- महाराष्ट्र के सूखा-पीड़ित पहाड़ी गांव किरकसाल में भारतीय भेड़िया और धारीदार लकड़बग्घा सहित 606 प्रजातियों का दस्तावेजीकरण किया गया है।
- इस सर्वे में वन्यजीवों की जानकारी जुटाने के लिए कैमरा ट्रैप का इस्तेमाल किया गया और जमीन के इस्तेमाल के तरीकों का पता लगाने के लिए पांच साल के डेटा की जीआईएस (भौगोलिक सूचना प्रणाली) मैपिंग की गई।
- ग्राम पंचायत और वन विभाग की मदद से इस गांव ने यहां के घास के मैदानों, झाड़ीदार इलाकों और खुले प्राकृतिक आवासों में पाई जाने वाली जैव-विविधता को बचाने के लिए पेड़ काटने, जंगल में आग लगने और शिकार जैसे तीन तरह के प्रतिबंध लागू किया है।
महाराष्ट्र के सतारा जिले के मान तालुका में स्थित छोटा-सा गांव किरकसाल अपने घने झाड़ीदार इलाकों के लिए जाना जाता है। गांव के बुजुर्गों के अनुसार यह क्षेत्र कभी समृद्ध घासभूमि पारिस्थितिकी तंत्र था, जहां बड़ी संख्या में कृष्ण मृग (ब्लैकबक) और चिंकारा पाए जाते थे। 1950 के दशक के बाद यहां खुर वाले वन्यजीवों (अंगुलेट प्रजातियों) की स्थानीय आबादी धीरे-धीरे खत्म हो गई। हालांकि, भारतीय भेड़िया, धारीदार लकड़बग्घा, सुनहरा सियार और बंगाल लोमड़ी जैसी प्रजातियां यहां बनी रहीं, लेकिन गांव की जैव-विविधता का कभी व्यवस्थित तरीके से दस्तावेजीकरण नहीं किया गया।
मुंबई के वन्यजीव जीवविज्ञानी चिन्मय सावंत (इनके दादा-दादी किरकसाल में रहते हैं) ने इस पारिस्थितिकी तंत्र में मौजूद प्रजातियों का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण करने का फैसला लिया। इसी उद्देश्य से उन्होंने कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान पूरा समय किरकसाल में बिताया और गांव का पीपुल्स बायोडायवर्सिटी रजिस्टर (पीबीआर) तैयार करने पर काम किया। सावंत बताते हैं, “किरकसाल पहाड़ी क्षेत्रों और टेबल पर्वतों (सपाट चोटी वाला पर्वत) से जुड़ा हुआ है, लेकिन हमें यह नहीं पता था कि वहां कौन-कौन से जीव रहते हैं। इसे जानने और इस क्षेत्र का वैज्ञानिक अध्ययन करने की उत्सुकता थी, इसलिए मैं पूरे लॉकडाउन में यहीं रहा। उस समय ग्राम पंचायत के सदस्य रहे अमोल काटकर ने मुझे पीबीआर तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी। इसके बाद मैंने प्रकृति संरक्षण में दिलचस्पी रखने वाले युवाओं की एक टीम बनाई।” इसी पहल के साथ ‘किरकसाल संरक्षण परियोजना’ की शुरुआत हुई। इस टीम ने गांव की जैव-विविधता का दस्तावेजीकरण लगातार जारी रखा। बाद में साल 2023 से 2025 के बीच इस परियोजना को डब्ल्यूडब्ल्यूएफ (WWF) से अनुदान भी मिला।
