- केन-बेतवा लिंक परियोजना के दौधन बाँध का निर्माण आगे बढ़ने के साथ पन्ना टाइगर रिजर्व में पेड़ों की कटाई शुरू हो चुकी है।
- परियोजना से प्रभावित गाँवों के कई परिवार जंगल से मिलने वाले महुआ, चिरौंजी, तेंदू, आंवला, हर्रा-बहेड़ा, जलाऊ लकड़ी और दूसरे संसाधनों पर अपनी निर्भरता कम होने की बात कर रहे हैं।
- पुराने सरकारी और वैज्ञानिक आकलनों में पन्ना के जंगल, बाघों के आवास, वन्यजीवों की आवाजाही और केन नदी की पारिस्थितिकी पर असर की आशंका जताई गई है।
मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में पन्ना टाइगर रिजर्व के पास केन नदी के किनारे बसा दौधन गाँव जंगल और नदी से घिरा इलाका है। अब इसी गाँव के पास केन-बेतवा लिंक परियोजना का दौधन बाँध बन रहा है। गाँव की 50 वर्षीय पूना गोंड के लिए जंगल केवल आसपास फैली हरियाली नहीं है। परिवार के खाने, जलाऊ लकड़ी और घर बनाने की सामग्री से लेकर कई रोजमर्रा की जरूरतें इसी जंगल से पूरी होती रही हैं।
“जंगल हमारा ईश्वर है। भूख मिटाने से घर बनाने तक के साधन हमें जंगल ने दिए हैं। हमारा जीवन इसी से जुड़ा है,” पूना कहती हैं।
दौधन गाँव के ग्रामीण पास के जिस इलाके में जंगल होने की बात करते हैं, वहां अब बाँध के निर्माण के चलते साफ़ की गई जमीन, और खुदे हुए हिस्से दिखाई देते हैं और भारी मशीनों की आवाज सुनाई देती है। दौधन और आसपास के गाँवों के कई परिवारों की चिंता है कि परियोजना आगे बढ़ने के साथ जंगल तक उनकी पहुंच और उससे मिलने वाले संसाधन कम होते जाएंगे।
केन-बेतवा लिंक परियोजना प्राधिकरण के मुताबिक, जुलाई 2026 के अंत तक दौधन बाँध स्थल पर कई निर्माण गतिविधियां चल रही थीं। पहले चरण के कॉफरडैम (अस्थाई संरचना) के तटबंध का करीब 98 प्रतिशत काम पूरा हो चुका था, जबकि मुख्य बाँध के कुछ हिस्सों में कंक्रीट डालने का काम मई 2026 में शुरू हुआ था। बाँध की नींव की खुदाई, स्पिलवे और अप्रोच चैनल पर भी काम जारी है।
केन-बेतवा देश की पहली नदी जोड़ो परियोजना है। करीब 44,605 करोड़ रुपये की इस परियोजना के तहत केन नदी पर दौधन बाँध बनाकर पानी बेतवा नदी क्षेत्र तक पहुंचाया जाएगा। परियोजना के कारण करीब 9,000 हेक्टेयर क्षेत्र डूब में आने का अनुमान है, जिसमें पन्ना टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्र की 4,141 हेक्टेयर और बफर क्षेत्र की 1,314 हेक्टेयर जमीन शामिल है। सरकार का दावा है कि इससे बुंदेलखंड में सिंचाई और पेयजल उपलब्धता बढ़ेगी। परियोजना को 2030 तक पूरा करने का लक्ष्य है।

