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वायु प्रदूषण से और भी जानलेवा हो सकता है डेंगू: अध्ययन

नई दिल्ली के घनी आबादी वाले इलाके में फॉगिंग करता नगर निगम का एक कर्मचारी। (तस्वीर- एपी/मनीष स्वरूप)

नई दिल्ली के घनी आबादी वाले इलाके में फॉगिंग करता नगर निगम का एक कर्मचारी। (तस्वीर- एपी/मनीष स्वरूप)

  • बीस डेंगू-प्रभावित देशों में किए गए एक अध्ययन में पाया गया है कि हवा में पीएम2.5 का स्तर अधिक होने से डेंगू से होने वाली मौतों का खतरा काफी बढ़ जाता है।
  • अध्ययन में यह भी बताया गया है कि किसी देश की आर्थिक स्थिति और वहां की स्वास्थ्य सुविधाओं का स्तर मृत्यु दर को तय करने में प्रमुख भूमिका निभाता है।
  • शोधकर्ताओं का कहना है कि डेंगू की लगातार निगरानी, बीमारी के प्रकोप से निपटने की बेहतर तैयारी, मरीजों के इलाज और हवा की गुणवत्ता में सुधार करना बेहद आवश्यक है।
  • हालांकि, इस अध्ययन की कुछ कमियां भी हैं, जैसे डेंगू के मामलों की कम रिपोर्टिंग और पहली या दूसरी बार हुए संक्रमण से जुड़े आंकड़ों की कमी।

साल 2024 में दुनिया भर में डेंगू के 1.4 करोड़ से अधिक मामले और 11,000 से ज्यादा मौतें दर्ज की गईं, जो कि अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है। हालाँकि, डेंगू के प्रसार में जलवायु परिवर्तन और तेजी से बढ़ते शहरीकरण की भूमिका पहले से मानी जाती रही है, लेकिन इन्हीं दोनों कारणों की वजह से वायु प्रदूषण में वृद्धि होना भी इसका एक सीधा परिणाम है।

एक नए अध्ययन में शोधकर्ताओं ने ये जानने की कोशिश की कि क्या हवा में मौजूद सूक्ष्म कणों (पीएम2.5) के संपर्क में लंबे समय तक रहने से डेंगू से मौत का खतरा बढ़ जाता है? जापान की ओइता यूनिवर्सिटी के रिसर्च सेंटर फॉर ग्लोबल एंड लोकल इंफेक्शियस डिसीज के साकिरुल खान के नेतृत्व में और जापान, बांग्लादेश व ब्रिटेन के शोधकर्ताओं के सहयोग से हुए इस अध्ययन में पाया गया कि हवा में पीएम2.5 का स्तर अधिक होने से डेंगू से होने वाली मौतों में काफी बढ़ोतरी होती है।

वर्ष 2020 से 2024 के दौरान एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के (भारत सहित) 20 डेंगू-प्रभावित देशों में यह अध्ययन किया गया। जिन देशों में वार्षिक औसत पीएम2.5 का स्तर 35 µg/m³ से अधिक था, वहां डेंगू से मृत्यु दर उन देशों की तुलना में तीन से पांच गुना अधिक थी, जहां औसत पीएम2.5 का स्तर 15 µg/m³ से कम था

प्रतिरक्षा प्रणाली को कमजोर करना

स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, साल 2023 में दुनिया भर में वायु प्रदूषण के कारण लगभग 80 लाख मौतें हुईं, जिनमें से 45 लाख मौतों की मुख्य वजह हवा में मौजूद पीएम2.5 के संपर्क में रहना था।

