- झारखंड में अभी तक सामान्य से कम मॉनसूनी बारिश से खरीफ फसलों की बुआई और रोपाई पर गंभीर असर पड़ा है। आधा जुलाई बीत जाने के बाद भी धान की रोपाई में तेजी नहीं आई है।
- अगले कुछ दिनों में पर्याप्त बारिश नहीं होने से धान और अन्य फसलों के उत्पादन में भी कमी की आशंका जताई जा रही है। इससे पलायन और पानी की कमी जैसी कई चुनौतियां आने की आशंका है।
- संभावित सूखे को देखते हुए राज्य सरकार जागरूकता अभियान चला रही है और किसानों को मोटे अनाज की खेती के लिए आर्थिक मदद दे रही है।
- हालांकि, जानकार मानते हैं कि बार-बार बन रही ऐसी स्थितियों के लिए लंबी-अवधि की योजना जरूरी है।
चतरा जिले के रहने वाले 40-वर्षीय बरुण कुमार यादव छत्तीसगढ़ के भिलाई में सुतार का काम करते हैं। पिछले महीने की 29 तारीख को वे धान की रोपाई के लिए भिलाई से अपने गांव पत्थलगडा आए थे। लेकिन, अनुमान के अनुसार बारिश नहीं होने से वे एक महीने बाद धान की रोपाई किए बिना ही वापस लौट गए।
वहीं इसी गांव के बसंत दांगी ने सामुदायिक कुएं के पानी से धान की पौध या नर्सरी तो लगा ली, लेकिन पर्याप्त पानी नहीं मिलने से उनके खेत में भी अब दरारें आ गई हैं। पास के ही मेराल गांव के आन्द्रियास टोपनो की धान की नर्सरी रोपाई के लायक हो गई है, लेकिन बारिश नहीं होने से वे अभी तक रोपाई नहीं कर पाए हैं।
धान की अधिकतर किस्मों के लिए पहले नर्सरी लगाई जाती है और फिर उसकी रोपाई की जाती है।
चौथा गांव के किसान शंकर दांगी बारिश में देरी के चलते इस साल धान छोड़कर मक्के की बुआई कर रहे हैं। “बारिश का इतंजार करने से अच्छा है कि मक्का ही बो दें। मक्का बोने में भी 10 दिन की देरी हो चुकी है, इसलिए पैदावार भी घटेगी,” उन्होंने बताया।
झारखंड, जहां अर्थव्यवस्था का आधार मॉनसूनी बारिश है, में खरीफ की बुआई में करीब 20 दिन से ज़्यादा की देरी हो चुकी है।
झारखंड कृषि निदेशालय के निदेशक विद्यानंद शर्मा पंकज ने कहा, “रोपाई करीब 20 दिन देरी से चल रही है। हालांकि, संथाल परगना जैसे इलाकों में रोपाई देर तक चलती है। फिर भी, पिछले साल के मुकाबले धान की पैदावार 80 फीसदी तक होने का अनुमान है।”
इस साल भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) ने बारिश सामान्य से कम होने का अनुमान लगाया है। अमेरिका की नेशनल वेदर सर्विस के मुताबिक इस साल अक्टूबर से दिसंबर के बीच बहुत मजबूत अल-नीनो का अनुमान लगाया है जो अब तक का सबसे बड़ा अल-नीनो इवेंट हो सकता है। ऐसे में झारखंड के लिए इसके मायने क्या हैं, इसे समझने के लिए मोंगाबे हिंदी ने चतरा की यात्रा की।

बरुण का धान वाला खेत अभी तैयार भी नहीं हुआ है और उसमें घास उग आई है। छः लोगों के भरण-पोषण के लिए जिम्मेदार बरुण कहते हैं कि खेती से सिर्फ पेट भर पाता है।
बरुण अपने खेत में बने पारंपरिक कुएं में झांकते हैं और कहते हैं, “आप इस कुएं में बचे पानी से अनुमान लगा सकते हैं कि बारिश की स्थिति कितनी विकट है। मैंने अपने 12 कट्ठा वाले धान के खेत के लिए चार किलो बीज खरीदकर नर्सरी तो लगा दी, लेकिन बारिश पर निर्भर खेती में इस बार उम्मीद बहुत कम है।”
