- हाल ही में हुई एक स्टडी में पश्चिम सिक्किम में आदिवासी समुदायों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले औषधीय पौधों के बारे में बताया गया है, जिसमें पारंपरिक इलाज को पवित्र पेड़ों और मठों के जंगलों के बचाव से जोड़ा गया है।
- इस इलाके के पवित्र पेड़ औषधीय पौधों का भंडार हैं, जो सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपराओं से बने हुए हैं।
- रिसर्च करने वालों ने स्थानीय डॉक्टरों के साथ पौधों से होने वाले इलाज रिकॉर्ड किए, हालांकि जानकारों ने चेतावनी दी है कि ऐसे तरीके ज़्यादातर सामाजिक होते हैं और उन्हें आसानी से वैज्ञानिक पैमाने पर नहीं उतारा जा सकता।
भारत के हिमालयी क्षेत्र के पवित्र उपवन औषधीय पौधों का एक विशाल भंडार हैं। सांस्कृतिक रूप से संरक्षित ये जगहें अनौपचारिक संरक्षण क्षेत्रों के तौर पर काम करती हैं और औषधीय रूप से महत्वपूर्ण प्रजातियों को बचाए रखती हैं। साथ ही, जैव-विविधता के संरक्षण में समुदाय की भागीदारी को भी मज़बूत करने में भी इनका योगदान होता है।
इन सभी महत्वपूर्ण योगदानों के बावजूद, इन उपवनों से जुड़े पारिस्थितिक आधार और ज्ञान प्रणालियों का ज़्यादातर कोई लिखित रिकॉर्ड नहीं है और इनके खत्म होने का खतरा लगातार बना हुआ है।
सिक्किम की एसआरएम यूनिवर्सिटी के वनस्पति विज्ञान के एक हालिया अध्ययन में 70 औषधीय पौधों की प्रजातियों का दस्तावेजीकरण किया गया है। इन पौधों का इस्तेमाल लेप्चा, भूटिया, नेपाली, लिंबू और तिब्बती समुदाय करीब 35 बीमारियों के इलाज के लिए करते हैं। जुलाई 2022 और जून 2024 के बीच हुए इस अध्ययन में पश्चिम सिक्किम में आदिवासी समुदायों और पारंपरिक चिकित्सकों की चिकित्सा पद्धतियों और तरीकों को रिकॉर्ड किया गया।
इस अध्ययन के मुख्य लेखकों में से एक और एसआरएम यूनिवर्सिटी में वनस्पति विज्ञान के एसोसिएट प्रोफेसर, बिस्वजीत बोस का कहना है कि डॉक्यूमेंटेशन से पता चलता है कि कैसे सांस्कृतिक रूप से संरक्षित जंगल के हिस्से जैसे कि सेक्रेड ग्रोव, गुम्पा फॉरेस्ट और मठ गुम्पा फॉरेस्ट, पश्चिम सिक्किम जिले में औषधीय पौधों की विविधता के लिए एक सामाजिक तौर पर संरक्षित इकाई के तौर पर काम करते हैं। गांव की सामुदायिक ज़मीन जो इन उपवनों को बचाती है, यह दिखाती है कि ट्रेडिशनल नॉलेज सिस्टम या पारंपरिक ज्ञान प्रणाली कैसे संरक्षित क्षेत्र के तौर पर काम करती हैं। वह आगे कहते हैं कि यह अध्ययन भविष्य में किए जाने वाले औषधीय अनुसंधान के लिए एक बेसलाइन डेटासेट भी देता है।


