- सिरसिया नदी, जो कभी दक्षिणी नेपाल के वीरगंज के जनजीवन, कृषि और धार्मिक अनुष्ठानों का मुख्य आधार हुआ करती थी, आज औद्योगिक कचरे और सीवेज के कारण इस कदर प्रदूषित हो चुकी है कि यह जनस्वास्थ्य के लिए एक गंभीर खतरा बन गई है।
- कमजोर कानून-प्रवर्तन, अप्रभावी नियमों और जल-शोधन योजनाओं के लागू न होने के कारण यह समस्या लगातार बनी हुई है, क्योंकि नेपाल के औद्योगिक गलियारे में स्थित कारखाने बिना किसी ट्रीटमेंट के ही अपना हानिकारक अपशिष्ट नदी में बहा रहे हैं।
- यह प्रदूषित जल बहकर भारत के रक्सौल तक पहुंचता है, जिससे वहां का पानी दूषित हो रहा है, और फसलों को भारी नुकसान पहुंच रहा है।
दक्षिणी नेपाल के औद्योगिक शहर वीरगंज के रामगढ़वा इलाके में रहने वाले 38 साल के प्रदीप कुमार विश्वकर्मा को आज भी अपने बचपन के दिन याद हैं कि कैसे वे गर्मी से बचने के लिए सिरसिया नदी में कूद जाया करते थे। उस समय उनकी माँ नदी किनारे कपड़े धोया करती थीं और गाँव के लोग पीने के लिए इसका पानी ले जाते थे।
जो नदी कभी इस जगह की जान हुआ करती थी, आज, उस ही के किनारे से गुजरते हुए विश्वकर्मा और इस सीमावर्ती शहर के लोगों को अपनी नाक पर रुमाल रखकर चलना पड़ता है। इसका बहता हुआ पानी अब नदी के पानी जैसा बिल्कुल नहीं दिखता। यह इतना गाढ़ा और काला हो चुका है मानो किसी ने इसमें ट्रक भरकर तेल डाल दिया हो। नदी के आसपास की हवा में सल्फर और सड़ते हुए कचरे की तेज बदबू फैली रहती है।
नदी की तरफ इशारा करते हुए विश्वकर्मा ने कहा, “यह अब नदी नहीं बची है।” उन्होंने आगे कहा, “यह फैक्ट्रियों का एक खुला नाला बन चुकी है। हमने सिर्फ अपनी नदी ही नहीं खोई, बल्कि अपना सम्मान भी खो दिया है।”
यह नदी कभी बारा और पर्सा जिलों के लोगों के रोजमर्रा के जीवन, उनके धर्म और खेती का एक अहम हिस्सा हुआ करती थी। यह नेपाल से बहकर भारत में जाने वाली करीब 6,000 छोटी-बड़ी नदियों में से एक है। इसकी शुरुआत उत्तर में बारा जिले के रामबन जंगल से होती है और आगे जाकर यह नेपाल के सबसे बड़े औद्योगिक क्षेत्र बारा-पर्सा कॉरिडोर से होकर गुजरती है।
आज कमजोर नियमों और सरकारी विभागों के बीच आपसी तालमेल की कमी के कारण फैक्ट्रियों को औद्योगिक कचरा और सीवेज बिना उपचारित किए सीधे नदी में बहाया जा रहा है। दशकों के विरोध-प्रदर्शनों, कई अदालती मुकदमों, सरकारी नियमों के बावजूद स्थिति जस की तस है। यह न सिर्फ नेपाल में, बल्कि सीमा पार भारत के बिहार राज्य में बसे रक्सौल के पर्यावरण और लोगों को भी नुकसान पहुंचा रही है।

बारा-पर्सा औद्योगिक कॉरिडोर में तकरीबन 1,200 छोटी-बड़ी फैक्ट्रियां हैं। दशकों से नेपाल की औद्योगिक राजधानी कहे जाने वाले इस इलाके ने देश की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई है। यहां चमड़े और कपड़ों से लेकर स्टील, साबुन और घी जैसी चीजें बनाई जाती हैं, जिससे हजारों लोगों को रोजगार मिलता है। लेकिन इस आर्थिक तरक्की की पर्यावरण को बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ रही है।
