Site icon Mongabay हिन्दी

जहां जाते हैं कीट, वहीं पहुंचते हैं पक्षी: पूर्वी हिमालय के अध्ययन में मिले संकेत

पीले गले वाली फुलवेटा जो ईगलनेस्ट वन्यजीव अभयारण्य में मध्यम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पाई जाने वाली एक आम प्रजाति है। यह पक्षी बड़े झुंड बनाती है और मिलकर झाड़ियों से कीट चुनकर खाती है। चूंकि, पत्तियों पर रहने वाले कीटों की संख्या मौसम के अनुसार स्थिर रहती है, इसलिए फुलवेटा जैसी पत्तियों से कीट चुनकर खानी वाले पक्षी बड़े पैमाने पर प्रवास नहीं करती हैं। तस्वीर: तरुण मेनन।

पीले गले वाली फुलवेटा जो ईगलनेस्ट वन्यजीव अभयारण्य में मध्यम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पाई जाने वाली एक आम प्रजाति है। यह पक्षी बड़े झुंड बनाती है और मिलकर झाड़ियों से कीट चुनकर खाती है। चूंकि, पत्तियों पर रहने वाले कीटों की संख्या मौसम के अनुसार स्थिर रहती है, इसलिए फुलवेटा जैसी पत्तियों से कीट चुनकर खानी वाले पक्षी बड़े पैमाने पर प्रवास नहीं करती हैं। तस्वीर: तरुण मेनन।

  • अरुणाचल प्रदेश में किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि उड़ने वाले और जमीन पर रहने वाले कीट सर्दियों में कम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में चले जाते हैं। इससे कीटों को खाने वाले पक्षी भी मौसम के हिसाब से होने वाले इन बदलावों का बारीकी से अनुसरण करते हैं।
  • पत्तियों पर रहने वाले कीटों में मौसम के अनुसार ऐसा कोई बदलाव नहीं देखा गया और उन पर निर्भर रहने वाले पक्षी भी ज्यादातर एक ही जगह पर रहे। इससे संकेत मिलता है कि अलग-अलग ऊंचाई वाले क्षेत्रों के बीच पक्षियों का प्रवास भोजन की उपलब्धता से जुड़ा है।
  • नतीजों से पता चलता है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से कीटों की उपलब्धता और पक्षियों की आवाजाही के बीच समय का तालमेल बिगड़ सकता है, जिससे हिमालयी पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र में पक्षियों के प्रजनन पर असर पड़ सकता है।

अरुणाचल प्रदेश के हिमालय में रहने वाली मेंबैबलर (सतबहिया), लाफिंग थ्रश (हंसमुख कस्तूरी), युहिना और पहाड़ों पर रहने वाले दूसरी छोटी पक्षियां हर सर्दियों में प्रवास के लिए नीचे की तरफ आने लगते हैं। ये पक्षियां गर्म महीनों में पहाड़ों की ऊंची चोटियों पर रहती हैं। इनमें से कई पक्षी असल में उड़ती नहीं हैं। वे बस एक टहनी से दूसरी टहनी और एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर फुदकती हुई कई दिनों और हफ्तों में सैकड़ों मीटर नीचे आ जाती हैं। फिर, गर्मियां आने पर वे वापस ऊंचाई वाली जगहों पर चली जाती हैं।

हिमालय में इस तरह की मौसमी आवाजाही आम है, जहां ऊंचाई वाले इलाकों में रहनी वाली लगभग 65% पक्षी किसी न किसी रूप में ऊंचाई के अनुसार जगह बदलती हैं। लेकिन, इन बदलावों के पीछे की वजहें अब तक पूरी तरह समझी नहीं जा सकी हैं।

भारतीय विज्ञान संस्थान के पीएचडी शोधकर्ता और अध्ययन के प्रमुख लेखक तरुण मेनन ने कहा, “पक्षियों के प्रवास की वजह को लेकर दो मुख्य सिद्धांत हैं और दोनों ही तापमान से जुड़े हैं।” “एक तो यह है कि ठंड सीधे पक्षी को प्रभावित करती है और वह गर्म बने रहने के लिए दूसरी जगह चली जाती है। दूसरा यह है कि ठंड भोजन को प्रभावित करती है और पक्षी भोजन का पीछा करते हुए जगह बदलती है।”

हिमालय में अपने पूर्व के काम के दौरान मेनन ने देखा था कि सर्दियों में पहाड़ से नीचे आने वाले पक्षियों में लगभग वे पक्षी ही हमेशा शामिल होते थे जो कीट खाते हैं। यह अवलोकन आगे चलकर बड़े सवाल में बदल गया: क्या ये पक्षी ठंड से बचने के बजाय कीटों का पीछा करते हुए जगह बदल रहे थे?