शोधकर्ताओं ने बुखार, गले में खराश और सर्दी-जुकाम से लेकर मलेरिया, गुर्दे के संक्रमण, ऊंचाई पर होने वाली बीमारी, दस्त, पीलिया, जोड़ों के दर्द और मधुमेह जैसी बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली स्वदेशी चिकित्सा पद्धतियों का दस्तावेजीकरण किया। इस क्षेत्र में किए गए दस्तावेज़ीकरण में स्थानीय पौधों के नाम, उनके उपयोग किए जाने वाले भाग, औषधि की तैयारी की विधियाँ, औषधीय उपयोग और संबंधित समुदाय से जुड़े विवरण दर्ज किए गए। इस अध्ययन के लिए कुल 190 पुरुषों और 28 महिलाओं सहित 218 चिकित्सकों से जानकारी एकत्र की गई। कॉर्डिसेप्स साइनेंसिस नाम के फंगस, जिसे कीड़ा जड़ी भी कहा जाता है, पारंपरिक चिकित्सा में प्रमुखता से उपयोग किया जाता था, जबकि टेट्राटेनियम नेपालेन्स और आर्टेमिसिया वल्गारिस प्रजातियों का स्थानीय ज्ञान और व्यापक उपयोग पाया गया।
इस अध्ययन से पता चलता है कि औषधीय रूप से महत्वपूर्ण प्रजातियों की जानकारी सिर्फ़ पारंपरिक चिकित्सकों, जैसे वैद्य-हकीमों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह अलग-अलग जातीय समूहों में भी व्यापक रूप से फैली हुई है। इन समूहों में बुजुर्ग, किसान और वे परिवार भी शामिल हैं जो पारंपरिक रूप से इलाज करने वाली पीढ़ियों से नहीं जुड़े हैं।
इस अध्ययन के दौरान जुटाई गई जानकारी की पुष्टि के लिए कई तरीके अपनाए गए। इसके लिए अलग-अलग गाँवों में पौधों के ताज़े नमूने दिखाए गए, गाँव के बुज़ुर्गों से मिली जानकारी पर चर्चा की गई और दूसरे वैद्य-हकीमों को पौधों की तस्वीरें दिखाकर पारंपरिक वनस्पति से जुड़ी जानकारी की दोबारा पुष्टि की गई। इन सभी तरीकों से मिली जानकारी सही है या नहीं, यह पक्का करने के लिए ग्रामीणों से कई बार बातचीत की गई और ‘वर्ल्ड फ्लोरा ऑनलाइन‘ डेटाबेस का इस्तेमाल करके पौधों के नामों की पुष्टि की गई।
इन पौधों के नमूनों को स्थाई तौर पर संग्रहित करने के लिए इनके नमूनों को दबाया गया, उन्हें सुखाया गया और हर्बेरियम शीट पर लगाया गया। पौधों की प्रजातियों की पहचान एसआरएम यूनिवर्सिटी के वनस्पति विज्ञान विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर आदित्य प्रधान ने की और एथ्नोबॉटैनिकल इंडेक्स और ‘इंटरनेशनल क्लासिफिकेशन ऑफ़ प्राइमरी केयर‘ के वैज्ञानिक तरीकों का इस्तेमाल करके उनका विश्लेषण किया।


इलाज के पारंपरिक तरीके
पश्चिम सिक्किम में, जहाँ यूनेस्को की सूची में शामिल खांगचेंदज़ोंगा नेशनल पार्क है, पारंपरिक इलाज करने वालों को उनके जातीय समूहों के आधार पर स्थानीय रूप से वैद्य, झांकरी, बिजुआ, फेडांगा, धामी, बोंगथिंग, मोन-बोंगथिंग और लामा कहा जाता है।
बोस और इस अध्ययन की सह-लेखिका रीना छेत्री युक्सोम गांव में एक बुजुर्ग वैद्य से हुई मुलाकात को याद करते हुए कहते हैं कि ये बुजुर्ग उनसे अपने पूर्वजों के बनाए हुए बगीचे में मिले तो जो एक “जीवंत फार्मेसी” की तरह है। बोस बताते हैं, “उन्होंने टेट्राटेनियम नेपालेंस (Tetrataenium nepalense) के बीज तोड़े और बताया कि इनका इस्तेमाल ऊंचाई पर होने वाली बीमारी (altitude sickness) के इलाज में कैसे किया जाता है। यह नुस्खा उन्होंने 12 साल की उम्र में सीखा था।”
