- मानव-तेंदुए संघर्ष को कम करने के लिए महाराष्ट्र तेंदुओं पर इम्यूनोकंट्रासेप्शन परीक्षण कर रहा है, ताकि अस्थायी रूप से उनकी प्रजनन क्षमता को सीमित किया जा सके।
- जुन्नर में प्राकृतिक वातावरण में हुए बदलावों, विशेष रूप से गन्ने के खेतों के विस्तार ने इंसानों और तेंदुओं के बीच टकराव की घटनाओं को बढ़ा दिया है। ये खेत तेंदुओं के लिए छिपने और रहने की सुरक्षित की जगह बन गए हैं।
- हालांकि कुछ विशेषज्ञ बर्थ कंट्रोल को एक अंतिम और ज़रूरी उपाय मानते हैं, वहीं अन्य विशेषज्ञों का कहना है कि बेहतर आंकड़े जुटाना, उनके प्राकृतिक आवास का सही प्रबंधन करना और संघर्ष रोकने के लिए सटीक कदम उठाना ही लंबे समय के लिए अधिक असरदार समाधान हैं।
महाराष्ट्र ने राज्य में लोगों और तेंदुओं के बीच बढ़ते संघर्ष को देखते हुए तेंदुओं की आबादी को नियंत्रित करने के लिए उपाय शुरू किए हैं। इसके साथ ही महाराष्ट्र देश का पहला ऐसा राज्य बन गया है जो तेंदुओं की आबादी को नियंत्रित करने के लिए ट्रायल के तौर पर ‘बर्थ कंट्रोल’ का इस्तेमाल कर रहा है। महीनों चले विचार-विमर्श के बाद, पिछले साल नवंबर में केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने राज्य सरकार के इस प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। हालाँकि, इससे पहले कुछ अन्य राज्यों ने भी ऐसे सुझाव दिए थे, लेकिन इसे ट्रायल के रूप में शुरू करने की पहल महाराष्ट्र ने ही की है।
राज्य का वन विभाग इस कार्यक्रम को भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) द्वारा पेश किए गए प्रस्ताव के अनुसार लागू करेगा। हालाँकि, आबादी नियंत्रण के इस तरीके को मीडिया व आम बातचीत में आमतौर पर “नसबंदी” कहा जा रहा है, लेकिन जुन्नर में लंबे समय तक अध्ययन करने वाले डब्ल्यूआईआई के वैज्ञानिक बिलाल हबीब स्पष्ट करते हैं कि “यह असल में ‘इम्यूनोकंट्रासेप्शन’ यानी एक अस्थायी टीका है, जो इन जानवरों को अगले दो से तीन साल तक प्रजनन करने से रोकेगा।” नसबंदी के विपरीत (जो कि एक बार की जाने वाली स्थायी प्रक्रिया होती है) ये वैक्सीन जानवर के प्रतिरक्षा तंत्र को इस तरह प्रभावित करता है कि वह कुछ समय के लिए संतान उत्पन्न करने में असमर्थ हो जाता है।
इस पायलट प्रोजेक्ट के लिए पुणे के जुन्नर वन प्रभाग को चुना गया है, जहां इंसानों और तेंदुओं के बीच बढ़ते संघर्ष के कारण जान-माल के नुकसान की घटनाएं बढ़ रही हैं। मोंगाबे-इंडिया को जुन्नर वन प्रभाग से मिले मुआवजे के रिकॉर्ड के मुताबिक, 2021 से अब तक तेंदुओं के हमलों में 22 लोगों की मौत हुई है, 42 लोग घायल हुए हैं और 16,593 मवेशी मारे गए हैं। इस दौरान वन विभाग ने मुआवजे के तौर पर लगभग 19 करोड़ रुपये बांटे हैं।
तेंदुओं के लिए नए/वैकल्पिक प्राकृतिक आवास