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के सहयोग से संचालित इस परियोजना के तीन प्रमुख उद्देश्य थे, स्थानीय समुदाय की भागीदारी और युवाओं का प्रशिक्षण, जैव-विविधता का दस्तावेजीकरण एवं शोध तथा प्राकृतिक आवासों का संरक्षण और उसे संवारना। परियोजना के पहले चरण (मई 2023 से अक्टूबर 2024) में स्थानीय लोगों के साथ मिलकर सर्वेक्षण तैयार किए गए, ताकि समुदाय का विश्वास जीता जा सके। दूसरे चरण में पांच सालों के आंकड़ों की जीआईएस के जरिए मैपिंग की गई। इससे पता चला कि 1.67 वर्ग किलोमीटर घासभूमि में अब खेती होने लगी है। परियोजना के तहत स्तनधारी प्रजातियों की विविधता का अध्ययन करने के लिए कैमरा ट्रैप से निगरानी भी की गई। सावंत बताते हैं, “समुदाय की अगुवाई में किए गए वैज्ञानिक सर्वेक्षण के दौरान हमने वनस्पतियों और जीव-जंतुओं की कुल 606 प्रजातियों का दस्तावेजीकरण किया। इनमें 212 पक्षी, पौधों की 160 प्रजातियां, 34 उभयचर एवं सरीसृप (हर्पेटोफौना) और 18 स्तनधारी प्रजातियां शामिल हैं। इस अध्ययन से हमें अहसास हुआ कि यह क्षेत्र प्रजातियों के संरक्षण के नजरिए से बहुत अहम है।” इस परियोजना के परिणामस्वरूप सतारा वन प्रभाग के उप वन संरक्षक को एक प्रस्ताव भेजा गया है, जिसमें मान (दहीवाड़ी) और खटाव (वडूज) वन परिक्षेत्र के 23 गांवों में फैले 4,793 हेक्टेयर (47.93 वर्ग किलोमीटर) क्षेत्र को ‘किरकसाल-कुकुडवाड संरक्षण रिजर्व’ घोषित करने की मांग की गई है। सावंत कहते हैं, “हम परिदृश्य स्तर पर काम कर रहे हैं, ताकि तीन लगातार जुड़े क्लस्टरों, किरकसाल, कुकुडवाड और कालेढोन, को कानूनी संरक्षण के दायरे में लाकर संरक्षित किया जा सके।”


शिकार के बिना भेड़िये कैसे जीवित रहे?
किरकसाल संरक्षण परियोजना में कार्यरत फील्ड जीवविज्ञानी अर्नव गांधे बताते हैं कि किरकसाल के घास के मैदानों में रहने वाले भेड़िए मुख्य रूप से कृंतकों (रोडेंट), काली गर्दन वाले खरगोश (ब्लैक-नेप्ड हेयर), सिवेट, नेवले, मुर्गी और पोल्ट्री अपशिष्ट का शिकार करते हैं। हालांकि, मानसून के दौरान वे कभी-कभी धनगर समुदाय की भेड़ों का भी शिकार कर लेते हैं। गांधे कहते हैं, “इस क्षेत्र से खुर वाले वन्यजीव शिकार और भोजन की कमी की वजह से गायब हो गए, लेकिन भेड़िए इसलिए जीवित रह सके, क्योंकि वह सबसे अधिक सहनशील प्रजातियों में से एक है। उन्हें अन्य जानवरों की तुलना में कम पानी की जरूरत होती है, वे मृत पशुओं के अवशेष खाकर भी जीवित रह सकते हैं और कठोर प्राकृतिक परिस्थितियों में भी अपना अस्तित्व बनाए रख सकते हैं। हालांकि, यह भी संभव है कि यहां भेड़ियों की कुछ आबादी खत्म हो गई हो और सिर्फ कुछ ही जीवित बच पाए हों।”
अशोका ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकोलॉजी एंड द एनवायरनमेंट (ATREE) के सीनियर फेलो एबी टी. वनाक ने ईमेल के जरिए बताया, “मांसाहारी जानवरों की आबादी के लिए शिकार का अच्छा आधार होना जरूरी है। हालांकि, जंगली शिकार न मिलने पर, आसानी से ढलने वाले मांसाहारी जानवर तेजी से पालतू जानवरों और पोल्ट्री जैसे इंसानों से जुड़े खान-पान पर निर्भर हो सकते हैं। भारतीय भेड़िये बहुत लंबे समय से कम जुगाली (जैसे बकरी, भेड़) करने वाले जानवरों पर निर्भर रहे हैं।”