ईगलनेस्ट वन्यजीव अभयारण्य का विहंगम दृश्य, जहां सिर्फ तापमान की तुलना में कीटों की उपलब्धता पक्षियों की पर्वत श्रृंखलाओं में ऊंचाई या निचले इलाकों में मौसमी आवाजाही को ज्यादा प्रभावित कर सकती है। तस्वीर: तरुण मेनन।
ईगलनेस्ट वन्यजीव अभयारण्य का विहंगम दृश्य, जहां सिर्फ तापमान की तुलना में कीटों की उपलब्धता पक्षियों की पर्वत श्रृंखलाओं में ऊंचाई या निचले इलाकों में मौसमी आवाजाही को ज्यादा प्रभावित कर सकती है। तस्वीर: तरुण मेनन।

यह अध्ययन बायोलॉजी लेटर्स में प्रकाशित हुआ है। इसमें पूर्वी हिमालय से ऐसे सबूत मिले हैं, जो बताते हैं कि सिर्फ तापमान की तुलना में कीटों की उपलब्धता इन मौसमी आवाजाही को ज्यादा प्रभावित कर सकती है। शोधकर्ताओं ने ईगलनेस्ट वन्यजीव अभयारण्य और उससे सटे सिंगचुंग बुगुन विलेज कम्युनिटी रिजर्व में 2,300 मीटर की ऊंचाई वाले वन क्षेत्र में सात जगहों पर गर्मियों (अप्रैल-जून) और सर्दियों (नवंबर-जनवरी) में आर्थ्रोपोड (जीव जिनके जोड़दार पैर होते हैं) और पक्षियों के नमूने लिए। ये जगहें समुद्र तल से 800 से 3,100 मीटर की ऊंचाई के बीच स्थित है।

मेनन कहते हैं कि पहले भी पर्वतीय क्षेत्रों में अलग-अलग ऊंचाई पर कीटों का अध्ययन किया गया है, लेकिन यह अध्ययन इसे प्रवास के नजरिए से देखता है। इसमें यह देखा गया है कि मौसम और ऊंचाई के साथ कीटों में किस तरह का बदलाव होता है और इसका पक्षियों पर क्या असर पड़ता है।

कीटों पर सर्दियों का असर अलग-अलग

टीम ने पूरे साल भोजन की उपलब्धता में होने वाले बदलावों को समझा। इसके लिए उन्होंने उड़ने वाले कीटों के लिए चिपचिपे जाल, जमीन पर रहने वाले कीटों के लिए गड्ढे वाले जाल और पत्तियों पर रहने वाले कीटों के लिए शाखाओं को हिलाने की विधि का इस्तेमाल कर आर्थ्रोपोड के नमूने एकत्र किए। अध्ययन की अवधि के दौरान उन्होंने गर्मियों में 23 वर्गों के 12,744 और सर्दियों में 4,079 आर्थ्रोपोड एकत्र किए। इनमें मक्खियां (डिप्टेरा), असली कीट (हेमिप्टेरा), चींटियां और ततैया (हाइमेनोप्टेरा) तथा मकड़ियां (एरेनी) सबसे अधिक संख्या में पाए गए।