जुन्नर वन प्रभाग पुणे जिले के उत्तरी हिस्से में लगभग 5,826 वर्ग किलोमीटर के इलाके में फैला हुआ है और इसमें जुन्नर, आंबेगांव, खेड और शिरूर तहसील शामिल हैं। पश्चिमी घाट के पूर्वी हिस्से में स्थित जुन्नर मुख्य रूप से इंसानी आबादी और खेती-बाड़ी वाला इलाका है, जिसके बीच-बीच में सूखे पतझड़ वाले जंगलों के छोटे-छोटे हिस्से हैं। येडगांव बांध और कुकड़ी सिंचाई प्रणाली जैसी परियोजनाओं के आने से इस क्षेत्र को भरपूर पानी मिला, जिससे यहां गन्ने की खेती में जबरदस्त उछाल आया।

वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन सोसाइटी-इंडिया के शोधकर्ता निकित सुर्वे बताते हैं, “गन्ने की खेती शुरू होने से पहले इस इलाके में तेंदुए कम हुआ करते थे।” बड़ी बिल्लियों की प्रजाति में तेंदुए माहौल के हिसाब से खुद को ढालने में सबसे माहिर होते हैं। वे निशाचर होते हैं, इसलिए उन्हें दिन के समय छिपने के लिए जगह की जरूरत होती है। सुर्वे आगे कहते हैं, “बुवाई के दो-तीन महीने के भीतर ही गन्ने की फसल इतनी घनी हो जाती है कि वह तेंदुए के पूरे परिवार को आसानी से छिपा सकती है।”
सावित्रीबाई फुले पुणे यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट प्रोफेसर योगेश पी. बाधे के मुताबिक, जुन्नर वन प्रभाग में मानव-तेंदुआ संघर्ष का दो दशकों से भी ज्यादा का इतिहास रहा है। वह कहते हैं, “2001 से 2010 के बीच यह संघर्ष लगातार बना हुआ था, मगर यह काफी हद तक नियंत्रित और कुछ ही इलाकों तक सीमित था। लेकिन, 2012 के बाद से इंसानों पर हमले और मवेशियों के शिकार, दोनों ही मामलों में भारी बढ़ोतरी देखी गई।”
बाधे के सह-लेखन में तैयार किए गए कॉन्फ्लिक्ट ट्रेंड एंड हॉटस्पाट एनालिसिस से पता चलता है कि 2015 से 2019 के बीच मवेशियों पर हमलों की संख्या सालाना औसतन 274 से बढ़कर 643 हो गई। जुन्नर वन प्रभाग के मुआवजा रिकॉर्ड बताते हैं कि इसके बाद के सालों में यह आंकड़ा और तेजी से बढ़ा है, जहां अकेले 2024 में ही मवेशियों के मारे जाने के 6,844 मामले दर्ज किए गए।
भारतीय वन्यजीव संस्थान पिछले छः वर्षों से जुन्नर में काम कर रहा है। उनके अनुमान के मुताबिक, जुन्नर में तेंदुओं का घनत्व (प्रति 100 वर्ग किलोमीटर में 6.75 तेंदुए) ताडोबा-अंधारी टाइगर रिजर्व के बराबर है। मगर, वह इस बात को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं कि यह आबादी इस पूरे इलाके में किस तरह फैली हुई है।
बाधे का कहना है कि इंसानों और तेंदुओं के बीच बढ़ता संघर्ष इस इलाके के परिवेश में आए बदलाव और एक ही क्षेत्र में इंसानों व तेंदुओं की बढ़ती मौजूदगी को दर्शाता है। उन्होंने बताया, “पश्चिमी पहाड़ी इलाकों में प्राकृतिक आवासों के विनाश और जंगलों के टुकड़ों में बंटने की वजह से समय के साथ तेंदुओं ने खेतों, इंसानी बस्तियों और नदियों के किनारे फैले इलाकों में खुद को ढाल लिया है। गन्ने के खेतों ने तेंदुओं को एक नया और सुरक्षित ठिकाना दे दिया है, जो उन्हें साल भर छिपने की घनी जगह देता है और मवेशियों, खासकर बकरियों के रूप में आसानी से शिकार भी उपलब्ध कराता है।”

