- नेपाल में रसुआ से बत्तार तक कीचड़ और मलबे का व्यापक फैलाव है। सैकड़ों लोग अपने परिजनों की तलाश में हैं, जबकि सेना जीवित लोगों को बचाने में जुटी है।
- रसुआ में लगातार दूसरे साल हिमनद से जुड़ी विनाशकारी बाढ़ आई है। विशेषज्ञ इसे हिमालय में उभरते आपदा के नए रुझान के रूप में देख रहे हैं।
- बाढ़ का बहाव मैदानी इलाकों में कमजोर पड़ने और गंडक में पहले से कम पानी होने के कारण बिहार और उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती इलाके बड़ी तबाही से बच गए।
- विशेषज्ञों ने भारत, नेपाल और चीन के बीच साझा निगरानी एवं चेतावनी प्रणाली बनाने के साथ हिमालय में निर्माण और पर्यटन की सीमा का आकलन करने की सिफारिश की है।
नेपाल के राजबिराज के रहनेवाले श्याम सुंदर यादव अपने भाई अजय कुमार यादव की तलाश में नुआकोट के बत्तार में पिछले चार दिन से रुके हैं। अजय वहां से 15 किमी दूर बेत्रावती बाजार के नीलकंठ माध्यमिक विद्यालय, उत्तरी गया में कंप्यूटर पढ़ाते थे। नेपाल में 26 अगस्त को आई भीषण बाढ़ के बाद से उनसे संपर्क नहीं हो पा रहा है। मगर श्याम चाहकर भी बत्तार से आगे नहीं बढ़ पा रहे, क्योंकि आगे कीचड़ और मलबे की नदी है। रास्ता दलदली है।
इसी बत्तार में नेपाली सेना का बेस कैंप भी है, जहां से हेलिकॉप्टर के जरिये वे बचाव अभियान चला रहे हैं। कीचड़ और मलबे की इस नदी का फैलाव उत्तर दिशा में लगभग 54 किमी दूर चीन की सीमा पर स्थित रसुआगड़ी के इमिग्रेशन सेंटर तक है। सेना हेलिकॉप्टर के जरिये पूरे इलाके का सर्वे करती है, अगर कहीं कोई जिंदा दिखता है तो उसे बचाने की कोशिश करती है।
श्याम सुंदर जो पेशे से पत्रकार हैं, कहते हैं, “अभी नेपाल सरकार की प्राथमिकताओं में शव निकालना नहीं है। अभी वे सिर्फ जिंदा लोगों को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। यह सही भी है। वैसे भी कीचड़ के नीचे दबे हजारों शवों को निकालना आसान काम नहीं है। सिर्फ मेरे भाई के स्कूल के 200 से अधिक बच्चे और चार शिक्षकों के इस मलबे में दबे होने की आशंका है। यहां से बार्डर तक कई बस्तियां हैं। उनमें जो खुशकिस्मत थे वही बच पाये हैं।”
बत्तार में श्याम सुंदर जैसे कई लोग तीन-चार दिन से डटे हैं। इस उम्मीद में कि उनके परिजन जो बेत्रावती, त्रिशूली बाजार या रसुआ में रह रहे थे, शायद बचे हो।
नेपाल की भोटेकोशी नदी में आई इस भीषण बाढ़ को समझने के लिए यह विवरण शायद नाकाफी है। मगर इतना जरूर समझा जा सकता है कि अब तक तबाही का सही आंकड़ा सामने नहीं आया है। सही तस्वीर सामने आने में शायद हफ्तों लग जायें, जो हमारे अनुमान से कहीं अधिक बड़ा होगा।
