- 26 अगस्त को आई बाढ़ के बाद नेपाल ने तुरंत राहत पाने के लिए ‘लॉस एंड डैमेज फंड’ से संपर्क किया है।
- हिमालयी क्षेत्र में तापमान बढ़ने की रफ़्तार तेज़ हो रही है, लेकिन जानकारों का कहना है कि इस खास बाढ़ को अभी पक्के तौर पर सिर्फ़ जलवायु परिवर्तन से नहीं जोड़ा जा सकता।
- ग्लोबल क्लाइमेट फंड के पास दुनिया भर की ज़रूरतों और नेपाल को हुए नुकसान की भरपाई करने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं, और यह भी साफ़ नहीं है कि संकट के समय यह फंड कितनी तेज़ी से मदद कर पाएगा।
नेपाल में 26 अगस्त को आई बाढ़ के बाद, 12 सितंबर तक 1,386 से ज़्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और 5,130 से ज़्यादा लोग लापता हैं। भोटे कोशी नदी के किनारे मलबे के बीच दो अनसुलझे सवाल हैं: क्या इस आपदा का संबंध जलवायु परिवर्तन से है? और, क्या ऐसे संकटों में कमज़ोर देशों की मदद के लिए बनाया गया नया वैश्विक कोष या ग्लोबल फंड असल में काम आ सकता है?
इस बाढ़ के तुरंत बाद, नेपाल सरकार ने ‘लॉस एंड डैमेज’ (नुकसान और क्षति) से निपटने के लिए बने इस ‘फंड फॉर रेस्पोंडिंग तो लॉस एंड डैमेज’ (FRLD) के बोर्ड को एक पत्र लिखा। यह फंड संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन पर फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC) का एक वित्तीय तंत्र है, जिसे 2022 में कमज़ोर देशों को जलवायु आपदाओं से निपटने में मदद करने के लिए बनाया गया था।
नेपाल के वित्त मंत्री स्वर्णिम वागले और कृषि, वन एवं पर्यावरण मंत्री गीता चौधरी के हस्ताक्षर वाले इस पत्र में, नेपाल ने बोर्ड से जल्दी, सीधे और प्रभावी ढंग से कार्रवाई करने के लिए विशेष निर्णय लेने का अनुरोध किया। 31 अगस्त वाले इस पत्र में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि बोर्ड की त्वरित कार्रवाई से “यह साबित होगा कि यह फंड अंतरराष्ट्रीय एकजुटता को कमज़ोर देशों और समुदायों के लिए समय पर मिलने वाली मदद में बदल सकता है, जब उन्हें इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत हो।”
दुनिया भर में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में नेपाल का हिस्सा लगभग 0.027% है। यह पहाड़ी देश संयुक्त राष्ट्र की ‘सबसे कम विकसित देशों’ की श्रेणी में आता है और जलवायु परिवर्तन के लिहाज़ से बहुत संवेदनशील है। पत्र में कहा गया है कि यह देश “जलवायु परिवर्तन के ऐसे असर झेल रहा है जो उसकी क्षमता से कहीं ज़्यादा हैं और लगातार बढ़ रहे हैं।” इसमें तर्क दिया गया है कि भोटे कोशी की आपदा यह दिखाती है कि कैसे क्रायोस्फीयर (बर्फ़ वाले इलाकों) में होने वाली चरम घटनाएं तेज़ी से ऊंचे पहाड़ों से घनी आबादी वाले निचले इलाकों तक फैल सकती हैं और गंभीर रूप ले सकती हैं, जिससे पानी, भोजन, ऊर्जा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे और इकोसिस्टम पर असर पड़ता है।