टीम ने पाया कि गर्मियों में उड़ने वाले और जमीन पर रहने वाले कीटों की संख्या ऊंचाई बढ़ने के साथ बढ़ी। हालांकि, सर्दियों में यह पैटर्न उलट गया और उनकी संख्या कम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ज्यादा पाई गई। इसके विपरीत, पत्तियों पर रहने वाले कीटों का व्यवहार अलग था। दोनों मौसमों में ऊंचाई बढ़ने के साथ उनकी संख्या घटती गई, हालांकि लगभग 1,600 मीटर की ऊंचाई पर इनकी संख्या में मामूली बढ़ोतरी देखी गई और मौसम के अनुसार इनमें बहुत कम बदलाव हुआ। अध्ययन में इस स्थिरता के लिए वनस्पतियों के संरक्षणकारी प्रभाव को जिम्मेदार बताया गया है। पत्तियां सुरक्षित जलवायु बनाती हैं, जो उन पर रहने वाले कीटों को तापमान में बहुत ज्यादा उतार-चढ़ाव से बचाती है।

एक नतीजा खास तौर पर अप्रत्याशित रहा। मकड़ियां गर्मियों की तुलना में सर्दियों में ज्यादा तादाद में पाई गईं। ऐसा खासकर कम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में हुआ जो लगभग सभी अन्य समूहों के बिल्कुल विपरीत था। मेनन को लगता है कि इसका संबंध उनके शरीर की कार्यप्रणाली और व्यवहार से है। “मकड़ियों में ठंड के अनुकूल होने वाले गुण और बारीक आवासों का इस्तेमाल करने की क्षमता पाई जाती है, जिससे वे उस समय भी जीवित रह सकती हैं, जब अन्य आर्थ्रोपोड निष्क्रिय अवस्था में चले जाते हैं।” सर्दियों में पक्षियों के लिए भोजन के स्रोत के रूप में मकड़ियों के महत्व पर आगे किया जाने वाला अध्ययन तैयार किया जा रहा है।

नॉक्टुइडी पतंगा परिवार से संबंधित लूपर कैटरपिलर। पत्तियों पर रहने वाली यह इल्ली भोजन का महत्वपूर्ण जरिया है और पत्तियों से कीट चुनकर खाने वाले पक्षी अक्सर इनका शिकार करते हैं। तस्वीर: प्रणव बालासुब्रमण्यम।
नॉक्टुइडी पतंगा परिवार से संबंधित लूपर कैटरपिलर। पत्तियों पर रहने वाली यह इल्ली भोजन का महत्वपूर्ण जरिया है और पत्तियों से कीट चुनकर खाने वाले पक्षी अक्सर इनका शिकार करते हैं। तस्वीर: प्रणव बालासुब्रमण्यम।

शिकार के हिसाब से आवाजाही करती पक्षियां

कीटों की संख्या इसलिए अहम है, क्योंकि अलग-अलग पक्षी अलग-अलग तरीके से शिकार करते हैं। सैलीयर पक्षी हवा में ही कीटों को पकड़ लेते हैं। जमीन पर कीट खोजने वाले पक्षी जंगल की जमीन पर शिकार करते हैं। पत्तियों से कीट खाने वाले पक्षी पत्तियों पर मौजूद कीटों को चुनते हैं। नवंबर 2022 से जनवरी 2024 के बीच, अध्ययन में दो गर्मियों और दो सर्दियों के दौरान मिस्ट-नेट का इस्तेमाल करके पक्षियों के नमूने लिए गए। इस दौरान गर्मियों में 160 प्रजातियों के 1,971 अलग-अलग पक्षी और सर्दियों में 133 प्रजातियों के 1,721 पक्षियों के नमूने लिए गए।

नतीजे आर्थ्रोपोड के पैटर्न से काफी हद तक मिलते-जुलते थे। सैलीयर और जमीन पर कीट खोजने वाले पक्षी गर्मियों में ज्यादा ऊंचाई वाले क्षेत्रों में अधिक पाए गए। वहीं, सर्दियों में उनकी तादाद घट गई, जो उनके शिकार की मौसमी आवाजाही के हिसाब से था। वहीं, पत्तियों से कीट चुनकर खाने वाले पक्षियों में ऊंचाई या मौसम के अनुसार कोई बड़ा बदलाव नहीं देखा गया। यह उन कीटों को खाने के मुताबिक था, जिनकी संख्या में मौसम के अनुसार कोई खास बदलाव नहीं होता। शिकार की उपलब्धता और पक्षियों के वितरण के बीच इस करीबी संबंध से संकेत मिलता है कि “पक्षी सिर्फ अनुकूल तापमान वाली जगह पर जाने के बजाय बहुत संभव है कि भोजन का पीछा कर रहे हैं,” मेनन ने कहा। “वे मुख्य रूप से यह खोज रहे हैं कि उन्हें सबसे ज्यादा मात्रा में भोजन कहां मिल सकता है।” हालांकि, शोधकर्ताओं ने सावधान किया है कि तापमान, मौसम और पर्यावरण से जुड़े अन्य कारक भी शायद अपनी भूमिका निभाते हैं।