पुणे स्थित ग्रासलैंड्स ट्रस्ट के संस्थापक और अध्यक्ष मिहिर गोडबोले ने ईमेल के जरिए बताया कि सिर्फ कृंतक और खरगोश लंबे समय तक भेड़ियों की भोजन संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं, खासकर तब जब उनके झुंड में तीन-चार से ज्यादा सदस्य हों। उन्होंने कहा, “ऐसे क्षेत्रों में भले ही भेड़ियों के जीवित रहने के लिए हिरणों की आबादी अब अनिवार्य न रह गई हो, लेकिन घासभूमि पारिस्थितिकी तंत्र को ज्यादा स्वस्थ और पारिस्थितिकी रूप से संतुलित बनाए रखने के लिए स्थानीय जंगली शाकाहारी प्रजातियों की मौजूदगी बेहद अहम है।”
सतारा के उप वन संरक्षक (डीसीएफ) अमोल सतपुते का मानना है कि अगर इस पारिस्थितिकी तंत्र में लंबी-अवधि के नजरिए के साथ हिरणों को दोबारा बसाया जाए, तो इससे भेड़ियों द्वारा भेड़ों का शिकार की घटनाएं कम हो सकती हैं और मानव-भेड़िया संघर्ष भी घट सकता है। उनके अनुसार, अगर इस क्षेत्र को संरक्षण रिजर्व घोषित किया जाता है, तो ऐसा किया जाना संभव होगा।
संरक्षणवादियों और स्थानीय लोगों को यह आशंका है कि अगर क्षेत्र में गन्ने की खेती बढ़ती रही, तो यहां तेंदुओं का आगमन हो सकता है, खासकर तब जब भेड़ियों की संख्या घटने लगे। भारतीय वन्यजीव संस्थान के पूर्व डीन वाईवी झाला चेतावनी देते हैं, “तेंदुओं के साथ प्रतिस्पर्धा में भेड़िए टिक नहीं सकते।”
गोडबोले भी इस आशंका से सहमत हैं। उन्होंने कहा, “भले ही कुछ समय के लिए दोनों प्रजातियों का क्षेत्र एक-दूसरे से मिलता-जुलता रहे, लेकिन जैसे-जैसे वनस्पति घनी होती है, तेंदुए प्रमुख शिकारी के रूप में उभरने लगते हैं। भारतीय भेड़िए खुले और अर्ध-शुष्क घासभूमि पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बहुत ज्यादा ढले हुए होते हैं और घनी वनस्पति वाले आवासों से बचते हैं।” उन्होंने आगे कहा कि जैसे-जैसे गन्ने की खेती का विस्तार होगा, यह बनावट धीरे-धीरे भेड़ियों के लिए कम उपयुक्त और तेंदुओं के लिए अधिक अनुकूल बनती जाएगी। इसके चलते भेड़ियों का इस क्षेत्र से विस्थापन भी हो सकता है।

तीन-सूत्रीय प्रतिबंध
किरकसाल में तीन-सूत्रीय प्रतिबंध लागू किए गए हैं। ‘कुऱ्हाड बंदी’ (पेड़ों की कटाई पर रोक), ‘वनवा बंदी’ (जंगल में आग लगने से रोकथाम) और ‘शिकार बंदी’ (शिकार पर प्रतिबंध)। इसके अलावा ‘चराई बंदी’ (चराई पर रोक) भी लागू है, लेकिन यह सिर्फ किरकसाल के बाहर से आने वाले लोगों के लिए है, ताकि यहां चराई को नियंत्रित किया जा सके। सावंत कहते हैं, “आदर्श गांव प्रकल्प के तहत हम पहले से ही इन प्रतिबंधों पर काम कर रहे थे, ताकि गांव को आदर्श गांव का दर्जा मिल सके। लेकिन डब्ल्यूडब्ल्यूएफ से मिले अनुदान के बाद हमने इन प्रतिबंधों को असरदार ढंग से लागू करने पर जोर दिया।” इसके तहत दो स्थानों पर सूचना-पट्ट लगाए गए और वन विभाग को भी सक्रिय किया गया।
