Site icon Mongabay हिन्दी

भारत की पहली बार बनी जुगनुओं की चेकलिस्ट, दर्ज हुईं 92 प्रजातियां

एब्सकॉन्डिटा पर्प्लेक्सा। तस्वीर - परवेज़ द्वारा।

एब्सकॉन्डिटा पर्प्लेक्सा। तस्वीर - परवेज़ द्वारा।

  • एक नए शोध में भारतीय जुगनुओं की एक चेकलिस्ट तैयार की गई है। इसमें चार सबफ़ैमिली और 27 जॉनर की 92 प्रजातियों को दर्ज किया गया है।
  • जुगनुओं की ज़्यादातर प्रजातियाँ एक से ज़्यादा भारतीय राज्यों में पाई जाती हैं।
  • कम से कम 22 राज्यों और एक केंद्र-शासित प्रदेश में जुगनू पाए जाने का रिकॉर्ड है।

जुगनुओं की टिमटिमाहट से चमकता रात का आसमान एक पुरानी मीठी याद को ताज़ा कर देता है। भले ही इन रोशनी पैदा करने वाले छोटे-छोटे कीड़ों का वर्णन हमारी संस्कृति, कला और साहित्य में बहुत सुन्दर तरीके से किया जाता हो, लेकिन असल में हम जुगनुओं के बारे में कितना जानते हैं?

ज़ूटाक्सा नामक एक जर्नल में छपे एक नए शोध में भारतीय जुगनुओं (कोलियोप्टेरा: लैम्पाइरिडे) की एक पूरी चेकलिस्ट तैयार की गई है। इसमें चार सबफ़ैमिली और 27 जॉनर की 92 प्रजातियों को दर्ज किया गया है। इस चेकलिस्ट में भारत के बायोजियोग्राफिक ज़ोन में बहुत ज़्यादा एंडेमिज़्म और एक बड़ा लेकिन असमान डिस्ट्रीब्यूशन दिखाया गया है। एंडेमिज्म जीवविज्ञान और पारिस्थितिकी में किसी प्रजाति (पौधे या जानवर) की वह स्थिति है, जिसमें वह प्रजाति प्राकृतिक रूप से केवल एक विशिष्ट और सीमित भौगोलिक क्षेत्र में ही पाई जाती है। रिसर्चर्स ने 1881 से अक्टूबर 2025 तक इस प्रजाति पर मौजूद प्रकाशनों का सर्वे किया और पाया कि भारतीय जुगनुओं का 60.86% हिस्सा देश में एंडेमिक है, यानी कि यह सिर्फ भारत में भी पाया जाता है।

दुनिया भर में जुगनुओं के लिए उनके आवास का नुकसान, रात की कृत्रिम रोशनी से प्रकाश प्रदूषण और कीटनाशकों को सबसे बड़ा खतरा माना जाता है। तस्वीर- अनस्प्लैश 
दुनिया भर में जुगनुओं के लिए उनके आवास का नुकसान, रात की कृत्रिम रोशनी से प्रकाश प्रदूषण और कीटनाशकों को सबसे बड़ा खतरा माना जाता है। तस्वीर- अनस्प्लैश

इस शोध के मुख्य लेखक, परवेज़ बताते हैं कि जब वे अपनी पीएचडी की तैयारी कर रहे थे, तो भारत में जुगनू की ज़्यादातर प्रजातियों के बारे में जानकारी की कमी थी, इसी वजह से उन्होंने भारतीय जुगनुओं की अनजान दुनिया के बारे में और गहराई से जानने की कोशिश की। उन्होंने मोंगाबे-इंडिया को बताया, “पहली बार पता चलने के बाद ज़्यादातर प्रजातियों पर स्टडी नहीं की गई थी।”

