इस दौरान कृषि मजदूरी नहीं मिलती हैं, इसलिए समुदाय खाने-पाने की चीजों और औषधीय पौधों का संग्रहण करके गुजारा करते हैं।

कुरुंथोटी की इस अहमियत के बावजूद इसकी उपलब्धता और संग्रहण लगातार मुश्किल होता जा रहा है। अब इसकी खेती शुरू हो गई है, बाजार में कीमतें कम मिलती हैं, जलवायु परिवर्तन के असर व अत्यधिक कटाई से इसकी उपलब्धता में कमी आई है और आक्रामक प्रजातियों का तेजी से फैलने की वजह से स्थानीय संग्रहकर्ताओं के लिए इसे इकट्ठा करना धी-धीरे मुश्किल होता जा रहा है।
यह लेख कुरुंथोटी के संग्रहण, संरक्षण और विपणन में आने वाली बाधाओं का पता लगाता है और वायनाड के आदिवासी समुदायों के बीच औषधीय पौधों पर आधारित आजीविका पर असर का विश्लेषण करता है।
समुदाय का नजरिया
अक्सर कुरुंथोटी को इकट्ठा करने में पूरा परिवार लगता है। संग्रह के दौरान पति-पत्नी के साथ उनके वयस्क बच्चे भी होते हैं। सख्त जमीन से पौधे को उखाड़ना बहुत ही मुश्किल काम है और इसे इकट्ठा करने के मौसम में कई महिलाएं कमर में तेज दर्द की शिकायत करती हैं। वायनाड जिले के आदिवासी गांव थजहासेरी आदिया उन्नथी के रहने वाले सुब्बानन बताते हैं, “पहले मलयालम महीनों ‘कन्नी’ और ‘तुलम’ (सितंबर के मध्य से नवंबर के मध्य तक) के दौरान होने वाली हल्की बारिश की मदद से हम ‘कुरुंथोटी’ को आसानी से उखाड़ पाते थे। अब हालात बदल गए हैं। जलवायु में बदलाव के कारण, हमें कभी बहुत तेज बारिश का सामना करना पड़ता है, तो कभी लंबे समय तक सूखा रहता है; जिससे जमीन बहुत कठोर हो जाती है।” वह कहते हैं कि इतने साल बीत जाने के बाद भी, इसे काटने का तरीका वही बना हुआ है और इस पूरी प्रक्रिया के दौरान पीठ और पैरों में दर्द इस प्रक्रिया का स्थायी हिस्सा बना हुआ है। “संग्रहण के मौसम में हम मसालेदार या ज्यादा नमक वाला खाना नहीं खा सकते, क्योंकि हमारी त्वचा में पड़ी दरारों में तेज जलन होती है। हम सुबह-सुबह ही संग्रहण के लिए निकल जाते हैं और अक्सर दोपहर का खाना छोड़ देते हैं; हम लगातार 12–14 घंटे काम करते हैं। फिर भी, हमारी कमाई पक्की नहीं होती: कुछ दिन तो हम सिर्फ ₹200 ही कमा पाते हैं। कभी-कभी ही ऐसा होता है कि हम ₹1,500 तक कमा लें।”
हाल के सालों में जंगलों में कुरुंथोटी की उपलब्धता में कमी आई है। इसकी वजह इसका अव्यवस्थित दोहन और आक्रामक प्रजातियों का फैलाव है। सड़कों के किनारे और सार्वजनिक जमीनों पर भी इस पौधे की उपलब्धता कम हुई है; इसकी वजह महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून (MGNREGA) के तहत नियमित रूप से रास्तों और सड़कों के किनारे की जाने वाली साफ-सफाई भी है।

आ रहा बदलाव
इस क्षेत्र में जंगलों में उगने वाले पौधों में पिछले कुछ सालों में बड़ा बदलाव आया है। आक्रामक प्रजातियां खास तौर पर सेना स्पेक्टेबिलिस, लंटाना कैमरा और क्रोमोलेना ओडोराटा के तेजी से फैलने से कुरुंथोटी के स्वाभाविक विकास में रुकावट आई है। समुदाय के 80 साल के बुज़ुर्ग मलन कहते हैं, “पहले पूरे गांव से कुरुंथोटी इकट्ठा करने के काम में मुश्किल से चार लोग ही शामिल होते थे। अब सिर्फ इसी बस्ती से कम से कम 20 लोग इसे इकट्ठा करने जाते हैं। इस बढ़ते दबाव की वजह से यह चीज खत्म होती जा रही है।” वह जानवरों से संघर्ष के बढ़ते खतरों की ओर भी इशारा करते हैं। “एक बार जाने पर हमारा सामना पांच हाथियों से हुआ। अब हमें बेहद सावधान रहना होगा।”
