- भारत के ठोस कचरा प्रबंधन के नए नियमों में कचरे को चार तरह से अलग करने, ज्यादा कचरा पैदा करने वालों की जिम्मेदारियां बढ़ाने, मिश्रित कचरे के लिए लैंडफिल का शुल्क बढ़ाने का प्रावधान है।
- कई दशकों से नियमों को ठीक से लागू न करने और कचरे को सही ढंग से अलग न करने की वजह से, बड़ी मात्रा में मिश्रित कचरा लैंडफिल में पहुँच रहा है।
- लैंडफिल और कचरा जलाने से वायु प्रदूषण और जलवायु पर बुरा असर पड़ता है; इससे दिल्ली जैसे शहरों में पार्टिकुलेट उत्सर्जन, मीथेन का उत्सर्जन और स्थानीय स्तर पर गर्मी का तनाव बढ़ता है।
भारत के पर्यावरण मंत्रालय ने इस साल जनवरी में सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट या ठोस कचरे के प्रबंधन के नए नियम (2026) जारी किए। यह नए नियम अब 2016 के नियमों की जगह लेकर नियमों के पालन की व्यवस्था को बेहतर बना सकते हैं। इन नए नियमों में कचरा पैदा करने वालों की ज़िम्मेदारियों की साफ़ रूपरेखा, ‘बल्क वेस्ट जनरेटर’ यानी बड़ी मात्रा में कचरा पैदा करने वालों की परिभाषा में बदलाव, और गीले और सूखे कचरे को अलग-अलग करने को बढ़ावा देने के लिए मिश्रित कचरे के लिए लैंडफिल के इस्तेमाल पर रकम को बढ़ाने जैसे प्रावधान शामिल हैं।
यह नए नियम भले ही अच्छी नीयत से बनाए गए हों, लेकिन इस क्षेत्र के जानकारों ने इन्हें लागू करने में आने वाली उन कमियों के बारे में चेतावनी दी है, जो दशकों से भारत में ठोस कचरे के प्रबंधन के लिए समस्या बनी हुई हैं। इसका उदाहरण नई दिल्ली के विशाल लैंडफिल — भलस्वा, गाजीपुर और ओखला — हैं, जो कचरे को उसके स्रोत पर ही अलग-अलग न कर पाने की शहर की पुरानी नाकामी की निशानी हैं। कचरा पैदा करने के मामले में दिल्ली सभी भारतीय शहरों में सबसे आगे है, जहाँ हर व्यक्ति रोजाना लगभग 600 ग्राम कचरा पैदा करता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के अनुसार, इकट्ठा किए गए कचरे का लगभग 64% हिस्सा उपचारित किया जाता है, जबकि बाकी 36% यानी 4,241 टन कचरा रोज़ाना असुरक्षित रूप से लैंडफिल तक पहुँच जाता है।
ये लैंडफिल पूरे साल वायु प्रदूषण के साथ-साथ गर्मियों में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन और गर्मी के तनाव (हीट स्ट्रेस) का भी कारण बनते हैं। एक ‘सोर्स अपोर्शनमेंट स्टडी‘ के अनुसार, दिल्ली में पार्टिकुलेट मैटर (PM) उत्सर्जन में बायोमास और कचरा जलाना दूसरा सबसे बड़ा कारण है; यह PM10 में 23% और PM2.5 में 24% का योगदान देता है। जब जैविक कचरा जमा होता है और सड़ने के लिए छोड़ दिया जाता है, तो उससे मीथेन गैस निकलती है। बीस साल की अवधि में, मीथेन में कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में पर्यावरण को गर्म करने की क्षमता 80 गुना ज़्यादा होती है और यह ग्लोबल वार्मिंग के लिए दूसरा सबसे बड़ा कारण है। एक अन्य अध्ययन के अनुसार, गाजीपुर लैंडफिल के भीतर ज़्यादा तापमान वाले क्षेत्र बढ़ रहे हैं और सतह तक पहुँच रहे हैं, जो कि ठीक नहीं है।
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) में सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट और सर्कुलर इकोनॉमी के रिसर्च एसोसिएट श्रोतिक बोस कहते हैं, “नए नियमों में ऐसे ज़्यादा प्रावधान नहीं हैं जो सीधे तौर पर वायु प्रदूषण या गर्मी के तनाव (हीट स्ट्रेस) से निपटते हों, जबकि कचरा जलाने, उत्सर्जन और हवा की गुणवत्ता के बीच साफ़ संबंध है।”

