- रेल लाइनों के आस-पास रहने वाले लाखों लोगों को लगातार शोर और कंपन के बीच जीवन बिताना पड़ता है जिसका असर अक्सर देर रात तक जारी रहता है।
- भारत में अध्ययन इस संपर्क को तो माप सकते हैं, लेकिन सेहत पर पड़ने वाले लंबी-अवधि के दुष्प्रभावों का अभी तक व्यापक अध्ययन नहीं हुआ है।
- जानकार कहते हैं कि आंकड़ों, निगरानी और नीति में कमियों की वजह से सेहत पर इसके दुष्प्रभाव का स्पष्ट आकलन नहीं हो पा रहा है।
हर दिन हजारों ट्रेनें भारत के शहरों, कस्बों और घनी आबादी वाली बस्तियों से होकर गुजरती हैं। रेल पटरियों के आस-पास रहने वाले लाखों भारतीयों के लिए कंपन के साथ गुजरती ट्रेन का शोर रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है। ज्यादातर दिनों में यह समस्या देर रात तक जारी रहती है। फिर भी, ट्रेनों का शोर पर्यावरणीय सेहत के ऐसे खतरे के रूप में बना हुआ है, जिसे अभी तक ठीक से समझा नहीं गया है।
अब हालिया अध्ययनों में रेल पटरियों के साथ शोर के इस बढ़े हुए स्तर का दस्तावेजीकरण शुरू किया गया है। कुछ समुदाय ऐसे शोर के संपर्क में हैं, जो सुझाई गई आवासीय सीमा से ज्यादा है। जहां शोधकर्ता रेलवे के शोर को पहले से कहीं ज्यादा अच्छी तरह माप पा रहे हैं, वहीं इस बारे में अभी भी बहुत कम जानकारी है कि सालों तक बार-बार इस शोर के संपर्क में आने का नींद, हृदय के स्वास्थ्य, तनाव से जुड़ी शारीरिक प्रक्रिया और जीवन की गुणवत्ता पर क्या असर पड़ता है।
जैसे-जैसे इसके सबूते सामने आ रहे हैं, शोधकर्ताओं का कहना है कि भारत में ट्रेनों के शोर के संपर्क में आने से सेहत पर लगातार पड़ने वाले दुष्प्रभाव की स्पष्ट समझ नहीं बन पाई है। इससे स्वास्थ्य पर असर जैसे अहम सवालों का जवाब नहीं मिल पाया है।
शोर की तीव्रता का पता, स्वास्थ्य संबंधी सबूत गायब
हाल के सालों में हुए अध्ययन धीरे-धीरे यह बता रहे हैं कि रेल पटरियों के आस-पास रहने वाले समुदायों का जीवन कैसा होता है।
दिल्ली तकनीकी विश्वविद्यालय (डीटीयू) में पर्यावरणीय विज्ञान और इंजीनियरिंग विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर राजीव कुमार मिश्रा की अगुवाई में 2024 के अध्ययन से पता चला कि रेल पटरियों के आसपास रहने वाले लोगों ने ट्रेनों के लगातार शोर और बार-बार कंपन के संपर्क में आने से जुड़े शारीरिक और मानसिक दुष्प्रभावों की जानकारी दी।
शोध दल ने दिल्ली में रेलवे स्टेशनों के आस-पास 10 जगहों पर शोर के स्तर को मापा। इससे पता चला कि शोर का स्तर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की सीमा से ज्यादा था। सर्वे में जिन लोगों से बात की गई, उन्होंने नींद में खलल को लेकर सबसे ज्यादा चिंता जताई। हालांकि, मिश्रा जोर देकर कहते हैं कि ये नतीजे रेलवे के शोर से नुकसान की संभावना को दर्ज करते हैं ना कि इससे सेहत पर पहने वाले असर को। उनके मुताबिक भारत में इस तरह के शोर के संपर्क में आने और चिकित्सकीय रूप से मापे जा सकने स्वास्थ्य नतीजों के बीच संबंध स्थापित करने वाले लंबी-अवधि के महामारी विज्ञान संबंधी सूबत नगण्य हैं।