यह अध्ययन इस बढ़ते सबूत की अगली कड़ी है कि हिमालयी पक्षी मुख्य रूप से कीटों की संख्या में होने वाले मौसमी उतार-चढ़ाव का पीछा करने के लिए अलग-अलग ऊंचाई वाले क्षेत्रों के बीच आवाजाही करते हैं। हालांकि, तापमान अभी भी अहम है, क्योंकि या तो यह पक्षियों को सीधे प्रभावित करता है या फिर यह कीटों की आबादी को प्रभावित करता है। लेकिन, ऐसा हो सकता है कि पक्षी सबसे ज्यादा प्रतिक्रिया तापमान के आधार पर न देते हों। इस साल की शुरुआत में 34 पर्वत श्रृंखलाओं को शामिल करते हुए किए गए एक वैश्विक विश्लेषण के अनुसार, ऊंचाई के अनुसार जगह बदलने वाले पक्षी साल भर आवाजाही के दौरान तापमान में होने वाले बदलावों का लगातार अनुसरण नहीं करते हैं।


और पढ़ेंः हिंद महासागर के ऊपर बिना रुके सबसे लंबी दूरी तक पलायन करते हैं ड्रैगनफ्लाई पतंगे


ये नतीजे संरक्षण के लिहाज से भी अहम हैं। जलवायु परिवर्तन के साथ पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्रों में तापमान और बारिश के स्वरूप में बड़े बदलाव होने की आशंका है। अगर इन बदलावों से साल में कीटों के निकलने का समय पहले ही आ जाता है, तो अपने प्रवास का समय तय करने के लिए मौसम के स्थिर संकेतों पर निर्भर रहने वाले पक्षियों के लिए उसके साथ तालमेल बिठाना मुश्किल हो सकता है। मेनन ने समझाया, “मसलन, पक्षी अपने प्रवास का समय तय करने के लिए दिन और रात के चक्र पर निर्भर रहते हैं। अगर वसंत जल्दी आ जाता है, लेकिन पक्षी अपने प्रवास का समय सही तरीके से तय नहीं कर पाते हैं, तो वे भोजन की उपलब्धता के चरम समय के बाद पहुंचते हैं और फिर उनके बच्चों को पालने के लिए पर्याप्त भोजन नहीं होता।”

दुनिया में पहाड़ों पर पाई जाने वाली सबसे शानदार जैव-विविधता वाले इलाकों में से एक के लिए, इन पारिस्थितिकी संबंधों को समझना अहम है। फिलहाल, ईगलनेस्ट के जंगल अभी भी अपने मौसमी चक्र के अनुसार चल रहे हैं। नवंबर में बैबलर पक्षी नीचे की ओर जाते हैं। अप्रैल में वे वापस ऊपर चले जाते हैं। और अब, इसकी वजह बताने के लिए आंकड़े भी मौजूद है।


यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर  28 जुलाई, 2026 को प्रकाशित हुई थी।


बैनर तस्वीर: पीले गले वाली फुलवेटा जो ईगलनेस्ट वन्यजीव अभयारण्य में मध्यम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पाई जाने वाली एक आम प्रजाति है। यह पक्षी बड़े झुंड बनाती है और मिलकर झाड़ियों से कीट चुनकर खाती है। चूंकि, पत्तियों पर रहने वाले कीटों की संख्या मौसम के अनुसार स्थिर रहती है, इसलिए फुलवेटा जैसी पत्तियों से कीट चुनकर खानी वाले पक्षी बड़े पैमाने पर प्रवास नहीं करती हैं। तस्वीर: तरुण मेनन।

 

Exit mobile version