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मधुमक्खी के बक्सों से आदिवासी महिलाओं की जिंदगी में नई मिठास

नीलगिरि में छत्ते से शहद निकालती हुई मधुमक्खी पालक। तस्वीर: शॉन जे. स्टीफन/कीस्टोन फाउंडेशन।

नीलगिरि में छत्ते से शहद निकालती हुई मधुमक्खी पालक। तस्वीर: शॉन जे. स्टीफन/कीस्टोन फाउंडेशन।

  • केरल और तमिलनाडु में आदिवासी समुदायों की 50 महिलाओं को मधुमक्खी पालन का प्रशिक्षण दिया गया है। इससे उन्हें जंगलों से पारंपरिक तरीके से जंगली शहद इकट्ठा करने के बजाय आजीविका का बेहतर विकल्प मिला है।
  • महिलाओं का कहना है कि मधुमक्खी पालन से उनकी आर्थिक आजादी के साथ-साथ समुदाय की आत्मनिर्भरता भी बढ़ रही है।
  • एशिया की मूल मधुमक्खियों का इस्तेमाल करने से शहद के उत्पादन के अलावा कई पर्यावरणीय और कृषि संबंधी फायदे मिलते हैं।

तमिलनाडु के नीलगिरि जिले के वाझैथोट्टम गांव की रहने वाली इरुला महिला नीलावथी (37) के पास पिछले कुछ महीनों में जश्न मनाने की कई वजहें रही हैं। उनके पास नया काम है, उनकी आमदनी बढ़ी है और गांव के मरियम्मन कोविल मंदिर में सालाना उत्सव मनाने के लिए पर्याप्त पैसे हैं।

वह गर्व से कहती हैं, “मैंने अब तक लगभग छह लीटर शहद बेच लिया है। चूंकि घर पर मधुमक्खी पालन की जिम्मेदारी मेरी है, इसलिए परिवार वाले इस काम से होने वाली कमाई मुझे रखने देते हैं।” नीलावती ने अपने और बच्चों के लिए नए कपड़े खरीदने के अलावा समय के साथ इस कमाई से पत्थर के दो दोसा तवे भी खरीद लिए हैं।

नीलावथी सहित सिगुर पठार की नौ इरुला आदिवासी महिलाएं वाझैथोट्टम के छोटे-से सामुदायिक भवन में एकत्रित हुईं और उन्होंने मोंगाबे-इंडिया के साथ मधुमक्खी पालन सीखने के अपने अनुभव साझा किए। पिछले एक साल के दौरान उन्हें मधुमक्खियों के बक्सों (हाइव बॉक्स) में मधुमक्खी के छत्तों का प्रबंधन करना, मधुमक्खियों के लिए रस उपलब्ध कराने वाले फलदार पेड़ उगाना और शहद निकालना सिखाया गया। इस आजीविका ने उनके परिवारों की आमदनी में जबरदस्त बढ़ोतरी की है।

आजीविका के लिए मधुमक्खी पालन

यूनेस्को ने अप्रैल 2025 में अपने वुमेन फॉर बी प्रोजेक्ट को भारत लाने के लिए नीलगिरी स्थित गैर-लाभकारी संस्था ‘कीस्टोन फाउंडेशन’ के साथ सहयोग किया। देश में इस कार्यक्रम की पहली साइट के तौर पर नीलगिरी बायोस्फीयर रिजर्व को चुना गया और केरल व तमिलनाडु में पांच जगहों पर इसकी गतिविधियां शुरू की गईं।

केरल के निलंबूर में काम करती हुईं मधुमक्खी पालक। अप्रैल 2025 में यूनेस्को के वुमेन फॉर बी प्रोजेक्ट की शुरुआत भारत में नीलगिरी बायोस्फीयर रिजर्व में हुई। इसमें सिगुर, पिल्लूर, कुझियूर, वायनाड और निलांबूर की 50 आदिवासी महिलाओं को आजीविका के तौर पर मधुमक्खी पालन का काम सिखाया गया। तस्वीर: शॉन जे. स्टीफन/कीस्टोन फाउंडेशन।
केरल के निलंबूर में काम करती हुईं मधुमक्खी पालक। अप्रैल 2025 में यूनेस्को के वुमेन फॉर बी प्रोजेक्ट की शुरुआत भारत में नीलगिरी बायोस्फीयर रिजर्व में हुई। इसमें सिगुर, पिल्लूर, कुझियूर, वायनाड और निलांबूर की 50 आदिवासी महिलाओं को आजीविका के तौर पर मधुमक्खी पालन का काम सिखाया गया। तस्वीर: शॉन जे. स्टीफन/कीस्टोन फाउंडेशन।