क्या कहते हैं नए नियम
इस साल 1 अप्रैल से लागू हुए नए नियमों के तहत कचरे को चार तरह से अलग-अलग करना जरूरी है। यह पुराने सिस्टम से अलग है, जिसमें कचरे को सूखा, गीला और घरेलू खतरनाक तीन भागों में वर्गीकृत किया गया था। अब कचरे को सूखा, गीला, सैनिटरी और स्पेशल केयर वेस्ट में विभाजित करना होगा। स्पेशल केयर वेस्ट में दवाइयाँ, पेंट के डिब्बे, बल्ब और मरकरी वाले थर्मामीटर जैसी चीज़ें शामिल हैं।
‘एक्सटेंडेड बल्क वेस्ट जनरेटर रिस्पॉन्सिबिलिटी’ (ईबीडब्ल्यूजीआर) भी शुरू की गई है। इसका मकसद उन कचरा उत्पादकों पर ज्यादा सख्ती से ध्यान देना है जो 100 किलोग्राम से ज्यादा कचरा पैदा करते हैं, 20,000 वर्ग मीटर से ज़्यादा जगह का इस्तेमाल करते हैं, या रोजाना 40,000 लीटर से ज़्यादा पानी की खपत करते हैं। बल्क वेस्ट जनरेटर कुल ठोस कचरे का 30% हिस्सा पैदा करते हैं। उन्हें या तो गीले कचरे का निपटान (ट्रीटमेंट) वहीं करना होगा, या फिर उसे किसी सही सुविधा केंद्र (फैसिलिटी) में भेजना होगा और इसके सबूत के तौर पर ईबीडब्ल्यूजीआर सर्टिफिकेट लेना होगा।
लैंडफिल पर पाबंदियां और सख्त कर दी गई हैं। अब सिर्फ ऐसा कचरा (जिसे रीसायकल या जिससे ऊर्जा नहीं बनाई जा सकती) और अक्रिय सामग्री ही लैंडफिल में डालने की इजाज़त है। साथ ही, जो स्थानीय निकाय बिना अलग किया हुआ कचरा सैनिटरी लैंडफिल में भेजते हैं, उनसे ज़्यादा लैंडफिल शुल्क लिया जाएगा। इसके अलावा, नियमों में पुराने कचरे के सभी डंपसाइट की मैपिंग और जांच करना जरूरी कर दिया गया है और तय समय-सीमा के भीतर बायोमाइनिंग और बायोरेमेडिएशन की व्यवस्था की गई है। ये सूक्ष्मजीवों पर आधारित तकनीकें हैं – पहली तकनीक कचरे से धातुएं अलग करती है और दूसरी जहरीले प्रदूषकों को विघटित करने में मदद करती है।
प्लास्टिक कचरा इकट्ठा करने वाली एनवायरनमेंटल टेक्नोलॉजी कंपनी ‘क्लीनहब’ में इम्पैक्ट हेड, लक्ष्मी पी. कहती हैं, “मुझे लगता है कि 2026 के नियमों ने 2016 के फ्रेमवर्क की कई कमियों को दूर किया है। कचरे को चार तरह से अलग करने का कदम एक बेहतर बदलाव है, यह बड़ी सोच को दिखाता है, और यह हमेशा अच्छी बात होती है। कुल मिलाकर, अब इस बात को लेकर ज़्यादा स्पष्टता है कि किसकी क्या जिम्मेदारी है। इस डॉक्यूमेंट में पिछले दशक से कई सबक लिए गए हैं। लेकिन असल परीक्षा तो इसे लागू करने की होगी।”
ठोस कचरा प्रबंधन के सभी चरणों, जैसे कचरा पैदा होना, उसे इकट्ठा करना, ट्रांसपोर्ट करना, मटेरियल रिकवरी फैसिलिटी (एमआरएफ) में प्रोसेस करना और उसका निपटान करना, पर नज़र रखने के लिए एक केंद्रीकृत पोर्टल बनाया जा रहा है। इन कामों में शहरी स्थानीय निकाय मुख्य भूमिका निभाते हैं। बोस के अनुसार, यह साफ़ नहीं है कि नया फ़्रेमवर्क और पोर्टल शहरी स्थानीय निकायों के कामकाज को बेहतर बना पाएगा या नहीं। वे कहते हैं, “असली चुनौती कचरा प्रोसेस करने वाली सुविधाओं के साथ पुराने समझौतों को फिर से लिखने, उन्हें पोर्टल पर रजिस्टर करने और इतने बड़े पैमाने पर नियमों का पालन सुनिश्चित करने में है।”

वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट पर भरोसा
नए नियम लैंडफिल में कचरा फेंकने पर रोक लगाकर कचरे के दोबारा इस्तेमाल को बढ़ावा देते हैं, लेकिन वे अभी भी वेस्ट-टू-एनर्जी यानी कचरे से ऊर्जा पैदा करने वाले प्लांट को कचरे के निपटान के एक मान्य तरीके के तौर पर मान्यता देते हैं। वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट्स से होने वाले वायु प्रदूषण को लेकर लंबे समय से चिंताएं रही हैं। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के आदेश पर सीपीसीबी की जांच में पाया गया कि ओखला वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट से डाइऑक्सिन और फुरान जैसी बेहद जहरीली और कैंसर पैदा करने वाली गैसें निकल रही थीं, और इनकी मात्रा तय सीमा से लगभग 900% ज़्यादा थी।
लक्ष्मी कहती हैं, “भारत में, कचरे में कैलोरी की मात्रा तभी होती है जब उसे ठीक से अलग-अलग किया जाए। लेकिन एक बार जब आप कचरे को अलग कर लेते हैं, तो रीसाइक्लिंग इंडस्ट्री इतनी मज़बूत होती है कि वह ज्यादातर मटेरियल को प्रोसेस कर सकती है। असल में, जो कचरा रीसायकल नहीं हो सकता, उसका हिस्सा बहुत कम होता है, वज़न के हिसाब से शायद 5 से 10 प्रतिशत। साथ ही, ‘एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी’ (ईपीआर) और बेहतर प्रोडक्ट डिज़ाइन से भी नॉन-रीसाइक्लेबल प्लास्टिक को कम करने की उम्मीद है। इसलिए, वेस्ट-टू-एनर्जी, ईपीआर और रीसाइक्लिंग, ये सभी एक ही तरह के कचरे की समस्या को हल करने का काम करते हैं।”
वे आगे कहती हैं, “वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट को आर्थिक रूप से फायदेमंद बनाने के लिए उसे कई सालों तक चलाना पड़ता है, जिससे उनमें लगातार कचरा, अक्सर मिला-जुला कचरा, डालते रहने का दबाव बना रहता है। ये प्लांट काफी कम तापमान पर काम करते हैं, जिसका मतलब है कि डाइऑक्सिन और भारी धातुओं जैसे जहरीले तत्व पूरी तरह से नष्ट नहीं हो पाते। जब ये प्लांट शहरों के अंदर या उनके पास लगाए जाते हैं, तो इससे पर्यावरण और लोगों की सेहत को गंभीर खतरा हो सकता है।”
आंखों की डॉक्टर और ‘वाय वेस्ट वेडनेसडेज़ फ़ाउंडेशन’ की संस्थापक डॉ. रूबी मखीजा कहती हैं, “यह एक आम गलतफहमी है कि टेक्नोलॉजी से इस समस्या को हल किया जा सकता है।” यह फ़ाउंडेशन दिल्ली-एनसीआर में ‘ज़ीरो वेस्ट टू लैंडफ़िल’ मॉडल को बड़े पैमाने पर लागू करने के लिए काम कर रहा है। मशीनरी चाहे कितनी भी आधुनिक या महंगी क्यों न हो, अगर कचरे को उसके स्रोत पर ही अलग नहीं किया गया, तो वह बेकार साबित होगी। कचरे के सही मैनेजमेंट का लगभग 70% हिस्सा कचरे को अलग करने पर निर्भर करता है, लेकिन इसे निवेश की प्राथमिकता नहीं माना जाता है।”
इस साल लागू किए गए नए नियमों के तहत वेस्ट-टू-एनर्जी और सीमेंट प्लांट को छः साल में अपने ‘रिफ्यूज़ डिराइव्ड फ्यूल’ (आरडीएफ) के स्रोतों को 5% से बढ़ाकर 15% करना होगा। रिफ्यूज़ डिराइव्ड फ्यूल (आरडीएफ) उस ईंधन को कहते हैं जो घरों और दफ्तरों के ठोस कचरे से बनता है। नए नियमों में आरडीएफ को इस तरह परिभाषित किया गया है: “हाई कैलोरीफ़िक वैल्यू या उच्च कैलोरी मान वाले शहरों से निकले ठोस कचरे को छोटे टुकड़ों में काटकर और सुखाकर बनाया गया ईंधन, जिसमें मुख्य रूप से रीसायकल न हो सकने वाले प्लास्टिक, कागज़ और कपड़े शामिल होते हैं।”