जंगल से जुड़ी आजीविका में बदलाव
दौधन गाँव की 52 वर्षीय हरबाई गोंड के लिए जंगल आमदनी के साथ परिवार के खाने का भी अहम स्रोत रहा है।
“मुझ जैसे ग्रामीण जंगल के महुआ, चिरोंजी, तेंदू, आंवला, हर्रा-बहेड़ा जैसे कई उत्पादों पर निर्भर हैं। इन उत्पादों से हमारी मौसमी आय 30-40 हजार रुपये हो जाती थी। जबकि, बेर, आचार, करोंदा, जामुन, कई भाजियाँ हमारी भूख मिटाने का जरिया थी,” हरबाई ने बताया। “अब हमें जंगल में जाने की सीधी अनुमति नहीं है। हम जंगल में अंदर जाते हैं तब प्रशासन के लोग रोक-टोक करते हैं। खास तौर पर हमारे आंदोलन के बाद तो प्रशासन की दखलअंदाजी और भी बढ़ गई है,” उन्होंने ने आगे कहा।
दौधन के 30 वर्षीय भज्जू कोंदर भी जंगल से मिलने वाली खाद्य सामग्री को परिवार की रोजमर्रा की जरूरतों से जोड़ते हैं।
“जंगल की सबसे खास बात हमारे लिए यह थी कि वहाँ तरह-तरह के जंगली खाने से हमारी थाली की विविधता बनी रहती थी। वहीं, विविध प्रकार की खाद्य सामग्री जंगल से हमें मुफ़्त मिलती थी। अब विस्थापन के बाद खाने से लेकर सब कुछ पैसे से खरीदना पड़ रहा है। इसमें सबसे बड़ी परेशानी यह है कि, अब मजदूरी करने शहर जाना पड़ता है। तब घर का खर्च चल पाता है।”
सुकवाहा की 40 वर्षीय गुड्डी सौर कहती हैं कि निर्माण आगे बढ़ने के साथ जलाऊ लकड़ी जुटाना भी मुश्किल हुआ है।

“परियोजना का काम बढ़ने से अब जलाऊ लकड़ी लाना भी आसान नहीं जंगल से। ऐसे में कई परिवार अब गैस सिलेंडर से खाना बना रहे हैं। कई लोग जलाऊ लकड़ी लेने जंगल जाते भी हैं तो कुल्हाड़ी जैसे साधन छुपा कर ले जाते हैं। वहीं, परियोजना क्षेत्र में यदि कोई बाहरी व्यक्ति घूमने आता है जैसे कार, बाइक से तब भी निगरानी रखी जाती है।”
हालाँकि, ग्रामीणों की ओर से बताई जा रही ये रोक-टोक किस हद तक परियोजना निर्माण से जुड़ी नई व्यवस्था है और कितनी पन्ना टाइगर रिजर्व में पहले से लागू नियमों का हिस्सा, यह स्पष्ट होना बाकी है।
इसी गाँव के 75 वर्षीय बुजुर्ग मुकुंद सौर कहते हैं कि परिवारों की आजीविका केवल जंगल तक सीमित नहीं रही है। उनके मुताबिक, गाँव के लोग जंगल की उपज, खेतों के अनाज और केन नदी की मछलियों पर भी निर्भर रहे हैं।
पेड़ों की कटाई के अलग-अलग आंकड़े
परियोजना में पेड़ों के नुकसान को लेकर अलग-अलग दस्तावेजों में अलग आंकड़े सामने आते हैं। इन आंकड़ों का क्षेत्र और पेड़ों की गणना का आधार भी अलग है।
केंद्र सरकार के मुताबिक, दौधन बाँध और उससे जुड़े निर्माण के लिए 17,101 पेड़ों को काटने के लिए चिन्हित किया गया है। इनमें से 12,404 पेड़ पन्ना टाइगर रिजर्व के भीतर काटे जा चुके हैं।
इसके मुकाबले परियोजना के पुराने पर्यावरणीय दस्तावेजों में जलाशय के पूर्ण स्तर पर डूबने वाले क्षेत्र में 20 सेंटीमीटर से अधिक परिधि वाले करीब 18.05 लाख पेड़ों के प्रभावित होने का अनुमान लगाया गया था।
इसलिए निर्माण के मौजूदा चरण में काटे जा रहे पेड़ों और पूरे डूब क्षेत्र में संभावित रूप से प्रभावित पेड़ों की संख्या को एक ही आंकड़े के रूप में नहीं देखा जा सकता।
परियोजना दस्तावेजों में जंगल के नुकसान की भरपाई के लिए करीब 12,034 हेक्टेयर अवनत वन भूमि पर कॉम्पेन्सेटरी प्लांटेशन का प्रावधान भी बताया गया है। यह जमीन 239 अलग-अलग भूखंडों में फैली होने की बात पुराने दस्तावेजों में कही गई है।

