- मध्य प्रदेश के कूनो राष्ट्रीय उद्यान में कैमरा ट्रैप में कैराकल दिखा है। इसी इलाके में भारत की चीता परियोजना चल रही है।
- यह रिकॉर्ड कूनो में कैराकल की मौजूदगी की पुष्टि करता है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ एक कैमरा ट्रैप तस्वीर से स्थानीय आबादी की पुष्टि नहीं की जा सकती।
- कूनो प्रबंधन के अनुसार, पिछले चार वर्षों की निगरानी में यह कैराकल का पहला रिकॉर्ड है। पुराने रिकॉर्ड और परिदृश्य के आधार पर इस क्षेत्र में इसकी मौजूदगी की संभावना पहले से मानी जाती रही है।
- विशेषज्ञों का कहना है कि कैराकल के संरक्षण के लिए उसके वितरण, व्यवहार, आवास, आवाजाही और पारिस्थितिकी को बेहतर समझने की जरूरत है।
मध्य प्रदेश के कूनो राष्ट्रीय उद्यान में रात के समय लगे दो कैमरा ट्रैप में एक पतली, लंबी टांगों वाली जंगली बिल्ली दिखी। उसके शरीर का रंग भूरा था और दोनो कानों के सिरो पर काले बालों के गुच्छे दिख रहे थे। यह कैराकल था, भारत की सबसे कम दिखने वाली जंगली बिल्लियों में से एक।
यह रिकॉर्ड इसलिए भी खास है क्योंकि यह कैराकल उसी जंगल में पाया गया, जहां भारत की चीता परियोजना चल रही है।
कूनो राष्ट्रीय उद्यान के क्षेत्र निदेशक उत्तम कुमार शर्मा ने मोंगाबे-हिन्दी से बातचीत में बताया कि पिछले चार वर्षों में यह कैराकल की पहली रिकॉर्डिंग है। उन्होंने कहा, “चार साल से मैं यहां हूं। इस दौरान कैराकल की रिकॉर्डिंग हमारे सामने नहीं आई थी। हालांकि पुराने रिकॉर्ड कहते हैं कि इस क्षेत्र में इसकी मौजूदगी होनी चाहिए।”
वन विभाग अब पुराने रिकॉर्ड की जांच कर रहा है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि कूनो या आसपास के क्षेत्रों में पहले कैराकल कब और कहां दिखा था।
शर्मा के अनुसार, यह रिकॉर्ड कूनो में कैराकल की स्थानीय मौजूदगी की संभावना की ओर इशारा कर सकता है। हालांकि, वे कहते हैं कि किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए बेहतर निगरानी जरूरी है। उन्होंने कहा, “एक बार संख्या पता चल जाए और यह मालूम हो जाए कि कितनी जगहों पर यह दिख रहा है, तब स्थिति ज्यादा स्पष्ट होगी।”
मौजूदगी की पुष्टि, आबादी का प्रमाण नहीं
कैराकल के वितरण और भारत में उसके उपयुक्त आवासों पर काम कर चुके शेखर कोलिपका कहते हैं कि कूनो के इस रिकॉर्ड को सावधानी से समझना चाहिए। कोलिपका कॉमनलैंड फाउंडेशन में सीनियर लैंडस्केप डेवलपर हैं।
उन्होंने मोंगाबे-हिन्दी को लिखित जवाब में कहा, “एक कैमरा ट्रैप तस्वीर कैराकल की मौजूदगी की पुष्टि करती है, लेकिन यह स्थानीय आबादी के अस्तित्व का प्रमाण नहीं है।”

हालांकि, वे इस रिकॉर्ड को महत्वपूर्ण मानते हैं। उनके अनुसार, यह तस्वीर दिखाती है कि कैराकल कूनो के इलाके का इस्तेमाल कर रहा है। आगे की निगरानी से यह समझने में मदद मिलेगी कि क्या इस इलाके में और कैराकल हैं, और क्या कैमरा ट्रैप में दिखे जानवर यहां अपना इलाका बनाता है या आगे बढ़ जाता है।
कोलिपका के अनुसार, कूनो में दिखा कैराकल संभवतः एक डिसपर्सिंग मेल यानी अपने जन्मस्थान से नया क्षेत्र खोजने निकला नर हो सकता है। वे कहते हैं, “ज्यादातर जंगली बिल्लियों की तरह, युवा कैराकल अपने जन्मस्थल से निकलकर अपना इलाका बनाने की कोशिश करते हैं। खासकर नर कैराकल उपयुक्त आवास की तलाश में लंबी दूरी तय कर सकते हैं। वे नदियों, खेतों, गांवों, सड़कों और रेलवे लाइनों को पार कर सकते हैं।”
