- दिल्ली विश्वविद्यालय परिसर में बनाया गया कार्बन गार्डन कार्बन को सोखने और शहरी पारिस्थितिकी से जुड़ी समस्याओं से निपटने के लिए पौधों, शैवाल, कवक और सूक्ष्मजीवों की मिली-जुली प्रजातियों का इस्तेमाल करता है।
- सीमित जगहों में भी असरदार ढंग से काम करने के लिए विकसित इस मॉडल को अब विश्वविद्यालय के बाहर भी अपनाया जा रहा है और इसी तर्ज पर 44 नए कार्बन गार्डन बनाए जा रहे हैं।
- हालांकि, एक जानकार कहते हैं कि इस मॉडल को अलग-अलग क्षेत्रों में अपनाते समय वहां की पारिस्थितिकी को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
दुनिया भर में गिंकगो बिलोबा जीवित जीवाश्म (लिविंग फॉसिल) के तौर पर मशहूर है। यह पृथ्वी पर मौजूद पेड़ की सबसे प्राचीन जीवित प्रजातियों में से एक है। इसकी वंशावली लगभग 29 करोड़ साल पुरानी मानी जाती है। यह पेड़ों के उस प्राचीन समूह का एकमात्र जीवित सदस्य है, जो पृथ्वी पर डायनासोर के विचरण करने से भी बहुत पहले अस्तित्व में था। आज यही पेड़ दिल्ली विश्वविद्यालय के उत्तरी परिसर के एक शांत कोने में शुरू की गई नई पहल कार्बन गार्डन का गवाह बना खड़ा है।
कार्बन गार्डन कोई सजावटी हरित क्षेत्र नहीं है, बल्कि इसे पारिस्थितिकी पहल के रूप में विकसित किया गया है। यह ऐसी जीवंत प्रणाली है, जिसे वायु प्रदूषकों को हटाने, कार्बन को सोखने और शहरी बनावट में पारिस्थितिकी संतुलन बहाल करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। ऐसे समय में, जब दिल्ली जैसे शहर लगातार दूषित हवा से जूझ रहे हैं, यह गार्डन प्रदूषण कम करने के लिए प्रकृति-आधारित समाधान प्रस्तुत करने की कोशिश करता है।
इसे तैयार करने में तीन साल लगे हैं। इसमें पानी में पनपने वाले हाइड्रोफाइट्स, सूखे इलाकों के हिसाब से ढलने वाले जेरोफाइट्स, सामान्य माहौल में फलने-फूलने वाले मेसोफाइट्स और पुराने पौधों के समूह टेरिडोफाइट्स और ब्रायोफाइट्स जैसे कई तरह की वनस्पतियां हैं।
कार्बन गार्डन में कई प्रजातियों के पेड़ हैं। इनमें तेजी से बढ़ने वाले कैसुरीना (सदाबहार प्रजाति के पेड़) से लेकर कदंब या बरफ्लावर जैसे स्थानीय पेड़ हैं जो घनी छाया (कैनोपी) बनाते हैं। इनके साथ यहां जमीन पर फैलने वाले पौधे, झाड़ियां व शैवाल, बैक्टीरिया और कवक जैसे सूक्ष्मजीव भी मौजूद हैं। विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग के प्रमुख प्रोफेसर दीनबंधु साहू कहते हैं, “कार्बन सोखने की क्षमता को ज्यादा से ज्यादा बढ़ाने के लिए पौधों की प्रजातियों का सही चुनाव बहुत अहम भूमिका निभाता है।”
वह विस्तार से बताते हैं, “पौधों की सतह पर रहने वाले सूक्ष्मजीव मीथेन और कार्बन मोनोऑक्साइड जैसी विषैली गैसों को तोड़कर उन्हें कम नुकसानदेह या उपयोगी यौगिकों में बदलने में मदद करते हैं। इस तरह यह गार्डन कुदरती फिल्ट्रेशन सिस्टम की तरह काम करता है, जो हवा से प्रदूषकों को सोखने के साथ-साथ मिट्टी की गुणवत्ता भी बेहतर बनाता है।” इस पहल की अगुवाई कर रहे साहू दिल्ली विश्वविद्यालय के अनुसंधान एवं नवाचार परिषद के अध्यक्ष भी हैं।
विश्वविद्यालय में वनस्पति विज्ञान की छात्रा जोया खान कहती हैं कि कार्बन गार्डन जीवंत प्रयोगशाला की तरह है। वह कहती हैं, “कक्षा और पाठ्यपुस्तकों में जो कुछ भी पढ़ाया जाता है, उसे हम कार्बन गार्डन में सीधे तौर पर देख और समझ सकते हैं।”

मिली-जुली प्रजातियां