कोई दूसरा रास्ता नहीं
अफ्रीकी वन्यजीव अभयारण्यों में फेलिड आबादी पर इम्यूनोकंट्रासेप्शन का प्रयोग सफल रहा है। यूरोप के बॉटस्टिबर इंस्टीट्यूट फॉर वाइल्डलाइफ फर्टिलिटी कंट्रोल की निदेशक जियोवाना मासेई का कहना है कि खुले में रहने वाले जंगली जानवरों की संख्या नियंत्रित करने के लिए भी बर्थ कंट्रोल एक कारगर तरीका हो सकता है। मासेई अमेरिका के यूटा में हुए एक अध्ययन का हवाला देती हैं, जिसमें पाया गया कि जंगली कोयोटे की नसबंदी करने से भेड़ों पर उनके हमलों में कमी आई थी।
अध्ययन में देखा गया कि सर्जरी द्वारा की गई नसबंदी से कोयोटे के सामाजिक व्यवहार या अपने इलाके की रक्षा करने की आदत पर कोई बुरा असर नहीं पड़ा। चूंकि उनके पास भोजन कराने के लिए उनके बच्चे नहीं थे, इसलिए उनके शिकार करने की दर में काफी गिरावट आई। इस तरह नसबंदी वाले कोयोटे अपने इलाके की रक्षा करते रहे और दूसरे नए जानवरों को वहां आने से रोकते रहे यानी ये “बायोलॉजिकल प्लेसहोल्डर्स” के रूप में काम करते रहे।
हालाँकि, मासेई इस बात पर जोर देती हैं कि मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए बर्थ कंट्रोल का इस्तेमाल कितना सही है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि जानवर की प्रजाति और परिस्थिति क्या है। मासेई कहती हैं, “संरक्षण प्रबंधकों को पहले यह तय करना चाहिए कि क्या इस परिस्थिति में इस खास प्रजाति के लिए जन्म नियंत्रण ही संघर्ष कम करने का सबसे सही तरीका है? अगर हां, तो क्यों।”
भारतीय वन्यजीव संस्थान के वैज्ञानिक बिलाल हबीब के अनुसार, इस इलाके में संघर्ष को कम करने के लिए इम्यूनोकंट्रासेप्शन ही शायद आखिरी रास्ता बचा है। वह कहते हैं, “पिछले 25 सालों में हमने सब कुछ आजमा कर देख लिया है: तेंदुओं को हटाना, उन्हें पकड़ना, बाड़ लगाना और फॉक्स लाइट्स का इस्तेमाल करना।”
जब भारतीय वन्यजीव संस्थान की टीम ने 2020 से 2025 के बीच 15 ऐसे तेंदुओं को पकड़ा जिन्हें हमलावर माना जा रहा था और उन्हें रेडियो कॉलर पहनाकर “जुन्नर से काफी दूर” छोड़ दिया, तो वे सभी तीन से नौ महीने के भीतर वापस आ गए। हबीब बताते हैं, “जब हमने रेडियो कॉलर से उनकी निगरानी की, तो पाया कि ये तेंदुए किसी संघर्ष या हमले में शामिल ही नहीं थे। अगले एक पूरे साल में इनमें से कोई भी तेंदुआ किसी इंसानी मौत के लिए जिम्मेदार नहीं था।”
तेंदुओं के व्यवहार और समीकरण में बदलाव
अपने शोध के आधार पर डब्ल्यूआईआई के वैज्ञानिकों ने पाया कि तेंदुओं में दो तरह के वर्ग होते हैं: एक वे जिनका अपना निश्चित इलाका होता है, और दूसरे वे युवा तेंदुए जो अपने लिए नए इलाके की तलाश में भटकते रहते हैं। हबीब समझाते हैं कि इन युवा तेंदुओं को स्थापित तेंदुओं के इलाकों से खदेड़ दिया जाता है, जिससे इंसानों के साथ उनका आमना-सामना होने और संघर्ष की घटनाएं बढ़ जाती हैं।