वे कहते हैं कि मध्य भारत में कैराकल ऐतिहासिक रूप से दुर्लभ रहा है, हालांकि कभी इसका वितरण अपेक्षाकृत बड़े क्षेत्र में था। राजस्थान और गुजरात में यह अभी भी तुलनात्मक रूप से ज्यादा दिखता है, क्योंकि वहां झाड़ीदार इलाके, सूखे पर्णपाती वन और अर्ध-शुष्क आवास अब भी मौजूद हैं।
चीता परियोजना और बढ़ी निगरानी
कूनो में कैराकल की तस्वीर सामने आने के बाद मध्य प्रदेश सरकार ने इसे कूनो में चल रहे व्यापक संरक्षण प्रयासों से जोड़ा है। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि चीता परियोजना केवल चीतों के पुनर्वास तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य दूसरे वन्यजीवों और उनके प्राकृतिक आवासों की रक्षा करना भी है। उन्होंने कहा कि कूनो राष्ट्रीय उद्यान कई दुर्लभ वन्यजीवों के लिए सुरक्षित और समृद्ध आवास के रूप में विकसित हो रहा है।
उत्तम कुमार शर्मा भी इस रिकॉर्ड को चीता परियोजना के बाद हुए बदलावों के संदर्भ में देखते हैं। उन्होंने कहा कि चीता परियोजना के बाद कूनो में पानी की उपलब्धता बढ़ी है और घास के मैदानों में सुधार हुआ है। उनके अनुसार, कैराकल की रिकॉर्डिंग और इन बदलावों के बीच एक सामान्य संबंध हो सकता है, लेकिन इसे समझने के लिए और अध्ययन की जरूरत होगी।
शर्मा ने यह भी बताया कि कूनो में व्यवस्थित तरीके से कैमरा ट्रैप लगाए जाते हैं। उनके अनुसार, हर दो वर्ग किलोमीटर में दो कैमरा ट्रैप आमने-सामने लगाए जाते हैं। कूनो का क्षेत्र करीब 750 वर्ग किलोमीटर है और कैमरा ट्रैप सालभर लगे रहते हैं। उन्होंने कहा कि इससे पहले कैमरा ट्रैप में भारतीय भेड़िया और जंगली कुत्ते जैसी प्रजातियां दिखी हैं, लेकिन कैराकल पहली बार रिकॉर्ड हुआ है।
कैराकल का आवास
कैराकल का वैश्विक वितरण अफ्रीका से लेकर पश्चिम एशिया और मध्य भारत तक फैला हुआ है। मध्य भारत इसके वैश्विक वितरण का पूर्वी छोर माना जाता है। कोलिपका कहते हैं, “इसके आगे उपयुक्त आवास कम हो जाते हैं और यह प्रजाति प्राकृतिक रूप से नहीं पाई जाती।”
उनके अनुसार, भारत में कैराकल राजस्थान और गुजरात में तुलनात्मक रूप से ज्यादा मिलता है, जहां झाड़ीदार, सूखे पर्णपाती और अर्ध-शुष्क आवास अब भी उपलब्ध हैं।
कूनो का यह रिकॉर्ड एक बड़ा सवाल भी उठाता है- क्या कूनो, गांधी सागर, चंबल और राजस्थान के कुछ हिस्से कैराकल के लिए एक बड़े सूखे इलाके का हिस्सा हो सकते हैं?

कोलिपका कहते हैं, “कैराकल मुख्य रूप से अर्ध-शुष्क पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़ा है, जिसमें घास के मैदान, झाड़ीदार इलाके, बीहड़ और खुले सूखे जंगल शामिल हैं। असल में यह किसी एक तरह के आवास पर निर्भर नहीं रहता, बल्कि ऐसे आवासों के मिले-जुले इलाके का इस्तेमाल करता है।”
यह बात कूनो के लिए अहम है। कूनो के आधिकारिक विवरण में करधई या धोक (Anogeissus pendula), खैर (Acacia catechu) और सलाई (Boswellia serrata) जैसे पेड़ों के जंगलों के साथ बड़े घास के मैदानों का भी उल्लेख है। उद्यान की वेबसाइट के अनुसार, कूनो के कुछ घास के मैदान कान्हा और बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के कई घास के मैदानों से भी बड़े हैं।
कोलिपका ने बताया कि राजस्थान और गुजरात में कैराकल के आवास पर हुए पहले के शोध में रिमोट सेंसिंग और हैबिटैट सूटेबिलिटी मॉडलिंग का इस्तेमाल किया गया था। इससे भारत में कैराकल के उपयुक्त आवासों की पर्यावरणीय विशेषताओं को पहचानने में मदद मिली। उनके अनुसार, ऐसे अध्ययन भविष्य में कैराकल सर्वे के लिए प्राथमिकता वाले इलाका पहचानने में मदद कर सकते हैं।
गांधी सागर और बड़ा इलाका
