- भारत तेज़ी से 20% इथेनॉल वाले E20 को डिफ़ॉल्ट पेट्रोल ब्लेंड के तौर इस्तेमाल कर रहा है, और ज़्यादा इथेनॉल वाले ब्लेंड पर भी विचार कर रहा है।
- ब्राज़ील को अक्सर भारत की इथेनॉल योजना के लिए एक मॉडल माना जाता है, लेकिन इसका इथेनॉल सिस्टम दशकों में फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियों, कंज्यूमर की पसंद, बड़े पैमाने पर टेस्टिंग और अनुकूल इंफ्रास्ट्रक्चर के ज़रिए विकसित हुआ है।
- जानकारों का कहना है कि भारत का इथेनॉल ट्रांज़िशन आखिरकार सिर्फ़ ब्लेंडिंग टारगेट पर ही नहीं, बल्कि ईंधन की क्वालिटी, गाड़ी की तैयारी, कंज्यूमर के भरोसे से जुड़े सवालों पर भी निर्भर करेगा।
यह रिपोर्ट भारत और ब्राज़ील के इथेनॉल ट्रांज़िशन की तुलना करने वाली सीरीज़ का पहला हिस्सा है। ब्राज़ील दशकों से इथेनॉल पर चल रहा है, जहाँ वाहन चालाक पेट्रोल स्टेशनों पर पेट्रोल में इथेनॉल के अलग-अलग ब्लेंड में से चुनते हैं। भारत डिफ़ॉल्ट ईंधन ब्लेंड के तौर पर E20 की ओर बढ़ रहा है, जहाँ उपभोक्ताओं के पास बहुत कम विकल्प हैं। यह रिपोर्ट इस बात की पड़ताल करती है कि दोनों देशों में गाड़ी मालिकों के लिए इस अंतर का क्या मतलब है।
उत्तरी ब्राजील के बेलेम शहर में ‘पोस्तो डलास’ नाम के एक पेट्रोल स्टेशन पर एक कार आती है। कार का ड्राइवर स्टेशन पर लगे रेट कार्ड को देखता है और फिर उसके हिसाब से अपने ईंधन का चुनाव करता है। इस स्टेशन पर काम करने वाले 27 साल के जॉन के लिए यह रोज़ का नज़ारा है। “यहाँ ज़्यादातर फ़्लेक्स-फ़्यूल वाली गाड़ियाँ आती हैं। लोग कीमत देखते हैं और उसी हिसाब से ईंधन भरने के लिए कहते हैं,” जॉन ने बताया।
पोस्तो डलास स्टेशन ब्राजील की सरकारी कंपनी पेट्रोब्रास द्वारा संचालित किए जाते हैं। ब्राजील में, ग्राहक कीमत और इस्तेमाल के आधार पर इथेनॉल के अलग-अलग प्रतिशत वाले मिश्रण या शुद्ध पेट्रोल में से अपना ईंधन चुन सकते हैं। यहाँ बिकने वाली ज़्यादातर कारें फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियाँ होती हैं, जिन्हें पेट्रोल और इथेनॉल के अलग-अलग मिश्रणों पर चलने के लिए बनाया गया है। ब्राज़ील में यह विकल्प कई दशकों से उपलब्ध है।
वहीं, दुनिया के दूसरे हिस्से में, लगभग 15,000 किलोमीटर दूर, भोपाल के कटारा हिल्स में एक पेट्रोल पंप पर भी नज़ारा कुछ ऐसा ही दिखता है। गाड़ियाँ आती-जाती हैं, ग्राहक जल्दी-जल्दी फ़ैसले लेते हैं और पंप पर काम करने वाले लोग पेट्रोल भरते हैं। लेकिन इस स्टेशन पर एक चीज़ अलग है: यहाँ उपलब्ध विकल्प। भारत में, सरकार ने अपने इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम के तहत सभी स्टेशनों पर 20% इथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल (जिसे E20 कहा जाता है) को मानक या डिफ़ॉल्ट ईंधन बना दिया है।