लुसिओलिने (Luciolinae) जुगनुओं की सबसे बड़ी सब-फ़ैमिली है जिसमें 37 प्रजातियाँ हैं; इसके बाद ओटोट्रेटिने (Ototretinae) में 31, लैम्पाइरिने (Lampyrinae) में 17 और साइफोनोसेरिने (Cyphonocerinae) में एक प्रजाति हैं। लुसिओलिने और ओटोट्रेटिने सबसे ज़्यादा विविधता वाली सब-फ़ैमिली हैं, जिनमें से प्रत्येक में जुगनू के 11 जॉनर (वंश) शामिल हैं। इस स्टडी में हर प्रजाति का मौजूदा नाम, ओरिजिनल कॉम्बिनेशन, समानार्थी नाम, लिटरेचर साइटेशन और भारत व अन्य देशों में उनके फैलाव की जानकारी भी दी गई है।

ज़्यादातर प्रजातियाँ एक से ज़्यादा भारतीय राज्यों में पाई जाती हैं। कम से कम 22 राज्यों और एक केंद्र-शासित प्रदेश में जुगनू पाए जाने का रिकॉर्ड है, हालाँकि 17 प्रजातियों (18.47%) के बारे में भारत में उनकी सटीक जगह की जानकारी उपलब्ध नहीं है। एक रिसर्च पेपर के अनुसार, पश्चिमी घाट में सबसे ज़्यादा (25.33%) जुगनू प्रजातियाँ पाई जाती हैं। इसके बाद उत्तर-पूर्व, गंगा के मैदानी इलाके, तटीय इलाके और दक्कन प्रायद्वीप का नंबर आता है, जहाँ क्रमशः 22.66%, 17.33% और 13.33% प्रजातियाँ पाई जाती हैं। ट्रांस-हिमालय और हिमालय क्षेत्रों में 1.33% जुगनू प्रजातियाँ हैं, जबकि द्वीपों पर 2.66% प्रजातियाँ पाई जाती हैं। रेगिस्तानी और कम बारिश वाले इलाकों में जुगनू की कोई भी प्रजाति दर्ज नहीं की गई है।


और पढ़ेंः कृत्रिम प्रकाश से कैसे कम हो रही है जुगनुओं की संख्या


इस स्टडी से पता चलता है कि भारतीय जुगनू के खासतौर पर यहीं पाए जाने और पारिस्थितिक रूप से अहम होने के बावजूद, उनके बारे में पूरी जानकारी, जैसे कि पूरी सर्वे रिपोर्ट, अपडेटेड नेशनल चेकलिस्ट और संरक्षण से जुड़ी जानकारी अभी भी काफी हद तक मौजूद नहीं है।

परवेज़ का कहना है कि चूंकि यह भारतीय जुगनू की पहली चेकलिस्ट है, इसलिए यह भविष्य में किए जाने वाले अध्ययनों के लिए एक आधार (बेसलाइन) का काम कर सकती है। परवेज़ कहते हैं, “यह रिसर्च भारत से कहीं आगे तक जाती है और पड़ोसी देशों को भी ज़रूरी मदद देती है, जहां जुगनू पर स्टडीज़ बहुत कम या बिल्कुल नहीं होती हैं।”

वे आगे कहते हैं कि दक्षिण एशिया (IUCN SSC फायरफ्लाई स्पेशलिस्ट ग्रुप) के रीजनल कोऑर्डिनेटर और फायरफ्लाईज़ एशियन एसोसिएशन के फाउंडर के तौर पर, उन्हें अक्सर पूरे क्षेत्र से जुगनू की पहचान और डेटा के लिए अनुरोध मिलते रहते हैं।

“हमारी नई चेकलिस्ट, पहचान की सेवाएं और योजनाबद्ध एकेडमिक रिपॉजिटरी, जिसे केरल और नई दिल्ली के सेंटर्स का सहयोग प्राप्त है, इन कमियों को दूर करेंगी और पूरे एशिया में सहयोग और संरक्षण को बढ़ावा देंगी।”


यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 12 मार्च, 2026 को प्रकाशित हुई थी।


बैनर तस्वीर: एब्सकॉन्डिटा पर्प्लेक्सा। तस्वीर – परवेज़ द्वारा।

Exit mobile version