मध्य प्रदेश के गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य में भी पिछले साल कैमरा ट्रैप में कैराकल दिखा था। कूनो में आया नया रिकॉर्ड इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मध्य प्रदेश और राजस्थान के सूखे तथा अर्ध-शुष्क इलाकों के बीच संभावित जुड़ाव पर चर्चा को आगे बढ़ाता है।
शर्मा ने भी कैराकल की इस रिकॉर्डिंग को कूनो के व्यापक इलाके से जोड़ा। उन्होंने कहा कि गांधी सागर, राजस्थान और चंबल क्षेत्र से कैराकल की मौजूदगी की खबरें आती रही हैं। ऐसे में कूनो जैसे मिलते-जुलते सूखे जंगल, बीहड़ और घास के मैदान वाले इलाके में इसके मिलने की उम्मीद थी।

हालांकि, विशेषज्ञ इस पर सावधानी बरतने की सलाह देते हैं। कोलिपका के अनुसार, मध्य प्रदेश में कैराकल का आवास ऐतिहासिक रूप से ज्यादा फैला हुआ था, लेकिन अब यह बहुत बंट चुका है। यह बिखराव सिर्फ कैराकल के लिए ही नहीं, बल्कि चीता, तेंदुआ और बाघ जैसी दूर तक आवाजाही करने वाली प्रजातियों के लिए भी चिंता का विषय है।
वे कहते हैं, “कैराकल की आवाजाही, आवास के इस्तेमाल और बदलते इलाकों में इसके बने रहने की क्षमता के बारे में अभी हमारी जानकारी बहुत सीमित है। इस प्रजाति के लिए लैंडस्केप स्तर की संरक्षण योजना या पारिस्थितिक गलियारे की बात करने से पहले मजबूत वैज्ञानिक प्रमाणों की जरूरत है। कूनो का रिकॉर्ड एक महत्वपूर्ण पहला कदम है, लेकिन अभी बहुत अधिक शोध की जरूरत है।”
कैराकल के लिए खतरे
मध्य भारत में कैराकल की गिरावट कई दबावों से जुड़ी हो सकती है। इनमें घास के मैदानों, सूखे पर्णपाती वनों और अर्ध-शुष्क आवासों का क्षरण, उपयुक्त इलाकों में कृषि का विस्तार, खुले घूमने वाले कुत्तों की बढ़ती संख्या और शिकार शामिल हैं।
कोलिपका कहते हैं, “भारत के लैंडस्कैप (परिदृष्य) तेजी से बदल रहे हैं। ऐतिहासिक रूप से कैराकल दक्कन पठार, विंध्य, अरावली, गुजरात के कच्छ और मध्य भारत के कई हिस्सों में पाया जाता था। आज इनमें से बहुत से आवास कृषि, बुनियादी ढांचे और अन्य मानवीय उपयोगों में बदल गए हैं।”
उनके अनुसार, कैराकल के संरक्षण की सबसे बड़ी चुनौती अर्ध-शुष्क पारिस्थितिकी तंत्र, सवाना और झाड़ीदार इलाकों का लगातार नुकसान और क्षरण है। वे कहते हैं, “इन आवासों को अक्सर ठीक से संरक्षण नहीं मिलता, क्योंकि इन्हें गलती से ‘बंजर भूमि’ मान लिया जाता है, जबकि इनका जैव विविधता मूल्य बहुत अधिक है।”
और पढ़ेंः पृथ्वी के सबसे तेज जानवर चीता के लिए कैसे तैयार हुआ कूनो का जंगल?
दूसरे खतरों में संपर्क क्षेत्रों का खत्म होना, खुले घूमने वाले कुत्ते, खेतों में चूहे मारने वाली दवाओं से होने वाला द्वितीयक विषाक्त असर, शिकार और इस प्रजाति पर सीमित वैज्ञानिक जानकारी शामिल हैं।
कोलिपका के अनुसार, भारतीय कैराकल के वितरण, पारिस्थितिकी, व्यवहार, आवास की जरूरतों और आवाजाही के पैटर्न को बेहतर समझना अभी सबसे जरूरी है। वे कहते हैं, “इस प्रजाति के लिए प्रभावी संरक्षण रणनीति तभी बन सकती है, जब इसके लिए मजबूत वैज्ञानिक आधार तैयार हो। इस कम समझी गई लेकिन अद्भुत प्रजाति के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए शोधकर्ताओं, सरकारी एजेंसियों और संरक्षण संस्थाओं के बीच सहयोग जरूरी होगा।”
यह खबर मोंगाबे-इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 1 जुलाई, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: मध्य प्रदेश के कूनो राष्ट्रीय उद्यान में रात के समय कैमरा ट्रैप में दिखा कैराकल। तस्वीर साभार: कूनो राष्ट्रीय उद्यान।