रियो डी जनेरियो में रहने वाले निकोला पैम्प्लोना पेशे से पत्रकार हैं और अपनी गाडी के लिए पेट्रोल और इथेनॉल के बीच चुनाव करना उनके लिए रोज़ की बात है। ज़्यादातर ब्राज़ीलियाई लोग एक आसान नियम का पालन करते हैं। पैम्प्लोना ने कहा, “ब्राज़ील के ड्राइवर जानते हैं कि इथेनॉल का इस्तेमाल तब फ़ायदेमंद होता है जब उसकी कीमत पेट्रोल की कीमत से 70% कम हो।”
हालाँकि, पैम्प्लोना के उलट, भोपाल में प्रियंका वर्मा को यह विकल्प नहीं मिलता। भोपाल आने से पहले वर्मा की कार दिल्ली के तंग ट्रैफ़िक में लगभग 15 किलोमीटर प्रति लीटर का माइलेज देती थी। लेकिन अब, भोपाल में कम ट्रैफ़िक होने के बावजूद उनकी कार का माइलेज लगभग 11.5 किलोमीटर प्रति लीटर रह गया है, जो लगभग 23% की कमी है। वे इस कमी के लिए E20 पेट्रोल को ज़िम्मेदार मानती हैं।
इस दौरान पैम्प्लोना इथेनॉल को चुनते हैं, जबकि वर्मा इसका इस्तेमाल करने के लिए मजबूर हैं। भारत और ब्राजील की तुलना में यही मुख्य अंतर है। ब्राजील ने उन गाड़ियों को धीरे-धीरे हटाने के लिए काफ़ी समय दिया जो इसके अनुकूल नहीं थीं, अपना सिस्टम फ्लेक्स-फ़्यूल गाड़ियों के हिसाब से बनाया और ग्राहकों को कीमत के आधार पर अपना ईंधन चुनने की आज़ादी दी। भारत का तरीका अलग है; यहाँ E20 डिफ़ॉल्ट पेट्रोल बन रहा है, जबकि फ्लेक्स-फ़्यूल गाड़ियाँ अभी भी बहुत कम हैं। पेट्रोल पंप पर अलग-अलग तरह के ईंधन चुनने का विकल्प भी लगभग न के बराबर है।
भारत में इथेनॉल पर चल रही बहस में ब्राज़ील बहुत मायने रखता है क्योंकि भारत ने ब्लेंडिंग को बढ़ाते समय अक्सर ब्राज़ील के लंबे इथेनॉल अनुभव से प्रेरणा ली है। भारत के इथेनॉल रोडमैप में इथेनॉल और फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियों के साथ ब्राज़ील के अनुभव का ज़िक्र किया गया है। दोनों देशों ने बायोएनर्जी सहयोग पर भी चर्चा की है, जिसमें इथेनॉल, हायर ब्लेंड और फ्लेक्स-फ्यूल टेक्नोलॉजी शामिल हैं। ब्राज़ील के इथेनॉल प्रतिनिधियों ने भारत सरकार और ऑटोमोबाइल-सेक्टर के साथ बातचीत की है। फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियों के बारे में भारत की चर्चा ब्राज़ील के रास्ते के कुछ हिस्सों को दिखाती है, जहाँ इथेनॉल को ब्लेंडिंग से फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियों में सीधे इस्तेमाल के लिए ले जाया गया।
लेकिन, भारत और ब्राज़ील के इथेनॉल अपनाने की प्रक्रिया की तुलना से भी दोनों देशों के दृष्टिकोण में फ़र्क पता चलता है। ब्राज़ील ने गाड़ियों के ट्रांजिशन, कड़ी टेस्टिंग, कीमतों में अंतर, लॉजिस्टिक्स और ग्राहकों के भरोसे से दशकों में अपना इथेनॉल सिस्टम बनाया है। वहीं, कम इथेनॉल ब्लेंडिंग से E20 की ओर भारत तेज़ी से आगे बढ़ा है।

E20 से पहले भारत में हुई टेस्टिंग
भारत के इथेनॉल ट्रांजिशन का अपना टेस्टिंग इतिहास है, हालांकि इस टेस्टिंग से जुडी कई जानकारियां ब्राज़ील के लंबे इथेनॉल रिकॉर्ड की तरह सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध नहीं हैं।
