- एक हालिया अध्ययन में जापान और निकारागुआ में 1800 के दशक में ज्वालामुखी फटने का संबंध भारत में आगरा और मद्रास में पड़े अकाल से जोड़ा गया है।
- वैसे उस वक्त सूखा पड़ने की फौरी वजह ज्वालामुखी ही था, लेकिन अल-नीनो और औपनिवेशिक नीतियों से हालात विकराल हो गए, जिससे अकाल की स्थिति पैदा हो गई।
- यह अध्ययन स्ट्रेटोस्फीयर (समताप मंडल) की जियोइंजीनियरिंग से जुड़े खतरों की ओर भी इशारा करता है, जिसके ऐसे ही असर हो सकते हैं और खाद्यान्न का संकट पैदा हो सकता है।
एक नए अध्ययन के मुताबिक 1830 के दशक में जापान और दूसरा निकारागुआ में दो अलग-अलग ज्वालामुखी फटे। इन दोनों विस्फोटों से बड़ी मात्रा में सल्फर एरोसोल वायुमंडल में फैल गए। इससे धरती का तापमान तेजी से घटा और मानसून में सामान्य बारिश नहीं हो पाई, जिससे ब्रिटिश प्रशासन के अधीन आगरा और मद्रास क्षेत्रों में सूखे जैसे हालात पैदा हो गए।
वैसे तो सूखे की मुख्य वजह ज्वालामुखी विस्फोट था, लेकिन दशकों तक औपनिवेशिक शासन के दौरान भारी-भरकम कर और पर्यावरण को हुए नुकसान ने मॉनसून की विफलता को अकाल में बदल दिया, जिससे बड़ी संख्या में लोगों की जान गई।
साल 1832 से 1838 के बीच भारत में मानसून कमजोर रहा। इस दौरान दुनिया भर में मौसम के चक्र में बदलाव दिखाई दिया। इनमें से एक था अल-नीनो जो दक्षिणी गोलार्ध से जुड़ी आवधिक जलवायु घटना है और 1833 में सक्रिय हुआ था। इसके असर से मानसून का चक्र प्रभावित हुआ, जिस कारण पूरे भारत में लंबे समय तक सूखा मौसम बना रहा। इस वजह से ब्रिटिश प्रशासन के अधीन आगरा और मद्रास क्षेत्रों में सूखा पड़ा, जिससे धान, दलहन और अन्य मौसमी फसलों की खेती चौपट हो गई। औपनिवेशिक नीतियों के कारण आर्थिक कुप्रबंधन और बढ़ गया, जिसने सूखे को अकाल में बदल दिया। इस अकाल में 9 लाख से ज्यादा लोगों की जान गई।
जापान व निकारागुआ में इन ज्वालामुखी के फटने तथा अकाल के बीच संबंध स्थापित करने वाला यह अध्ययन दिसंबर में जर्नल ऑफ हिस्टोरिकल जियोग्राफी में प्रकाशित हुआ। अध्ययन में पाया गया कि 1831 में जापान के पास और 1835 में निकारागुआ में ज्वालामुख विस्फोटों से मौमस ठंडा हो गया और भारत में मानसून फेल हो गया। 1831 के विस्फोट का यह समय अल-नीनो की शुरुआत से भी जुड़ गया, जिससे दोनों प्रभावों ने मिलकर सूखे को इतना ज्यादा गंभीर बना दिया, जितना शायद इनमें से कोई एक प्रभाव अकेले नहीं कर पाता।
अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो बोल्डर की पुराजलवायु वैज्ञानिक अत्रेयी भट्टाचार्य ने एक साक्षात्कार में कहा कि यह नया अध्ययन उन विभिन्न विषयों में हो रहे शोधों की बढ़ती श्रृंखला में बड़ा योगदान है, जो वैश्विक जलवायु प्रभावों, स्थानीय स्तर के मौसमी चक्र और समाज की प्रतिक्रिया के बीच मौजूद इन अकाट्य संबंधों को सामने ला रहे हैं। भट्टाचार्य इस अध्ययन से जुड़ी नहीं हैं।

ज्वालामुखी का फटना
