- भारत में कचरे से ऊर्जा (वेस्ट-टू-एनर्जी या डब्ल्यूटीई) संयंत्रों के पास रहने वाले समुदाय दुर्गंध और कालिख की शिकायत करते हैं। इसके बावजूद विरोध-प्रदर्शनों के बीच दिल्ली में नए संयंत्र का निर्माण शुरू हो गया है।
- इस बीच, अपने घरेलू बाजारों में क्षमता पूरी हो जाने की वजह से यूरोप और जापान की डब्ल्यूटीई कंपनियां भारत समेत ग्लोबल साउथ में अपना विस्तार कर रही हैं।
- जानकारों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों से मिलने वाली फंडिंग, नीतिगत बदलाव और कार्बन क्रेडिट जैसे प्रोत्साहन इस विस्तार को बढ़ावा दे रहे हैं।
जब राजपाल सैनी दिल्ली नगर निगम से सेवानिवृत्त हुए, तब उन्होंने यह नहीं सोचा था कि जीवन के इस पड़ाव पर उन्हें अपने ही पूर्व नियोक्ता के खिलाफ संघर्ष करना पड़ेगा। नगर निगम की ओर से उनके गांव के पास लगाए गए कचरा दहन (इंसिनरेशन) संयंत्र ने उनकी जिंदगी को मुश्किल बना दिया है। दिल्ली के उत्तर-पश्चिमी छोर पर बवाना के पास स्थित सन्नौठ गांव के निवासी सैनी कहते हैं, “दिल्ली से निकलने वाले पूरे कचरे का प्रसंस्करण केंद्र यहीं है. एक खत्ता (कूड़ा डालने वाली जगह), खतरनाक कचरे के निपटान की जगह, कम्पोस्टिंग संयंत्र और 28 मेगावाट का कचरे से ऊर्जा संयंत्र। इतना ही काफी नहीं था, अब हमारे ऊपर एक और डब्ल्यूटीई संयंत्र थोप दिया गया है।”
सैनी ने कहा, “दुनिया योग और ताजी हवा में सांस लेने की अहमियत समझती है। लेकिन बाहर जाने की तो बात ही छोड़ दीजिए, बदबू से बचने के लिए हमें अपने दरवाजों की दरारों को भी बंद करना पड़ता है। नियमित रूप से प्राणायम करने वाले मेरे चाचा पिछले छह सालों से लकवाग्रस्त हैं और बिस्तर पर हैं।” सैनी की कार “सांस लेने के अधिकार” की वकालत करने वाले पोस्टरों से पटी पड़ी है।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) में मामला लंबित होने और दिसंबर 2024 से स्थानीय निवासियों के विरोध-प्रदर्शनों के बावजूद मई में प्रतिदिन 3,000 टन क्षमता वाले 30 मेगावाट के नए डब्ल्यूटीई संयंत्र का निर्माण शुरू हो गया। यह संयंत्र मुनक नहर के ठीक बगल में स्थित है जो दिल्ली के लिए पेयजल का महत्वपूर्ण जरिया है। यह राजधानी का पांचवां डब्ल्यूटीई संयंत्र होगा। दिल्ली में हर रोज लगभग 12,000 टन कचरा निकलता है।

भारत में पहला डब्ल्यूटीई संयंत्र (ऐसी टेक्नोलॉजी जो कचरे को ऊर्जा या बिजली में बदलती है) 1987 में एक यूरोपीय कंपनी ने लगाया था। यह संयंत्र 20 दिनों के अंदर ही बंद कर दिया गया, क्योंकि यहां के कचरे में बिजली बनाने के लिए जरूरी ऊर्जा दहन क्षमता (कैलोरीफिक वैल्यू) नहीं थी। आज भारत में 30 संयंत्र हैं, जिनमें से आधे कचरे की गुणवत्ता और आर्थिक व्यवहार्यता जैसी समस्या के कारण काम नहीं कर रहे हैं। 2025 की एक नीतिगत रिपोर्ट के अनुसार, डब्ल्यूटीई संयंत्र देश के कुल कचरे के 6% से भी कम का निपटान कर पाए हैं और देश की कुल ऊर्जा में इनका योगदान महज 0.1% है। फिर भी, 16 और संयंत्र बन रहे हैं और 33 लगाने का प्रस्ताव है।