जंगल से बाहर भी कुरुंथोटी की उपलब्धता में कमी आई है। अक्टूबर और नवंबर के महीनों में इसे इकट्ठा करने वालों ने बताया कि सामान्य जमीन से इस पौधे को इकट्ठा करने में उन्हें मुश्किल हो रही है, क्योंकि वहां आनाथोट्टावडी (Mimosa diplotricha C. Wright) का फैलाव हो गया है। यह छोटा, तेजी से फैलने वाला, नए-उष्णकटिबंधीय इलाकों का झाड़ीनुमा पौधा है। यह आक्रामक प्रजाति है जिसने ऐसी कंटीली घनी झाड़ियां बना ली हैं जिन्हें पार करना मुश्किल है। ये झाड़ियां उन जगहों पर तेजी से फैल जाती हैं जहां बहुत अधिक छेड़छाड़ हुई हो या जो खेती-बाड़ी वाले इलाके हों (CABI, 2019)।
जलवायु आपदाओं से बढ़ती अनिश्चितता
वायनाड में 2024 में हुए विनाशकारी भूस्खलन से बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा जारी सैटेलाइट तस्वीरों के अनुसार इस भूस्खलन ने मुंडाकाई की ढलानों पर लगभग 86,000 वर्ग मीटर जमीन को रातों-रात तबाह कर दिया।
मेप्पाडी क्षेत्र में स्थित मुंडक्कई, अट्टमाला और चूरालमला जैसे अत्यधिक प्रभावित इलाकों के समुदाय, पारंपरिक रूप से गैर-खेती वाले मौसम के दौरान ‘कुरुंथोट्टी’ इकट्ठा करने के लिए इन पहाड़ी ढलानों पर निर्भर रहते थे।
उदाहरण के लिए, त्रिक्काइपट्टा में स्थानीय संग्रह में भूस्खलन के बाद समुदाय द्वारा इकट्ठा की गई ‘कुरुंथोट्टी’ की मात्रा में काफी गिरावट देखी गई है। जैसे-जैसे उपलब्धता कम हुई, औषधीय पौधों के संग्रह से जुड़े मौसमी आजीविका के अवसर भी कम हो गए हैं। इस गिरावट ने खास तौर पर आदिवासी समुदायों के कमजोर वर्गों को प्रभावित किया है, जिनमें महिलाएं और बुज़ुर्ग संग्राहक शामिल हैं। ये लोग बिना खेती वाले मौसम के दौरान अतिरिक्त आय के लिए ऐसी गतिविधियों पर काफी निर्भर रहते हैं।

बाजार में अनिश्चितता
पारंपरिक आर्थिक सोच के विपरीत बढ़ती मांग के बावजूद कुरुंथोटी की कीमत स्थिर बनी हुई है या उसमें गिरावट आई है। कुरुंथोटी उन 35 औषधीय पौधों की प्रजातियों में से एक है, जिनके उत्पादन को राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड के तहत बढ़ावा दिया जा रहा है। हालांकि, केरल के भीतर और बाहर इसके उत्पादन के विस्तार से स्थानीय बाजार की गतिशीलता प्रभावित होती दिख रही है और इसका असर पारंपरिक रूप से इन्हें इकट्ठा करने वालों की आय पर भी पड़ रहा है।
पुलपल्ली में स्थित वनोपोज कलेक्शन सेंटर गिरिजन कोऑपरेटिव सोसाइटी के प्रतिनिधि गिरीश पी.बी. कहते हैं, “अमीर किसानों ने कुरुंथोटी की खेती शुरू कर दी है, जिससे इसकी मांग पर असर पड़ा है। सोसाइटी ने बिचौलियों द्वारा फायदा उठाने की समस्या को सुलझाने की पूरी कोशिश की है, लेकिन अब तो खुद सोसाइटी भी अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष कर रही है।” वे कलेक्शन और मार्केटिंग, दोनों में आने वाली कई चुनौतियों के बारे में बताते हैं। “एक तरफ, जंगल में इसकी उपलब्धता कम होती जा रही है। इस साल, हमने पिछले सालों के 52 टन के मुकाबले सिर्फ 47 टन ही खरीदा। दूसरी तरफ, सूखी कुरुंथोटी की कीमत गिरकर ₹84 प्रति किलो हो गई है, जबकि दो साल पहले यह लगभग ₹110 प्रति किलो थी।”
बदलते हालात में कुरुंथोटी इकट्ठा करने वाले ज्यादातर आदिवासी परिवारों के पास वैकल्पिक साधन के तौर पर खेती को अपनाने के लिए बहुत जमीन नहीं है। नतीजतन, जहां दूसरी जगहों पर बाजार-आधारित खेती का विस्तार हो रहा है। वहीं, जंगल पर निर्भर रहने वाले पारंपरिक संग्राहकों के लिए इन संसाधनों तक पहुंच और उनसे होने वाली आर्थिक कमाई लगातार कम होती जा रही है।
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एम.एस. स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन के वैज्ञानिक वी.वी. सिवन के अनुसार, कई अन्य कारणों के साथ-साथ बीज बिखरने से पहले ही अवैज्ञानिक तरीके से इकट्ठा करना कुरुंथोटी के कम होने का मुख्य कारण है, जिससे आखिरकार इसकी कमी हो सकती है। वह कहते हैं, “कुरुंथोटी को बचाने के लिए हमारे पास दो विकल्प हैं। या तो संग्रहण तब तक के लिए टाल दिया जाए जब तक बीज न बन जाएं। या फिर कुल कुरुंथोटी का कम से कम एक-चौथाई हिस्सा बिना काटा हुआ छोड़ दिया जाए। इस कीमती जैव-संसाधन की लगातार उपलब्धता पक्की करने के लिए अच्छी पहल के तौर पर इसका इस्तेमाल करने वाले, इसे इकट्ठा करने वाले और इसे संरक्षित करने वाले लोग इसके बीज इकट्ठा करके उन्हें उपयुक्त जगहों पर बिखेर सकते हैं।”