दरअसल, 1831 में उत्तर-पूर्वी जापान के सिमुशिर द्वीप पर स्थित जावरित्स्की काल्डेरा ज्वालामुखी फट गया। इसके तीन साल बाद निकारागुआ के उत्तर-पश्चिमी चिनांडेगा क्षेत्र स्थित कोसेगुइना ज्वालामुखी में भी विस्फोट हुआ। इन दोनों विस्फोटों से राख और सल्फर एरोसोल का बड़ा गुबार वायुमंडल में फैल गया। जहां राख एक दिन के भीतर ही नीचे बैठ गई, वहीं एरोसोल कई सालों तक वायुमंडल में बना रहा। उसने सूर्य की रोशनी को रोका और पृथ्वी के औसत तापमान में लगभग 1 डिग्री सेल्सियस की गिरावट आ गई। तापमान में यह कमी भले ही मामूली लगे, लेकिन इसके प्रभाव व्यापक और विनाशकारी थे। इसका असर भारतीय भूभाग पर भी हुआ, जिससे भूमि और महासागर के बीच तापमान का अंतर कम हो गया, जबकि यही अंतर मानसूनी हवाओं को आगे बढ़ाता है।
अध्ययन के एकमात्र लेखक और स्विट्जरलैंड के यूनिवर्सिटी ऑफ बर्न के ऐतिहासिक भूगोलवेत्ता रिचर्ड वॉरेन ने एक साक्षात्कार में कहा, “मैंने देखा कि इसके तुरंत बाद भारत में दो अकाल पड़े।” इस अध्ययन को स्विस नेशनल साइंस फाउंडेशन और स्विस स्टेट सेक्रेटेरिएट फॉर एजुकेशन, रिसर्च एंड इनोवेशन का वित्तीय सहयोग मिला है।
वॉरेन 1830 के दशक में हुए ज्वालामुखी विस्फोटों और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में पड़े अकालों के बीच संबंध स्थापित करने वाले व्यापक अध्ययन पर काम कर रहे हैं। उनका मुख्य ध्यान दक्षिण और पूर्वी एशिया पर है। इसके लिए वे मौसम संबंधी ऐतिहासिक अभिलेखों के साथ-साथ उस समय के लिखित दस्तावेजों को भी देख रहे हैं, ताकि इन अकालों की प्रकृति के सबूत जुटाए जा सकें। वॉरेन ने बताया कि अकाल सिर्फ भारत तक सीमित नहीं थे। चीन और जापान भी ऐसे संकट से प्रभावित हुए थे, लेकिन इन नतीजों की पुष्टि करने वाला उनका शोध-पत्र अभी प्रकाशित होना बाकी है।
मद्रास और आगरा की तत्कालीन जलवायु परिस्थितियों का अध्ययन करने के लिए वॉरेन ने ब्रिटिश लाइब्रेरी में उपलब्ध ब्रिटिश शासन में भारत में मौसम संबंधी अभिलेखों से प्राप्त आंकड़ों का इस्तेमाल किया। इन आंकड़ों के आधार पर उन्होंने उस समय की जलवायु का पुनर्निर्माण किया और उन्हें 15वीं शताब्दी से उपलब्ध ऐतिहासिक आंकड़ों के विशाल भंडार पर आधारित अत्याधुनिक वैश्विक जलवायु मॉडल में शामिल किया।
उनके विश्लेषण से पता चला कि ज्वालामुख फटने, अल-नीनो के असर और अन्य जलवायु कारकों के मिले-जुल प्रभाव ने भारत में कमजोर मानसून के हालात पैदा किए। सामान्यतः मानसून के दौरान भारत के कई क्षेत्रों में समुद्र से आने वाली नमी से भरपूर हवाओं से हर साल लगभग 35 इंच बारिश होती है। लेकिन ज्वालामुखी विस्फोटों के बाद पूरी धरती पर बढ़ी ठंड ने हवाओं के चक्र को बदल दिया, जिससे समुद्र से नमी से भरपूर हवाएं बहुत कम मात्रा में भारत पहुंचीं। इससे मद्रास और आगरा में भीषण सूखे की स्थिति बनी और पैदावार में गिरावट आई।

ब्रिटिश-शासित भारत में आर्थिक नीतियां
अगर सूखे की स्थिति नहीं बनी होती, तो कृषि उत्पादकता में इतनी गिरावट नहीं आती। लेकिन उस समय ब्रिटिश शासन के अधीन भारत की आर्थिक नीतियां भी शोषणकारी थीं। वॉरेन ने कहा कि अगर ईस्ट इंडिया कंपनी ने अनाज का भंडारण किया होता और उसे लोगों के बीच बांटा होता, तो इन अकालों के दुष्प्रभावों को रोका जा सकता था। इसके बजाय खाद्यान्नों की कीमतें तेजी से बढ़ गईं। चावल और गेहूं की कीमतों में 71% तक की बढ़ोतरी हुई। इससे लाखों लोगों की पहुंच से खाने-पीने की जरूरी चीजें भी बाहर हो गई। इसके बावजूद कंपनी ने हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। वॉरेन ने कहा, “उन्होंने कीमतों को नियंत्रित करने के लिए हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।” 1600 में स्थापित ईस्ट इंडिया कंपनी, अपनी निजी स्थायी सेना के बल पर उस समय भारत के विशाल भूभाग पर शासन कर रही थी। वॉरेन के अनुसार, उस दौर में चीन को अफीम बेचने के अलावा खेती ही कंपनी की आमदनी का मुख्य जरिया था।
