- भारत में गिद्धों, शिकारी पक्षियों और अन्य वन्यजीवों के लिए महत्वपूर्ण जोड़बीड़ गाढ़वाला कंजर्वेशन रिजर्व के पास बन रही बीकानेर की सबसे बड़ी रिहायशी कॉलोनी से चिंताएं बढ़ गई हैं।
- इस कालोनी से करीब छह सौ मीटर की दूरी पर स्थित गिद्धों के लिए शव निस्तारण जगह को हटाने के लिए वन विभाग को शिकायतें मिली हैं।
- जानकारों का मानना है कि भारत में जब गिद्धों की संख्या घटने लगी, तो प्रवासी पक्षियों ने जोड़बीड़ को अपना बसेरा बनाया और इसकी वजह पर्याप्त भोजन का मिलना है।
- शिकारी पक्षी और आईयूसीएन की लुप्तप्राय श्रेणी में शामिल स्टेपी ईगल के लिए लॉन्च किए गए 10 साल के ग्लोबल एक्शन प्लान में जोड़बीड़ को भी शामिल किया गया है।
दोपहर के दो बजने को हैं। सूरज आसमान के बीचोंबीच अपने पूरे तेज के साथ चमक रहा है। बीकानेर के जोड़बीड़ गाढ़़वाला कंजर्वेशन रिजर्व के मुख्य गेट से करीब आधा किलोमीटर पशुओं के कई शव पड़े हैं जिनका रंग तेज धूप में गुलाबी दिख रहा है। इन शवों को लुप्तप्राय प्रजाति के गिद्ध आराम से खा रहे हैं। उनके आस-पास कई आवारा कुत्ते भी इनका भक्षण कर रहे हैं।
मध्य-एशियाई प्रवासी पक्षी मार्ग यानी ‘सेंट्रल एशियन फ्लायवे’ में स्थित जोड़बीड़ कंजर्वेशन रिजर्व को जैव-विविधता खासकर भारत में बहुत तेजी से घट रहे गिद्धों के संरक्षण के लिए अहम माना जाता है। यहां गिद्धों की कम से कम सात प्रजातियां पाई जाती हैं। वैसे यहां अब तक पक्षियों की 243 प्रजातियां देखी गई हैं।
बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी के पूर्व उप निदेशक और 2020-2025 के लिए वल्चर कंजर्वेशन के लिए ऐक्शन प्लान बनाने में अहम भूमिका निभाने वाले विभु प्रकाश जोड़बीड़ को गिद्ध संरक्षण के लिए अहम मानते हैं। वह मोंगाबे-हिंदी से कहते हैं, “जब भारत में गिद्धों की संख्या कम होने लगी, तो यहां प्रवासी गिद्ध बहुत आने लगे। जोड़बीड़ में प्रवासी मिस्र के गिद्ध (इजिप्टियन वल्चर) सबसे ज्यादा मिलते हैं। इसकी वजह भोजन की पर्याप्त उपलब्धता है।” माना जाता है कि सर्दियों में यहां नौ हजार तक शिकारी पक्षी पहुंचते हैं।
लेकिन, गिद्धों और अन्य शिकारी पक्षियों की इस भोजनशाला पर अब खतरा मंडरा रहा है। इसका कारण रिजर्व के नजदीक बनी जोड़बीड़ आवासीय कॉलोनी है।

बीकानेर की सबसे बड़ी कॉलोनी और जोड़बीड़
राजस्थान सरकार ने बीकानेर की सबसे बड़ी जोड़बीड़ आवासीय स्कीम को 2008 में लॉन्च किया था। लेकिन, कानूनी पचड़े में फंस जाने से वहां आवंटी अब तक अपना घर नहीं बना पाए हैं। हाल के दिनों में जोड़बीड़ आवासीय कॉलोनी के आवंटियों ने बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर प्रदर्शन तेज कर दिया है। वन विभाग को भी शव निस्तारण वाली जगह के बारे में दो शिकायतें मिली हैं।
