- भारत में निर्माण कार्यों की बढ़ती मांग के कारण ईंटों की मांग भी बढ़ी है और ईंट उद्योग का विस्तार हो रहा है। कई कंपनियाँ कम कार्बन वाले विकल्पों को अपना रहे हैं।
- पारम्परिक चिमनी की जगह ज़िगज़ैग तकनीक अपनाने से कोयले का इस्तेमाल और ईंटों की बर्बादी कम होती है और पर्यावरण पर कम असर पड़ता हैं।
- लेकिन ईंट भट्टों में काम करने वाले मजदूरों के लिए मजदूरी अब भी अनिश्चित है और उनकी आमदनी तय घंटों के बजाय काम की मात्रा पर निर्भर करती है।
शहरों के तेजी से होते विस्तार, घरों की बढ़ती मांग और बड़े पैमाने पर निर्माण परियोजनाओं के कारण, भारत में निर्माण क्षेत्र की तेजी साफ़ देखी जा सकती है।
सरकार की शहरी आवास योजना के तहत, 10 वर्षों की अवधि में 1.18 करोड़ घरों को मंजूरी दी गई, 1.14 करोड़ घरों का निर्माण शुरू हुआ और 2024 तक 80 लाख से ज़्यादा घर बनकर तैयार हो गए। वहीं, ग्रामीण आवास योजना के तहत सरकार की योजना 2029 तक 2 करोड़ घर बनाने की है। देश में हर साल लाखों इमारतें बनाई जाती हैं, जो इस विकास के पैमाने और गति, दोनों को दर्शाती हैं।
निर्माण क्षेत्र जलवायु परिवर्तन में एक अहम भूमिका निभाता है। वर्ल्ड ग्रीन बिल्डिंग काउंसिल के अनुसार, दुनिया भर में ऊर्जा से जुड़े कार्बन उत्सर्जन में इमारतों और निर्माण का करीब 39% हिस्सा है, जिसमें अकेले निर्माण सामग्री और निर्माण प्रक्रिया का योगदान 11% है।
निर्माण कार्यों की बढ़ती मांग के कारण ईंटों की मांग भी बढ़ी है और ईंट उद्योग का विस्तार हो रहा है। चीन के बाद भारत दुनिया में ईंटों का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है। फिर भी, इस सेक्टर का एक बड़ा हिस्सा असंगठित, बिखरा हुआ और अनौपचारिक है। ईंट बनाने के पारंपरिक तरीकों में कोयले से चलने वाली और ऊर्जा की ज़्यादा खपत करने वाली भट्टियों का इस्तेमाल होता है। इससे मिट्टी की पकी हुई ईंटों के उत्सर्जन का स्तर बढ़ जाता है। ईंट उद्योग भारत में (कोयले से मिलने वाली) ऊर्जा का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल करने वाले उद्योगों में से एक है और यह ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन का भी एक स्रोत है। लेकिन खेती के बाद, यही उद्योग भारत में सबसे ज़्यादा लोगों को रोजगार भी देता है।
उत्तर प्रदेश के औद्योगिक शहर के बाहरी इलाकों में कई पारंपरिक ईंट-भट्टे हैं जो कई दशकों से चले आ रहे हैं और शहर में तेज़ी से हो रहे निर्माण कार्यों को बढ़ावा देते हैं। साथ ही, यहाँ कई कंपनियाँ कम कार्बन वाले विकल्पों, जैसे कि फ्लाई-ऐश ईंटें, कंप्रेस्ड स्टेबलाइज़्ड अर्थ ब्लॉक्स (सीएसईबी) और ऑटोक्लेव्ड एरेटेड कंक्रीट ब्लॉक्स (एएसी) के साथ प्रयोग कर रही हैं। ये विकल्प उत्सर्जन और संसाधनों के इस्तेमाल को कम करते हैं, लेकिन लागत, जागरूकता और बाज़ार में इनकी स्वीकार्यता जैसी वजहों से इनका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है।

