- वनों की कटाई, पर्यावरण के नुकसान और बढ़ते मानव-बाघ संघर्ष की चिंताओं के बीच महाराष्ट्र सरकार ने चंद्रपुर में एक लौह अयस्क खनन परियोजना पर अस्थायी रूप से रोक लगा दी है।
- यह प्रस्तावित स्थल एक अत्यंत महत्वपूर्ण वन्यजीव कॉरिडोर के भीतर स्थित है और इस क्षेत्र में बाघों की आवाजाही को बाधित कर सकता है। यह क्षेत्र पहले से ही मानव- बाघ संघर्ष की बढ़ती घटनाओं का सामना कर रहा है।
- पर्यावरणविदों का तर्क है कि इस परियोजना के सीमित आर्थिक लाभों की तुलना में इसकी पर्यावरणीय और सामाजिक लागत कहीं अधिक है। उनके अनुसार, इससे रोजगार का सृजन बेहद कम होगा और प्रतिपूरक वनीकरण की योजना भी नाकाफी है।
स्थानीय निवासियों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं के हफ्तों तक चले विरोध-प्रदर्शनों और भूख हड़ताल के बाद, महाराष्ट्र सरकार ने चंद्रपुर जिले के ब्रह्मपुरी वन प्रभाग में स्थित लोहारडोंगरी लौह अयस्क खनन परियोजना पर फिलहाल आगे की कार्रवाई रोक दी है। यह परियोजना पिछले कई महीनों से पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों के लिए बड़ी चिंता का विषय बनी हुई थी।
खनिज (नीलामी) नियम, 2015 के तहत नागपुर की सनफ्लैग आयरन एंड स्टील कंपनी लिमिटेड को जंगल की लगभग 36 हेक्टेयर जमीन आवंटित की गई थी। खबरों के मुताबिक, इस प्रोजेक्ट का रास्ता साफ करने के लिए लगभग 18,000 पेड़ काटे जाने की आशंका जताई गई है। हालाँकि, मोंगाबे-इंडिया काटे जाने वाले पेड़ों की सही संख्या की पुष्टि करने वाले दस्तावेजों तक नहीं पहुंच सका, लेकिन सार्वजनिक रूप से उपलब्ध 2022 की ट्री एन्यूमरेशन सर्वे रिपोर्ट बताती है कि इस परियोजना के लिए 11,773 से अधिक पेड़ काटे जाने हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में इस संख्या में और पेड़ जुड़ चुके होंगे।
स्थानीय निवासियों की सबसे बड़ी चिंता इस प्रोजेक्ट से पर्यावरण को होने वाला भारी नुकसान है, जिससे बाघों और इंसानों के बीच संघर्ष की घटनाओं के बढ़ने की पूरी आशंका है।

मानव-बाघ संघर्ष की बढ़ती घटनाएं
महाराष्ट्र का चंद्रपुर जिला इंसान और बाघों के बीच बढ़ते संघर्ष का मुख्य केंद्र बन चुका है, जहां इन हमलों में अक्सर लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ती है। मोंगाबे-इंडिया ने इस स्थिति पर रिपोर्टिंग करने के लिए 2024 के अंत में प्रभावित इलाकों का दौरा किया। इसमें सामने आया कि साल 2022–2023 में बाघों के हमलों में रिकॉर्ड 111 लोगों की मौत हुई थी, जबकि 2023–2024 में अब तक 59 मौतें दर्ज की जा चुकी हैं। नए आधिकारिक आंकड़ों का अभी इंतजार है।
देश के सबसे लोकप्रिय टाइगर रिजर्वों में से एक ताडोबा-अंधारी टाइगर रिजर्व (टीएटीआर) में किए गए कड़े संरक्षण उपायों की वजह से राज्य में बाघों की संख्या में भारी बढ़ोतरी हुई है।
अप्रैल 2022 की राष्ट्रीय बाघ गणना के अनुसार, भारत के कुल 3,682 बाघों में से 444 बाघ महाराष्ट्र में हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, ताडोबा-अंधारी टाइगर रिजर्व में करीब 97 बाघ हैं। लेकिन गैर-आधिकारिक अनुमानों की मानें तो यह संख्या 150 के आसपास हो सकती है।
पर्यावरण संरक्षण के लिए काम करने वाली संस्था द कॉर्बेट फाउंडेशन के निदेशक केदार गोरे ने कहा, “ताडोबा मध्य भारत में बाघों की नर्सरी बन चुका है। यह कई महत्वपूर्ण टाइगर रिजर्व और जंगलों से जुड़ा हुआ है। लंबे समय तक बाघों के संरक्षण के लिहाज से यह प्राकृतिक जुड़ाव बेहद जरूरी है।”
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अगर यह प्रस्तावित खनन परियोजना शुरू होती है, तो इससे बाघों की स्वाभाविक आवाजाही और उनके दूसरे इलाकों में फैलने की प्रक्रिया में बाधा आ सकती है। दरअसल, यह प्रोजेक्ट ताडोबा टाइगर रिजर्व को ब्रह्मपुरी-गडचिरोली वन क्षेत्र से जोड़ने वाले एक अति-संवेदनशील वन्यजीव गलियारे में स्थित है। बाघों के अलावा, यह इलाका जंगली सूअर, गौर (भारतीय बायसन), सांभर हिरण, तेंदुए और कई अन्य वन्यजीवों का भी प्राकृतिक आवास है।
भौगोलिक दृष्टि से, खनन के लिए आवंटित यह वन क्षेत्र ताडोबा (जो इसके पश्चिम में स्थित है) को चारों तरफ के प्रमुख जंगलों से जोड़ता है। इसके पूर्व में गडचिरोली जिले के घने जंगल हैं, उत्तर में नवेगांव-नागझिरा टाइगर रिजर्व है, जबकि दक्षिण में छत्तीसगढ़ का इंद्रावती टाइगर रिजर्व आता है।