जब वन विभाग ने हमलों वाली जगहों के पास हमलावर तेंदुओं को पकड़ने के लिए पिंजरे लगाए, तो चालाक युवा तेंदुए तो बच निकले और उनकी जगह वे तेंदुए पकड़े गए जिनका वहां पहले से अपना इलाका था।
हबीब के मुताबिक, तेंदुए 2 से 3 साल की उम्र में अपने लिए नए इलाके की तलाश शुरू कर देते हैं और 4 से 5 साल की उम्र तक आते-आते (जब वे इंसानी आबादी वाले माहौल में ढलना सीख चुके होते हैं) अपने लिए नया इलाका बनाने में पूरी तरह सक्षम हो जाते हैं। पहले से बसे अनुभवी तेंदुओं को हटाने से उनके इलाके खाली हो जाते हैं, जिन पर कम अनुभवी युवा तेंदुए जल्दी कब्जा कर लेते हैं। इससे टकराव की आशंका और बढ़ जाती है। हबीब कहते हैं, “नतीजतन, पूरे इलाके में कम उम्र के युवा तेंदुओं का दबदबा हो जाता है, जिससे संघर्ष की घटनाएं बढ़ जाती हैं।”
इस समस्या से निपटने के लिए हबीब इस बात पर जोर देते हैं कि पहले से मौजूद शांत और अनुभवी तेंदुओं को उनके इलाके में लंबे समय तक रहने दिया जाए और साथ ही तेंदुओं के प्रजनन को सीमित किया जाए। इसका उद्देश्य अनुभवी तेंदुओं को बनाए रखना है ताकि नए और कम उम्र के तेंदुए वहां न आएं। एक मादा तेंदुए के जीवनकाल में पैदा होने वाले शावकों की संख्या को लगभग 20 से घटाकर 5 या 6 तक सीमित करने से, समय के साथ आबादी का दबाव और इंसानों के साथ टकराव दोनों कम हो सकते हैं।


जानवरों में बर्थ कंट्रोल
तेंदुओं की आबादी नियंत्रण के लिए प्रस्तावित तरीका गोनाकॉन-बी है। यह गोनाडोट्रोपिन-रिलीजिंग हार्मोन (GnRH) पर आधारित एक इम्यूनोकंट्रासेप्टिव वैक्सीन है, जिसका इस्तेमाल अमेरिका में खुरवाले जानवरों की आबादी को नियंत्रित करने के लिए बड़े पैमाने पर किया जाता है।
GnRH जानवरों में प्रजनन क्रिया को नियंत्रित करने वाला मुख्य हार्मोन है। लंबे समय से इसे मादा जानवरों की प्रजनन क्षमता को नियंत्रित और प्रबंधित करने के लिए एक मुख्य साधन माना जाता रहा है।
हबीब बताते हैं कि GnRH टीके का परीक्षण चिड़ियाघर/बाड़े में रखे गए बाघों पर और बाड़े व जंगल दोनों में रहने वाले शेरों पर किया जा चुका है। हालाँकि, मोंगाबे-इंडिया को केवल खुले में घूमने वाले खुरवाले जानवरों, जैसे व्हाइट टेल्ड डियर, बाइसन, जंगली घोड़ों और मवेशियों में ही गोनाकॉन-बी के उपयोग के प्रमाण मिले हैं।
वहीं दूसरी ओर, डेस्लोरेलिन इम्प्लांट जैसे दवा के अन्य तरीकों का उपयोग चिड़ियाघरों और अभयारण्यों में बड़ी बिल्लियों की आबादी नियंत्रित करने के लिए दशकों से किया जा रहा है।
फिलहाल, मंत्रालय ने परीक्षण के लिए पांच तेंदुओं को पकड़कर पुणे के मानिकडोह रेस्क्यू सेंटर ले जाने की अनुमति दे दी है। एक सूत्र के अनुसार, डबल्यूआईआई के प्रस्ताव में यह कहा गया है कि जानवरों को टीका लगाने, रेडियो कॉलर पहनाने और उनकी निगरानी का काम सीधे जंगल में ही होना चाहिए, न कि किसी रेस्क्यू सेंटर में। मोंगाबे-इंडिया स्वतंत्र रूप से इस प्रस्ताव को नहीं देख सका है।

संरक्षण की एक बड़ी चुनौती