साल 2021 में, नीति आयोग ने इथेनॉल के लिए एक रोडमैप तैयार किया। इस रोडमैप को पेट्रोलियम और सड़क परिवहन मंत्रालय, ऑयल मार्केटिंग कंपनियों और ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया (एआरएआई) के प्रतिनिधियों वाली एक एक्सपर्ट कमिटी ने सिर्फ़ 75 दिनों में तैयार किया था
भारत की इथेनॉल यात्रा 2001 में पायलट प्रोजेक्ट्स और 2003 से कुछ चुनिंदा राज्यों में 5% इथेनॉल-ब्लेंडेड पेट्रोल की बिक्री के साथ शुरू हुई थी। साल 2019-20 तक औसत ब्लेंडिंग लगभग 5% ही रही, इसके बाद सरकार ने ब्लेंडिंग के लक्ष्य को E10 से बढ़ाकर E20 कर दिया और E20 की डेडलाइन को साल 2030 से कम करके 2025-26 कर दिया।
इस रोडमैप में गाड़ी की संगतता या कम्पैटिबिलिटी को भी बदलाव का हिस्सा माना गया, और कहा गया कि गाडी निर्माताओं को यह बताना और दिखाना चाहिए कि क्या गाड़ियां E20, E85 या E100 जैसे ईंधन का इस्तेमाल कर सकती हैं। इसमें इथेनॉल-ब्लेंडेड ईंधन में कलपुर्जों की कम्पैटिबिलिटी और उनमें जंग लगने के खतरों को दूर करने की ज़रूरत पर भी ध्यान दिया गया है।
एआरएआई और सोसाइटी ऑफ़ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (एसएआईएम) ने पुराने और नए दुपहिया और चारपहिया वाहनों पर E20 टेस्टिंग का ज़िक्र सार्वजनिक तौर पर किया है, जिसमें उत्सर्जन, माइलेज, ड्यूरेबिलिटी और मटेरियल की कम्पैटिबिलिटी की जांच शामिल है। एसएआईएम के मुताबिक, भारत का E20 अपनाना एक “सोचा समझा और मानकों पर आधारित सफ़र” था, जबकि एआरएआई ने कहा है कि अध्ययनों में गाड़ियों का प्रदर्शन, माइलेज, ड्यूरेबिलिटी, लंबे समय तक इस्तेमाल, तेज़ी से उम्र बढ़ना और मटीरियल कम्पैटिबिलिटी शामिल थी।
मोंगाबे-इंडिया को सरकारी रिपॉजिटरी में गाड़ियों के हिसाब से जानकारी नहीं मिली।
सरकार ने माना है कि E20 कुछ गाड़ियों में माइलेज में थोड़ी कमी ला सकता है। मार्च 2025 में संसद में दिए गए एक जवाब में, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने कहा कि E20 की वजह से E10 के लिए डिज़ाइन किए गए और E20 के लिए कैलिब्रेट किए गए चार पहिया वाहनों की माइलेज में थोड़ी कमी आती है। जवाब में यह भी कहा गया कि एसएआईएम ने कमिटी को बताया था कि हार्डवेयर में बदलाव और इंजन ट्यूनिंग से यह नुकसान कम हो सकता है, और E20 रोडमैप में गाड़ी की परफॉर्मेंस, इंजन के घिसने या इंजन ऑयल के खराब होने में कोई बड़ी दिक्कत नहीं मिली।
एसएआईएम ने कहा है कि माइलेज में भारी कमी की चिंता गलत है, क्योंकि माइलेज ईंधन के प्रकार के अलावा कई और बातों पर भी निर्भर करता है।

ब्राज़ील का लंबा सफ़र
ब्राज़ील के बायोएनर्जी एक्सपर्ट और ब्राज़ील की नेशनल एजेंसी ऑफ़ पेट्रोलियम, नेचुरल गैस एंड बायोफ्यूल्स, या एएनपी, के पूर्व टेक्निकल डायरेक्टर, लुइज़ ऑगस्टो होर्टा नोगीरा ने मोंगाबे-इंडिया को बताया कि ब्राज़ील के लंबे सफ़र की तुलना में भारत का इथेनॉल ट्रांजिशन काफी तेज़ लगता है।