भारत ने 2025 में डब्ल्यूटीई को पहले से पर्यावरण मंजूरी लेने की जरूरत से छूट दे दी और उन्हें केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के इंडस्ट्री पॉल्यूशन इंडेक्स में लाल श्रेणी (ज्यादा प्रदूषण की संभावना वाली श्रेणी) से हटाकर नीली श्रेणी में डाल दिया। यह श्रेणी 2025 में उन सुविधाओं के लिए बनाई गई थी जो घरेलू और औद्योगिक गतिविधियों से होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करने, कम करने और उसे रोकने के लिए जरूरी हैं।”

यूरोप में कचरा डालने वाली जगहों (लैंडफिल) को चरणबद्ध तरीके से बंद किए जाने से डब्ल्यूटीई संयंत्रों को बढ़ावा मिला था। अब लोग इनके ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन की संभावनाओं को लेकर सचेत हो रहे हैं। यूरोपीय संघ ने डब्ल्यूटीई परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहायता में कटौती कर दी है, जबकि महाद्वीप में सबसे अधिक स्थापित डब्ल्यूटीई क्षमता वाले जर्मनी ने इन संयंत्रों पर कार्बन डाइऑक्साइड कर लगा दिया है।
इस बीच, अपने घरेलू बाजारों में पूरी क्षमता का दोहन हो जाने से यूरोप और जापान की डब्ल्यूटीई कंपनियां अब ग्लोबल साउथ के देशों में विस्तार कर रही हैं। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों से मिलने वाली फंडिंग, मुफ्त भूमि, नीतिगत बदलाव और कार्बन क्रेडिट जैसे प्रोत्साहन इस विस्तार को बढ़ावा दे रहे हैं, जबकि इन संयंत्रों से आसपास रहने वाले समुदायों को होने वाले नुकसान को लेकर गंभीर चिंताएं बनी हुई हैं।

कैसा समाधान
जहां यूरोप में कचरे को अलग-अलग किया जाता है, वहीं भारत में ज्यादातर कचरा मिला-जुला होता है और उसमें नमी की मात्रा भी अधिक होती है। ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 (और इसके पहले के संस्करणों) के अनुसार, सिर्फ रिसाइकल नहीं हो सकने वाला ऐसा कचरा, जिसकी कैलोरिफिक वैल्यू 1,500 किलोकैलोरी प्रति किलोग्राम या उससे ज्यादा हो, ऊर्जा उत्पादन के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इस कचरे को बॉयलर में डालने से पहले ज्वलनशील कचरे को सुखाकर और उसकी कतरन करके रिफ्यूज़-डिराइव्ड फ्यूल (आरडीएफ) के पेलेट और फ्लफ में बदला जाना जरूरी है।
दिल्ली स्थित गैर-लाभकारी संस्था सेंटर फॉर फाइनेंशियल अकाउंटेबिलिटी की चैतन्यन देविका कुलशेखरन कहती हैं, “जमीनी स्तर पर आरडीएफ असल में मिला-जुला कचरा ही होता है, जिसे 14 दिनों तक एक गड्ढे में सूखने के लिए छोड़ दिया जाता है।”
डब्ल्यूटीई से दो बची हुई चीजें निकलती हैं, RDF पिट से निकलने वाला लीचेट और बॉटम ऐश। बवाना में बनने वाला नया डब्ल्यूटीई संयंत्र हर दिन बनने वाले 3.5 लाख लीटर से ज्यादा लीचेट को यहीं दोबारा इस्तेमाल करने का वादा करता है। कुलशेखरन सवाल उठाती हैं, “इस बात पर शक है कि वे रोजाना इतना पानी इस्तेमाल कर पाएंगे, जबकि हर दिन नया लीचेट भी बनता रहता है।”
कुलशेखरन के अनुसार बॉटम ऐश संयंत्र में डाले गए कुल कचरे का लगभग 27 से 40 प्रतिशत होती है और इसमें खतरनाक अवशेष होते हैं, इसलिए इसका निपटान वैज्ञानिक लैंडफिल में किया जाना चाहिए। यूरोपीय संघ के नियमों के अनुसार, इस राख का निपटान करने से पहले इसे सीमेंट के साथ मिलाना अनिवार्य है। यूरोप में कचरे को कम करने, फिर से इस्तेमाल करने और रीसाइकल को बढ़ावा देने वाली गैर-लाभकारी संस्थाओं के समूह जीरो वेस्ट यूरोप की एक रिपोर्ट के अनुसार, “यूरोप के कचरा दहन संयंत्रों से हर साल 1.6 करोड़ टन तक विषैली राख और अवशेष जमीन में दफनाए जाते हैं। यह काम अक्सर ऐसे समुदायों के आस-पास किया जाता है, जिनकी इस फैसले में कोई भागीदारी नहीं होती।”