साल 2025 में प्रकाशित और डीटीयू में मिश्रा की अगुवाई में किए गए फॉलो-अप अध्ययन में धारणाओं से ज्यादा शोर के असल संपर्क पर ध्यान केंद्रित किया गया। इसमें दिल्ली में 14 झुग्गी बस्तियों के पास से गुजरने वाली ट्रेनों की 1,057 घटनाओं पर नजर रखी गई। इस दौरान शोधकर्ताओं ने पाया कि हर जगह ट्रेनों के शोर का स्तर आवासीय मानकों से ज्यादा था। मालगाड़ियों में शोर का स्तर सबसे ज्यादा था, जबकि इलेक्ट्रिक के मुकाबले डीजल इंजन में शोर का स्तर लगातार अधिक था।
जिन जगहों पर निगरानी रखी गई, उनमें सभी जगहों पर रेलवे से शोर का औसत स्तर सीपीसीबी की आवासीय सीमा से अधिक रहा। इससे पता चलता है कि रेल पटरियों के आस-पास शोर की तीव्रता व्यापक है। मिश्रा ने कहा कि भारतीय परिस्थितियों में लंबे समय तक रेलवे के शोर के संपर्क में आने और लंबे समय तक बनी रहने वाली स्वास्थ्य समस्याओं के बीच संबंध स्थापित करने के लिए आगे भी वैज्ञानिक जांच की जरूरत है और इसके लिए लंबे समय तक महामारी विज्ञान संबंधी शोध करना होगा।
पुराने तौर-तरीके
भारत का मौजूदा निगरानी तंत्र शायद इस बात का पूरा पता नहीं लगा पाता कि समय के साथ रेल पटरियों के आसपास समुदायों का जीवन कैसा होता है।
दिल्ली सीएसआईआर-राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला (सीएसआईआर-एनपीएल) में पूर्व मुख्य वैज्ञानिक महावीर सिंह कहते हैं, “रेलवे के शोर के आकलन के मौजूदा तरीके आम तौर पर इंजीनियरिंग मूल्यांकन और नियामक अनुपालन के लिए प्रभावी है, लेकिन वे हमेशा मानवीय संपर्क की पूरी तस्वीर पेश नहीं करते हैं।”
सिंह के अनुसार, पारंपरिक निगरानी में स्वास्थ्य-संबंधी महत्वपूर्ण पहलू नजरअंदाज हो सकते हैं, जिनमें बार-बार ट्रेनों का गुजरना, रात के समय होने वाली परेशानी, लंबे समय तक लगातार शोर के संपर्क में रहना और जमीन के जरिए फैलने वाला कंपन शामिल हैं।
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उन्होंने कहा कि रेल पटरियों के आसपास रहने वाले समुदाय शायद ही सिर्फ शोर के संपर्क में आते हैं। सालों से, वे अक्सर रेलवे-जनित शोर और जमीन के जरिए फैलने वाले कंपन दोनों का अनुभव करते हैं। “अगर उद्देश्य जनस्वास्थ्य पर होने वाले असर को समझना है, तो लंबी-अवधि के आकलन में दोनों चीजों को शामिल किया जाना चाहिए, क्योंकि एक साथ दोनों के आकलन से समुदाय की स्थिति के बारे में ज्यादा वास्तविक समझ मिलती है।”
सिंह यह भी कहते हैं कि भारत के निगरानी ढांचे में इन संपर्कों पर ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए और इसे समुदाय-आधारित बनाते हुए समुदाय के लिए स्वस्थ ध्वनि वातावरण बनाए जाने पर काम किया जाना चाहिए।
संस्थागत नजरिए से, लखनऊ स्थित रिसर्च डिजाइन और स्टैंडर्ड्स ऑर्गनाइजेशन (आरडीएससो) के पूर्व कार्यकारी निदेशक केपीएस वर्मा कहते हैं, “रेलवे से होने वाले शोर को ऐतिहासिक रूप से मुख्य तौर पर इंजीनियरिंग और संचालन से जुड़े विषय के तौर पर देखा गया। इसे कभी भी जनस्वास्थ्य से संबंधित चिंता के तौर पर नहीं देखा गया।” वह कहते हैं कि उनके कार्यकाल के दौरान चलती ट्रेनों से होने वाले शोर को आम तौर पर अस्थायी माना जाता था और इसलिए इस पर कम ध्यान दिया जाता था।
वर्मा बताते हैं कि भारतीय रेलवे ने शोर को कम करने के लिए इंजीनियरिंग से जुड़े उपाय शुरू किए हैं। इसमें लंबे-वेल्डेड रेल, रेल ग्राइडिंग भी शामिल हैं। साथ ही, ब्रेक मटीरियल में सुधार किया है, ताकि पहिये और रेल के बीच होने वाले और ब्रेक लगाने से पैदा होने वाले शोर को कम किया जा सके।