इस अध्ययन में 50-59 साल की उम्र के 76 पारंपरिक वैद्य पाए गए, जबकि 20-29 साल की उम्र के केवल छह वैद्य ही मिले। इससे पता चलता है कि पारंपरिक चिकित्सा के क्षेत्र में आने वाले युवाओं की संख्या में कमी आ रही है।
पॉलिटिकल इकोलॉजिस्ट और जिओग्राफर अमितांशु आचार्य, जो नीदरलैंड के आईएचई डेल्फ़्ट इंस्टीट्यूट फ़ॉर वॉटर एजुकेशन में ‘वॉटर एंड सोसाइटी’ के सीनियर लेक्चरर हैं और जिन्होंने सिक्किम में नेपाली पवित्र उपवनों (sacred groves) पर रिसर्च की है, कहते हैं कि पवित्र उपवन सिर्फ़ कार्बन सोखने या संरक्षण वाली जगहें नहीं हैं, बल्कि उनका अस्तित्व कई तरह का होता है।
वे कहते हैं, “स्थानीय समुदायों में पवित्र उपवनों के अलग-अलग रूप और मायने होते हैं।” वे आगे कहते हैं, “इनसे होने वाला इलाज जितना औषधीय है, उतना ही सामाजिक भी है।”
उनके अनुसार, पारंपरिक वनस्पति विज्ञान अनुसंधान में पारंपरिक उपचार पद्धतियों को वैश्विक, यूरोपीय-केंद्रित मानकों के अंतर्गत रखा जाता है। उनका कहना है कि उपचार में काम आने वाले पवित्र उपवनों के सामाजिक-सांस्कृतिक पहलुओं और पारिस्थितिक विशेषताओं का मिटते जाना एक बड़ी समस्या है।
“ऐसे अध्ययनों में लोग दिखाई नहीं देते, जिसमें पौधों, जड़ी-बूटियों, जड़ों और अलग-अलग बीमारियों के इलाज में उनके इस्तेमाल की सिर्फ एक सूची होती है,” उन्होंने आगे कहा। अक्सर, स्वदेशी हीलर कम्युनिटी के सदस्यों को पीयर-रिव्यूड जर्नल्स के बारे में पता नहीं होता है और वे इस बात का अंदाज़ा नहीं लगा सकते कि इस तरह के दस्तावेजीकरण से उस ज्ञान पर क्या असर पड़ सकता है जो अक्सर पीढ़ी-दर-पीढ़ी जुबानी तौर पर दिया जाता है।
“किसी खास समुदाय द्वारा किसी खास बीमारी या रोग के इलाज के लिए जड़ी-बूटियों को दवा के तौर पर लिस्ट करने के खतरे बहुत ज़्यादा हैं,” आचार्य ने बताया, और यह भी कहा कि इससे दवा कंपनियों को स्वदेशी ज्ञान के इस्तेमाल और पवित्र उपवनों को कमोडिटी बनाने का आसान रास्ता मिल सकता है।

उनका कहना है कि एथनोबोटैनिकल रिसर्च के बारे में मुख्य चिंता पारंपरिक ज्ञान सिस्टम को वैश्विक फ्रेमवर्क में मिलाना नहीं होनी चाहिए। इसके बजाय, स्थानीय समुदायों से सीधे जुड़ने और यह पूछने की ज़रूरत है कि वैज्ञानिक संस्थान चिकित्सकों और पवित्र उपवनों के फ़ायदे के लिए उनकी मौखिक परंपराओं की सुरक्षा और संरक्षण में कैसे मदद कर सकते हैं।
जवाब में, बोस कहते हैं कि लिस्ट बनाने का मकसद स्थानीय ज्ञान को बचाना था, क्योंकि बहुत से युवा पारंपरिक दवा की प्रैक्टिस से दूर जा रहे हैं। वे कहते हैं, “हाल ही में, हमें पता चला कि एक बुज़ुर्ग हीलर गुज़र गए, लेकिन हम अब भी उनकी रिकॉर्ड की हुई आवाज़ें और फ़ोटो रखते हैं, और उनके ज्ञान को संभालकर रखना हमारी रिसर्च का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।” वे आगे कहते हैं कि रिकॉर्डिंग और नोट्स उन्हें याद दिलाते हैं कि अगर देसी ज्ञान को रिकॉर्ड और सम्मान न दिया जाए तो वह कितनी जल्दी गायब हो सकता है। वे आगे कहते हैं, “उनकी आवाज़ें और कहानियाँ सिर्फ़ इसी डॉक्यूमेंटेशन के ज़रिए ज़िंदा रहती हैं।”