सिरसिया नदी निगरानी समिति की 2010 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कम से कम 47 बड़ी फैक्ट्रियां अपना कचरा सीधे इस नदी में बहाती हैं। पर्यावरणविदों की मानें तो 2026 तक ऐसी फैक्ट्रियों की संख्या बढ़कर 60 से अधिक हो गई है।
वीरगंज के पर्यावरण रसायन शास्त्री बिनोद गुप्ता ने बताया, “सिरसिया नदी में प्रदूषण का स्तर बहुत खराब है। इसमें चमड़ा फैक्ट्रियों से निकलने वाला क्रोमियम, केमिकल प्लांटों से निकलने वाला सल्फ्यूरिक एसिड और पेपर मिलों के जहरीले पदार्थ मौजूद हैं।” उन्होंने आगे कहा, “शुष्क मौसम में, नदी के कुल पानी का लगभग 80% हिस्सा फैक्ट्रियों का गंदा पानी ही होता है।” हैरानी की बात यह है कि शुष्क दिनों में सिरसिया में सिर्फ फैक्ट्रियों का गंदा पानी ही बहता है। एक सरकारी अधिकारी ने कहा, “अगर फैक्ट्रियों से कचरा बहना बंद हो जाए, तो यह नदी सूख जाएगी।”
सीवेज और कचरे का नदी के पर्यावरण पर काफी बुरा असर पड़ रहा है। बी.आर.ए. बिहार यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के एक अध्ययन में पाया गया कि जैसे ही औद्योगिक कचरा नदी में मिलता है, ज़ूप्लैंकटन (नदी के सूक्ष्म जीव जो जलीय जीवन का आधार होते हैं) पूरी तरह खत्म हो जाते हैं। इससे नदी एक ऐसा ‘जैविक रेगिस्तान’ बनकर रह जाती है, जहां जीवन की संभावना लगभग न के बराबर होती है।
सिरसिया नदी के किनारे रहने वाले हिंदू परिवारों के लिए, नदी की यह बदहाली न सिर्फ सेहत का संकट है, बल्कि उनकी आस्था के लिए भी एक बड़ा नुकसान है। गंगा के मैदानी इलाकों के सबसे बड़े त्योहारों में से एक, छठ पूजा के दौरान श्रद्धालु परंपरा के अनुसार सूर्य भगवान को अर्घ्य देने के लिए नदी के पानी में खड़े होते हैं। पिछले कुछ सालों में, सिरसिया नदी में छठ की पूजा करने वाले लोगों की संख्या काफी कम हुई है। जो लोग इस पानी में उतरते हैं, उन्हें अक्सर त्वचा की बीमारियां, एलर्जी और संक्रमण जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
नदी किनारे रहने वाली 60 साल की नैना पति देवी ने बताया, “हम पहले इस नदी के पानी से पूजा का प्रसाद बनाया करते थे। लेकिन अब तो इसमें पैर रखने में भी घिन आती है। अक्टूबर-नवंबर में आने वाले छठ त्योहार के दौरान फैक्ट्रियां कुछ दिनों के लिए गंदा पानी बहाना बंद कर देती हैं।”
उन्होंने आगे कहा, “ऐसा लगता है जैसे वे हम पर कोई एहसान कर रहे हों। कुछ समय के लिए पानी थोड़ा साफ दिखने लगता है। लेकिन तीसरे दिन से वही काला कीचड़ फिर से नजर आने लगता है।”


नेपाल के संविधान का अनुच्छेद 30 हर नागरिक को स्वच्छ और स्वस्थ माहौल में रहने का अधिकार देता है। नेपाल के ‘मुलुकी अपराध कानून’ की धारा 111 के अनुसार, पीने के पानी के स्रोतों को गंदा करने वालों को तीन साल तक की जेल हो सकती है। लेकिन असलियत में यह सब सिर्फ कागजों तक ही सीमित है।
