- चूंकि राज्य की संस्थाएँ अलग-अलग कार्यकाल के बीच पुनर्गठित होती रहती हैं, ऐसे में केंद्र का तर्क है कि केंद्र सरकार की बनाई एक समिति को उनके अंतरिम फ़ैसले लेने का काम संभाल लेना चाहिए।
- केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त एक स्थायी संस्था, पर्यावरण पर पड़ने वाले असर के आकलन की प्रक्रिया से जुड़े “अन्य कार्यों” के लिए भी ज़िम्मेदार हो सकती है।
- केंद्र के अनुसार, आमतौर पर इन निकायों का पुनर्गठन कार्यकाल खत्म होने से छः महीने पहले शुरू किया जाता है, लेकिन “राज्यों की ओर से प्रस्ताव देर से या अधूरे जमा किए जाने के कारण देरी होती है।
केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने कहा है कि जब राज्य के पर्यावरण पर असर का आकलन करने वाले निकायों का कार्यकाल खत्म हो जाए या वे काम न कर रहे हों, तो केंद्र सरकार की बनाई एक समिति को उनके अंतरिम फ़ैसले लेने का काम संभाल लेना चाहिए।
इस नई व्यवस्था के लिए 5 मार्च को एक ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी किया गया। चूंकि राज्य की संस्थाएँ अलग-अलग कार्यकाल के बीच पुनर्गठित होती रहती हैं, ऐसे में केंद्र का तर्क है कि इस नई व्यवस्था से फ़ैसले लेने की प्रक्रिया में “निरंतरता” बनी रहेगी। केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त एक स्थायी संस्था, पर्यावरण पर पड़ने वाले असर के आकलन की प्रक्रिया से जुड़े “अन्य कार्यों” के लिए भी ज़िम्मेदार हो सकती है। इन कार्यों को केंद्र सरकार समय-समय पर इस स्थायी संस्था को सौंप सकती है।
पर्यावरण प्रभाव आकलन या एनवायरनमेंट इम्पैक्ट असेसमेंट (EIA) नोटिफिकेशन के तहत, ‘कैटेगरी B’ के प्रोजेक्ट्स – जैसे लेदर टैनिंग इंडस्ट्री, छोटे पैमाने पर माइनिंग और मेटलर्जिकल प्रोसेसिंग – के लिए पर्यावरण मंज़ूरी देने का काम ‘स्टेट एनवायरनमेंटल इम्पैक्ट असेसमेंट अथॉरिटीज़’ (SEIAA) का है। इन अथॉरिटीज़ को ‘स्टेट एक्सपर्ट अप्रेज़ल कमिटीज़’ (SEAC) सलाह और मार्गदर्शन देती हैं। इन कमिटीज़ का कार्यकाल तीन साल का होता है, जिसे एक साल और बढ़ाया जा सकता है।
इन कमिटी के सदस्यों के पास पर्यावरण प्रबंधन, जोखिम मूल्यांकन, जीवन विज्ञान जैसे विषयों या किसी खास क्षेत्र का 15 साल का अनुभव होना ज़रूरी है।
केंद्र के अनुसार, आमतौर पर इन निकायों का पुनर्गठन कार्यकाल खत्म होने से छः महीने पहले शुरू किया जाता है, लेकिन “राज्यों की ओर से प्रस्ताव देर से या अधूरे जमा किए जाने के कारण देरी होती है।” ऐसी देरी से “पर्यावरण मंजूरी प्रक्रिया पूरी तरह रुक जाती है,” क्योंकि प्रस्ताव केंद्र को भेजे जाते हैं, “जिससे समय-सीमा बढ़ जाती है और प्रोजेक्ट के मूल्यांकन में अनावश्यक देरी होती है, जिससे प्रोजेक्ट की समय-सीमा और निवेशकों का भरोसा प्रभावित होता है।”
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इसके जवाब में, केंद्र ने राज्य निकायों का कार्यकाल चार साल तक बढ़ाने और केंद्र द्वारा नियुक्त एक ‘एनवायरनमेंट इम्पैक्ट असेसमेंट स्टैंडिंग अथॉरिटी’ (SAEIA) बनाने का प्रस्ताव दिया है। इस अथॉरिटी की मदद के लिए ‘एनवायरनमेंट इम्पैक्ट अप्रेज़ल’ पर एक ‘स्टैंडिंग कमिटी’ (SCEIA) होगी। यह अथॉरिटी छह महीने के लिए मंज़ूरी से जुड़े फ़ैसले लेने का काम संभालेगी – और इस अवधि को आगे छह महीने और बढ़ाया जा सकेगा।
इन कमेटियों के सदस्यों के तौर पर केंद्र सरकार द्वारा “उचित समझे जाने वाले पदेन सदस्यों” को शामिल करने का प्रस्ताव है।
यह प्रस्ताव मंज़ूरी की प्रक्रिया में लगने वाले समय को कम करने के मकसद से भारत के पर्यावरण कानूनों और नियमों में किए गए कई संशोधनों के बाद आया है।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 20 मार्च, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: असम में एक लोहे का कारखाना । डॉन विक्रो की तस्वीर, विकिमीडिया कॉमन्स (CC BY-SA 4.0)