वह आगे कहते हैं कि सिंगापुर डेजी जैसी आक्रामक प्रजातियां अब उन सामान्य स्थानों और सड़कों के किनारों पर फैल गई हैं, जहां पहले कुरुंथोटी प्रचुर मात्रा में उगती थी। इससे स्थानीय वनस्पतियों की बढ़ोतरी पर असर पड़ रहा है। वह विस्तार से बताते हैं, “अगर हम ऐसा अनुकूल तंत्र तैयार करें, जिसमें संग्रहकर्ता खुद न्यूनतम प्रसंस्करण (कम से कम धोना और सुखाना) कर सकें, तो इससे उत्पाद की कीमत और संग्रहकर्ताओं की आय दोनों बढ़ेगी। इससे बाजार की समस्याओं और बिचौलियों के हस्तक्षेप को भी कम किया जा सकता है। इन सबको संभव बनाने के लिए संग्रहकर्ताओं, खरीदारों और अन्य संबंधित हितधारकों को साथ आकर कोशिश करनी होगी।”

ऐसी नीतिगत पहलों की तुरंत जरूरत है जो उचित और स्थिर मूल्य निर्धारण तंत्र पक्का करें, संरक्षण उपायों को मजबूत करें और संदर्भ के अनुसार तथा सह-डिजाइन की गई ऐसी प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा दें जिससे मेहनत कम हो सके। जैव विविधता और वनों पर निर्भर समुदायों की आजीविका दोनों की सुरक्षा के लिए ऐसे उपाय बहुत जरूरी हैं।
मौजूदा हालात इस बात की भी मांग करते हैं कि आदिवासी समुदायों के लिए आजीविका के वैकल्पिक और टिकाऊ अवसरों के विकास पर ज्यादा ध्यान दिया जाए। ऐसे उपायों के बिना, पारिस्थितिकी बदलाव, संसाधनों की घटती उपलब्धता और अस्थिर बाजारों का मिला-जुला दबाव, इन पहले से ही हाशिए पर पड़े समूहों की सामाजिक-आर्थिक कमजोरियों को और भी बढ़ा सकता है।
विपिनदास पी. और सुजीत एम.एम. एम.एस. स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन में सामुदायिक कृषि-जैवविविधता पर काम करते हैं; थिप्पी थझस्सेरी आदिया आदिवासी समुदाय की सदस्य हैं; अभि ऑगस्टीन टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज में मास्टर के छात्र हैं।
उद्धरण:
CABI, (2019). आक्रामक प्रजातियों का कम्पेंडियम। वॉलिंगफ़ोर्ड, यूके: CAB इंटरनेशनल। www.cabi.org/isc.
गौतमी, आर., शर्मा, एन., पांडे, आर., अग्रवाल, ए., 2021. भारत के संकटग्रस्त औषधीय पौधों की स्थिति और समेकित सूची। Genet. Resour. Crop. Evol. 68 (6), 2235–2263. https://doi.org/10.1007/s10722-021-01199-0।
शर्मा, बी., बरुआ, पी.एस., तांती, बी., 2018. Aristolochia indica L. — असम, भारत में संकटग्रस्त औषधीय पौधे — को फिर से लगाने और संरक्षण के लिए आवास वितरण मॉडलिंग। J. Threat Taxa 10 (11), 12531–12537. https://doi.org/10.11609/jott.3600.10.11.12531-12537।
थट्टान्टाविडे अंजू, अजय कुमार, 2024। केरल, भारत के वायनाड जिले की मुल्लू कुरुमन जनजातियों के बीच पारंपरिक पारिस्थितिकी ज्ञान और औषधीय पौधों की विविधता का उपयोग और जलवायु परिवर्तन के दौर में जैव-विविधता संरक्षण के लिए इसके निहितार्थ, Trees, Forests and People, Volume 16, 100595, https://doi.org/10.1016/j.tfp.2024.100595।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 2 अप्रैल, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: वायनाड के चीयम्पम में संग्रहित की गई कुरुंथोटी। कुरुंथोटी औषधीय पौधा है, जिसकी आयुर्वेदिक दवा उद्योग में मांग बहुत अधिक है। गैर-कृषि मौसम के दौरान इसे इकट्ठा करके आदिवासी समुदाय अपना गुजारा करते हैं। तस्वीर: विपिनदास पी.।