उन्होंने कहा, “हमें ऐसा करने में लगभग एक सदी लग गई और भारत ने इसे पाँच साल में कर दिखाया है।”
ब्राज़ील ने 1931 में पेट्रोल में इथेनॉल मिलाना अनिवार्य कर दिया था, लेकिन ब्राज़ील की चीनी से जुडी अर्थव्यवस्था में इथेनॉल की जड़ें देश के कृषि और औद्योगिक इतिहास में और भी गहराई तक जाती हैं। ब्राज़ील में बड़ा राजनीतिक बदलाव 1970 के दशक में तेल की आपूर्ति में आई कठिनाइयों के बाद आया, जब ब्राज़ील ने घरेलू इथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा देने और ईंधन आयात पर निर्भरता कम करने के लिए अपना नेशनल अल्कोहल प्रोग्राम, प्रोआल्कूल, लॉन्च किया।
ब्राज़ील की नेशनल यूनियन ऑफ़ फ्यूल एंड लुब्रिकेंट डिस्ट्रीब्यूशन कंपनीज़, सिंडिकॉम, ने देश के अनुभव को टेक्नोलॉजी, लॉजिस्टिक्स, रेगुलेशन और टैक्सेशन के मामले में “पांच दशकों की जमा हुई सीख से भी आगे” बताया। उस सीख में नाकामियां भी शामिल थीं। शुरुआती दौर में, कार खरीदने वालों को पेट्रोल और इथेनॉल से चलने वाली गाड़ी में से चुनना पड़ता था।
निकोला पैम्प्लोना ने लगभग तीन दशकों तक ब्राज़ील में इथेनॉल के बदलाव को एक पत्रकार और गाड़ी मालिक, दोनों के तौर पर देखा है। उन्होंने कहा कि शुरुआती समय में, पेट्रोल और इथेनॉल से चलने वाली कार में से चुनना आसान नहीं था।
उन्होंने कहा कि फ्लेक्स-फ्यूल टेक्नोलॉजी ब्राज़ील की इथेनॉल कहानी में एक अहम मोड थी। उन्होंने कहा, “फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियों का आना इंडस्ट्री की सफलता के पीछे मुख्य वजह थी।” “ड्राइवरों को कीमत या पर्यावरण के हिसाब से चुनने की आज़ादी मिली।”
इस आज़ादी ने ब्राज़ील के ड्राइवरों के इथेनॉल से जुड़ने का तरीका बदल दिया। वे गन्ने की कटाई के मौसम में इथेनॉल इस्तेमाल कर सकते थे, जब यह सस्ता होता है, और ऑफ़-सीज़न में या लंबी यात्राओं के लिए पेट्रोल पर शिफ्ट हो सकते थे।
लेकिन पैम्प्लोना ने कहा कि उनकी खुद की पसंद सिर्फ़ पैसे के हिसाब से नहीं है। उन्होंने कहा, “एक ड्राइवर के तौर पर, मैंने हमेशा पर्यावरण की वजहों से पेट्रोल के बजाय इथेनॉल को प्राथमिकता दी है। कम प्रदुषण फ़ैलाने के बदले में मुझे थोड़ा ज़्यादा पैसे देने में कोई दिक्कत नहीं है।”
इसकी तुलना में, भारत का कदम बहुत तेज़ रहा है। भारत सरकार के आंकड़ों से पता चलता है कि 2014 में पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग 1.53% थी। भारत तय समय से पांच महीने पहले, 2022 में 10% ब्लेंडिंग तक पहुंच गया। सरकारी क्षेत्र की ऑयल मार्केटिंग कंपनियों ने 6 फरवरी, 2023 से E20 पेट्रोल बेचना शुरू कर दिया था। इस रफ्तार को बढ़ी हुई इथेनॉल आपूर्ति से भी सपोर्ट मिला है। पेट्रोलियम मंत्रालय ने कहा कि 2022 में संशोधित बायोफ्यूल्स पर नेशनल पॉलिसी ने 20% ब्लेंडिंग टारगेट को 2030 से कम करके इथेनॉल सप्लाई ईयर 2025-26 कर दिया, साथ ही उत्पादन और इंफ्रास्ट्रक्चर को भी बढ़ाया।