तमिलनाडु के सिगुर, पिल्लूर व कुजियूर और केरल के वायनाड व नीलांबुर की 50 आदिवासी महिलाओं ने आजीविका के रूप में मधुमक्खी पालन सीखने के लिए इस कार्यक्रम में हिस्सा लिया। कीस्टोन फाउंडेशन की कार्यक्रम समन्वयक शाइनी रेहेल बताती हैं, “महिलाओं का चयन गांव के बुजुर्गों के साथ आयोजित सामुदायिक बैठकों के जरिए किया गया। जिन महिलाओं ने मधुमक्खी पालन में दिलचस्पी दिखाई, उन्होंने खुद ही इस कार्यक्रम से जुड़ने का फैसला किया।”

यूनेस्को में नेचुरल साइंसेज की प्रोग्राम असिस्टेंट मालविका जयकृष्णन बताती हैं कि अधिकतर प्रतिभागियों को मधुमक्खी पालन का पहले से कोई अनुभव नहीं था या मामूली अनुभव था। वे सृष्टि कुमार के साथ मिलकर इस प्रोजेक्ट को चलाती हैं। फोकस ग्रुप चर्चाओं और सर्वे के बाद इच्छुक महिलाओं को चुना गया और उन्हें मधुमक्खी पालन का प्रशिक्षण दिया गया।

जयकृष्णन कहती हैं, “इस प्रोग्राम की शुरुआत क्लासरूम सत्र से हुई, जिसमें मधुमक्खी पालन की बुनियादी बातें सिखाई गईं। इसके बाद व्यावहारिक प्रशिक्षण, जरूरी उपकरण और समय-समय पर मार्गदर्शन दिया गया। पहले साल के दौरान सभी प्रतिभागियों को मधुमक्खी के बक्से, सुरक्षा के लिए जरूरी उपकरण, शहद निकालने वाले उपकरण और लगातार तकनीकी सहायता भी दी गई।”

सरिता (43) के लिए शुरुआत में मधुमक्खियों को संभालना डरावना था। लेकिन प्रशिक्षण और लगातार काम करने से उनका आत्मविश्वास बढ़ा। वह कहती हैं, “मुझे कुछ बार मधुमक्खियों ने काटा, शायद इसलिए क्योंकि मुझे उन्हें ठीक से संभालना नहीं आता था। लेकिन अब मुझे उनकी आदत हो गई है।” वह अब मधुमक्खियों  के सात बक्से संभालती हैं और हर बक्सा शहद निकालने के लिए तैयार है।

कुमार कहते हैं, “जैसे-जैसे महिलाओं का आत्मविश्वास बढ़ा, शुरुआत में मधुमक्खियों को संभालने से हिचकने वाली कई महिलाएं भी अपने दम पर मधुमक्खी बक्सों का प्रबंधन करने लगी। कई प्रतिभागियों ने बताया कि खेती और चमेली के फूलों की तुड़ाई जैसे अपने पारंपरिक कामों के साथ-साथ अब मधुमक्खी पालन भी उनकी दिनचर्या का नियमित हिस्सा बन गया है।”