वॉरेन ने अपने अध्ययन में अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन के उस सिद्धांत का सहारा लिया है, जिसमें उन्होंने दलील दी थी कि अकाल की वजह खाद्यान्न की उपलब्धता नहीं, बल्कि लोगों की उस तक पहुंच होती है। उन्होंने पर्यावरण इतिहासकार माइक डेविस के कामों का भी हवाला दिया है, जिन्होंने अकालों पर जलवायु की आवधिक घटनाओं, खास कर अल-नीनो की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया था। इतिहासकार बेंजामिन सीगल ने कहा, “मुझे लगता है कि इस अध्ययन में अकाल के इतिहास-लेखन (हिस्टोरियोग्राफी) का बहुत अच्छा विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।”
इतिहासकारों के लिए वैज्ञानिक शोध-पत्र आमतौर पर ऐसे स्रोत नहीं रहे हैं जिनका वे नियमित रूप से इस्तेमाल करते हों, क्योंकि इनमें अक्सर उन आर्थिक नीतियों का व्यापक विश्लेषण नहीं होता जो अकाल जैसी त्रासदियों में मदद करती हैं। लेकिन, इस अध्ययन में वॉरेन ने ऐसा किया है। उन्होंने जलवायु और आर्थिक नीतियों दोनों की भूमिका की दोबारा जांच करते हुए अकालों के असल कारणों का फिर से मूल्यांकन किया है। इससे यह बेहतर ढंग से समझने में मदद मिल सकती है कि ऐसी नीतियों का समाज पर कितना गहरा असर पड़ता है।
बोस्टन यूनिवर्सिटी के इतिहासकार और हंग्री नेशन: फूड, फैमिन एंड द मेकिंग ऑफ मॉडर्न इंडिया के लेखक बेंजामिन सीगल ने इस अध्ययन पर एक साक्षात्कार में कहा, “कृषि उत्पादकता को समझने में हमने जलवायु को जरूरत से ज्यादा निर्णायक मान लिया है। इस शोध-पत्र की सबसे अच्छी बात यह दिखाना है कि जलवायु का प्रभाव तो है, लेकिन वही सब कुछ तय नहीं करता। यह स्थानीय राजनीतिक, आर्थिक और कारोबारी परिस्थितियों की भूमिका को न तो नजरअंदाज करता है और न ही उनकी अहमियत को कम करके आंकता है। उपलब्ध सबूतों के आधार पर यह वास्तव में संतुलित और स्पष्ट विश्लेषण प्रस्तुत करता है।”
वॉरेन अपनी खोजों को इतिहास के जरिए यह समझने का एक तरीका मानते हैं कि आज की सरकारें इंसानों की वजह से हो रहे जलवायु परिवर्तन से पैदा हुई भोजन की कमी से कैसे निपट सकती हैं। सरकारें जलवायु के असर को कम करने या बढ़ाने के लिए क्या कदम उठाती हैं। वॉरेन ने कहा, “मुझे लगता है कि उन ऐतिहासिक घटनाओं से यह सबक सीखा जा सकता है।”


याद रखे जाने वाले सबक
कोलोराडो विश्वविद्यालय की अत्रेयी भट्टाचार्य ने कहा कि यह अध्ययन सिर्फ अकादमिक ही नहीं, बल्कि नीतिगत नजरिए से भी बेहद अहम है। उन्होंने कहा कि पृथ्वी के जलवायु चक्र से जुड़े विशाल आंकड़े उपलब्ध होने के बावजूद सबसे बड़ी चुनौती स्थानीय स्तर पर मौसम और जलवायु परिस्थितियों का सटीक पूर्वानुमान लगाना है। उन्होंने सवाल उठाया, “हम इस जानकारी को स्थानीय जलवायु तक कैसे पहुंचाएं और इसे उन समुदायों से कैसे जोड़ें जो अपने स्तर पर जरूरी फैसले लेते हैं?”