वन्यजीवों की आवाजाही के लिहाज से महत्वपूर्ण इस क्षेत्र में प्रस्तावित खनन स्थल के पारिस्थितिक महत्व को समझाते हुए केदार गोरे कहते हैं कि जंगल के ये हिस्से आपस में प्राकृतिक रूप से जुड़े हुए हैं। उन्होंने बताया, “हालाँकि, जब सरकारी तौर पर इन कॉरिडोर का नक्शा बनाया जाता है, तो उन्हें अक्सर सिर्फ तीन से चार किलोमीटर चौड़ी संकरी पट्टियों के रूप में दिखाया जाता है। यह इस जुड़ाव को समझने का बहुत ही सीमित तरीका है। वास्तव में, पर्यावरण विशेषज्ञों के लिए यह पूरा जंगली इलाका ही एक कॉरिडोर की तरह काम करता है, जहां से बाघ टाइगर रिजर्व से बाहर निकलकर आगे बढ़ते हैं; क्योंकि बाघ नक्शे पर खींची गई इन छोटी-मोटी सीमाओं को नहीं समझते।” वह आगे कहते हैं, “इसी वजह से, आधिकारिक रूप से तय किए गए कॉरिडोर के बाहर आने वाले क्षेत्र को अक्सर गैर-जरूरी मान लिया जाता है, भले ही वह पर्यावरण के नजरिए से कितना ही महत्वपूर्ण क्यों न हो।”
मध्य भारत में वन्यजीव संरक्षण पर काम करने वाली संस्था सतपुड़ा फाउंडेशन के सहायक निदेशक मंदार पिंगले बताते हैं, “जब बाघ ताडोबा से निकलकर ब्रह्मपुरी और उससे आगे की तरफ बढ़ते हैं, तो वे आवाजाही के लिए जंगल के इन्हीं हिस्सों पर निर्भर रहते हैं। प्रस्तावित खनन परियोजना जंगल की जमीन के एक बड़े हिस्से को घेर लेगी, जिससे पहले से ही दबाव झेल रहा यह प्राकृतिक तंत्र और अधिक टुकड़ों में बंट जाएगा।” सड़कों, नहरों और रेलवे लाइनों के निर्माण से ये वन्यजीव कॉरिडोर पहले से ही इंसानी गतिविधियों के भारी दबाव में हैं। गोरे कहते हैं, “एक विकासशील देश में सड़कों और रेलवे जैसे बुनियादी ढांचों को तो नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है, लेकिन वन्यजीवों के लिए इस इलाके के महत्व को देखते हुए खदान परियोजना पर दोबारा विचार जरूर किया जाना चाहिए।”
इंसानों का बढ़ता दबाव
पर्यावरणविदों द्वारा उठाई गई एक और बड़ी चिंता यह है कि ओपन-कास्ट खनन को शुरू करने के लिए पहुंच सड़कों और अन्य सुविधाओं जैसे बुनियादी ढांचों में तेजी से बढ़ोतरी होगी, साथ ही भारी वाहनों की आवाजाही भी बढ़ेगी। इससे जंगलों की शांति भंग हो सकती है, हादसों में वन्यजीवों के मारे जाने का खतरा बढ़ सकता है और महत्वपूर्ण वन क्षेत्र इंसानी दबाव के प्रति और अधिक संवेदनशील हो सकते हैं।
पिंगले के मुताबिक, अगर आर्थिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो भी यह परियोजना व्यावहारिक प्रतीत नहीं होती। मानव-वन्यजीव संघर्ष के कारण राज्य सरकार पर पहले से ही काफी वित्तीय बोझ है, जहां किसी इंसान की मौत होने पर लगभग ₹25 लाख का मुआवजा दिया जाता है। अगर प्राकृतिक आवासों के नष्ट होने से यह संघर्ष और बढ़ता है, तो सरकार का यह खर्च भी बढ़ जाएगा। दूसरी ओर, इस खनन परियोजना से केवल 32 स्थायी नौकरियां और लगभग 40 अतिरिक्त अस्थायी पद मिलने की ही उम्मीद है। पिंगले का कहना है कि इतने छोटे से आर्थिक फायदे के लिए पर्यावरण और समाज को इतना बड़ा नुकसान पहुंचाना उचित नहीं है।
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प्रस्तावित परियोजना में यवतमाल में प्रतिपूरक वनीकरण की बात कही गई है। पिंगले का मानना है कि यवतमाल में नए पेड़ लगाने से खनन स्थल पर नष्ट होने वाले सालों पुराने और घने जंगलों की भरपाई कभी नहीं हो सकती। यह खनन परियोजना कुल मिलाकर पर्यावरण और अर्थव्यवस्था दोनों को भारी नुकसान पहुंचाने वाली है। इससे मानव-वन्यजीव संघर्ष और बढ़ेगा, बाघों का महत्वपूर्ण इलाका टुकड़ों में बंट जाएगा और क्षेत्र में लंबे समय से चल रहे संरक्षण के प्रयासों को गहरा धक्का लगेगा।
यह खबर मोंगाबे-इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 15 अप्रैल 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: सीताराम पेठ गांव की पारिस्थितिकी विकास समिति के अध्यक्ष मधुकर पांडुरंग कोवे का सुझाव है कि इस क्षेत्र में बाघों से सामना होने की बढ़ती घटनाओं का एकमात्र समाधान निवासियों को दूसरी जगह बसाना है। तस्वीर – सौमित्र शिंदे/मोंगाबे।