ओखला में संचालित डब्ल्यूटीई संयंत्र में इस राख के इस्तेमाल के लिए एक ईंट बनाने वाली इकाई स्थापित की जानी थी। लेकिन, संयंत्र के पास स्थित सुखदेव विहार के निवासी रंजीत देवराज कहते हैं, “आज तक एक भी ईंट नहीं बनाई गई। ईंट बनाने के लिए महीन राख की जरूरत होती है, जो पूरी तरह जलने से बनती है। लेकिन कम कैलोरिफिक वैल्यू वाले कचरे के साथ ऐसा संभव नहीं हो पाता। दूसरी ओर, दिल्ली सीमा पर स्थित ताजपुर पहाड़ी की झुग्गी बस्ती में करीब 15 फुट ऊंचा राख का ढेर देखा जा सकता है।”

सेहत पर असर
बवाना से शहर के दूसरे छोर यानी दक्षिण-पूर्वी दिल्ली में ओखला कचरा डंपिंग स्थल और तेहखंड डब्ल्यूटीई के बीच बसे वी.पी. सिंह कैंप की झुग्गी बस्ती के निवासी हर सुबह अपनी छतों पर कालिख की एक परत के साथ जागते हैं। सालों से लैंडफिल के पास रहने से प्रदूषण उनके लिए सामान्य बात हो गई है। कमलेश ने कहा, “दुर्गंध, कालिख, धुआं, दूषित पानी—अब किसी बात से कोई फर्क नहीं पड़ता। सरकार इसके बारे में कुछ करने वाली नहीं है।” कमलेश 2006 से वहां रह रहे हैं। तेहखंड डब्ल्यूटीई की स्थापना 2023 में भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी पावर फाइनेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड से लिए गए कर्ज से हुई, जिसने भारत में 13 डब्ल्यूटीई परियोजनाओं को ₹2,000 करोड़ का ऋण दिया है।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि मिले-जुले कचरे को जलाने से जीवाश्म ईंधनों को जलाने की तुलना में ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड निकलती है। इसके अलावा, इससे पार्टिकुलेट मैटर, भारी धातुएं, हाइड्रोजन क्लोराइड, डाइऑक्सिन और फ्यूरान भी उत्सर्जित होते हैं जो कैंसर, प्रजनन संबंधी नुकसान और अंतःस्रावी तंत्र में व्यवधान से जुड़े कैंसरकारी पदार्थ हैं। भारत में डब्ल्यूटीईसंयंत्रों के लिए उत्सर्जन मानक यूरोपीय संघ की तुलना में कहीं ज्यादाशिथिल हैं (पार्टिकुलेट मैटर के लिए 10 गुना ज्यादा और डाइऑक्सिन के लिए 1.7 गुना अधिक), फिर भी दिल्ली के चार WTE संयंत्रों में से तीन ने इन मानकों का उल्लंघन किया है।

डाइऑक्सिन समय के साथ शरीर और खाद्य पदार्थों में जमा होते जाते हैं। नीदरलैंड, स्पेन और स्लोवाकिया में डब्ल्यूटीई संयंत्रों के आसपास किए गए अध्ययनों में पाया गया कि संयंत्रों की ओर से उत्सर्जन सीमाओं का पालन किए जाने के बावजूद भी मुर्गी के अंडों और घास में डाइऑक्सिन की ज्यादा सांद्रता थी।
यूरोप में डब्ल्यूटीई संयंत्रों को चरणबद्ध तरीके से बंद करना
जर्मनी के गैर-लाभकारी संगठन नेचर प्रोटेक्शन एसोसिएशन (NABU) में सर्कुलर इकोनॉमी के वरिष्ठ अधिकारी माइकल येडेलहाउजर ने कहा,”डब्ल्यूटीई संयंत्र जर्मनी के कचरा प्रबंधन ढांचे का अभिन्न हिस्सा हैं। लेकिन, वहां बड़े पैमाने पर पहुंचने वाले कचरे से बचा जा सकता है या उसका फिर से इस्तेमाल अथवा रीसाइकल किया जा सकता है।”