बसंत भी कम बारिश को लेकर चिंतित हैं, “अगर एक-दो दिन में बारिश नहीं हुई, तो नर्सरी के पौधे सूखने लगेंगे। दरारें जितनी चौड़ी होंगी, पटवन उतनी ही ज्यादा करनी होगी। बारिश होने पर ही धान की रोपाई हो पाएगी।”
झारखंड में इस साल 1 जून से 14 जुलाई, 2026 के बीच सामान्य से 41 फीसदी कम बारिश हुई है। इस दौरान सामान्य तौर पर 321 मिमी बारिश होनी चाहिए थी जबकि असल आंकड़ा 193.2 मिमी है। चतरा में तो हालात और खराब हैं। वहां 68 फीसदी (287 मिमी के मुकाबले महज 91 मिमी) बारिश ही हुई है। गढ़वा में बारिश की कमी सबसे अधिक 79 फीसदी है। राज्य के 24 में से 13 जिलों में बारिश की कमी 40 फीसदी से अधिक है। इस बार का अल-नीनो सबसे मजबूत होने का अनुमान है। विशेषज्ञ अनुमान लगाते हैं कि इस साल मॉनसून पर अल-नीनो का प्रभाव पड़ेगा और आगे भी कम बारिश की स्थिति रहेगी।।
भारतीय मौसम विभाग के रांची केंद्र के प्रमुख अभिषेक आनंद मोंगाबे-हिंदी से कहते हैं, “कमजोर अल-नीनो की स्थितियां मॉनसून के शुरुआती दौर में ही बन चुकी हैं जो आने वाले मॉनसूनी महीनों में और भी मजबूत होगी जिससे भारत में मॉनसूनी बारिश में कमी की आशंका है।”
भारत सरकार ने भी 315 ऐसे जिलों की पहचान की है जहां सूखे जैसी स्थितियां बन सकती हैं।

रोपाई, बुआई में देरी और इसके मायने
झारखंड के आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक राज्य की मुख्य फसल धान है और यहां के दो-तिहाई से ज्यादा किसान सीमांत (एक एकड़ से कम खेती वाली जमीन) हैं। वहीं 2025-26 के आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक सकल फसल वाले रकबे का 80 प्रतिशत से ज़्यादा हिस्सा असिंचित है। ऐसे में बारिश में हो रही ये देरी स्थिति को बेहद चिंताजनक बना देती है।
यह भी गौरतलब है कि झारखण्ड के अधिकतर किसान साल में सिर्फ एक बार खेती करते हैं और उसी से उनके साल भर के खाने की व्यवस्था हो पाती है।
कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि रोपाई या बुआई जितनी देर से होती है, पैदावार उतनी ही कम होती है। रांची स्थित बिरसा कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू) में एग्रोनॉमी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर परेवज आलम कहते हैं, “हमने विश्वविद्यालय के अंदर एक शोध में पाया कि अगर रोपाई 1 अगस्त तक की जाती है, तो पैदावार में 50 फीसदी तक की कमी आती है, क्योंकि फसल को पर्याप्त धूप नहीं मिल पाती।”
कृषि विभाग ने झारखंड में इस साल 18 लाख हेक्टेयर में धान की रोपाई का लक्ष्य रखा है। लेकिन, नौ जुलाई तक महज 7.65 फीसदी ही रोपाई हो पाई थी। मक्के के लिए यह आंकड़ा 24.41, दलहन के लिए 8.82 और मोटे अनाज के लिए 3.86 और तिलहन के लिए 13.53 फीसदी था।