इस संबंध में जोड़बीड़ गाढवाला संरक्षण रिजर्व के क्षेत्रीय वन अधिकारी चंद्रभान सिंह ने मोंगाबे-हिंदी को बताया, “हमें दो शिकायतें (मृत पशुओं के निस्तारण की जगह बदलने को लेकर) मिली हैं। हमने अपने जवाब में स्पष्ट कहा है कि मृत पशुओं को बीकानेर नगर निगम डालता है। इसमें वन विभाग की कोई भूमिका नहीं है। हमारी ओर से स्थानीय स्तर पर इसका समाधान नहीं किया जा सकता।”
वहीं, राजस्थान के मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक केसीए अरुण प्रसाद ने मोंगाबे-हिंदी से बातचीत में स्पष्ट किया कि फिलहाल शव निस्तारण वाली जगह को हटाकर दूसरे स्थान पर ले जाने का कोई प्रस्ताव विभाग के पास नहीं है। उन्होंने कहा कि गिद्धों और शिकारी पक्षियों को जोड़बीड़ इसलिए पसंद आता है कि यहां उन्हें पर्याप्त भोजन मिलता है।
जोड़बीड़ महत्वपूर्ण पक्षी क्षेत्र (आईबीए\ग्लोबल ए1 यानी विश्व स्तर पर संकटग्रस्त शिकारी पक्षी और अन्य पक्षियों की प्रजातियां नियमित रूप से पाई जाती हैं) और प्रमुख जैव-विविधता क्षेत्र (केबीए\46934 यानी संकटग्रस्त पक्षियों की प्रजातियों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है) है। इसे राजस्थान वन विभाग ने खासतौर पर गिद्धों के भोजन स्थल के रूप में विकसित किया है।
इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंज़र्वेशन ऑफ़ नेचर (आईयूसीएन) के सदस्य और सेठ ज्ञानी राम बंसीधर पोद्दार कॉलेज नवलगढ़ में जंतु विज्ञान विभाग के प्रमुख दाऊ लाल बोहरा कहते हैं, “अगर प्रशासनिक वजहों से एशिया के सबसे बड़े गिद्ध क्षेत्र से शव निस्तारण स्थल को अन्यत्र स्थानांतरित किया जाता है, तो गिद्धों के भोजन चक्र, उनकी उपस्थिति और प्रवासी पक्षियों के आगमन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इससे इस क्षेत्र की अंतरराष्ट्रीय पहचान एवं संरक्षण महत्व भी प्रभावित हो सकता है। फिलहाल जहां शव निस्तारण होता है, वह जगह अन्य वन्यजीवों और कुत्तों के खतरे को कम करती है, क्योंकि यह पूरा इलाका दीवारों और तार से घेरा हुआ है।”
एक अनुमान के मुताबिक आसपास के गांवों व शहरों से गर्मियों में लगभग 100-120 शव व सर्दियों में 170-200 शव (छोटे व बड़े पशु) निस्तारित किए जाते हैं।
हालाँकि, विभु प्रकाश भविष्य में ऐसे विवाद से बचने का रास्ता सुझाते हैं। वह कहते हैं, “अगर हम वन क्षेत्र में दखल जारी रखेंगे, तो गिद्ध बाहर आएंगे, उनका इंसानों से टकराव होगा और ऐसे में पहले से ही भारी गिरावट झेल रहे गिद्धों की संख्या और कम हो जाएगी। इसलिए, प्रशासन को विशेषज्ञों से सलाह-मशविरा के बाद ही ऐसे निर्णय लेने चाहिए।”
राजस्थान वन विभाग से जुड़े सूत्र शव निस्तारण की जगह बदलने की मांग को तथ्यों से परे बताते हैं। नाम नहीं छापने की शर्त पर एक अधिकारी ने मोंगाबे-हिंदी से कहा, “बीकानेर शहर का सीवेज प्लांट और डंपिंग यार्ड भी इस कॉलोनी के नजदीक है। फिर सिर्फ गिद्धों के भोजन स्थल को ही निशाना क्यों बनाया जा रहा है जो कॉलोनी से पांच सौ से सात सौ मीटर की दूरी पर है?”