अक्सर स्वच्छ हवा से जुड़े समाधानों को तकनीक के नजरिए से देखा जाता है, लेकिन साहू का मानना है कि पौधे कुछ सबसे असरदार उपाय दे सकते हैं। ‘कार्बन गार्डन’ इसी विचार को हकीकत में बदलने की कोशिश है।
यह पहल स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र के लिए भूमि और जल के बीच संतुलित और परस्पर जुड़े संबंधों पर आधारित है। जल तंत्र जहां प्रदूषकों को छानने, पानी का भंडारण करने और नमी बनाए रखने में मदद करता है, वहीं स्थलीय तंत्र इसी नमी का इस्तेमाल मिट्टी को जोड़े रखने, पौधों के बढ़ने और कार्बन सोखने के लिए करता है। साहू कहते हैं, “अगर इनमें से एक तंत्र कमजोर पड़ जाए, तो दूसरा भी असरदार नहीं रह पाता है।”
गार्डन का जल तंत्र कैना (लिली की एक प्रजाति), स्पाइरुलिना, डायटम और क्लोरेला जैसे जलीय पौधों और सूक्ष्म शैवालों पर आधारित है। ये बारिश के पानी का संग्रह करते हैं, उसे प्राकृतिक रूप से साफ करते हैं, ऑक्सीजन का उत्पादन करते हैं और पोषक तत्वों के चक्र को बनाए रखने में मदद करते हैं। वहीं भूमि पर नीम, पीपल, सहजन और कासुआरिना जैसे पेड़ मिट्टी को बांधे रखते हुए कार्बन डाइऑक्साइड को सोखते हैं और हवा में मौजूद पार्टिकुलेट मैटर को भी रोकते हैं। इसके अलावा स्नेक प्लांट और पेटूनिया जैसी झाड़ियां एवं सजावटी पौधे परागण करने वाले जीवों को आकर्षित करते हैं और वायु में मौजूद प्रदूषकों को सोखने में भी मदद करते हैं।
ब्रायोफाइट्स (काई वर्ग) और फर्न नमी को बनाए रखने, मिट्टी बनने की प्रक्रिया को बढ़ावा देने और सूक्ष्मजीवों के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करने में मदद करते हैं। वहीं, नागफनी और एलोवेरा जैसे शुष्क क्षेत्रों में उगने वाले पौधे भीषण गर्मी और सूखे के दौरान इस पूरे तंत्र को सक्रिय बनाए रखते हैं। दूसरी ओर, गिंकगो और सागो पाम जैसे लंबे समय तक जीवित रहने वाले जिम्नोस्पर्म कार्बन के लंबी अवधि के भंडारण और पारिस्थितिकी तंत्र की मजबूती बढ़ाने में मदद करते हैं। साहू कहते हैं, “पेड़ों की छाल भी इसमें अहम भूमिका निभाती है। पेड़ की छाल के सिर्फ एक वर्ग मीटर क्षेत्र में लगभग एक लाख करोड़ पाए जा सकते हैं, जो मीथेन, कार्बन मोनोऑक्साइड और मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक अन्य वाष्पशील यौगिकों को सोख कर उनका विघटन करते हैं।”
साहू के विभाग के एक अनौपचारिक अध्ययन में पाया गया कि आस-पास की सड़कों की तुलना में ‘कार्बन गार्डन’ के अंदर पर्यावरण की स्थिति बेहतर थी। सुबह के समय AQI 76–81 था, जबकि बाहर 133 था। वहीं गार्डन के अंदर PM2.5 और PM10 का स्तर लगभग आधा था। दोपहर के समय गार्डन के अंदर तापमान भी लगभग 4 डिग्री सेल्सियस कम था।
वैसे इस पहल के नतीजे उत्साहजनक हैं, फिर भी जानकारों का एक स्वतंत्र समूह अभी इस बगीचे के पारिस्थितिकी और पर्यावरण पर असर का व्यापक मूल्यांकन कर रहा है।
बेंगलुरु स्थित संरक्षण एवं अनुसंधान संस्था नेचर कंजर्वेशन फाउंडेशन के सीजनवॉच कार्यक्रम की टीम लीड और वैज्ञानिक गीता रामास्वामी का मानना है कि कार्बन गार्डन की अवधारणा अच्छी है, लेकिन इसे अलग-अलग क्षेत्रों में अपनाते समय वहां की स्थानीय पारिस्थितिकी को ध्यान में रखना बहुत जरूरी है। वह कहती हैं, “ऐसा जरूरी नहीं है कि दिल्ली में सफल रहने वाली पौध प्रजातियां केरल में भी उसी तरह काम करें। इसलिए ऐसे गार्डन विकसित करते समय स्थानीय प्रजातियों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, अन्यथा इसका स्थानीय जैव-विविधता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।”