जर्मनी में कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य कार्बन डाइऑक्साइड टैक्स प्रति टन 55-65 यूरो के बीच है जो सिर्फ कचरे के जीवाश्म-आधारित घटक (प्लास्टिक) पर लगाया जाता है। उन्होंने आगे कहा, “कार्बन मूल्य निर्धारण ज्यादा कचरे से मटीरियल को फिर से निकालने के लिए प्रोत्साहन के रूप में काम कर सकता है।
इसके विपरीत, दिल्ली का ओखला डब्ल्यूटीई संयंत्र अब भी कार्बन क्रेडिट से आय अर्जित कर रहा है। 2021 में, संयुक्त राष्ट्र ने अपनी कार्बन न्यूट्रिलिटी के लक्ष्य को पूरा करने के लिए इस कंपनी से 4,000 प्रमाणित उत्सर्जन कटौती (सीईआर) खरीदा था।

यूरोप के पास अपनी जरूरत से 6 करोड़ टन ज्यादा कचरा दहन क्षमता है, जिसके कारण संयंत्रों को चालू रखने के लिए देशों को कचरा आयात करना पड़ता है। 2024 में, जर्मनी ने दहन के लिए 10 लाख टन से ज्यादाकचरा आयात किया। जीरो वेस्ट यूरोप में जीरो पॉल्यूशन नीति प्रबंधक यानेक वाह्क ने कहा, “बहुत ज्यादा क्षमता कचरे में कमी लाने और रीसाइकल की कोशिशों को कमजोर करती है।”
लंबी-अवधि की “डिलीवर या पे” अनुबंध यूरोपीय संघ की नगरपालिकाओं को कानूनी रूप से डब्ल्यूटीओ संयंत्रों को निश्चित मात्रा में कचरा उपलब्ध कराने के लिए बाध्य करते हैं। 35-45 सालों तक चलने वाले ये अनुबंध स्थानीय निकायों को “बांध” देते हैं, जिससे वे कचरे को कम करने की दिशा में कोई कोशिश नहीं कर पाते। वाह्क ने कहा, “इटली में छह नगरपालिकाओं को डब्ल्यूटीओ संयंत्र को 50 लाख यूरो का भुगतान करना पड़ा। यूरोप के कई स्थानीय निकाय इस चक्र में फंसे हुए हैं।”
वाह्क ने बताया कि नए डब्ल्यूटीओ संयंत्रों पर रोक लगाने की लगातार वकालत के चलते यूरोपीय संघ में डब्ल्यूटीओ परियोजनाओं के लिए वित्तपोषण को चरणबद्ध तरीके से खत्म कर दिया गया। उन्होंने कहा, “यूरोपीय संघ का कोहेशन फंड जो समृद्ध यूरोपीय संघ के देशों से कम समृद्ध देशों को धन हस्तांतरित करता है, मॉडर्नाइजेशन फंड जो देशों को ऊर्जा लक्ष्यों को पूरा करने में मदद करता है और यहां तक कि सस्टेनेबल फाइनेंस टैक्सोनॉमी जो हरित और सर्कुलर प्रौद्योगिकियों का समर्थन करती है, इन सभी ने WTE को अपनी सूची से हटा दिया है। आखिरी वाला एक बड़ी जीत थी, क्योंकि यही टैक्सोनॉमी यूरोपीय संघ में सरकारों और निजी बैंकों के निवेश का मार्गदर्शन करती है।”
वित्तीय सहायता
घरेलू बाजार में पूरी क्षमता का दोहन हो जाने के कारण डब्ल्यूटीई कंपनियां अब नए बाजारों की तलाश कर रही हैं। जापान अपने लगभग 80 प्रतिशत कचरे का नियमित रूप से दहन करता है, इसलिए वहां इस क्षेत्र में विस्तार की गुंजाइश बहुत कम बची है। जापानी डब्ल्यूटीई कंपनी हिताची जोसेन ने भारत के जबलपुर, पुणे और बेंगलुरु में स्थापित चार डब्ल्यूटीई संयंत्रों को प्रौद्योगिकी उपलब्ध कराई है। वर्ष 2023 में पुणे स्थित कंपनी को जापान बैंक फॉर इंटरनेशनल कोऑपरेशन (जेबीआईसी) से 2.6 अरब जापानी येन (जेपीवाई) का कर्ज मिला, जो 2 जुलाई की विनिमय दर (1 जेपीवाई = ₹0.59) के अनुसार 1.5 अरब रुपये से अधिक है। वहीं, बेंगलुरु के डब्ल्यूटीई संयंत्र को 1.85 अरब जेपीवाई (करीब 1.09 अरब रुपये) का कर्ज मिला। कुलशेखरन कहती हैं, “यह बैंक अपने ही देश की कंपनियों के कारोबारी विस्तार को समर्थन देने के लिए कर्ज उपलब्ध करा रहा है।”