पत्थलगडा ब्लॉक के बीडीओ उदल राम ने नवाडीह गांव में मोगाबे हिंदी को बताया कि प्रखंड में धान की 90 फीसदी नर्सरी का काम पूरा हो चुका है। वह कहते हैं कि अब तक रोपाई शुरू हो जानी चाहिए थी, लेकिन बारिश की बेरुखी से ऐसा नहीं हो पाया है।
पत्थलगडा ब्लॉक के ही बेलहर गांव के किसान और पंचायती राज विभाग में मास्टर ट्रेनर प्रकाश राणा ने मोंगाबे से कहा, “लोग इंतजार में हैं। अगले 15 दिन में अच्छी बारिश होने पर ही किसान रोपाई कर पाएंगे। मौजूदा हालात में ऐसा लगता है कि धान की 60 फीसदी रोपाई ही हो पाएगी।”
बीएयू में कृषि मौसम विज्ञान विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर प्रज्ञा कुमारी ने मोंगाबे हिंदी से कहा, “जून में बारिश में 54 फीसदी की कमी रही। चतरा और गढवा जैसे जिलों में यह कमी 90 फीसदी तक थी। इसलिए, किसान बारिश के इंतजार में खेत भी तैयार नहीं कर पाए।”
कमजोर मॉनसून का असर पैदावार पर भी दिखता है। झारखंड में 2022 के सुखाड़ के दौरान राज्य के 24 में से 22 जिलों के 226 ब्लॉक में सूखा घोषित किया गया था।
उस साल धान और मक्के की पैदावार में भी गिरावट देखी गई। धान की पैदावार में तो 66 फीसदी की बड़ी कमी आई। वहीं, मोटे अनाज को छोड़कर बाकी सभी फसलों की उत्पादन दर में भी गिरावट (पेज 157,158) आई। अगर धान के उत्पादन की बात करें, तो यह 2021 के 3042 किलो\प्रति हेक्टेयर से करीब 20 फीसदी घटकर 2485 किलो\प्रति हेक्टेयर रह गया। मक्के का उत्पादन 2021 के 2225 किलो\प्रति हेक्टेयर से घटकर करीब 2134 किलो\प्रति हेक्टेयर रह गया। आईएमडी के आंकड़ों के मुताबिक 2022 में राज्य में मॉनसूनी बारिश 20 फीसदी कम हुई थी।
चतरा के जिला कृषि अधिकारी गौतम कुमार इन हालात को चुनौतीपूर्ण मानते हैं। “कम बारिश होने से आर्थिक स्थिति पर असर दिखने लगता है। अनाज, पानी और चारे की समस्या सामने आती है, क्योंकि खरीफ मुख्य फसल सीजन है। कृषि से मिलने वाले रोजगार में भी दिक्कतें आने लगती हैं,” उन्होंने बताया।

पलायन का बढ़ता खतरा
झारखंड एक पलायन-उन्मुख राज्य भी है और खेती-बाड़ी में संकट गहरा होने से इसमें और तेजी आने की आशंका है। एक अनुमान के मुताबिक झारखंड से करीब 45 लाख लोगों ने पलायन किया है।
जानकार मॉनसून की बेरुखी के चलते पलायन को सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों से भी जोड़ते हैं। झारखंड नरेगा वॉच के जेम्स हेरेंज मोंगाबे से कहते हैं, “पलायन बढ़ने से गांव में सिर्फ बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे ही बचेंगे। लोगों का रोजमर्रा का खर्च चलाना मुश्किल हो जाता है। जरूरी नहीं कि पलायन करने वालों को तुरंत काम मिल जाए। अगर घर पैसा भेजने में देर होगी, तो परिवार साहूकार के चक्कर में फसेंगे।”
हालाँकि, वरिष्ठ पत्रकार नकुल तिवारी मानते हैं कि फिलहाल नए लोगों का पलायन शुरू नहीं हुआ है। वह कहते हैं, “अभी लोगों को बाहर ले जाने वाले एजेंट गांव में नहीं आए हैं। अगस्त के बाद ही स्थिति साफ हो पाएगी।”