कानपुर के ईंट-भट्टे
कानपुर के बाहरी इलाके रामाईपुर में खेतों में ईंट-भट्टे कतारों से दिखाई देते हैं। इनमें पुरानी पद्धति वाले स्थाई चिमनी वाले भट्टे और नए ज़िग-ज़ैग पद्धति के भट्टे शामिल हैं। रामाईपुर के भट्टे कानपुर के ज़्यादातर भट्टों जैसे ही हैं। इन्हें छोटे पैमाने पर परिवार या किसी व्यक्ति द्वारा पारंपरिक तरीकों और बहुत कम संसाधनों के साथ संचालित किया जाता है।
ईंटों को इन भट्टियों में पकाने की प्रक्रिया को ‘फायरिंग’ कहा जाता है।
पुरानी स्थाई चिमनी से ज़िगज़ैग फ़ायरिंग की ओर बढ़ना सुनने में भले ही एक तकनीकी बात लगे, लेकिन असल में यह ईंट बनाने के तरीके को बदल रहा है। पारंपरिक स्थाई चिमनी वाली भट्टियाँ सीधी हवा के बहाव पर निर्भर करती हैं, जिससे कोयला ठीक से नहीं जलता; अक्सर ईंटें असमान रूप से पकती हैं और प्रदूषण व ईंधन की बर्बादी बढ़ती है। इसके उलट, ज़िगज़ैग भट्टियाँ गर्म हवा को घुमावदार रास्ते से गुज़ारती हैं, जिससे जलने की प्रक्रिया बेहतर होती है और कोयले की खपत कम होती है।
रामाईपुर में स्थित समत ब्रिक फील्ड में, सितंबर में अगले फायरिंग सीज़न की तैयारी चल रही थी। यह सीज़न आम तौर पर नवंबर में शुरू होता है और जून तक चलता है। भट्टे के मुख्य चैंबर के पास खड़े सुपरवाइज़र अमित पॉल ने दूर दिख रही एक चिमनी की ओर इशारा करते हुए कहा, “वह अभी भी पुरानी स्थाई चिमनी है। वे जल्द ही इसे बदलने की योजना बना रहे हैं। अब सरकारी गाइडलाइंस के मुताबिक सभी चिमनियों को ज़िगज़ैग तकनीक में बदला जा रहा है।”
पॉल समत ब्रिक फील्ड में ज़िगज़ैग भट्ठे की देखरेख करते हैं। इस काम में हवा के बहाव, ईंधन डालने और लगातार निगरानी रखने पर हमेशा ध्यान देना पड़ता है। उन्होंने बताया कि मिट्टी की ईंटें बनाने का पारंपरिक तरीका ज़्यादातर हाथ से किया जाता है, लेकिन हाल ही में ज़िगज़ैग जैसी बेहतर टेक्नोलॉजी अपनाने से प्रदूषण कम करने और उत्पादन की क्षमता बढ़ाने में मदद मिली है।
“ज़िगज़ैग तरीके से हम कम कोयले का इस्तेमाल करके बेहतर क्वालिटी की ईंटें बना पाते हैं। पहले, ईंटें ठीक से न पकने की वजह से लगभग एक-तिहाई ईंटें ईंटें खराब हो जाती थीं। अब बर्बादी बहुत कम हो गई है,” पॉल ने बताया।
ज़मीनी स्तर पर, साफ़-सुथरी भट्टियों की ओर यह बदलाव तकनीकी बदलाव से ज़्यादा मजदूरों और उनकी मजदूरी को लेकर रोज़ाना की बातचीत जैसा लगता है। रामाईपुर की ज़िगज़ैग भट्टी में काम करने वाले 26 साल के मजदूर राहुल सोनकर का दिन ताज़ी पकी ईंटों को ढेर में लगाने और बाहर भेजने से पहले उन्हें धोने में गुज़रता है। यह काम एक जैसा ही होता है और उनके हाथ हमेशा लाल धूल और कीचड़ से सने रहते हैं। वह चार साल से इस भट्टी में काम कर रहे हैं। इससे पहले, वह उत्तर प्रदेश के औरैया ज़िले में अपने गाँव औधा में रहते थे, जहाँ उन्हें ठीक से कोई काम नहीं मिल पा रहा था।