वर्ष 2016 से अब तक जर्मनी की डब्ल्यूटीई कंपनी मार्टिन जीएमबीएच को ग्लोबल उत्तर में लगभग 30 संयंत्रों के लिए उपकरण आपूर्ति के अनुबंध मिले हैं, जबकि ग्लोबल साउथ में यह संख्या 200 से अधिक रही है। भारत में कंपनी मुंबई के देवनार में प्रतिदिन 300 टन क्षमता वाले डब्ल्यूटीई संयंत्र बना रही है। इसके अलावा, वह अन्य डब्ल्यूटीई संयंत्रों को दहन, फ्ल्यू गैस शोधन (ट्रीटमेंट) और हीट रिकवरी से जुड़े उपकरण भी उपलब्ध करा रही है।

मार्टिन जीएमबीएच की चेन्नई स्थित भारतीय इकाई सीएनआईएम मार्टिन प्राइवेट लिमिटेड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) डेनिस बाउर ने मोंगाबे-इंडिया से कहा, “हमने पूरे क्षेत्र (भारत और दक्षिण एशिया) में कचरे के कैलोरिफिक वैल्यू का अध्ययन किया और यूरोपीय तकनीक की तुलना में लगभग एक-तिहाई लागत पर विभिन्न प्रकार के कचरे के लिए प्रभावी दहन तकनीक विकसित की। यह उतनी कुशल नहीं है, इसकी निगरानी भी उतनी उन्नत नहीं है। यह कुछ वैसी ही बुनियादी तकनीक है जैसी यूरोप में 15-20 साल पहले इस्तेमाल होती थी, लेकिन यह काम करती है।” बाउर ने आगे कहा, “भारत में फ्ल्यू गैस शोधन (उत्सर्जन नियंत्रण) के लिए हम जिस तकनीक का इस्तेमाल करते हैं, वह यूरोपीय मानकों के मुताबिक है। लेकिन उसे सही तरीके से लागू करना संयंत्र संचालकों की जिम्मेदारी है। अगर डाइऑक्सिन को नियंत्रित करने के लिए जरूरी सक्रिय कार्बन (एक्टिवेटेड कार्बन) को इंजेकट ही नहीं किया जाता है, तो इसके लिए तकनीक जिम्मेदार नहीं है।”
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डब्ल्यूटीई संयंत्र लगाने में शुरुआती पूंजीगत लागत बहुत अधिक होती है। इसलिए इन्हें आमतौर पर विश्व बैंक, जापान बैंक फॉर इंटरनेशनल कोऑपरेशन (जेबीआईसी) और एशियाई विकास बैंक (एडीबी) जैसे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों से आर्थिक सहायता मिलती है। इन संस्थानों में जापान सबसे बड़े शेयरधारकों में से एक है, जबकि जर्मनी यूरोप का सबसे बड़ा शेयरधारक है।
हालांकि, फरवरी 2025 में वर्ल्ड बैंक ने गुजरात में एक ही कंपनी द्वारा चलाए जा रहे चार डब्ल्यूटीई संयंत्रों में निवेश नहीं करने का फैसला किया। यह फैसला तब लिया गया जब सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कंपनी के एक संयंत्र से होने वाले प्रदूषण और सेहत पर पड़ने वाले असर को लेकर चिंता जताई।
कुलशेखरन कहती हैं, “सरकार से मिलने वाले अनेक फायदे, बिजली की बढ़ी हुई दरें, कार्बन और प्लास्टिक क्रेडिट से होने वाली आय तथा नगर निकायों से मिलने वाले कचरा प्रसंस्करण शुल्क के बावजूद भारत में डब्ल्यूटीई संयंत्र आर्थिक रूप से व्यवहार्य नहीं हैं। फिर भी वे सरकारी सब्सिडी के सहारे संचालित होते रहते हैं।”
यह खबर मोंगाबे-इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 2 जुलाई, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: दिल्ली में भलस्वा लैंडफिल में लगी आग के बीच कचरा बीनने वाला कूड़े को अलग-अलग करता हुआ। सांकेतिक तस्वीर। (AP फोटो/मनीष स्वरूप)