Site icon Mongabay हिन्दी

खेतों के बीच प्राकृतिक ठिकाने बचा रहे भालू, लकड़बग्घा और काले हिरण

एक पथरीली चट्टान पर धारीदार लकड़बग्घा। तस्वीर: इंद्रजीत घोरपड़े।

एक पथरीली चट्टान पर धारीदार लकड़बग्घा। तस्वीर: इंद्रजीत घोरपड़े।

  • ऐसे इकोसिस्टम, जिनमें इंसान कभी-कभी आते-जाते रहते हैं, भी दुनिया भर में खतरे में पड़ी प्रजातियों के लिए रहने की जगह बन सकते हैं और उनके संरक्षण में मदद कर सकते हैं।
  • खेतों से घिरी चट्टानी जगहें भालू और तेंदुए जैसे बड़े जानवरों के साथ-साथ छोटे मांसाहारी जानवरों के लिए सुरक्षित ठिकाने का काम करती हैं।
  • अगर ये सुरक्षित ठिकाने खत्म हो जाते हैं और इन इलाकों का स्वरूप बदल जाता है तो इंसान और जानवरों के बीच टकराव बढ़ सकता है।

जैव-विविधता संरक्षण के क्षेत्र में एक लम्बे समय से यह अवधारणा रही है जिसमें संरक्षित क्षेत्रों के बेहतर प्रबंधन को ही संरक्षण का अच्छा तरीका माना जाता था। समय-समय पर हुए कई अध्ययनों में जैव-विविधता और प्रजातियों के संरक्षण में खुली प्राकृतिक पारिस्थितिकी प्रणालियों जैसे अलग-अलग तरह के परिदृश्यों की भूमिका की जांच की गई है। इन अध्ययनों के नतीजों ने इस पुरानी धारणा को गलत साबित कर दिया है।

उत्तरी कर्नाटका के कोप्पल ज़िले के कम बारिश और इंसानी गतिविधिओं वाले इलाके पर किया गया एक नया अध्ययन इस बात को और पुख्ता करता है। इस अध्ययन से पता चलता है कि ऐसे इकोसिस्टम, जिनमें इंसान कभी-कभी आते-जाते रहते हैं, भी दुनिया भर में खतरे में पड़ी प्रजातियों के लिए रहने की जगह बन सकते हैं और उनके संरक्षण में मदद कर सकते हैं।

शोधकर्ताओं ने तीन प्रजातियों, धारीदार लकड़बग्घा (Hyaena hyaena), स्लॉथ भालू या रीछ (Melursus ursinus) और काला हिरण (Antilope cervicapra), के फैलाव की जांच करने के लिए चरवाहों के साथ खास जानकारी देने वालों के इंटरव्यू और ‘वन-सीज़न, वन-स्पीशीज ऑक्यूपेंसी’ मॉडलिंग फ्रेमवर्क का इस्तेमाल किया। इस अध्ययन से पता चला कि लकड़बग्घा, रीछ और काले हिरण ने क्रमशः 52%, 26% और 63% इलाके में अपनी जगह बनाई हुई थी, वहीं भारतीय भेड़िया (Canis lupus pallipes) कम से कम 76% इलाके में पाया गया।

इस अध्ययन की मुख्य लेखिका इरावती मजगांवकर कहती हैं, “दक्कन प्रायद्वीप के इन इलाकों में बहुत कम संरक्षित क्षेत्र हैं, इसलिए आम लोगों की सोच और सरकारी नीतियों में इन्हें सिर्फ़ खेती वाली ज़मीन के तौर पर देखा जाता है। लेकिन हमें खेती वाले इलाकों के बीच प्राकृतिक आवासों के कुछ छोटे हिस्से मिले हैं, जिन्हें हमने अपनी रिसर्च में ‘रिफ्यूजिया’ (सुरक्षित ठिकाने) कहा है। यहाँ जंगली जानवर अक्सर आते-जाते रहते हैं। ये ऐसे इलाके हैं जिनका इस्तेमाल इंसान और जानवर दोनों करते हैं। इन्हीं सुरक्षित ठिकानों की वजह से जानवर इंसानों से जगह और समय के हिसाब से अलग रह पाते हैं।”

इस अध्ययन में “हल्ला” (hallas) को ऐसी ही एक सुरक्षित जगह बताया गया है, जहाँ इंसानी गतिविधियों के बावजूद ब्लैकबक की आबादी पनप सकती है। “हल्ला” ज़लोढ़ मिट्टी वाली धाराएँ होती हैं जो इस इलाके के जल निकासी पैटर्न का हिस्सा हैं और मॉनसून के बाद सूख जाती हैं। मजगांवकर के अनुसार, इसी तरह खेतों से घिरी चट्टानी जगहें भी भालू और तेंदुए जैसे बड़े जानवरों के साथ-साथ छोटे मांसाहारी जानवरों के लिए सुरक्षित ठिकाने का काम करती हैं।


और पढ़ेंः [वीडियो] जंगली बिल्ली ने गुरुग्राम के खेतों को बनाया अपना घर


अगर ये सुरक्षित ठिकाने खत्म हो जाते हैं और इन इलाकों का स्वरूप बदल जाता है, तो मजगांवकर इस बात से इनकार नहीं करतीं कि इंसान और जानवरों के बीच टकराव बढ़ सकता है। वह कहती हैं कि इन कई तरह से इस्तेमाल होने वाले इलाकों में संरक्षण को बढ़ावा देने वाली एक और अहम बात यह है कि ये चरवाहा समुदायों को आजीविका के मौके देते हैं। वह आगे कहती हैं, “हो सकता है कि लोगों को अपनी जगह छोड़नी पड़े या अपने पशुओं के साथ दूर तक जाना पड़े। ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने यह काम छोड़ दिया है क्योंकि अब इन इलाकों का दायरा कम हो गया है।”

यह अध्ययन उस धारणा को चुनौती देता है जिसके तहत कम बारिश वाले खुले पारिस्थितिक तंत्रों को “बंजर ज़मीन” माना जाता है। यह खेती और पशुपालन वाले इलाकों के संरक्षण की क्षमता को उजागर करता है। जैव-विविधता से भरपूर इलाकों की गलत पहचान से उनका प्रबंधन गलत तरीके से हो सकता है, जिससे इन क्षेत्रों में ज़मीन के साझा इस्तेमाल और साथ-साथ रहने की क्षमता, तथा कई प्रजातियों के अस्तित्व पर असर पड़ सकता है।

 


यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 26 फरवरी, 2026 को प्रकाशित हुई थी।


 

बैनर तस्वीर: एक पथरीली चट्टान पर धारीदार लकड़बग्घा। तस्वीर: इंद्रजीत घोरपड़े।

Exit mobile version