वायु प्रदूषण इंसान के स्वास्थ्य की रक्षा करने वाली रोग प्रतिरोधक क्षमता और रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचाने के लिए जाना जाता है। अध्ययनों में पाया गया है कि पीएम2.5 के लंबे समय तक संपर्क में रहने से रक्त वाहिकाओं की अंदरूनी परत में सूजन और खराबी आ जाती है (जिसे वैज्ञानिक भाषा में एंडोथेलियल डिसफंक्शन कहा जाता है)। यह स्थिति आगे चलकर इंसान की प्रतिरक्षा प्रणाली, हृदय और श्वसन प्रणाली को नुकसान पहुंचाती है। डेंगू का एक मुख्य लक्षण यही एंडोथेलियल डिसफंक्शन है, जिसकी वजह से नसों से खून का रिसाव होने लगता है और मरीज शॉक (गंभीर स्थिति) में चला जाता है। शोधकर्ता साकिरुल खान कहते हैं, “लंबे समय तक प्रदूषण के बीच रहने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता और रक्त वाहिकाओं की मजबूती कम हो जाती है। और जब मानसून में डेंगू का संक्रमण होता है, तो बीमारी के अत्यधिक गंभीर होने का खतरा बढ़ जाता है, भले ही उस समय प्रदूषण का स्तर अस्थायी रूप से कम ही क्यों न हो गया हो।”

हवा में प्रदूषण के पुराने आंकड़ों और संक्रमण के रिकॉर्ड की जांच करते हुए ताइवान के दक्षिणी शहरों और सिंगापुर में किए गए दो अलग-अलग अध्ययनों ने भी वायु प्रदूषण और डेंगू के बीच एक मजबूत संबंध दर्ज किया है। इससे पता चलता है कि प्रदूषण का असर मच्छरों के जीवन चक्र, डेंगू वायरस और इंसान की रोग प्रतिरोधक क्षमता तीनों पर पड़ता है।

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में इलाज कराता एक डेंगू का मरीज। भारत सहित 20 डेंगू-प्रभावित देशों में किए गए एक हालिया अध्ययन में पाया गया कि हवा में मौजूद सूक्ष्म कणों (पीएम2.5) के लंबे समय तक संपर्क में रहने से डेंगू से मौत का खतरा काफी बढ़ जाता है। तस्वीर- एपी/राजेश कुमार सिंह
उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में इलाज कराता एक डेंगू का मरीज। भारत सहित 20 डेंगू-प्रभावित देशों में किए गए एक हालिया अध्ययन में पाया गया कि हवा में मौजूद सूक्ष्म कणों (पीएम2.5) के लंबे समय तक संपर्क में रहने से डेंगू से मौत का खतरा काफी बढ़ जाता है। तस्वीर- एपी/राजेश कुमार सिंह

अध्ययन की कमियां

अध्ययन के निष्कर्षों और वायु प्रदूषण को सीधे तौर पर डेंगू की गंभीरता से जोड़ने को लेकर कुछ शंकाएं भी जताई गई हैं। नई दिल्ली स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर जेनेटिक इंजीनियरिंग एंड बायोटेक्नोलॉजी में वेक्टर-बॉर्न डिजीज की ग्रुप लीडर सुजाता सुनील, चिकनगुनिया और डेंगू जैसे वायरस से होने वाले संक्रमणों पर शोध कर रही हैं। इस अध्ययन के “प्रभावशाली नतीजों” को स्वीकार करते और यह मानते हुए कि यह आगे के शोध के लिए नए रास्ते खोलता है, सुनील बताती हैं कि इस अध्ययन में शामिल देशों में स्वास्थ्य ढांचा और चिकित्सीय निगरानी काफी कमजोर है। सुनील ने कहा, “मुझे यह भी स्पष्ट नहीं है कि वहां बीमारियों की जांच की सुविधा कितनी बेहतर है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत सहित इनमें से ज्यादातर देशों में डेंगू के सभी मामलों का दर्ज न होना और पहली बार तथा दूसरी बार हुए डेंगू संक्रमण के आंकड़ों का न होना ऐसे बड़े कारक हैं, जो डेंगू की गंभीरता को प्रभावित करते हैं। और इन पहलुओं का प्रदूषण के स्तर से कोई संबंध नहीं है।”

सुनील आगे समझाती हैं, “भले ही डेंगू के कुल मामलों की रिपोर्टिंग कम होती हो, लेकिन डेंगू से होने वाली मौतों का रिकॉर्ड आमतौर पर दर्ज हो जाता है। इस वजह से मृत्यु दर (केस फेटैलिटी रेट – सीएफआर) बनावटी तौर पर ज्यादा दिखाई देने लगती है, जो जरूरी नहीं कि असली स्थिति को दर्शाती हो।”