सोनकर ने कहा, “मैं दिन में लगभग पाँच से छह घंटे काम करता हूँ।” उनकी कमाई पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करती है कि वे कितनी ईंटें धोते हैं। कम काम वाले दिनों में वे लगभग ₹300 कमाते हैं; और अच्छे दिनों में लगभग ₹700। उन्होंने बताया, “अगर मैं लगभग 3,000 ईंटें धोता हूँ, तो मुझे ₹600-₹700 मिलते हैं।”
ज़िगज़ैग तकनीक अपनाने से कोयले का इस्तेमाल और बर्बादी तो कम हुई है, लेकिन सोनकर जैसे मजदूरों के लिए मजदूरी अब भी अनिश्चित है और यह तय घंटों के बजाय काम की मात्रा पर निर्भर करती है। मजदूरों की हालत में कोई खास बदलाव नहीं आया है। भले ही तकनीक आधुनिक हो गई है, लेकिन काम का स्वरूप अब भी असंगठित ही है, जिसमें न तो काम की कोई निश्चितता है और न ही लंबे समय की सुरक्षा।

एक बड़ी पहल
ईंट बनाने के तरीकों में हो रहे ये छोटे-छोटे बदलाव सिर्फ़ काम की क्षमता बढ़ाने के लिए नहीं हैं; ये सरकारी नीतियों के समर्थन से भट्टियों से होने वाले प्रदूषण को कम करने की एक बड़ी पहल का हिस्सा हैं। उत्तर प्रदेश में, ‘ज़िगज़ैग भट्टियों’ को अपनाने की प्रक्रिया 2012 के ‘ईंट भट्टा स्थापना नियम‘ के बाद तेज़ी से आगे बढ़ी। इन नियमों में भट्टियों को लगाने और चलाने के लिए साफ़-सुथरे नियम तय किए गए थे, जिनमें दूरी की शर्तें, प्रदूषण के मानक और ईंधन के इस्तेमाल पर पाबंदियाँ शामिल थीं। लेकिन सबसे अहम नीतिगत बदलाव 2022 में ‘पर्यावरण (संरक्षण) नियमों‘ में किए गए संशोधन से आया, जिसके तहत साफ़-सुथरी तकनीक का इस्तेमाल अनिवार्य कर दिया गया।
कानपुर में उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी मनोज कुमार ने कहा कि यह बदलाव तेज़ी से हो रहा है। “इस इलाके में लगभग 70-80% भट्टियाँ पहले ही ज़िगज़ैग तकनीक में बदल चुकी हैं। 2012 और 2022 की गाइडलाइंस ने इस बदलाव की रफ़्तार बढ़ा दी है,” उन्होंने बताया।
लेकिन उन्होंने लागत की चुनौती का भी ज़िक्र किया। उन्होंने कहा, “पारंपरिक भट्टी को ज़िगज़ैग में बदलने में आम तौर पर ₹50 से 60 लाख का खर्च आता है। कई छोटे भट्टा मालिकों के लिए यह भट्टी को नए सिरे से बनाने जैसा है।”
राज्य प्रदूषण बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार, कानपुर नगर ज़िले में 307 ईंट-भट्टे हैं। इनमें से 264 को चलाने की मंज़ूरी तो मिल गई है, लेकिन अब तक सिर्फ़ 120 ने ही ज़िगज़ैग टेक्नोलॉजी अपनाई है; 32 भट्टों को बंद करने के आदेश दिए गए हैं और 11 को पहले ही हटाया जा चुका है, जो बदलाव की असमान रफ़्तार को दिखाता है।
आर्थिक मदद न मिलने से इस नई नीति के लक्ष्यों और ज़मीनी हकीकत के बीच अंतर पैदा होता है। हालाँकि ज़िगज़ैग भट्टों से होने वाले पर्यावरणीय फ़ायदों के बारे में काफ़ी जानकारी मौजूद है, लेकिन बदलाव का पूरा बोझ भट्टा मालिकों पर ही पड़ता है, जिनमें से कई बहुत कम मुनाफ़े पर काम करते हैं और मौसमी मजदूरों पर बहुत ज़्यादा निर्भर रहते हैं। रामाईपुर में पुरानी और नई चिमनियाँ अगल-बगल खड़ी हैं, जो यह दिखाती हैं कि बदलाव अभी चल रहा है, पूरी तरह से हुआ नहीं है।