हालाँकि, इस पत्र में कोई सटीक आंकड़ा नहीं दिया गया है, लेकिन इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) के क्रायोस्फीयर और जल जोखिम कार्यक्रम के रिमोट सेंसिंग और जियो-इन्फॉर्मेशन विशेषज्ञ श्रवण श्रेष्ठ के अनुसार, अकेले इस घटना से नेपाल को 2.6 अरब डॉलर का सीधा नुकसान हुआ है। उनका कहना है कि पुनर्निर्माण और रिकवरी में 4-5 अरब डॉलर या उससे ज़्यादा का खर्च आ सकता है।

कारण तय करने को लेकर उलझन
26 अगस्त की सुबह, लांगटांग हिमाल के उत्तरी हिस्से में लगभग 5,200 मीटर की ऊंचाई पर, एक लटकते हुए ग्लेशियर के नीचे चट्टानी ढलान ढह गई। यह मलबा हिमस्खलन के स्रोत से लगभग 1,200 मीटर नीचे गिरा, जिससे चट्टान और बर्फ का हिमस्खलन हुआ। इसके बाद यह मलबा लगभग 2,900 मीटर की ऊंचाई पर स्थित ल्हेंदे खोला (भोटे कोशी की एक सहायक नदी) की ओर बढ़ा। ICIMOD के आकलन के अनुसार, गिरने से पैदा हुए घर्षण ने बर्फ को पिघलाया और इतना पानी बना दिया कि हिमस्खलन मलबे के बहाव में बदल गया। इससे पहले से ही उफान पर चल रही नदियों में मलबे का एक बहुत घना बहाव नीचे की ओर चला गया।
कुछ ही घंटों में, इसने एक ऐसी आपदा का रूप ले लिया जिसमें एक हज़ार से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई, और कई परिवार अभी भी अपने प्रियजनों के बारे में खबर का इंतज़ार कर रहे हैं। हालाँकि, यह अभी भी स्पष्ट नहीं है कि यह संकट जलवायु परिवर्तन का नतीजा था या नहीं, और यह नेपाल की मदद करने के FRLD के फ़ैसले को कैसे प्रभावित करेगा।
अंतराष्ट्रीय थिंकटैंक ओडीआई ग्लोबल के रिस्क एंड रेजिलिएंस प्रोग्राम में प्रिंसिपल रिसर्च फेलो एमिली विल्किंसन के अनुसार, “नेपाल-तिब्बत में आई बाढ़ से हुए सभी भयानक नुकसान जलवायु परिवर्तन की वजह से नहीं हुए हैं।” उनका कहना है कि तापमान बढ़ने से बाढ़ का असर शायद और बढ़ गया, लेकिन परिवारों पर इसका कितना बुरा असर पड़ा, यह असमान विकास, आपदा जोखिम कम करने में कम निवेश, कुछ मामलों में सामाजिक रूप से हाशिए पर धकेले जाने और भू-राजनीतिक कारकों पर भी निर्भर करता है। विल्किंसन आगे कहती हैं कि जलवायु से जुड़े नुकसान का हिसाब-किताब तब लगाया जा सकता है जब ‘क्लाइमेट एट्रिब्यूशन स्टडी’ (जलवायु परिवर्तन से जुड़े प्रभावों का अध्ययन) उपलब्ध हो।
ICIMOD के श्रेष्ठ का कहना है कि जलवायु परिवर्तन एक मुख्य कारण हो सकता है, लेकिन इसकी पुष्टि के लिए और जांच की ज़रूरत है। जिस बात पर कोई शक नहीं है, वह है व्यापक ट्रेंड: हिंदू कुश हिमालय (HKH) का तापमान दुनिया के औसत से लगभग दोगुनी तेज़ी से बढ़ रहा है (हर दशक में 0.3°C), और अनुमान है कि 2100 तक ग्लेशियर का आकार बहुत कम हो जाएगा। तीस साल के लैंडसैट डेटा पर आधारित 2026 के एक विस्तृत ग्लेशियर आकलन से पता चलता है कि 1990 के बाद से इस इलाके में ग्लेशियर का 12% हिस्सा खत्म हो चुका है, और पिछले दशक में इसके खत्म होने की दर 1990 के दशक की तुलना में 50% ज़्यादा रही है। वे कहते हैं कि जैसे-जैसे ग्लेशियर पिघलते हैं, वे धीरे-धीरे उस सहारे को हटा देते हैं जो कभी उनके नीचे की चट्टान को अपनी जगह पर बनाए रखता था।