वह कहते हैं कि रेल पटरियों के एकदम पास रहने वाले लोगों के स्वतंत्र स्वास्थ्य पर तत्काल स्वतंत्र अध्ययन किया जाना चाहिए। “भविष्य की नीति रेल के डिब्बों, स्टेशन के प्लेटफॉर्म और व्यस्त रेल गलियारों के किनारे स्थित घरों से स्वतंत्र रूप से इकट्ठा किए गए और दोबारा सत्यापित किए जा सकने वाले सबूतों पर आधारित होनी चाहिए।”

छूटे हुए मॉडल
आईआईटी बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के सिविल इंजीनियरिंग संकाय के ब्रिंद कुमार कहते हैं कि रेल पटरियों के आसपास रहने वाले समुदाय शोर के साथ-साथ जमीन से फैलने वाले कंपन से भी प्रभावित होते हैं। हालांकि, रेलवे के अलग-अलग परिवेश के हिसाब से इन दोनों का संतुलन अलग-अलग हो सकता है। “बंद स्टेशन प्लेटफॉर्म पर ध्वनि के प्रतिध्वनित होने से शोर का असर ज्यादा होता है, लेकिन कंपन का प्रभाव खुली हुई रेल पटरियों के आसपास बनी आवासीय कॉलोनियों के पास महत्वपूर्ण हो जाता है।”
वह आगे कहते हैं कि भारत में अभी भी स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से रेलवे के शोर के प्रसार और इससे बचाव के मॉडल की कमी है। इससे वैज्ञानिक हस्तक्षेप सीमित हो जाता है। “यह न सिर्फ वैज्ञानिक समझ को सीमित करता है, बल्कि सबूतों पर आधारित बचाव की रणनीति बनाने की क्षमता को भी कम करता है।”
कुमार कहते हैं कि भारतीय रेलवे के पास अभी तक रेलवे के शोर और कंपन का पता लगाने और रेल पटरियों के आसपास रहने वाले समुदायों को इनसे बचाने के लिए कोई तय नीति नहीं है। “इन कमियों को दूर करने के लिए परिवहन इंजीनियरिंग, पर्यावरण से जुड़े स्वास्थ्य और जमीन के इस्तेमाल से जुड़ी योजनाओं के बीच समन्वित प्रयासों की जरूरत होगी।”
आईआईटी दिल्ली से संबद्ध ट्रांसपोर्टेशन रिसर्च एंड इंजरी प्रिवेंशन सेंटर (टीआरआईपी-सी) के सहायक प्रोफेसर मनीष पुरुषोत्तम मनोहर चेतावनी देते हैं कि सेहत से जुड़े लंबी-अवधि के सबूत के अभाव को सेफ्टी का प्रमाण मानने की भूल न की जाए। “हालांकि, भारत में और अधिक शोध की जरूरत है, लेकिन बड़े पैमाने पर संपर्क में आने के मौजूदा सबूत के मद्देनजर लगातार वैज्ञानिक जांच जारी रखने के साथ-साथ एहतियाती उपायों को उचित ठहराने के लिए पर्याप्त हैं।”
सबूत बताते हैं कि भारत ने अब यह समझना शुरू कर दिया है कि रेलवे के शोर का दुष्प्रभाव कहां होता है और समुदाय इसका किस तरह सामना करते हैं। हालांकि, जानकारों का मानना है कि सिर्फ ध्वनि की तीव्रता को मापने से जन-स्वास्थ्य पर पड़ने वाले लंवी-अवधि के प्रभावों का पता नहीं चलेगा। इन सवालों का जवाब पाने के लिए लंबी-अवधि के महामारी से जुड़े शोध, संपर्क का बेहतर आकलन, बेहतर इंजीनियरिंग मॉडल और पर्यावरण विज्ञान को जनस्वास्थ्य शोध से जोड़ने की जरूरत होगी।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 29 जुलाई, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: भारत में लाखों लोग रेल पटरियों के आस-पास रहते हैं, जहां शोर का स्तर अक्सर रिहायशी इलाकों के लिए तय सीमा से अधिक होता है। हालांकि, शोधकर्ता रेलवे के शोर को तो माप सकते हैं, लेकिन इस बारे में बहुत कम जानकारी है कि सालों तक लगातार इस शोर के संपर्क में रहने का सेहत पर क्या असर पड़ सकता है। तस्वीर – टिम एबॉट\फ्लिकर (CC BY-NC-ND 2.0)।