निर्माण सामग्री में बदलाव
कानपुर में ईंट बनाने के पारंपरिक भट्टों में बदलाव तो हो ही रहा है, साथ ही एक और अहम बदलाव भी देखने को मिल रहा है: कम कार्बन वाली निर्माण सामग्री का इस्तेमाल बढ़ना। इस बदलाव में सबसे आगे रहने वाली कुछ कंपनियों में से एक है कानपुर के महाराजपुर में स्थित ‘महाना इंडस्ट्रीज़’।
महाना परिवार सात दशकों से भी ज़्यादा समय से कानपुर के निर्माण क्षेत्र का हिस्सा रहा है। उनके सफ़र की शुरुआत 1950 के दशक में हुई थी, जब परिवार मिट्टी की ईंटों का भट्टा चलाता था। बाद में उन्होंने पूरी तरह से फ़्लाई-ऐश ईंटें और सीएलसी (सेल्युलर लाइटवेट कंक्रीट) ब्लॉक बनाना शुरू कर दिया, जो मिट्टी की ईंटों का कम कार्बन वाला विकल्प हैं।
इस बिज़नेस को चलाने वाले परिवार की चौथी पीढ़ी के सदस्य माधव महाना ने मोंगाबे-इंडिया को बताया, “हमने लगभग दो साल पहले मिट्टी की ईंटें बनाना बंद कर दिया था। अब यह काम फायदे का नहीं रह गया था। महामारी (कोविड19) के दौरान हमें आसानी से कच्चा माल नहीं मिल पा रहा था। गाइडलाइंस के मुताबिक, हमें सिर्फ़ 4-5 फ़ीट तक खुदाई करने की इजाज़त थी। फिर कोयले की बात आई। कीमतें तेज़ी से बढ़ीं, लेकिन लाल ईंटों की बाज़ार में कीमत वैसी ही बनी रही। चूँकि मिट्टी की ईंटें बनाने का काम मौसम पर निर्भर करता है, इसलिए मज़दूरों, कोयले और सामान का इंतज़ाम करना हमेशा एक चुनौती होती थी।”
भारत के ईंट उद्योग में फ्लाई-ऐश ईंटें सबसे अच्छे और बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किए जा सकने वाले विकल्पों में से एक बनकर उभरी हैं। इन ईंटों को बनाने के लिए ऊपरी मिट्टी का इस्तेमाल करने के बजाय, कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्रों से निकलने वाले उपोत्पाद या बाई-प्रोडक्ट ‘फ्लाई-ऐश’ का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे औद्योगिक कचरा निर्माण सामग्री में बदल जाता है। मिट्टी की ईंटों से फ्लाई-ऐश ईंटों और सीएलसी ब्लॉक की ओर बढ़ने से काम करने वालों के ढांचे में भी बदलाव आया है। जहाँ पहले मिट्टी की ईंटें बनाने के लिए 100 से ज़्यादा मजदूरों की ज़रूरत होती थी, वहीं अब नई मशीनी प्रक्रिया, जिसमें ईंटों को मिलाने, सांचे में ढालने और पकाने के लिए मशीनों का इस्तेमाल होता है, में सिर्फ़ 10-12 मज़दूर और ऑपरेटर ही काम करते हैं।