कचरा प्रबंधन और स्वास्थ्य
ये सभी नियम कागज़ों पर भले ही सख्त लगते हों, लेकिन इन्हें लागू करने की शिथिल प्रक्रिया, जुर्माना माफ़ करने और कॉलोनियों की रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन के सीमित बजट की वजह से दिल्ली के लैंडफिल में हज़ारों टन मिश्रित कचरा पहुँचता रहता है। दिल्ली में सर्कुलेरिटी और कचरे पर काम करने वाले एडवोकेसी ग्रुप ‘चिंतन एनवायरनमेंटल रिसर्च एंड एक्शन ग्रुप’ की संस्थापक और निदेशक भारती चतुर्वेदी ने कहा, “इंदौर जैसे शहरों में कचरा अलग करने की प्रक्रिया को मुख्यधारा में लाने में सफलता इसलिए मिली क्योंकि राज्य सरकार खुद घर-घर जाकर जागरूकता फैलाने में शामिल थी। वहाँ गैर-लाभकारी संस्थाओं (एनजीओ) को पार्टनर की तरह माना जाता है। जबकि दिल्ली नगर निगम के साथ एनजीओ को पार्टनर के तौर पर नहीं, बल्कि ऐसे लोगों के तौर पर देखा जाता है जिनके बिना भी काम चल सकता है।”
मखीजा के अनुसार, कचरा प्रबंधन में पर्यावरण और स्वास्थ्य से जुड़ी कमियों को दूर करने के लिए तकनीकी समाधानों पर कम और सिस्टम में जवाबदेही बहाल करने पर ज़्यादा ज़ोर देने की ज़रूरत है। “अगर किसी व्यक्ति से घर पर कचरा अलग करने के लिए कहा जाता है और वे ऐसा ठीक से करते हैं, तो उन्हें यह भरोसा होना चाहिए कि आगे का सिस्टम भी तैयार है। अक्सर ऐसा होता है कि जब लोग कचरा अलग करते हैं, तो कचरा उठाने वाला आकर उसे फिर से मिला देता है, जिससे सारी मेहनत बेकार चली जाती है। इससे भरोसा पूरी तरह खत्म हो जाता है। साथ ही, शहरी स्थानीय निकाय कचरा प्रबंधन के लिए उपभोक्ता शुल्क तो लेते हैं, लेकिन असल में कितने निवासी इसका भुगतान करते हैं?”
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मिश्रित कचरे के बढ़ते ढेर के नतीजे साफ़ तौर पर दिखाई देते हैं। साल 2022 में भलस्वा लैंडफिल में अचानक लगी आग के कारण आस-पास के इलाकों में PM2.5 का स्तर 45–55% और PM10 का स्तर 40–50% बढ़ गया था। जहरीले नाइट्रोजन ऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड का स्तर भी 25 से 100% तक बढ़ गया। इससे पता चलता है कि कचरा जलाने से स्थानीय स्तर पर अचानक ऐसा वायु प्रदूषण हो सकता है जो शहर में स्मॉग की सबसे खराब घटनाओं के बराबर हो सकता है।
मखीजा का कहना है कि जब तक कचरे को अलग करने और विकेंद्रीकृत प्रोसेसिंग को संस्थागत सख्ती और व्यक्तिगत जिम्मेदारी का समर्थन नहीं मिलता, तब तक जहरीली हवा और बढ़ती गर्मी के खिलाफ लड़ाई अधूरी रहेगी। वह कहती हैं, “घर से निकलने के बाद कचरा गायब नहीं हो जाता; यह उस हवा के ज़रिए वापस आता है जिसमें लोग सांस लेते हैं, उस पानी के ज़रिए जिसे वे पीते हैं, और दूषित मिट्टी में उगाए गए भोजन के ज़रिए।”
यह खबर मोंगाबे-इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 6 मार्च, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: भले ही नए नियम लैंडफिल में कचरा फेंकने पर रोक लगाकर सर्कुलेरिटी को बढ़ावा देते हैं, लेकिन वे प्रदूषण में योगदान के बावजूद, कचरे के निपटान के एक मान्य तरीके के तौर पर ‘वेस्ट-टू-एनर्जी’ प्लांट को भी बढ़ावा देते हैं। तस्वीर: ईशा पाठक।