वकील सुरेंद्र कुर्मी साल 2018 से इस नदी को बचाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। वे ‘सरिसवा नदी और प्रदूषण मुक्त वीरगंज अभियान’ के मुखिया हैं (सिरसिया नदी को ‘सरिसवा’ नाम से भी जाना जाता है)। उन्होंने नदी को दूषित करने के आरोप में वीरगंज महानगरपालिका और 10 बड़ी फैक्ट्रियों के खिलाफ एक जनहित याचिका दायर की थी।
कुर्मी ने बताया, “शुरुआत में अदालत ने यह कहकर मामला खारिज कर दिया कि यह केस सरकारी वकील की तरफ से आना चाहिए। इसके बाद जब हम आगे बढ़े, तो पुलिस ने कहा कि यह मुख्य जिला अधिकारी की जिम्मेदारी है। सीडीओ ने यह मामला नगर पालिका पर टाल दिया और नगर पालिका का कहना था कि उनके पास फैक्ट्रियों पर कार्रवाई करने के लिए जरूरी तकनीकी साधन और क्षमता नहीं है।”
साल 2019 में जनकपुर हाईकोर्ट की वीरगंज पीठ ने वीरगंज महानगरपालिका को प्रदूषण रोकने के लिए असरदार कदम उठाने को कहा। लेकिन सात साल बीत जाने के बाद भी यहां कुछ खास बदलाव नहीं आया है।
जैसे ही यह नदी रक्सौल के रास्ते भारत की सीमा में प्रवेश करती है, तो इससे होने वाला प्रदूषण भारत और नेपाल के बीच एक कूटनीतिक मुद्दा बन जाता है।
रक्सौल के रहने वाले सुभाष कुमार ने बताया कि नदी ने वहां के भूजल को भी दूषित कर दिया है। वह कहते हैं, “भारी बदबू के कारण हमें गर्मियों में भी अपने घरों की खिड़कियां बंद रखनी पड़ती हैं। हम इस पानी से खेतों की सिंचाई भी नहीं कर सकते, क्योंकि यह फसलों को सुखा देता है। हमें नेपाल की फैक्ट्रियों से निकले कचरे का नुकसान झेलना पड़ रहा है, लेकिन हमारे पास इसकी शिकायत करने की कोई जगह नहीं है।”

भारत सरकार ने रक्सौल शहर के गंदे पानी को साफ करने के लिए 74.6 करोड़ रुपए की एक सीवेज मैनेजमेंट योजना को मंजूरी दी है। इस क्षेत्र से भारतीय जनता पार्टी के विधायक प्रमोद कुमार सिन्हा के मुताबिक, तीन अलग-अलग जगहों पर बड़े नालों के गंदे पानी को साफ करने का काम चल रहा है।
हालाँकि, भारतीय अधिकारियों का मानना यही है कि जब तक नेपाल से बहकर आने वाले कचरे को नहीं रोका जाएगा, तब तक यह नदी कभी साफ नहीं हो पाएगी। भारतीय सीमा के अंदर सिरसिया नदी के बहाव क्षेत्र में केवल रक्सौल ही एकमात्र ऐसा शहर है जहां से गंदा पानी नदी में जाता है।
‘स्वच्छ रक्सौल’ संस्था के अध्यक्ष रंजीत सिंह ने बताया कि नदी के प्रदूषण के खिलाफ विरोध जताने के लिए वे खुद नेपाल भी गए थे, लेकिन वहां से उन्हें संतोषजनक जवाब नहीं मिला। वे नदी की इस बर्बादी के लिए बारा-पर्सा क्षेत्र की फैक्ट्रियों को जिम्मेदार मानते हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर प्रदूषण नहीं रोका गया, तो रक्सौल के लोग नेपाल की फैक्ट्रियों में जाने वाले कच्चे माल को रोकने और वहां से बनकर आने वाले तैयार माल को भारत आने से रोकने के लिए आगे आएंगे।