सरकार ने कहा कि E20 का टारगेट मौजूदा इथेनॉल सप्लाई ईयर (2025-26) में ही हासिल कर लिया गया है। इथेनॉल सप्लाई ईयर नवंबर से अक्टूबर की अवधि है और जिसका इस्तेमाल इथेनॉल सप्लाई और ब्लेंडिंग को ट्रैक करने के लिए किया जाता है।

ईंधन और गाड़ियों के बीच की गायब कड़ी
होर्टा ने कहा कि इथेनॉल पॉलिसी में ग्राहकों के भरोसे को जगह देनी होगी। उन्होंने कहा, “ग्राहकों का भरोसा सच में एक ऐसा मुद्दा है जिससे गंभीरता से निपटना होगा।” भारत की तरह, ब्राजील को भी इथेनॉल को लेकर शक और भ्रांतियों का जवाब देना था। उन्होंने कहा, “स्पष्टीकरण और जानकारी देने के लिए एक लगातार लड़ाई चल रही है।”
ब्राज़ील के गन्ना और बायोएनर्जी इंडस्ट्री एसोसिएशन (युनिका) ने भारत में इथेनॉल पर चर्चा के दौरान सरकार और ऑटोमोटिव-सेक्टर के प्रतिनिधियों के साथ मीटिंग में हिस्सा लिया था।
युनिका के मुखिया, इवांड्रो हेरेरा गस्सि, जिन्होंने भारत में इथेनॉल की मीटिंग में हिस्सा लिया था, ने मोंगाबे-इंडिया से बात की और कहा कि इथेनॉल ब्लेंड को लेकर डर कोई नई बात नहीं है। उन्होंने कहा कि इथेनॉल को अक्सर उन समस्याओं के लिए भी ज़िम्मेदार ठहराया जाता है जो गाड़ी की उम्र या खराब मेंटेनेंस से आ सकती हैं। उन्होंने कहा, “इथेनॉल के बारे में सच यह है कि यह इंजन के लिए बेहतर है। यह कारों के लिए बेहतर है।”
होर्टा ने अपने मैकेनिकल इंजीनियरिंग के अनुभव के आधार पर बात करते हुए इथेनॉल की तकनीकी खूबियों का भी बचाव किया और यह भी माना कि इथेनॉल में प्रति लीटर ऊर्जा की मात्रा कम होती है। उन्होंने कहा, “मैं एक मैकेनिकल इंजीनियर हूं, मेरी राय में, कई मामलों में, इथेनॉल पेट्रोल की तुलना में बेहतर गुणवत्ता वाला ईंधन है।”
ब्राज़ील की इथेनॉल यात्रा पर प्रकाशित एक किताब, ‘बायोएथेनॉल: फास्ट ट्रैक टू मोबिलिटी डीकार्बोनाइजेशन, कोऑर्डिनेटेड’, इस बात पर ज़ोर देती है कि ज़्यादा इथेनॉल वाले ईंधन के लिए गाड़ी और उसके फ्यूल-सिस्टम को अडैप्ट करने की ज़रूरत क्यों है। इथेनॉल में पेट्रोल से अलग एनर्जी कंटेंट, वोलैटिलिटी और पानी के प्रति लगाव होता है, और E85 जैसे ज़्यादा इथेनॉल वाले ईंधन पर आमतौर पर इंजन कैलिब्रेशन, मटीरियल कम्पैटिबिलिटी और कोल्ड-स्टार्ट परफॉर्मेंस के साथ चर्चा की जाती है।
यह फ़र्क भारतीय उपभोक्ताओं के लिए मायने रखता है। ज़्यादा इथेनॉल ब्लेंड के तकनीकी फ़ायदे हो सकते हैं, लेकिन अगर ड्राइवरों को ईंधन की कीमत में फायदा मिले बिना कम माइलेज मिलता है, तो यह बदलाव भरोसे का मुद्दा बन जाता है। ऐसे मार्केट में जहाँ E20 डिफ़ॉल्ट बन रहा है, ग्राहकों को गाड़ी की कम्पैटिबिलिटी और वारंटी पर भी स्पष्ट जानकारी की ज़रूरत है।
होर्टा और गस्सि दोनों ने जो बड़ा सबक बताया, वह यह है कि ज़्यादा ब्लेंड पर भरोसा बनने से पहले टेस्टिंग की ज़रूरत होती है। गस्सि ने कहा, “बहुत सारे टेस्ट।” “E20, E27, E30, E35, किसी भी टारगेट के लिए, बिना टेस्ट के कुछ नहीं।”