उक्त अधिकारी का यह भी कहना है कि रिजर्व के अंदर शव निस्तारण की जगह से करीब तीन किलोमीटर दूर कोटरी गांव है जहां लोग कई पुश्तों से रह रहे हैं। राजस्व विभाग ने इन्हें वहां रहने का अधिकार दिया है। इन लोगों ने आज तक शव निस्तारण की जगह को बदलने की मांग नहीं उठाई है।
इस संवाददाता ने जब इस साल मार्च में जोड़बीड़ आवासीय कॉलोनी का दौरा किया, तो वहां कई तरह के निर्माण हो चुके थे। इनमें भवन, पक्की सड़कें, खुले में बिजली की लाइनें जैसी बुनियादी सुविधाएं शामिल हैं।
इस पर बोहरा कहते हैं, “पांच सौ हेक्टेयर वाली कॉलोनी में विकास कार्यों से रेगिस्तानी चूहे और सांडा के आवास पूरी तरह नष्ट हो गए हैं जो शिकारी पक्षियों के लिए महत्वपूर्ण भोजन हैं। वहीं आबादी के लिए पावर लाइनें गिद्धों और अन्य शिकारी पक्षियों की मृत्यु दर को और बढ़ाएंगी।”
हालाँकि, केसीए अरुण प्रसाद ने कहा कि जोड़बीड़ के पास लोगों की आबादी बढ़ने से गिद्धों या शिकारी पक्षियों पर होने वाले असर के बारे में फिलहाल कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। उन्होंने भरतपुर के केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां भी चारों तरफ घनी आबादी है, लेकिन वहां पक्षियों की तीन सौ से ज्यादा प्रजातियां हैं।
घटता जोड़बीड़
जैव-विविधता पर इस योजना के गंभीर असर का आरोप लगाते हुए शुरुआत से ही इसका विरोध हो रहा है और मामला हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंच चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को अपने स्तर पर इस पर निर्णय करने का आदेश दिया।
इसके बाद 17 मार्च, 2017 को मुख्य सचिव की अध्यक्षता में हुई बैठक में फैसला हुआ कि रक्षित वन से क्षेत्रीय भेड़ ऊन अनुसंधान स्कीम को आवंटित जमीन में से 500 हेक्टेयर भूमि नगर विकास न्यास, बीकानेर की है।
बैठक में इस जमीन के बदले बीकानेर जिले में इतनी ही भूमि वन विभाग को आवंटित करने का फैसला हुआ। मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक ने कहा कि अभी तक यह जमीन वन मंडल वन्यजीव बीकानेर को नहीं मिली है।
साथ ही, यह भी तय हुआ कि आवासीय कॉलोनी के विकास की योजना तैयार करते हुए यह पक्का किया जाएगा कि उससे पास के गिद्ध संरक्षण क्षेत्र पर कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़े।
वहीं एक जुलाई, 2023 को स्थानीय मीडिया में यह खबर छपने के बाद कि जोड़बीड़ में मृत पशुओं को दूर डाला जाएगा, यह फैसला फिर से चर्चा में आ गया। इसके बाद कार्यालय, उप वन संरक्षक बीकानेर ने तथ्यात्मक रिपोर्ट तैयार की।
मोंगाबे-हिंदी द्वारा देखी गई इस रिपोर्ट में कहा गया है कि रियासत काल से ही जोड़बीड़ वन क्षेत्र (7583.87 हेक्टेयर) 1963-66 में ‘सरकारी जंगल’ के नाम से चिन्हित था। सबसे पहले यहां की 809.38 हेक्टेयर भूमि क्षेत्रीय भेड़ ऊन अनुसंधान और फिर 1960 में 2023.47 हेक्टेयर वन भूमि राष्ट्रीय उष्ट्र प्रजनन केंद्र को प्रदान की गई।
जोड़बीड़ को 1966 में रक्षित वनखंड यानी संरक्षित वन क्षेत्र घोषित किया गया था। बाद में इसके पारिस्थितिकी महत्व को देखते हुए 2008 में कंजर्वेशन रिजर्व घोषित किया गया। इसका कुल क्षेत्रफल 5646.62 हेक्टेयर है।
इसलिए, जानकार वन संरक्षण कानून की धारा 2 का हवाला देकर कॉगलोनी के लिए जमीन हस्तांतरण को अवैध बता रहे हैं। इस धारा के अनुसार, बिना केंद्र सरकार की सहमति के आरक्षित वन के किसी भी हिस्से को अनारक्षित नहीं किया जा सकता है।

यही नहीं, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की धारा 5सी में कहा गया है कि वन्यजीवों या उनके आवास पर विभिन्न परियोजनाओं और गतिविधियों के प्रभाव का आकलन करना या करवाना जरूरी है।
जोड़बीड़ की अहमियत इससे भी पता चलती है कि यहां एक ही पक्षी बार-बार आता है। बोहरा कहते हैं, “कजाकिस्तान, रूस एवं मंगोलिया से आने वाले मिस्त्र के गिद्ध, स्टेपी ईगल तथा ब्लैक काइट जैसे पक्षियों को जीपीएस टैगिंग एवं रिंगिंग के जरिए चिन्हित किया गया है। इनमें से कई पक्षी बार-बार जोड़बीड़ क्षेत्र में दर्ज किए गए हैं।”