फिलहाल जब यह खबर लिखी जा रही है, नेपाल सरकार की तरफ से 903 शवों के मिलने की सूचना है और 4,247 लोग लापता बताये गये हैं। आंकड़े श्याम सुंदर यादव की बातों की पुष्टि करते हैं, क्योंकि अब तक सबसे कम 24 शव रसुआ से मिले हैं, जो सबसे प्रभावित जिला है। सबसे अधिक 272 शव चितवन में मिले हैं। जो रसुआ इमिग्रेशन सेंटर से 150 किमी से अधिक दूर है। ये शव स्थानीय लोगों के नहीं हैं, ये वहां बहकर पहुंचे हैं।

क्या हुआ था 26 अगस्त के दिन
नेपाल के जलविज्ञान एवं जलस्रोत अनुसंधान केंद्र, काठमांडु द्वारा जारी सूचना के मुताबिक 26 अगस्त की सुबह करीब 8.37 मिनट पर नेपाल-चीन सीमा पर स्थित ल्हेंदे खोला (एक छोटी पतली नदी) में बड़े आकार (लगभग एक वर्ग किमी) का हिमखंड और उससे लगा पहाड़ का हिस्सा गिरा। इस घटना से इस क्षेत्र में 5.2 तीव्रता का भूकंप दर्ज किया गया। नेपाल के खान एवं भूतत्व विभाग 4.4 रिएक्टर स्केल के भूकंप की सूचना मिली।
रसुआ और बेत्रावती के जलमापन केंद्र से मिली जानकारी के अनुसार सुबह नौ बजे यह जमा पानी ल्हेंदे खोला से भोटेकोशी में जाना शुरू हो गया। नेपाल सरकार के मुताबिक 9.10 बजे भोटेकोशी और त्रिशूली नदी के तटीय इलाकों और डाउनस्ट्रीम के इलाकों को खाली कराने के लिए अनाऊंसेंट शुरू करवाए गए और लाखों एसएमएस भेजे गए। मगर 9.15 तक कीचड़ और पानी की वह बाढ़ रसुआ तक पहुंच गई थी और वहां से 36 किमी दूर बेत्रावती जलमापन केंद्र ने 9.20 बजे पानी की 3.55 मीटर ऊंची लहरें देखे जाने का आखिरी सिग्नल भेजा।
इस पूरे इलाके में 35 पुल, 45 झूला पुल और 40 किमी पक्की सड़क क्षतिग्रस्त हो गई। एक दर्जन से अधिक विद्युत परियोजनाएं क्षतिग्रस्त हुईं और उनमें काम करने वाले कई लोग टनल में फंसे रह गए। पूरे इलाके में बिजली और टेलीफोन सेवा भी ध्वस्त हो गई।
बेत्रवती के दक्षिण में सड़क के रास्ते करीब 100 किलोमीटर दूर धारिंग गलछी के बाद बाढ़ की गति थोड़ी धीमी हुई। 11.50 बजे पानी 23 किमी दूर मलेखु बाजार तक पहुंचा। इसके बाद अलग अलग इलाके से गुजरते हुए 3.20 बजे दोपहर पानी नारायणी देवघाट क्षेत्र में पहुंचा, वहां शाम 4 बजे तक बाढ़ के पानी का जलस्तर घटने लगा।
नेपाल सरकार के आकलन के मुताबिक देवघाट पहुंचने तक इस पूरे रास्ते में 1.96 करोड़ घन लीटर अतिरिक्त पानी बहा था।

कैसे बचे बिहार और यूपी
इस बीच भारत में बिहार सरकार को नेपाल की घटना के कारण गंडक नदी के जल स्तर में वृद्धि की सम्भावना की सूचना मिल चुकी थी। गंडक का भोटेकोशी से त्रिशूली नदी, और वहां से नारायणी नदी होते हुए वाल्मिकीनगर बराज तक आता है। नारायणी नदी भारत में आकर गंडक नदी कहलाने लगती है। गंडक नदी बिहार के पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, गोपालगंज, सीवान, सारण, मुजफ्फरपुर और वैशाली जिले से होकर गुजरती है और सोनपुर के पास गंगा नदी से संगम करती है। इस बीच वाल्मिकीनगर से आगे वह कुछ दूरी तक उत्तर प्रदेश के कुशीनगर और महाराजगंज जिले के हिस्से से भी गुजरती है। ऐसे में यूपी सरकार भी अलर्ट हो गई।