ब्राजीलियन डेवलपमेंट बैंक और सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज एंड मैनेजमेंट द्वारा संयुक्त रूप से प्रकाशित इस किताब में यह भी बताया गया है कि कैसे ब्राजील में हायर-ब्लेंड के निर्णयों को संस्थागत परीक्षण द्वारा समर्थित किया गया था। E27 को शुरू करने में सरकार, पेट्रोब्रास, वाहन निर्माता और मोटरसाइकिल-उद्योग की भागीदारी शामिल थी।
ब्राजील के वर्तमान मानक पेट्रोल या डिफ़ॉल्ट पेट्रोल में 30% इथेनॉल और 70% पेट्रोल होता है। तकनीकी परीक्षणों से इसकी व्यवहार्यता सामने आने के बाद ही इस मिश्रण की घोषणा की गई थी। सरकार ने यह भी कहा कि परीक्षणों की निगरानी कई ऑटोमोटिव सेक्टर के संगठनों द्वारा की गई थी, जिन्होंने E30 को दो और चार पहिया वाहनों के बेड़े के लिए सुरक्षित घोषित किया था। ब्राजील ने उपभोक्ताओं का विश्वास बनाने के लिए इन परीक्षण रिपोर्टों को सार्वजनिक भी किया।
जुलाई 2026 में, ब्राज़ील की नेशनल एनर्जी पॉलिसी काउंसिल ने भी ईंधन की कीमतों के दबाव और गैसोलीन (पेट्रोल) के इंपोर्ट को कम करने की ज़रूरत का हवाला देते हुए, 180 दिनों के लिए E30 से E32 तक अस्थाई बढ़ोतरी को मंज़ूरी दी।
E30 पेट्रोल के अलावा, ब्राज़ील के पास अपने फ्लेक्स-फ्यूल बेड़े के लिए एक अलग इथेनॉल पंप है। सिंडिकॉम ने बताया कि ब्राज़ील में कुल गाड़ियों में फ्लेक्स-फ्यूल वाली गाड़ियों का हिस्सा लगभग 75% है और कहा कि प्रोएलकूल ने फ्लेक्स-फ्यूल इंजन में रिसर्च और डेवलपमेंट को फाइनेंस करने में मदद की। गाड़ियों में यह बदलाव ब्राज़ील की इथेनॉल कहानी का केंद्र है क्योंकि इथेनॉल की डिमांड सिर्फ़ ब्लेंडिंग मैंडेट से ही नहीं बनती, बल्कि उन गाड़ियों से भी बनती है जो ड्राइवरों को अपना ईंधन चुनने की सहूलियत देती हैं।
सिंडीकॉम ने मोंगाबे-इंडिया को बताया कि ब्राज़ील का ‘फ्यूल ऑफ़ द फ्यूचर लॉ’ ज़्यादा इथेनॉल की तरफ़ तभी बढ़ने देता है जब तकनीकी तौर पर सही साबित होने वाले टेस्ट और ट्रायल हों। किसी भी बढ़ोतरी के लिए, जिसमें E35 तक भी शामिल है, सिंडीकॉम ने कहा कि पहले से पता होना ज़रूरी है ताकि डिस्ट्रीब्यूटर निवेश कर सकें और लॉजिस्टिक्स की सही प्लानिंग कर सकें।
होर्टा ने भारत को अभी E20 पर बने रहने की सलाह दी और इसे एक सुरक्षित रास्ता बताया क्योंकि ज़्यादा ब्लेंड के लिए गाड़ियों, फ्यूल सप्लाई और ग्राहकों की तैयारी में ज़्यादा तैयारी की ज़रूरत होगी। उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि आप (भारत) ज़्यादा सुरक्षित हैं। E20 पर जाएं, उसके आगे तुरंत नहीं बढ़ें।”
यह खबर मोंगाबे-इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 16 जुलाई, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: महाराष्ट्र के नागपुर के पास एक पेट्रोल पंप। भारत में, E20 स्टैंडर्ड पेट्रोल ब्लेंड बन रहा है, लेकिन पंप के स्तर पर उपभोक्ताओं के पास अभी भी सीमित विकल्प हैं। तस्वीर – गणेश धमोड़कर/विकिमीडिया कॉमन्स (CC BY-SA 4.0.)