किरकसाल की जैव-विविधता प्रबंधन समिति के सदस्य प्रथमेश काटकर बताते हैं कि नागपंचमी के अवसर पर शिकार करना और शिकार किए गए जानवर का सिर गांव के मंदिर के पास दफनाना यहां की पारंपरिक प्रथा थी। वह कहते हैं, “मेरे बचपन में मेरे रिश्तेदार भी शिकार में शामिल होते थे। उस समय यह कहना भी जोखिम भरा था कि शिकार नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि शिकार हमारी संस्कृति का अभिन्न हिस्सा माना जाता था।”
मनोरंजन के लिए शिकार करना, कुछ वन्यजीवों की आबादी नियंत्रित करने के उद्देश्य से उन्हें मारना और शिकारी जानवरों द्वारा पशुधन पर हमले के प्रतिशोध में उन्हें खत्म करना—ये सभी यहां सामान्य प्रथाएं थीं। किरकसाल के एक चरवाहे भगवत विट्ठल काटकर बताते हैं, “मैं पहले हर साल होने वाले सामूहिक शिकार में हिस्सा लेता था, लेकिन अब शिकार पूरी तरह बंद हो गया है, क्योंकि वन विभाग नियमित रूप से इस क्षेत्र में गश्त करता है।”
किरकसाल के एक अन्य युवा और जैव-विविधता प्रबंधन समिति के सदस्य विशाल काटकर बताते हैं कि पेड़ों की कटाई पर प्रतिबंध लगाने का उद्देश्य छोटे पेड़ों को बढ़ने का अवसर देना था। उन्होंने कहा, “पहले लोग अपनी भेड़ों को लेकर पहाड़ी इलाकों में जाते थे और लकड़ी की खास जरूरत न होने पर भी पेड़ काट देते थे। ‘कुऱ्हाड बंदी’ ने इस पर रोक लगा दी और जब इसे हमारे जलग्रहण क्षेत्र (वॉटरशेड) के कामों के साथ जोड़ा गया, तो इसका सकारात्मक प्रभाव दिखाई देने लगा।” किरकसाल में खुले घास के मैदानों के बीच-बीच में जंगलों के छोटे-छोटे हिस्से मौजूद हैं। उन्होंने बताया, “कुऱ्हाड बंदी और चराई बंदी के कारण बड़े पैमाने पर घासभूमि का संरक्षण हुआ है। आसपास की पहाड़ियों पर अब घास लोगों की कमर तक बड़ी हो जाती है। लोग यहां से घास काटकर अपने मवेशियों के लिए चारे के रूप में ले जा सकते हैं।”
वर्ष 2024 से किरकसाल में तैनात वनरक्षक भीमराव शंकर भोसले बताते हैं कि वन विभाग दिन और रात दोनों समय जंगल में नियमित गश्त करता है। उन्होंने कहा, “किरकसाल में हम शिकार और पेड़ों की कटाई की अनुमति नहीं देते। अगर बाहर के लोग यहां अपने पशुओं को चराने आते हैं, तो हम उन्हें चेतावनी देकर वापस भेज देते हैं।” हालांकि, उन्होंने यह भी बताया कि अब ऐसी घटनाएं बहुत कम हो गई हैं। इंसानी हस्तक्षेप घटने से वन्यजीवों की संख्या बढ़ी है, जिसके कारण लोगों ने भी स्वाभाविक रूप से जंगल क्षेत्र में मवेशी चराई के लिए जाना लगभग बंद कर दिया है।