वह कहती हैं, “ऐसी पहल का अधिक से अधिक फायदा उठाने के लिए ऐसे जानकारों को शामिल किया जा सकता है जो स्थानीय जैव-विविधता की समझ रखते हों।” वह आगे कहती हैं, “घरों के अंदर लगाए जाने वाले कुछ पौधों को उनकी मजबूती और साल भर हरियाली बनाए रखने की क्षमता के लिए पसंद किया जाता है। ऐसे पौधे जो स्थानीय नहीं हैं (अगर कोई हों) और आगे चलकर आक्रामक हो सकते हैं, उन्हें सोच-समझकर ही लगाया जाना चाहिए और पर्यावरण के लिहाज से सावधानी बरतनी चाहिए। लेकिन, वनस्पति-वैज्ञानिक इन बातों से वाकिफ हैं और शायद वे इनका समझदारी से इस्तेमाल कर रहे हैं,” रामास्वामी आगे कहती हैं।

व्यावहारिक समाधान
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुमानों के अनुसार वायु प्रदूषण की वजह से दुनिया भर में हर साल 70 लाख से ज़्यादा लोगों की मौत होती है। इनमें से लगभग 17 लाख मौतें भारत में होती हैं। IQAir के आंकड़े इस संकट की गंभीरता को और भी स्पष्ट करते हैं, क्योंकि दुनिया के 20 सबसे अधिक प्रदूषित शहरों में से नौ भारत में हैं।
साहू के अनुसार कार्बन गार्डन मॉडल का बड़ा फायदा इसकी व्यावहारिकता है। बड़े शहरी जंगलों के उलट, कार्बन गार्डन के लिए काफी कम जमीन चाहिए और इन्हें स्कूलों, रिहायशी परिसरों, कार्यालय परिसरों और दूसरी सार्वजनिक जगहों पर भी बनाया जा सकता है। उनका कहना है कि इस मॉडल को अपनाने में दिलचस्पी रखने वाले सिविल सोसाइटी ग्रुप, रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन और संस्थानों के साथ बातचीत पहले ही शुरू हो चुकी है।
कार्बन गार्डन को अपनाने की सबसे बड़ी पहलों में से एक का नेतृत्व केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) के पूर्वी सेक्टर द्वारा किया जा रहा है। सीआईएसएफ पूर्वी सेक्टर के महानिरीक्षक प्रबोध चंद्र कहते हैं, “हम झारखंड, बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में 44 कार्बन गार्डन विकसित कर रहे हैं।”
और पढ़ेंः दिल्ली में कैसे उगाया 524 फुटबॉल मैदानों जितना जंगल?
झारखंड के रांची और बिहार व उत्तर प्रदेश के नबीनगर, बरौनी और टांडा में ऐसे चार कार्बन गार्डन पहले ही बनाए जा चुके हैं। इन राज्यों में 40 और जगहों पर ऐसे गार्डन लगाने का काम चल रहा है। चंद्रा कहते हैं, “हमें उम्मीद है कि इस मॉनसून के आखिर तक सभी 44 कार्बन गार्डन काम करने लगेंगे।”
इस पहल का हिस्सा नहीं रहीं पर्यावरण वैज्ञानिक चिराश्री घोष के अनुसार, कार्बन गार्डन जैसी पहलें इसलिए अहम हैं, क्योंकि ये सिर्फ पेड़ लगाने से कहीं आगे की चीज हैं और लोगों को पर्यावरण को संवारने के काम में सीधे तौर पर शामिल होने के लिए प्रेरित करती हैं। घोष बताती हैं, “इससे सोच-समझकर बनाई गई पर्यावरण-अनुकूल जगहें को मिलकर तैयार करने का मौका मिलता है और इससे भी जरूरी बात यह है कि ऐसी संस्कृति बनती है जिसमें पर्यावरण हितैषी आदतें लोगों के जीवन का हिस्सा बन जाती है।”
यह खबर मोंगाबे-इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 26 जून, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: दिल्ली विश्वविद्यालय में कार्बन गार्डन। तस्वीर: दीनबंधु साहू।