बिहार सरकार के आपदा प्रबंधन विभाग ने तत्काल बैठक कर जानकारी साझा की कि गंडक नदी में तीन मीटर ऊंची पानी की लहरें आ सकती हैं। ऐहतियातन एनडीआरएफ-एसडीआरएफ की टुकड़ियां उतार दी गईं। गंडक तटबंध के बीच के गांव खाली कराए जाने लगे और लोगों को रिलीफ कैंप में रखा गया। सबसे जरूरी पहल यह हुई कि गंडक बराज के सभी दरवाजे खोल दिए गए।
हालाँकि, बिहार में पानी रात 11 बजे आना शुरू हुआ और वह भी काफी कम मात्रा में। इस हादसे के दौरान वाल्मिकीनगर बराज का अधिकतम जल स्राव 1.5 लाख क्यूसेक देखा गया जो कि अगस्त के महीने के जल स्राव दो लाख क्यूसेक से भी कम था। इन परिस्थितियों में खबर लिखे जाने तक गंडक नदी के आसपास का एक भी गांव बाढ़ से प्रभावित नहीं हुआ है। सरकार ने अपनी तरफ से ऐहतियातन गंडक बांध के बीच के गांव के पांच हजार लोगों को खाली कराकर रिलीफ कैंपों में रखा था, वे अब वापस लौट गये हैं।
बिहार राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकार के उपाध्यक्ष उदय कांत मिश्र कहते हैं, “आंकड़ों से पता चलता है कि नेपाल से जो पानी का बहाव चला उसकी ऊंचाई सात मीटर की थी क्योंकि वहां पहाड़ों में नदी संकरी थी, लेकिन मैदानी इलाकों में आते ही नदी का पाट चौड़ा हो जाने से पानी की धार को फैलाव मिला जिससे बहाव की आक्रामकता कम गई। इस घटना से जो गंडक में जल प्रवाह दो-ढाई लाख क्यूसेक्स होने की संभावना थी, उसके लिए सरकार पहले से तैयार थी। क्योंकि वाल्मिकीनगर बराज में पिछले वर्षों में इससे कहीं अधिक पानी आ चुका था।”
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वे कहते हैं, “थल सेना, वायु सेना, आपातकालीन स्थिति में बीस मिनट के अंदर तीस मीटर लम्बा पुल बनाने की क्षमता, ड्रोन के माध्यम से आवश्यक सामान और दवाओं की आपूर्ति की तैयारियां हमारे पास हैं। इसरो की संस्था सैक ने बिहार की आपदाओं के बारे में, सैटेलाइट के माध्यम से, ससमय डाटा उपलब्ध कराने के लिये बोधि नामका प्लेटफार्म बनाया है। इनसे आपदाओं का पूर्वानुमान और सटीक जानकारी मिल जाती है। तटबंधों की निगरानी, सुरक्षा और मरम्मत के लिए पिछले सभी वर्षों से अधिक तैयारियां की गई हैं।”
इस बाढ़ की आपदा से भारत के इलाके जरूर बच गये, मगर बड़ी संख्या में भारतीय इस आपदा की चपेट में आए। भारत सरकार के विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक देश के 1933 लोग हादसे के वक्त नेपाल या चीन में थे। इनमें चीन में 1498 और 433 नेपाल में थे। नेपाल में 29 अगस्त तक 108 भारतीय बचाये गये, 50 से फिर से संपर्क स्थापित किया गया मगर 275 लापता है। इनके अलावा भारतीय मूल के भी 128 लोग लापता हैं। इनमें से कई लोग कैलाश मानसरोवर यात्रा पर थे।
हिमालय में आपदा का नया ट्रेंड