सुर्वे इन इलाकों में तेंदुओं की आबादी बढ़ने के दावों पर सवाल उठाते हैं। वह कहते हैं, “बेहतर तकनीक के कारण तेंदुओं के ज्यादा दिखने का मतलब यह कतई नहीं है कि उनकी संख्या वास्तव में बढ़ रही है।”
अपनी डॉक्टरेट थीसीस के लिए मुंबई के संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान में तेंदुओं के व्यवहार और पारिस्थितिकी का अध्ययन करने वाले सुर्वे, मुंबई और जुन्नर में होने वाले संघर्षों की तुलना करते हुए बताते हैं: “संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान की बाहरी सीमा पर मुंबई में प्रति वर्ग किलोमीटर लगभग 20,000 लोग रहते हैं, जबकि जुन्नर में यह आबादी महज 500 से 1,000 लोग प्रति वर्ग किलोमीटर है। मुंबई में तेंदुओं का घनत्व प्रति 100 वर्ग किलोमीटर में 26 तेंदुए है और अगर हम मान भी लें कि जुन्नर में 6 से 7 तेंदुए हैं, तो फिर जुन्नर में संघर्ष का खतरा मुंबई से ज्यादा क्यों दिखाई दे रहा है?” उनका तर्क है कि तेंदुओं की आबादी पर नियंत्रण लगाने का कदम तभी सही ठहराया जा सकता है जब जानवरों की संख्या में स्पष्ट तौर पर भारी बढ़ोतरी साबित हो जाए।
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आगे के समाधान के रूप में, सुर्वे एक सोचे-समझे और दीर्घकालिक दृष्टिकोण की वकालत करते हैं। इसमें तेंदुओं की आबादी के सटीक आंकड़े जुटाना, उनके रुझान को समझना और टकराव के साथ उनके संबंध का अध्ययन करना शामिल है। वह वन विभाग के अलावा अन्य सभी संबंधित पक्षों में जागरूकता और क्षमता निर्माण पर भी ज़ोर देते हैं। उन्होंने बताया, “सिर्फ एक विभाग इस समस्या को हल नहीं कर सकता; आपको सभी प्रमुख पक्षों को एक साथ जोड़ना होगा।”
जुन्नर में मानव-तेंदुआ संघर्ष के रुझानों का अध्ययन करने वाले बाधे, मैपिंग और डेटा के आधार पर बचाव-केंद्रित प्रबंधन अपनाने की मांग करते हैं। वह कहते हैं, “अपने संसाधनों को 600 गांवों में फैलाने के बजाय, उन 200 गांवों को प्राथमिकता दें जहां टकराव की घटनाएं सबसे ज्यादा होती हैं। मानसून के दौरान और ढलती शाम के समय चौकसी बढ़ाएं, क्योंकि तेंदुओं के ज्यादातर हमले इसी समय होते हैं।”
हबीब इस समस्या को कम करने के उपायों की तात्कालिकता पर जोर देते हैं और महाराष्ट्र के सुदूर पूर्व में स्थित सोलापुर तक हाल ही में तेंदुए के दिखने का जिक्र करते हैं। उन्होंने कहा, “मैंने अपनी जिंदगी में कभी नहीं सोचा था कि सोलापुर जैसी जगह पर भी तेंदुआ दिखेगा।” वह चेतावनी देते हुए कहते हैं, “आने वाले समय में कृषि क्षेत्रों में जानवरों की संख्या इतनी अधिक बढ़ जाएगी कि उनकी आबादी को संभालना और नियंत्रित करना बेहद मुश्किल हो जाएगा।”
यह खबर मोंगाबे-इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 26 मार्च 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: मुंबई के संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान के दक्षिणी किनारे से सटी आरे कॉलोनी में एक पेड़ पर बैठा शावक। तस्वीर: एपी फोटो / रफीक मकबूल