वे कहते हैं, “हालांकि, क्या उसी वजह से उस सुबह वह ढलान ढह गई, इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है, और अभी इसके बारे में पक्के तौर पर कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी।”
वे आगे कहते हैं, “2000 के दशक में, हमें उम्मीद थी कि HKH इलाके में ग्लेशियर से जुड़ी बाढ़ लगभग हर 5 से 10 साल में एक बार आएगी। अकेले 2025 में इस इलाके में ऐसी तीन घटनाएं हुईं, और अब 2026 में यह घटना हुई है।”
काठमांडू स्थित गैर-लाभकारी संस्था ‘प्रकृति रिसोर्स सेंटर’ के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर राजू पंडित छेत्री तीन तरह के सबूतों की ओर इशारा करते हैं: ग्लोबल वार्मिंग के ट्रेंड पहले ही ठीक इसी तरह की आपदाओं की भविष्यवाणी कर चुके हैं; हिमालय की नाजुक पहाड़ी इकोलॉजी के कारण वहां तापमान दुनिया के औसत से कहीं ज़्यादा तेज़ी से बढ़ रहा है; और नेपाल में खुद ऐसी घटनाएं बार-बार होती रही हैं, जिसमें सिर्फ़ दो साल पहले एवरेस्ट के इलाके में ग्लेशियर झील के फटने से आई बाढ़ भी शामिल है। वे कहते हैं, “अगर वे कहते हैं कि ये ऐसी घटनाएं नहीं हैं जो जलवायु परिवर्तन की वजह से होती हैं, तो इस पर सवाल उठाने वाले – चाहे FRLD हो या दूसरे विकसित देश – बस अपनी ज़िम्मेदारी से भाग रहे हैं। उन्हें यह साबित करना चाहिए कि यह घटना जलवायु परिवर्तन की वजह से नहीं हुई थी।”
जानकारों का कहना है कि तैयारी की कमी ने भी भारी नुकसान को और बढ़ाने में भूमिका निभाई। श्रेष्ठ शुरुआती चेतावनी प्रणालियों (अर्ली वार्निंग सिस्टम) से जुड़ी सबसे बड़ी कमी की ओर इशारा करते हैं। उनका कहना है कि खतरा ऐसी जगह से आया जिस पर किसी की नज़र नहीं थी। नेपाल के पास संभावित रूप से खतरनाक 47 ग्लेशियल झीलों की एक अच्छी सूची है, और इनमें से दो झीलों – सो रोल्पा और इमजा सो – पर शुरुआती चेतावनी प्रणालियाँ मौजूद हैं।

लेकिन वे कहते हैं कि 26 अगस्त की घटना किसी झील से शुरू नहीं हुई थी। इसकी शुरुआत एक लटकते हुए ग्लेशियर वाली चट्टानी ढलान से हुई थी—एक ऐसा स्रोत जिसे कोई भी क्षेत्रीय प्रणाली ट्रैक नहीं करती है। वे आगे कहते हैं कि जो मॉनिटरिंग स्टेशन मौजूद थे, वे भी बहुत कमज़ोर और धीमे थे। भोटे कोशी और स्याब्रूबेसी में लगे ऑटोमेटेड रिवर गेज का मकसद बढ़ते जलस्तर का पता लगाना और अलर्ट जारी करना था। लेकिन, कोई भी चेतावनी जारी होने से पहले ही बाढ़ उन्हें बहा ले गई। नेपाल में घुसने के लगभग 10 मिनट के भीतर ही बाढ़ स्याब्रूबेसी पहुँच गई।