नेपाल में जल प्रबंधन एवं जलवायु परिवर्तन को लेकर काम करने वाले मधुकर उपाध्याय कहते हैं, “हिमालय के क्षेत्र में ऐसी घटनाएं बिल्कुल नई नहीं हैं। कम से कम 2015 के भूकंप के बाद से हमने ऐसी कई घटनाएं देखी हैं। उससे पहले केदारनाथ में हादसा हुआ था। चमोली में 2021 में ऐसा ही हादसा हुआ। 2012 में तो नेपाल के पोखरा में ऐसी बाढ़ आई, जिसकी हमने कल्पना भी नहीं की थी।”
वे कहते हैं, “मगर यह बाढ़ सबसे अलग है। इसके जो विजुअल देखे हैं, वे सबसे भयावह हैं। मगर मेरे लिए सबसे ज़्यादा फिक्र की बात है कि हमने अब तक एक जगह दो बार हिम और भू-स्खलन की वजह से बाढ़ आते अब तक नहीं देखा था। रसुआ में ऐसी बाढ़ पिछले साल 2025 में भी आई थी। तब भी ग्लेशियर लेक फटने से बाढ़ आई थी, लगभग 25 लोग मरे थे और तीन-चार हाइड्रोपावर केंद्र, सड़क और पुल क्षतिग्रस्त हुए थे। यह हिमालय क्षेत्र में बिल्कुल नया ट्रेंड है। इसका मतलब इस क्षेत्र में अब कभी भी कुछ हो सकता है और हिमखंडो के गिरने और भूस्खलन के कारण अब ऐसी आपदाएं नियमित हो जायेंगी।”
लंबे अरसे से हिमालय पर शोध करने वाले लेखक-पर्यावरणविद शेखर पाठक कहते हैं, “हिमालय की भंगुरता जगजाहिर है और इसके भीतर भूकंप छिपे हैं। वह खुद को भी तोड़ता-फोड़ता रहता है। इन सबको नजरअंदाज करते हुए इधर के सालों में हिमालय पर मानवीय गतिविधियां तेज हुई हैं। सड़क बन रही हैं, टनल बन रहे हैं, पुल बन रहे हैं। डाइनामाइटिंग हो रही है। टूरिज्म की वजह से आवाजाही खूब बढ़ी है। यह सब भी हिमालय की भंगुरता को और बढ़ा रहे हैं। फिर ग्लोबल वार्मिंग का हिमालय पर ज्यादा ही असर हो रहा है। इन सबकी वजह से हिमालय के ऊपरी हिस्से में इस तरह की घटनाओं को बढ़ावा दिया है।”
इसी बात में मधुकर जोड़ते हैं, “दरअसल ग्लोबल वार्मिंग जो हिमालय में दोगुना असर डाल रहा है, उसकी वजह से ग्लेशियर पिघलता और जमता रहता है। ऐसे में उसके नीचे की चट्टानों में भी दरारें आती हैं। 2015 में नेपाल में आये भूकंप की वजह से भी ऐसा हो रहा है।”

क्या है समाधान
मधुकर कहते हैं, “फिलहाल तो ऐसी घटनाओं को रोक नहीं सकते और इसकी अर्ली वार्निंग भी मुश्किल है। मगर भारत, चीन और नेपाल तीनों देश मिलकर इसकी निगरानी करें तो शायद अर्ली वार्निंग का सिस्टम बन सके। क्योंकि यह साझा समस्या है। इस हादसे से चीन का इलाका भी कम प्रभावित नहीं हुआ है।”
साथ ही वे कहते हैं, “अब सरकारों और लोगों को भी गंभीरता से समझना होगा कि हिमालय कितनी मानवीय गतिविधि बर्दाश्त कर सकता है। इसका आकलन कराये बिना न हाइवे बने, न पुल, न टनल और न टूरिज्म बढ़े।”
आखिरी सवाल के तौर पर जब उनसे पूछा जाता है कि नेपाल को इस हादसे से उबरने में कितना वक्त लगेगा तो वे कहते हैं, “कम से कम दो से तीन साल तो सिर्फ कीचड़ की नदी को साफ करने में लगेंगे, खास कर जैसा इसका फैलाव है।”
बैनर तस्वीरः टनल के भीतर फंसे मजदूरों को निकालने के लिए रास्ता खोलने की कोशिश। तस्वीर साभार- नेपाल आर्मी