आचार्य बताते हैं कि हर समुदाय के इलाज के अपने अलग तरीके होते हैं, जिसमें अक्सर मंत्रोच्चार और प्रार्थना शामिल होती है। वे कहते हैं, “पारंपरिक हीलर इलाज करवाने वाले व्यक्ति को शायद ही कभी मरीज़ के तौर पर देखते हैं, बल्कि ऐसे व्यक्ति के तौर पर देखते हैं जिसका बैलेंस या ऑर्डर बिगड़ गया हो।” “इलाज सिर्फ़ दवा देना नहीं है; इलाज के रीति-रिवाज़ और देखभाल के तरीके होते हैं जो सोशल, साइकोलॉजिकल और इमोशनल होते हैं।”
पूर्वोत्तर भारत की कई आदिवासी संस्कृतियों में, पारंपरिक इलाज को भगवान का तोहफ़ा माना जाता है। मोंगाबे इंडिया ने जिन हीलर्स से बात की, वे एक पैटर्न दिखाते हैं: हर हीलर हर बीमारी का इलाज नहीं करता; बल्कि, हर कोई आमतौर पर कुछ खास बीमारियों में माहिर होता है, और जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल उपलब्धता और नतीजे के आधार पर बहुत अलग-अलग होता है। कुछ हीलर्स पीलिया, त्वचा की बीमारियों और आंखों की सूजन के इलाज के लिए जाने जाते हैं, जबकि दूसरे हड्डी और जोड़ों से जुड़ी समस्याओं, फ्रैक्चर, अस्थमा, और दिल, किडनी और लिवर को प्रभावित करने वाली बीमारियों के जानकार होते हैं।
बोस का कहना है कि सिक्किम सरकार सामाजिक सेवा भत्ता स्कीम के तहत हीलर को वित्तीय मदद और पहचान देती है, जिसके तहत रजिस्टर्ड हीलर को मासिक पेंशन मिलती है। सिक्किम के गांवों समेत पूर्वोत्तर भारत के स्थानीय लोगों के बारे में बात करते हुए, जो मॉडर्न मेडिसिन के होने के बावजूद देसी इलाज पर ज़्यादा भरोसा कर रहे हैं, आचार्य का सुझाव है कि आयुष मंत्रालय जैसी केंद्र सरकार की संस्थाओं को जगह-जगह पर होने वाले इस इलाज की परंपराओं के लिए एक बारीक नज़रिया अपनाना चाहिए।
जैसे-जैसे संरक्षण और एथनोबॉटनी सर्कल में पारंपरिक औषधियों में दिलचस्पी बढ़ रही है, पारम्परिक ज्ञान पद्धतियों के मालिकाना हक, सहमति और समुदाय को होने वाले फायदे से जुड़े सवालों पर बेहतर स्पष्टीकरण की ज़रूरत है। आचार्य जैव विविधता से भर इलाकों, जहाँ आदिवासी आबादी ज़्यादा है, में फेथ हीलर को पहचान, वित्तीय मदद और इज्ज़त देने के लिए उन इलाकों में राज्य सरकारों के साथ मिलकर काम करने की सलाह देते हैं।
यह खबर मोंगाबे-इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 3 मार्च, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: सिक्किम में एक पवित्र उपवन। तस्वीर – अमिताभ गुप्ता द्वारा विकिमीडिया कॉमन्स (CC BY 4.0) के माध्यम से।