कार्यक्रम के तहत प्रशिक्षित मधुमक्खी पालक विजयरानी, ​​कविता, सरोजा, प्रिया और नीलावत (बाएं से दाएं)। तस्वीर - आरती मेनन।
कार्यक्रम के तहत प्रशिक्षित मधुमक्खी पालक विजयरानी, ​​कविता, सरोजा, प्रिया और नीलावत (बाएं से दाएं)। तस्वीर – आरती मेनन।
अधिकतर महिलाओं को मधुमक्खी पालन का पहले से कोई अनुभव नहीं था या मामूली अनुभव था। लेकिन क्लासरूम सत्र, व्यावहारिक प्रशिक्षण, जरूरी सामान और लगातार मार्गदर्शन मिलने के बाद उनका आत्मविश्वास बढ़ा और वे खुद से छत्तों की देखभेल करने लगीं। तस्वीर: आरती मेनन।
अधिकतर महिलाओं को मधुमक्खी पालन का पहले से कोई अनुभव नहीं था या मामूली अनुभव था। लेकिन क्लासरूम सत्र, व्यावहारिक प्रशिक्षण, जरूरी सामान और लगातार मार्गदर्शन मिलने के बाद उनका आत्मविश्वास बढ़ा और वे खुद से छत्तों की देखभेल करने लगीं। तस्वीर: आरती मेनन।

करेले की खेती में ए सेराना की भूमिका का आकलन करने वाली 2025 के एक अध्ययन से भी इसी तरह के नतीजे सामने आए। अध्ययन में पाया गया कि जिन खेतों में मधुमक्खियों ने परागण किया, वहां फसल की पैदावार में 27% से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई। शोध से यह भी पता चला कि फसल वाले इलाकों में रखे गए छत्तों से अधिक शहद मिला, जिससे खेती की उत्पादकता बढ़ाने और किसानों के लिए आमदनी का अतिरिक्त जरिया बनाने में इस प्रजाति की दोहरी अहमियत का पता चलता है।

मधुमक्खी पालन में शामिल कुछ आदिवासी महिलाओं ने देखा है कि उनके मधुमक्खी पालन केंद्रों के आस-पास के फलों के बागों में फूलों की पैदावार और फलों की उपज बेहतर हुई है। ये बातें उत्साहजनक हैं, लेकिन ये सिर्फ अलग-अलग अनुभवों पर आधारित हैं। जैव-विविधता या फसलों के परागण पर इस प्रोजेक्ट के असर का पता लगाने के लिए अभी तक कोई व्यापक अध्ययन नहीं किया गया है। रेहेल कहते हैं, “हम इस पर अध्ययन करने की योजना बना रहे हैं क्योंकि मधुमक्खी पालन का मुख्य फ़ायदा इससे मिलने वाली जैव-विविधता है।”

आर्थिक आजादी

कई महिलाओं के लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता इस कार्यक्रम की सबसे अहम उपलब्धियों में से एक रही है।

जयकृष्णन कहती हैं, “पहली बार शहद जमा करने का नतीजा बहुत उत्साहजनक रहा है। वायनाड और निलांबूर की महिलाओं को अच्छी पैदावार मिली, जबकि सिगुर की महिलाएं अपना शहद ऊंचे दामों पर बेच पाईं, क्योंकि यह मुदुमलाई इलाके से आता है।”

केरल के नीलांबुर एलिफेंट रिजर्व स्थित अप्पनकप्पु आदिवासी बस्ती की कट्टुनायका समुदाय की महिला लक्ष्मी बाबू ने हाल ही में शहद बेचकर हुई कमाई से वॉशिंग मशीन खरीदी है। उनका कहना है कि पिछले छह महीनों में उन्होंने 18 किलो से ज्यादा शहद का उत्पादन किया है।

लक्ष्मी ने फोन पर बताया, “इससे पहले मैंने सोने की बालियां खरीदी थी। मेरे पति बीमार हैं और हम शहद बेचकर उनके इलाज का खर्च उठाते हैं। सारे खर्चों के बाद भी, मैं कुछ पैसे बचा पाती हूं।”

मधुमक्खी पालन में शामिल कुछ आदिवासी महिलाओं ने देखा कि उनके मधुमक्खी पालन केंद्रों के आस-पास के फलों के बागों में फूलों का बेहतर विकास हुआ और पैदावार भी अधिक हुई। हालांकि, इस पर अभी और अध्ययन किया जाना बाकी है। तस्वीर: आरती मेनन।
मधुमक्खी पालन में शामिल कुछ आदिवासी महिलाओं ने देखा कि उनके मधुमक्खी पालन केंद्रों के आस-पास के फलों के बागों में फूलों का बेहतर विकास हुआ और पैदावार भी अधिक हुई। हालांकि, इस पर अभी और अध्ययन किया जाना बाकी है। तस्वीर: आरती मेनन।