जंगल में आग की रोकथाम के बारे में उन्होंने बताया कि संवेदनशील क्षेत्रों में 10 से 12 मीटर चौड़ी फायर लाइन बनाई जाती है। इस क्षेत्र में पवनचक्कियां होने से कभी-कभी शॉर्ट सर्किट से भी जंगल में आग लग जाती है। उन्होंने कहा, “जब भी आकस्मिक रूप से जंगल में आग लगती है, हमारी टीम फायर ब्लोअर लेकर तुरंत मौके पर पहुंचती है। आग बुझाने में किरकसाल के ग्रामीण भी हमारे साथ शामिल होते हैं।”
किरकसाल के किसानों ने बताया कि गांव के सभी लोग खास युवा, जंगल में आग लगने की घटनाओं को लेकर बेहद सतर्क रहते हैं। जैसे ही आग लगने की सूचना और उसकी जगह पता चलता है, सभी लोग बोरे लेकर वहां पहुंच जाते हैं और आग बुझाने में जुट जाते हैं।


इंसानों और वन्यजीवों पर असर
फील्ड जीवविज्ञानी अर्नव गांधे के अनुसार भारत में बहुत कम घासभूमियों को कानूनी संरक्षण प्राप्त है। उन्होंने कहा, “घासभूमियों को लंबे समय तक गलत तरीके से ‘बंजर भूमि’ के रूप में वर्गीकृत किया जाता रहा, लेकिन हाल के वैज्ञानिक अध्ययनों ने स्पष्ट किया है कि यह खास पारिस्थितिकी तंत्र है। इसलिए इनके संबंध में नीतियों में बदलाव करना और इन्हें कानूनी संरक्षण देना बेहद जरूरी है। इस दिशा में महाराष्ट्र सरकार का 7 मई, 2026 का सरकारी प्रस्ताव महत्वपूर्ण कदम है, जिसमें घासभूमियों को घासभूमि के रूप में ही मान्यता देने और वहां किसी भी प्रकार के वृक्षारोपण अभियान की अनुमति न देने का प्रावधान किया गया है।”
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झाला आगाह करते हैं कि संरक्षण रिजर्व से जुड़ी किसी भी योजना को स्थानीय समुदाय की सहमति और सहयोग से ही आगे बढ़ाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “अगर इस क्षेत्र में भेड़ियों का दीर्घकालिक संरक्षण पक्का करना है, तो उनके लिए पर्याप्त शिकार आधार बनाना होगा, जिसके लिए सरकार का सहयोग जरूरी है। मेरी राय में संरक्षण रिजर्व के बजाय ‘सामुदायिक रिजर्व’ ज्यादा सही होगा, क्योंकि इस प्रकार का कानूनी संरक्षण भूमि उपयोग के तौर-तरीकों में जरूरी और वैध बदलावों की सुविधा देता है।”
सतारा के डीसीएफ अमोल सतपुते ने बताया कि इस इलाके को संरक्षण रिजर्व घोषित करने की कोशिशें जारी हैं। उन्होंने बताया, “लकड़बग्घों और भेड़ियों के लिए बहुत कम जगहें हैं, इसलिए इस इलाके को बचाने की ज़रूरत है। हम स्थानीय लोगों की मदद से ही इस पर आगे बढ़ेंगे। इसके लिए एक जन सुनवाई होगी; लोगों को ऐसा नहीं लगना चाहिए कि यह फैसला उन पर थोपा गया है।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 22 जून, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: पेड़ों की कटाई, जंगल में आग लगने और जंगली जानवरों के शिकार पर तीन-स्तरीय प्रतिबंध लागू किए जाने से पहले चरवाहे भगवत विट्ठल काटकर ने एक बार सालाना शिकार की रस्म में हिस्सा लिया था। तस्वीर – विनया कुर्तकोटी।