खूंटी जिले के किसान रेजन गुड़िया कहते हैं कि मॉनसून की अनिश्चितता खेतिहर मजदूरों के लिए बुरी खबर है। अगर उन्हें खेतों में काम नहीं मिलेगा और वे अगस्त से ही पलायन शुरू कर देंगे।
हेरेंज कहते हैं, “खेतिहर मजदूरों का एकमात्र सहारा मनरेगा था। नई योजना वीबी-जी राम जी को लेकर अभी कई चीजें अस्पष्ट हैं। इस योजना के तहत काम मिलना शुरू भी नहीं हुआ है।”

सरकारी तैयारी
इस बीच, झारखंड सरकार ने भी संभावित सूखे को देखते हुए अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। राज्य ने सबसे पहले मई में ही आकस्मकि योजना बनाकर केंद्र को सौंप दी थी। राज्य सरकार ने कहा है कि किसानों की सुरक्षा और गुणवत्तापूर्ण बीज, सिंचाई सुविधाएं, कृषि ऋण, उर्वरक और दवाओं की समय पर उपलब्धता सुनिश्चित करना सर्वोच्च प्राथमिकता है।
सरकार मोटे अनाज को बढ़ावा देने के लिए मिलेट मिशन भी चला रही है। कृषि निदेशक ने बताया, “इसके तहत एक एकड़ पर तीन हजार रुपए (अधिकतम पांच एकड़ और 15,000 रुपए) की आर्थिक मदद दी जा रही है। 7 से 22 जुलाई तक शिविर लगाकर किसानों से फॉर्म भरवाए जा रहे हैं। 50 फीसदी और 100 फीसदी सब्सिडी पर बीज उपलब्ध कराए जा रहे हैं।“ किसानों को धान के ऐसे बीज चुनने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है, जो 60 दिनों में तैयार होते हैं।
लेकिन, राणा कहते हैं, “हमारी पंचायत में जागरूकता बढ़ाने के लिए सरकार का कोई शिविर नहीं लगा है। यह नहीं बताया गया है कि कौन-सी फसल लगानी चाहिए। जनप्रतिनिधि भी इस मामले को नहीं उठा रहे हैं।”
मेराल के पास सायल गांव के किसान चामो मुंडा भी कहते हैं कि सरकार की तरफ से हमारे गांव में अभी तक जागरूकता अभियान नहीं चलाया गया है। टोपनो और मुंडा दोनों कहते हैं कि इस इलाके में मोटा अनाज खासकर मड़वा लगाने वाले किसान न के बराबर हैं।
चतरा जिले के सिमरिया ब्लॉक की किसान मौसमी बक्सला कहती हैं कि मोटे अनाज को लेकर अभी जागरूकता की कमी है, इसलिए सरकार दीर्घकालिक योजना बनाकर प्रचार-प्रसार करे और इन अनाज को बाजार से जोड़े।
हालाँकि, आनंद आंकड़ों का हवाला देते हुए लंबी-अवधि की योजना बनाने की सलाह देते हैं। उन्होंने कहा, “पिछले 25 साल में झारखंड में आठ साल सामान्य से कम बारिश वाले रहे हैं, यानी औसतन हर तीन साल के बाद एक साल सूखे की आशंका। इसलिए, इन आंकड़ों को ध्यान में रखकर योजना बनाई जानी चाहिए।”
आलम कहते हैं, “बदलती जलवायु के हिसाब से किसानों को कैलेंडर आधारित खेती छोड़कर मौसम आधारित खेती पर जोर देना चाहिए, क्योंकि हमें मौसम की जानकारी हर रोज मिलती है।”
यह खबर हमारी मोंगाबे-इंडिया टीम के साथ संयुक्त रूप से प्रकाशित की गई है। आप यह खबर अंग्रेजी में यहां पढ़ सकते हैं।
बैनर तस्वीर- चतरा जिले में अपने खेत की दरकी मिट्टी देखते बसंत दांगी। झारखंड में 1 जून से 14 जुलाई के बीच सामान्य से 41 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई। तस्वीर: विशाल जैन/मोंगाबे।