उनका यह भी तर्क है कि अलग-अलग क्षेत्रों में डेंगू की निगरानी के प्रयास और रिपोर्टिंग की व्यवस्था में काफी अंतर होता है।

साकिरुल खान के नेतृत्व में हुए इस अध्ययन में, शोधकर्ताओं ने केवल उन्हीं देशों को चुना जिन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर या विश्व स्वास्थ्य संगठन से जुड़ी विश्वसनीय प्रणालियों के जरिए डेंगू के आंकड़े लगातार दर्ज किए थे, जहां 2020 से 2024 के दौरान 50,000 से अधिक डेंगू के मामले आए थे और जिनके पास किसी भी पूरे साल का डेटा गायब नहीं था। शोधकर्ताओं ने कुल बारिश, औसत तापमान, और सामाजिक-आर्थिक व जनसांख्यिकीय कारकों जैसे कि शहरी आबादी, जनसंख्या घनत्व, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, कोविड-19 और जीडीपी के प्रभावों को भी ध्यान में रखा। इन सभी चीज़ों को ध्यान में रखने के बावजूद, पीएम2.5 डेंगू से होने वाली मौतों का एक बहुत बड़ा और प्रमुख कारण बनकर सामने आया।

दिलचस्प बात यह है कि खान की टीम ने पीएम2.5 और शहरी आबादी व जनसंख्या घनत्व के बीच एक नकारात्मक संबंध देखा। हालाँकि, खान इन नतीजों को सावधानी से समझने की सलाह देते हैं। वह कहते हैं, “वैश्विक या देश के स्तर पर देखें, तो कुछ अत्यधिक शहरीकृत या घनी आबादी वाले देशों में हवा की गुणवत्ता को लेकर सख्त नियम लागू हैं, वहां स्वच्छ ऊर्जा का इस्तेमाल हो रहा है और निगरानी की बेहतर व्यवस्था है, जिससे वहां सालाना औसत पीएम2.5 का स्तर कम हो सकता है।”

वह आगे कहते हैं, “इसके विपरीत, कई कम शहरीकृत या कम आबादी वाले देशों में लकड़ी/कचरा जलाने, धूल और प्रदूषण नियंत्रण के कमजोर नियमों के कारण पीएम2.5 का स्तर काफी अधिक देखने को मिलता है।”

एक मादा एडीज एजिप्टी मच्छर। डेंगू फैलाने वाला यह मच्छर आज विकसित देशों तक अपने पैर पसार रहा है। हालाँकि, ऐतिहासिक रूप से डेंगू हमेशा विकासशील देशों की एक उपेक्षित बीमारी रहा है। तस्वीर-स्टीफन ऑसमस/USDA, फ्लिकर (CC BY 2.0) के माध्यम से।
एक मादा एडीज एजिप्टी मच्छर। डेंगू फैलाने वाला यह मच्छर आज विकसित देशों तक अपने पैर पसार रहा है। हालाँकि, ऐतिहासिक रूप से डेंगू हमेशा विकासशील देशों की एक उपेक्षित बीमारी रहा है। तस्वीर-स्टीफन ऑसमस/USDA, फ्लिकर (CC BY 2.0) के माध्यम से।

अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य

जलवायु परिवर्तन, शहरों के विस्तार और लोगों की बढ़ती आवाजाही के कारण डेंगू फैलाने वाला मच्छर एडिस एजिप्टी आज भले ही विकसित देशों में भी अपने पैर पसार रहा है, लेकिन ऐतिहासिक रूप से डेंगू विकासशील देशों की ही एक उपेक्षित बीमारी रहा है। खान की टीम ने पाया कि जिन देशों में प्रति व्यक्ति जीडीपी अधिक थी, वहां डेंगू से होने वाली मौतों में लगभग 35% की कमी दर्ज की गई। खान कहते हैं, “हमारे निष्कर्ष बताते हैं कि कम जीडीपी वाले देशों को अक्सर दोहरी मार झेलनी पड़ती है- एक तरफ लंबे समय तक भारी प्रदूषण का सामना करना और दूसरी तरफ अपेक्षाकृत कमजोर स्वास्थ्य प्रणाली। ये दोनों कारण मिलकर डेंगू से होने वाली मृत्यु दर को बढ़ा देते हैं।”