वॉरेन ने खास तौर पर कृषि के संदर्भ में सोलर जियोइंजीनियरिंग जैसी तकनीकों के इस्तेमाल को लेकर चिंता जताई। उन्होंने कहा, “ज्वालामुखी विस्फोटों पर हुए शोध से बड़ा सबक यह मिलता है कि अगर वायुमंडल में बड़ी मात्रा में एरोसोल छोड़ दिए जाएं, तो जलवायु चक्र में गंभीर व्यवधान पैदा हो सकते हैं।” उन्होंने आगे कहा, “दुनिया भर में बहुत बड़ी संख्या में लोगों के लिए इसके संभावित नतीजे बहुत नुकसानदायक हो सकते हैं।”
इसे समझाने के लिए वॉरेन ने एक काल्पनिक स्थिति का उदाहरण दिया, जिसमें वैश्विक औसत तापमान 3 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाए। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति के नतीजे मौजूदा जलवायु संकट से भी ज्यादा गंभीर हो सकते हैं और उनका प्रभाव अलग-अलग क्षेत्रों पर असमान रूप से पड़ेगा। उदाहरण के लिए, कुछ मामलों में भारत और चीन की तुलना में स्कैंडिनेवियाई देश ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं, क्योंकि उत्तरी यूरोप में सूर्य की रोशनी पहले से ही कम मिलता है और वहां फसलें भूमध्यरेखीय देशों की तुलना में मुश्किल से ही उग पाती हैं। दूसरी ओर, भारत जैसे देशों के सामने मानसून के फेल होने का कहीं अधिक बड़ा खतरा होगा।
और पढ़ेंः झारखंड में सूखे की आहट, रोपाई और बुआई में 20 दिन की देरी
अध्ययन से जुड़े नहीं रहे कोलंबिया विश्वविद्यालय के जलवायु शोधकर्ता ब्रैडॉक लिंस्ले ने कहा कि जियो-इंजीनियरिंग की कोशिशों के लिए इतिहास बड़ी चेतावनी देता है। उन्होंने मोंगाबे-इंडिया को बताया कि 1815 में इंडोनेशिया के माउंट टैम्बोरा ज्वालामुखी के विस्फोट के बाद अमेरिका के पूर्वी तट पर स्थित न्यू इंग्लैंड क्षेत्र में गर्मियों के महीनों में भी पूरे साल पाला पड़ता रहा। इसके परिणामस्वरूप पड़े अकालों ने बड़ी संख्या में लोगों की जान ली और व्यापक स्तर पर मुश्किलें पैदा कीं।
उन्होंने कहा, “अगर हम स्ट्रैटोस्फियर में जियो-इंजीनियरिंग के जरिए हस्तक्षेप करें और उसमें थोड़ा भी गलत दिशा में ज्यादा बदलाव कर दें, तो उन क्षेत्रों में, जहां गर्मियों में कृषि फसलों का उगना जरूरी है, सूखे ही नहीं बल्कि अकाल जैसी स्थिति भी पैदा हो सकती है।” उन्होंने आगे कहा, “अब भी बहुत-सी ऐसी बातें हैं जिन्हें हम पूरी तरह नहीं समझते। इन जटिल प्रक्रियाओं को बेहतर ढंग से समझने के लिए हमें और ज्यादा समय तथा शोध करना होगा।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 30 जुलाई, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: 6 अक्टूबर 1877 को छपे ब्रिटिश साप्ताहिक अखबार ‘द ग्राफ्रिक’ में मद्रास के तत्कालीन बेल्लारी जिले में अकाल से लोगों पर पड़े विनाशकारी असर को दिखाया गया था। यह तस्वीर होरेस हैरल ने बनाई थी और इसे नेशनल पोर्ट्रेट गैलरी से पब्लिक डोमेन के जरिए लिया गया है।