वे कहते हैं कि वैसे भी, जो अर्ली वॉर्निंग सिस्टम मौजूद हैं, उन्हें धीरे-धीरे आने वाली मॉनसून की बाढ़ के हिसाब से सेट किया गया है, न कि कुछ ही मिनटों में मलबे के तेज़ी से बहने (हाइपर-कंसंट्रेटेड डेब्रीज़ फ़्लो) जैसी स्थिति के लिए।
क्षमता का सवाल
‘लॉस एंड डैमेज’ (नुकसान और क्षति) से निपटने के लिए फंड (FRLD) बनाने के विचार को हकीकत बनने में कई दशक लग गए। छोटे द्वीपीय देशों ने कम से कम 1991 से ही नुकसान और क्षति से निपटने के लिए एक सिस्टम बनाने की मांग की थी। यह मांग उन बातचीत के दौरान की गई थी जिनसे संयुक्त राष्ट्र का क्लाइमेट कन्वेंशन बना, जिसे औपचारिक रूप से 1992 में शुरू किया गया था। साल 2015 में, पेरिस समझौते के आर्टिकल 8 में नुकसान और क्षति को क्लाइमेट एक्शन के एक अलग हिस्से के तौर पर औपचारिक रूप से शामिल किया गया। आखिरकार, 2022 में शर्म अल-शेख में हुई कॉप27 बैठक में देश इस फंड को बनाने पर सहमत हुए।
अगले साल दुबई में हुई कॉप28 बैठक में इस फंड को चालू किया गया। वहां समिट की अध्यक्षता कर रहे संयुक्त अरब अमीरात ने 10 करोड़ डॉलर देने का वादा किया और दूसरे देशों से भी योगदान करने को कहा। अब इस फंड की कुल रकम 82 करोड़ डॉलर से ज़्यादा हो गई है।
जुलाई में हुई फंड की हालिया बोर्ड मीटिंग तक, 119 देशों ने लगभग 2.8 अरब डॉलर की फंडिंग के लिए 176 अनुरोध जमा किए थे। प्रतिक्रिया इतनी बड़ी थी कि बोर्ड ने तय किया कि किसी भी चीज़ को मंज़ूरी देने से पहले पूरे पोर्टफोलियो का अच्छी तरह और बारीकी से आकलन करने के लिए और समय चाहिए। उसने इस फ़ैसले को अपनी अगली मीटिंग तक टाल दिया, जो दिसंबर 2026 में मनीला में होनी है।
जर्मनवॉच में क्लाइमेट चेंज अडॉप्टेशन और मानवाधिकार मामलों की सीनियर एडवाइज़र वेरा कुंज़ेल ने कहा, “भले ही FRLD अभी भी अपनी ऑपरेशनल और डिज़ाइन सुविधाओं को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में है, लेकिन एक बात तो साफ़ है: अभी उपलब्ध संसाधन असल नुकसान और उससे जुड़ी ज़रूरतों के पैमाने की तुलना में बहुत कम हैं।” जर्मनवॉच एक जर्मन नॉन-प्रॉफिट संस्था है जो ‘ग्लोबल क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स’ प्रकाशित करने के लिए जानी जाती है। यह इंडेक्स उन देशों की सालाना रैंकिंग है जो चरम मौसम की घटनाओं से सबसे ज़्यादा प्रभावित होते हैं।
वे कहती हैं कि इस फंड का स्वागत बहुत उत्साह और बड़ी उम्मीदों के साथ किया गया था, लेकिन अभी यह उन उम्मीदों पर खरा उतरने की स्थिति से बहुत दूर है।