उदाहरण के लिए, जब शोधकर्ताओं ने बांग्लादेश के अंदरूनी इलाकों का अध्ययन किया, तो पाया कि अलग-अलग हिस्सों में पीएम2.5 का स्तर एक जैसा होने के बावजूद ढाका में मृत्यु दर सबसे ज्यादा थी। शोधकर्ताओं का मानना है कि ऐसा ढाका की अत्यधिक घनी आबादी के कारण अस्पतालों और इलाज की सुविधाओं पर पड़े भारी दबाव की वजह से हो सकता है। इसलिए, उन्होंने स्वास्थ्य सेवाओं की क्षमता और आबादी की विशेषताओं को मृत्यु दर को प्रभावित करने वाले दो बेहद महत्वपूर्ण कारक माना।

भारत दुनिया के सबसे ज्यादा वायु प्रदूषण वाले शीर्ष पांच देशों में शामिल है। स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर 2025 रिपोर्ट के अनुसार, भारत में साल 2023 में वायु प्रदूषण के कारण 20 लाख से अधिक मौतें दर्ज की गईं।

भारत ने अपनी राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 में सार्वजनिक स्वास्थ्य पर अपनी जीडीपी का कम से कम 2.5% खर्च करने का लक्ष्य रखा है, जो वैश्विक मानकों के हिसाब से काफी कम है। भारत इस लक्ष्य से पीछे रहते हुए सार्वजनिक स्वास्थ्य पर अपनी जीडीपी का 2% से भी कम खर्च करता है। इसके कारण स्वास्थ्य क्षेत्र में निजी अस्पतालों का दबदबा बढ़ गया है, आम नागरिकों को इलाज पर अपनी जेब से भारी रकम खर्च करनी पड़ती है और सरकारी स्वास्थ्य प्रबंधन के प्रयासों के लिए बजट की कमी बनी रहती है।

नेशनल सेंटर फॉर वेक्टर बोर्न डिजीज कंट्रोल द्वारा वर्ष 2025 के लिए जारी आंकड़ों के अनुसार, भारत पिछले वर्षों की तुलना में 2025 में डेंगू के मामलों और मौतों में काफी कमी लाने में सफल रहा है, जो मच्छर नियंत्रण के लिए अपनाए गए प्रभावी उपायों का संकेत देता है। (यह आंकड़े नवंबर 2025 तक के हैं और इसमें पश्चिम बंगाल के आंकड़े शामिल नहीं हैं।)

साकिरुल खान कहते हैं, जलवायु में बढ़ते बदलावों और अनिश्चित बारिश के पैटर्न के बावजूद डेंगू-प्रभावित देश किसी भी तरह की लापरवाही नहीं बरत सकते हैं। उन्होंने कहा, “लगातार निगरानी, बीमारी के अचानक फैलने पर उससे निपटने की बेहतर तैयारी, मरीजों का अच्छा इलाज और हवा की गुणवत्ता में सुधार सहित पर्यावरण से जुड़े दीर्घकालिक उपाय आज भी उतने ही जरूरी बने हुए हैं।”

बांग्लादेश के ढाका में प्रदूषित तुराग नदी। शोधकर्ताओं का कहना है कि बांग्लादेश जैसे कम जीडीपी, उच्च प्रदूषण स्तर और अपेक्षाकृत कमजोर स्वास्थ्य सुविधाओं वाले देशों में अक्सर डेंगू से होने वाली मृत्यु दर अधिक होती है। तस्वीर- नुसरत यासमीन/रीच द्वारा फ्लिकर (CC BY 2.0) के माध्यम से।
बांग्लादेश के ढाका में प्रदूषित तुराग नदी। शोधकर्ताओं का कहना है कि बांग्लादेश जैसे कम जीडीपी, उच्च प्रदूषण स्तर और अपेक्षाकृत कमजोर स्वास्थ्य सुविधाओं वाले देशों में अक्सर डेंगू से होने वाली मृत्यु दर अधिक होती है। तस्वीर- नुसरत यासमीन/रीच द्वारा फ्लिकर (CC BY 2.0) के माध्यम से।