उधर नेपाल में, बारा-पर्सा क्षेत्र के फैक्ट्री मालिकों का कहना है कि यहां बड़े पैमाने पर एक साझा जल-शोधन प्लांट की जरूरत है, क्योंकि इस इलाके की ज्यादातर फैक्ट्रियां छोटी और मध्यम स्तर की हैं, जो खुद का अलग प्लांट लगाने और उसे चलाने का भारी खर्च नहीं उठा सकतीं।
वीरगंज उद्योग वाणिज्य संघ के अध्यक्ष हरि गौतम ने कहा, “एक साझा ट्रीटमेंट प्लांट ही इस समस्या का एकमात्र टिकाऊ हल है। सरकार को इसके लिए जरूरी बुनियादी ढांचा तैयार करना चाहिए; फैक्ट्रियां इसके इस्तेमाल के बदले सर्विस चार्ज देने को तैयार हैं।”

नेपाल के उद्योग, वाणिज्य और आपूर्ति मंत्रालय ने वीरगंज-पथलैया क्षेत्र की फैक्ट्रियों से निकलने वाले गंदे पानी को साफ करने वाले ट्रीटमेंट प्लांट के लिए एक अध्ययन (फ़िज़िबिलिटी स्टडी) कराया है। इस अध्ययन में 16 अलग-अलग तरह के उद्योगों से निकलने वाले 18 प्रकार के अपशिष्टों की पहचान की गई और पाया गया कि 122 फैक्ट्रियां सीधे तौर पर अपना गंदा पानी नदी में बहा रही हैं।
रिपोर्ट में तीन ट्रीटमेंट यूनिट बनाने की सलाह दी गई है, जो मिलकर रोजाना करीब 1.34 करोड़ लीटर गंदा पानी साफ कर सकेंगी। इस पूरे प्रोजेक्ट में लगभग 2.5 अरब नेपाली रुपए (करीब 1.7 करोड़ डॉलर) का खर्च आने का अनुमान है। एक सरकारी अधिकारी ने बताया, “हमने 2.5 अरब नेपाली रुपए का प्रस्ताव तैयार कर लिया है, लेकिन इसे शुरू करने के लिए देश के केंद्रीय बजट से पैसा मिलने की जरूरत है।”
इधर, युवाओं का सब्र अब टूट रहा है। साल 2025 के आखिर से ‘सिरसिया बचाओ आंदोलन’ चला रहे युवाओं के एक ग्रुप ने नदी का गंदा पानी बोतलों में भरकर सरकारी दफ्तरों के गेट पर पहुंचाना शुरू कर दिया है। वे इन बोतलों को वीरगंज उद्योग वाणिज्य संघ के दफ्तर के दरवाजों पर भी टांग रहे हैं।
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आंदोलन, कोर्ट के आदेशों, कमेटियों और सरकारी वादों के बीच फंसी सिरसिया नदी में आज भी वही काला पानी बह रहा है। यह गंदा पानी लोगों के घरों, मंदिरों, खेतों से गुजरते हुए सीमा पार कर भारत की ओर आ रहा है।
प्रदीप कुमार विश्वकर्मा के लिए अब इन कमेटियों और वादों का कोई मोल नहीं रह गया है। उन्होंने नदी के काले पानी की तरफ देखते हुए कहा, “हर साल एक नई कमेटी बनती है और हर साल नए वादे किए जाते हैं। लेकिन नदी का पानी दिन-ब-दिन और काला होता जा रहा है। हम इसी नदी के किनारे खेलकर बड़े हुए हैं, लेकिन आज हम इस जहर के साथ जीने को मजबूर हैं।”
संदर्भ-
सिद्दीकी, एस. (2018). इफेक्ट ऑफ सीवेज पॉल्यूशन ऑन जूप्लैंकटन कम्युनिटी ऑफ सिरसिया रिवर एट रक्सौल, इंडिया (जेईटीआईआर1802264). जर्नल ऑफ इमर्जिंग टेक्नोलॉजीज एंड इनोवेटिव रिसर्च (जेईटीआईआर), 5(2). रिट्रीव्ड फ्रॉम https://www.jetir.org/papers/JETIR1802264.pdf
यह खबर मोंगाबे टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी ग्लोबल वेबसाइट पर 23 जनवरी 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: सिरसिया नदी के किनारे छठ पर्व मनाते हुए श्रद्धालु। तस्वीर- सुरेश बिडारी।