नेपाल की मांग ने मामले को और उलझा दिया है। यह प्रोजेक्ट-आधारित मदद मांगने वाला कोई आम प्रस्ताव नहीं है, बल्कि तुरंत और तेज़ी से कार्रवाई की अपील है। तेज़ी से कार्रवाई करना FRLD के डिज़ाइन की एक खास बात है, जो इसे जलवायु से जुड़े दूसरी वित्तीय प्रणाली से अलग बनाती है। हालाँकि, इसे लागू करने के लिए अभी तक कोई सिस्टम नहीं बनाया गया है।

विल्किंसन और छेत्री भी यही बात कहते हैं। विल्किंसन कहते हैं, “फंड के नियम-कायदों में साफ़ तौर पर कहा गया है कि यह तेज़ी से कार्रवाई करने वाले उपायों (रैपिड रिस्पॉन्स) में मदद कर सकता है। हालाँकि, बारबाडोस इम्प्लीमेंटेशन मोडालिटीज (BIM) — जो इसके पायलट फ़ेज़ का नाम है — के तहत ऐसा करने का कोई प्रावधान नहीं है।” “अभी फंड के लिए जो आवेदन आए हैं, वे उपलब्ध फंड से कहीं ज़्यादा हैं। इसलिए, नेपाल को फंड देने के लिए इनमें से कुछ आवेदनों को अस्वीकार करना पड़ सकता है। तेज़ी से कार्रवाई के लिए फंड देने के मामले में दूसरे मानवीय फंड और संगठन ज़्यादा बेहतर स्थिति में हैं — जैसे संयुक्त राष्ट्र का सेंट्रल इमरजेंसी रिस्पॉन्स फंड।”
छेत्री का कहना है कि FRLD के नियम-कायदों में तेज़ी से कार्रवाई (रैपिड रिस्पॉन्स) का प्रावधान तो है, लेकिन उन नियमों के उस हिस्से को कैसे लागू किया जाए, इसकी प्रक्रिया अभी तय नहीं हुई है। वे कहते हैं, “अभी के लिए, बोर्ड नेपाल की मदद करने के लिए आपातकालीन स्थिति मानकर सहमत हो सकता है, और बाद में इसके तौर-तरीके तय कर सकता है।”
हाल ही में 3 सितंबर को दिली, तिमोर-लेस्ते में हुई सबसे कम विकसित देशों या ‘लीस्ट डेवलप्ड कंट्रीज़’ (LDC) ग्रुप के मंत्रियों की बैठक में, सदस्य देशों ने नेपाल के लोगों के साथ एकजुटता दिखाई। उन्होंने एक घोषणापत्र अपनाया जिसमें कहा गया कि FRLD सहायता की मांग फंड के उपलब्ध संसाधनों से कहीं ज़्यादा है, और अतिरिक्त फंड जुटाने के लिए साफ़ दिशा-निर्देशों की मांग की गई।
कुंज़ेल का कहना है कि नेपाल की मांग को दूसरे LDC और विकासशील देशों से ज़बरदस्त समर्थन मिल रहा है। उन्हें उम्मीद है कि बोर्ड सकारात्मक प्रतिक्रिया देगा। अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण और जलवायु नीति में ‘पॉलुटर पेज़’ यानि ‘प्रदूषण फैलाने वाला ही भुगतान करेगा’ का सिद्धांत अच्छी तरह से स्थापित है और यह पेरिस समझौते के व्यापक ढांचे में भी दिखता है। उनका कहना है कि नेपाल जैसे देशों को समर्थन देना कोई दान नहीं, बल्कि ज़िम्मेदारी और निष्पक्षता पर आधारित एक कर्तव्य है।
इसके अलावा, यह इस बात की भी परीक्षा है कि क्या ज़रूरत के समय काम करने के लिए बहुपक्षीय प्रणाली पर भरोसा किया जा सकता है।
यह खबर मोंगाबे-इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 14 सितम्बर, 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: नेपाल के नुवाकोट ज़िले के देवीघाट में त्रिशूली और ताडी नदियों के संगम पर अगस्त में अचानक आई बाढ़ से नष्ट हुईं इमारतें। (AP फ़ोटो/राजेश कुमार सिंह)