अध्ययनों से पता चलता है कि छोटे स्तर पर मधुमक्खी पालन करने वालों के लिए एपिस सेरोना आर्थिक रूप से फायदेमंद हो सकता है। हालांकि, एपिस मेलिफेरा आमतौर पर प्रति छत्ते ज्यादा शहद देती है, लेकिन स्थानीय परिस्थितियों में एपिस सेरोना अक्सर ज़्यादा मुनाफे वाली साबित होती है, क्योंकि इसके लिए कम देखभाल, साधारण उपकरणों और कम चराई वाले इलाके की जरूरत होती है। 2023 के एक तुलनात्मक अध्ययन में यह भी पाया गया कि एपिस सेरोना मधुमक्खी के छत्ते से मिलने वाले मोम जैसे कीमती उत्पाद बनाती है और मौसम के साथ तापमान में होने वाले बदलावों को एपिस मेलिफेरा की तुलना में बेहतर तरीके से झेल सकती है।

इस प्रोग्राम ने कमाई के अलावा मुश्किल हालात का सामना करने की क्षमता बनाने में भी मदद की है। कुमार कहते हैं, “वायनाड में पहले जमीन धंसने से कई पारंपरिक मधुमक्खी पालकों के मधुमक्खी के बक्से और रोजी-रोटी बर्बाद हो गई थी, अब वहां हिस्सा लेने वालों ने बताया कि इस प्रोजेक्ट ने महिलाओं को मधुमक्खी पालन फिर से शुरू करने और अपनी कमाई दोबारा बढ़ाने का मौका दिया है।”

हालांकि, लक्ष्मी के लिए सबसे बड़ा बदलाव समुदाय की वह भावना रही है जिसे मधुमक्खी पालन ने बढ़ावा दिया है।

वह कहती हैं, “हमारी बस्ती में 12 घर हैं। मधुमक्खी पालन शुरू करने से पहले हम एक-दूसरे से बहुत कम मिलते-जुलते थे। अब हम नियमित रूप से मिलते हैं, अपने अनुभव साझा करते हैं और साझा चुनौतियों पर चर्चा करते हैं।” लक्ष्मी बताती हैं कि उन्होंने कई अन्य महिलाओं को भी मधुमक्खी पालन अपनाने के लिए प्रेरित किया है। वह कहती हैं, “मधुमक्खियों ने मेरी जिदगी में बहुत खुशियां लाई हैं। मधुमक्खियां बहुत मेहनत करती हैं और जो उनकी देखभाल करते हैं, उनका भी वे बहुत अच्छे से ख्याल रखती हैं।”


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पारंपरिक रूप से जंगलों से जंगली शहद एकत्र करने के लिए मशहूर कट्टुनायका समुदाय से आने वाली लक्ष्मी कहती हैं कि इस कार्यक्रम से जुड़ने के बाद ही उन्हें मधुमक्खियों के पारिस्थितिकी महत्व का सही अहसास हुआ।

इस कार्यक्रम की सबसे उल्लेखनीय उपलब्धियों में से एक इसकी निरंतरता रही है। जयकृष्णन कहते हैं, “परियोजना शुरू होने के बाद से अब तक एक भी प्रतिभागी ने इसे बीच में नहीं छोड़ा है।” कार्यक्रम को लेकर दिलचस्पी लगातार बढ़ रही है और क्षेत्र की अधिक महिलाएं इससे जुड़ने की इच्छा जता रही हैं। कुमार के अनुसार, फिलहाल कार्यक्रम के दूसरे चरण पर चर्चा चल रही है। लंबी अवधि का लक्ष्य यह है कि पहले नीलगिरि में इस मॉडल की सफलता को मजबूत किया जाए और उसके बाद इसे देश के अन्य बायोस्फीयर रिजर्व तक बढ़ाया जाए।


यह खबर मोंगाबे-इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर  3 जुलाई, 2026 को प्रकाशित हुई थी।


बैनर तस्वीर: नीलगिरि में छत्ते से शहद निकालती हुई मधुमक्खी पालक। तस्वीर: शॉन जे. स्टीफन/कीस्टोन फाउंडेशन।

 

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