वायु गुणवत्ता नियंत्रण

खान के मुताबिक, वायु प्रदूषण जैसी पर्यावरणीय स्थितियों को उस बड़े ढांचे का हिस्सा माना जाना चाहिए जो जलवायु परिवर्तन, शहरीकरण, असमानता और संक्रामक बीमारियों के असर को आपस में जोड़ता है। उन्होंने कहा, “हमारा अध्ययन इस बात पर जोर देता है कि डेंगू की गंभीरता को समझने के लिए केवल मच्छरों पर ध्यान केंद्रित करने वाले पारंपरिक तरीकों से आगे बढ़कर सोचने की जरूरत है।”

उनका यह भी कहना है कि बांग्लादेश, भारत, नेपाल और इंडोनेशिया जैसे डेंगू-प्रभावित और अत्यधिक प्रदूषित देशों में हवा की गुणवत्ता के प्रबंधन को सरकारी स्वास्थ्य तैयारियों के साथ जोड़ने से डेंगू के गंभीर परिणामों को कम करने में मदद मिल सकती है।

सुनील भी मानती हैं कि हवा की गुणवत्ता सुधारने के उद्देश्य से उठाया गया कोई भी कदम स्वागत योग्य और सार्थक है। क्योंकि जैसे ही हवा की गुणवत्ता सुधरेगी, तो उससे जुड़ी दिल और सांस की पुरानी बीमारियों जैसी तमाम स्वास्थ्य समस्याएं कम हो जाएंगी। इसके परिणामस्वरूप लोग अधिक स्वस्थ होंगे और डेंगू या किसी भी अन्य संक्रामक बीमारी का मुकाबला बेहतर तरीके से कर पाएंगे।

साथ ही वह चिंता भी जताती हैं। “अगर हम वायु प्रदूषण नियंत्रण को डेंगू नियंत्रण रणनीति का हिस्सा बना लेते हैं, तो इसका मतलब होगा कि हम मच्छर नियंत्रण के लिए तय जरूरी संसाधनों का रुख दूसरी तरफ मोड़ रहे हैं, जो डेंगू प्रबंधन के लिए कहीं अधिक महत्वपूर्ण और आवश्यक है। इतना ही नहीं, इससे डेंगू की जांच के लिए मिलने वाले बजट में भी कमी आ सकती है।”


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सुनील के अनुसार, वायु प्रदूषण से निपटने के लिए लंबे समय तक किए जाने वाले लगातार प्रयासों की आवश्यकता है और इसे एक अलग नीतिगत मुद्दे के रूप में देखा जाना चाहिए। इसे अन्य बीमारी कार्यक्रमों के साथ नहीं मिलाया जाना चाहिए, क्योंकि इससे दोनों ही मुद्दे कमजोर पड़ सकते हैं। वह आगे कहती हैं, “व्यापक स्तर पर स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने के लिए इन्हें साथ लाना तो समझ में आता है, लेकिन जमीनी स्तर पर दोनों कार्यक्रमों को आपस में मिला देने से दोनों प्रयास मजबूत होने के बजाय कमजोर ही होंगे।”

हाल के कुछ अध्ययनों में मच्छरों के पनपने की प्रक्रिया को तापमान, नमी और बारिश से जोड़कर देखा गया है और बीमारी के फैलाव का पहले से अनुमान लगाने के लिए मॉडल तैयार किए गए हैं। सुनील कहती हैं, “मेरा मानना है कि वायु प्रदूषण का असर मच्छरों की शारीरिक प्रणाली पर भी पड़ता होगा और देखना होगा कि क्या यह बीमारी के प्रसार में कोई भूमिका निभाता है।” वह आगे कहती हैं, “मेरी यह जानने में विशेष रुचि है कि मच्छरों की आबादी पर वायु प्रदूषण का क्या असर होता है, क्योंकि डेंगू के नियंत्रण में यही सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।”


यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 18 मार्च 2026 को प्रकाशित हुई थी।


बैनर तस्वीर- नई दिल्ली के घनी आबादी वाले इलाके में फॉगिंग करता नगर निगम का एक कर्मचारी। (तस्वीर- एपी/मनीष स्वरूप)

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