कानपुर के सचेंडी इलाके में कम कार्बन वाला एक और विकल्प ‘ऑटोक्लेव्ड एरेटेड कंक्रीट’ (एएसी) है। एएसी एक हलकी निर्माण सामग्री है जिसे हाई-प्रेशर स्टीम में तैयार किया जाता है। इससे ऐसे ब्लॉक बनते हैं जिन्हें संभालना आसान होता है और जो पारंपरिक ईंटों की तुलना में काफी हल्के होते हैं। सचेंडी में देखी गई स्थिति से पता चलता है कि एएसी साइटें औपचारिक सुरक्षा नियमों और मशीनीकृत प्रोडक्शन लाइनों के साथ काम करती हैं, जो पारंपरिक भट्टों के अनौपचारिक और ज़्यादा मेहनत वाले काम के तरीके से बिल्कुल अलग हैं। इन ब्लॉकों को संभालना आसान होता है, ये इमारत का वज़न कम करते हैं और इंसुलेशन बेहतर बनाते हैं, जिससे इमारतों में ऊर्जा की खपत कम होती है।
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इन बदलावों के बीच, एक तीसरा विकल्प, ‘कम्प्रेस्ड स्टेबलाइज़्ड अर्थ ब्लॉक्स’ (सीएसईबी), धीरे-धीरे अपनी जगह बना रहा है। ये ब्लॉक भट्टी में नहीं पकाए जाते; इन्हें मिट्टी में थोड़ी मात्रा में सीमेंट या चूना मिलाकर मैकेनिकल प्रेस की मदद से आकार दिया जाता है, जिससे बहुत ज़्यादा तापमान पर पकाने की ज़रूरत नहीं पड़ती और ऊर्जा की बचत होती है।
कानपुर के एक स्थानीय विक्रेता रवि कुमार ने कहा, “मिट्टी की ईंटों की तुलना में सीएसईबी बनाना और उन्हें एक जगह से दूसरी जगह ले जाना ज़्यादा आसान है। इनसे ऊर्जा की बचत होती है और हम बिना कोयला जलाए एक जैसी क्वालिटी वाले ब्लॉक बना सकते हैं।”
एक निष्पक्ष बदलाव
ये बदलाव जितने तकनीक से जुड़े हैं, उतने ही लोगों से भी। महाना ने कहा, “इनोवेशन ज़रूरी है, लेकिन हमें यह भी पक्का करना होगा कि जिन लोगों ने पीढ़ियों से इस इंडस्ट्री को बनाया है, वे इन बदलावों को अपना सकें और उनसे फ़ायदा उठा सकें।”
काम करने वालों और वेंडर्स को नई चीज़ें सीखने की ज़रूरत है। रवि कुमार ने कहा, “लोग सावधानी बरत रहे हैं। वे मिट्टी की ईंटों के बारे में तो जानते हैं, लेकिन सीएसईबी या एएसी जैसे नए उत्पादों से अनजान हैं। हमें उन्हें दिखाना होगा कि ये कैसे काम करते हैं और इस प्रक्रिया के लिए उन्हें प्रशिक्षण देना होगा।”
सोनकर जैसे मजदूरों के लिए, साफ़-सुथरी भट्टियों का मतलब न तो ज़्यादा स्थिर आमदनी है और न ही ज़्यादा सुरक्षा; इससे पर्यावरण की दिशा में हुई प्रगति और मजदूरों के साथ न्याय के बीच का फ़र्क साफ़ दिखता है।
कानपुर में आए बदलाव से पता चलता है कि सिर्फ़ साफ़-सुथरी सामग्री का इस्तेमाल काफ़ी नहीं है। जब भारत अपने शहरों को बनाने के तरीक़ों पर नए सिरे से सोच रहा है, तो ईंट उद्योग में सही बदलाव के लिए उन कारोबारों और मजदूरों को भी साथ लेना ज़रूरी होगा जिनकी रोजी-रोटी लंबे समय से ईंट बनाने के काम पर टिकी है, ताकि इस नवाचार का फ़ायदा समाज के सभी लोगों को बराबर मिल सके।
(इस स्टोरी को जस्ट ट्रांज़िशन रिसर्च सेंटर (JTRC) फ़ेलोशिप, IIT कानपुर, क्लाइमेट ट्रेंड्स और अर्थ जर्नलिज़्म नेटवर्क का सहयोग मिला है।)
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 26 फरवरी, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: उत्तर प्रदेश के फ़र्रुख़ाबाद ज़िले में एक ईंट भट्टे पर मजदूर ईंटें ढोने के लिए हाथ-गाड़ियों का इस्तेमाल करते हुए। (AP फ़ोटो/राजेश कुमार सिंह)