इसलिए, जोड़बीड़ पूरे सेंट्रल एशियन फ्लायवे का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है। जानकार “अफ्रीका और यूरेशिया में प्रवासी शिकारी पक्षियों के संरक्षण पर समझौता ज्ञापन का भी हवाला देते हैं जिस पर भारत ने भी दस्तख्त किए हैं। इसका पैरा 7 कहता है, “हस्ताक्षरकर्ता ऐसे कानूनी, नियामक और प्रशासनिक उपायों को अपनाने, लागू करने और उन्हें सख्ती से अमल में लाने की कोशिश करेंगे जो शिकारी पक्षियों और उनके आवास के संरक्षण के लिए उपयुक्त हों।”
वहीं, 24 जून को लॉन्च किए गए ग्लोबल ऐक्शन प्लान फॉर स्टेपी ईगल में जोड़बीड़ को स्टेपी ईगल के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण स्थल बताया गया है जहां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी आबादी है।
संरक्षण योजना बनाने में भारत से बोहरा भी शामिल रहे। वह कहते हैं, “इससे साबित होता है कि जोड़बीड़ ना सिर्फ सीएमएस (कंजर्वेशन ऑफ माइग्रेटरी स्पीशीज) बल्कि लुप्तप्राय प्रजाति स्टेपी ईगल के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है।”
बोहरा जोड़बीड़ को गिद्धों के प्रजनन को लेकर भी अहम मानते हैं। वह मोंगाबे-हिंदी से कहते हैं, “यह स्थान वह है जहां मध्य एशिया से आने वाले अनेक प्रवासी गिद्ध शीतकाल में पहुंचते हैं तथा कई प्रजातियां यहां अपने जोड़े भी बनाते हैं। इसलिए यह स्थल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी महत्वपूर्ण माना जाता है।”

बढ़ता खतरा
गिद्ध जानवरों के शवों को तेजी से खाकर जीवाणुओं और वायरस को फैलने से रोकते हैं और पारिस्थितिकी तंत्र की सफाई और उसे बेहतर बनाए रखने में मदद करते हैं।
लेकिन, भारत में पाई जाने वाली और एशिया की स्थानीय गिद्धों की चार प्रजातियों में 1990 के दशक से भारी गिरावट आई है। अब ये प्रजातियां ‘गंभीर रूप से लुप्तप्राय’ की श्रेणी में आ गई हैं। इनकी आबादी में पिछले कुछ दशकों में 95 फीसदी तक की बड़ी कमी देखी गई है। गिद्धों की संख्या में तेज गिरावट से भारत में कम से कम पांच लाख लोगों की मौत हुई है।
लेकिन, तमाम कोशिशों के बावजूद गिद्धों की आबादी बढ़ाने की कोशिशें सफल होती नहीं दिखतीं। भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) ने 2023-25 के दौरान पहली बार गिद्धों के घोंसला बनाने की जगहों और उनकी आबादी का सिलसिलेवार अध्ययन किया। अखिल भारतीय संकटग्रस्त प्रजाति-गिद्ध का आकलन और निगरानी” नामक रिपोर्ट से पता चला है कि गंभीर रूप से लुप्तप्राय गिद्धों की आबादी में उनके पुराने घोंसले बनाने की जगहों में लगभग 70 फीसदी की कमी देखी गई है।
रिपोर्ट में शव निस्तारण वाली जगहों पर आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या पर भी चिंता जताई गई है, “ये कुत्ते न सिर्फ मरे हुए जानवरों के मांस के लिए गिद्धों से सीधे मुकाबला करते हैं, बल्कि उनके खाने-पीने के व्यवहार में बाधा डाल सकते हैं, उन्हें उस जगह का इस्तेमाल करने से रोक सकते हैं और उन पर हमला करने का खतरा भी पैदा कर सकते हैं।”
इस चिंता पर बोहरा कहते हैं, “सामान्यतः आवारा कुत्तों का प्रभाव सीमित होता है, लेकिन घायल, कमजोर या जमीन पर आराम कर रहे पक्षियों पर कुत्ते हमला कर सकते हैं। इसके अलावा, कुत्तों की अत्यधिक संख्या भोजन संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा भी पैदा कर सकती है।”
वहीं, डब्ल्यूआईआई की एक अन्य रिपोर्ट में वन्यजीवों के लिए जोड़बीड़ कंजर्वेशन रिजर्व जैसी जगहों के महत्व को देखते हुए संरक्षण पर अधिक ध्यान देने और शोध के जरिए संरक्षण के लिए सही योजना बनाकर स्थानीय संस्थाओं और हितधारकों से बात करने पर जोर दिया है।
बैनर तस्वीर- जोड़बीड़ में पर्याप्त भोजन के साथ-साथ गिद्धों और अन्य पक्षियों को आराम करने की भी पर्याप्त जगह मिलती है। तस्वीर – दाऊ लाल बोहरा।