बाघों के आवास पर क्या असर होगा
पन्ना टाइगर रिजर्व परियोजना से जुड़े सबसे अहम पर्यावरणीय सवालों के केंद्र में है।
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के एक अध्ययन के मुताबिक, परियोजना के कारण बाघों के आवास का करीब 58.03 वर्ग किलोमीटर हिस्सा सीधे प्रभावित हो सकता है। अध्ययन में हैबिटेट फ्रेगमेंटेशन और दूसरे हिस्सों से संपर्क टूटने के कारण करीब 105.23 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर अप्रत्यक्ष प्रभाव का भी अनुमान लगाया गया है।
पुराने पर्यावरणीय आकलनों में चीतल, सांभर और चट्टानों, गुफाओं व नदी किनारे के आवासों पर निर्भर दूसरी प्रजातियों पर भी असर की आशंका जताई गई है।
पलकोंहाँ के 45 वर्षीय कालू कोंदर कहते हैं, “परियोजना कार्य जैसे-जैसे बढ़ रहा है उससे हम जंगल से दूर हो रहे हैं। वहीं, टाइगर रिजर्व में जहां-जहां पेड़ों की कटाई हुई है वहाँ खालीपन आ गया है। जहां पेड़ नहीं हैं वहाँ वन्यजीव भी अब दिखाई नहीं देते।”
सुकवाहा की 45 वर्षीय नन्नी रानी सौर का कहना है कि उन्हें कुछ वन्यजीव अब सड़क के आसपास अधिक दिखाई देते हैं।
“परियोजना में पेड़ों की कटाई से वन्यप्राणी यहाँ-वहाँ भागते, आवाज करते दिखते हैं। देखने में लगता है उनका सुकून छिन गया है। मोर, हिरण, सियार, बंदर जैसे कई वन्यप्राणी तो अब रोड पर आते दिखते हैं। ऐसे में लगता है मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ ना जाए।”

जलीय जीवों पर प्रभाव
पीपुल्स साइंस इंस्टीट्यूट, देहरादून से जुड़े अनिल गौतम परियोजना के मूल आधार पर भी सवाल उठाते हैं।
“नदी जैसे प्राकृतिक स्त्रोतों को जोड़ना प्रकृति के विरुद्ध है। उन्हें जोड़ने से नदी के जल, जीव, वनस्पति, और उनका संतुलन और गुणवत्ता प्रभावित होगी। हर नदी अपने स्वाभाव के हिसाब से अलग है। वहीं, केन के जल का कम और बेतवा के जल का अधिक दोहन हुआ है। तब यह गलत तथ्य सामने आ रहा है कि, केन में अधिक और बेतवा में कम पानी है। जबकि, दोनों नदी में वर्षा दर समान है।”
केन और बेतवा की अपनी-अपनी जलीय जैव विविधता है। दोनों नदियों में मछलियों और दूसरे जलीय जीवों की कई प्रजातियां पाई जाती हैं।
केन और बेतवा की जलीय जैव विविधता पूरी तरह समान नहीं है। वर्ष 2017 के एक अध्ययन में केन में मछलियों की 89 और बेतवा में 81 प्रजातियां दर्ज की गई थीं। इनमें से 77 प्रजातियां दोनों नदियों में पाई गईं, जबकि 12 केवल केन और चार केवल बेतवा में दर्ज हुईं। अध्ययन में दोनों नदियों के निचले हिस्सों में बाहरी प्रजातियां भी मिली थीं और शोधकर्ताओं ने इन नदियों को जोड़ने से पारिस्थितिकी और मत्स्य संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव की आशंका जताई थी।

विशेषज्ञ क्या कहते हैं
दक्षिण एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स एंड पीपल के समन्वयक हिमांशु ठक्कर भी पन्ना के जंगल और केन नदी के प्रवाह को लेकर चिंता जताते हैं।
“केन-बेतवा परियोजना निश्चित रूप से पर्यावरणीय संकट की स्थति को जन्म देगी। परियोजना में पन्ना टाईगर रिजर्व का एरिया डूबने के साथ डिस्कनेक्ट भी होगा। तब प्राणियों का सर्वाइवल कठिन होगा। वहीं, नदी की जैव-विविधता बहाव रुकने से प्रभावित होगी। जबकि, पक्षियों की आबादी पर भी संकट होगा। मुख्यत: जो चार प्रकार के गिद्ध हैं उनकी गुफ़ाएं नष्ट होंगी। केन नदी में अधिक पानी है यह विचार सार्वजनिक नहीं है।”
और पढ़ेंः केन-बेतवा परियोजना: कौन छूटा, किसे कितना मिला मुआवजा और आंदोलन के बाद क्या बदला
परियोजना के खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर कहते हैं, “यह परियोजना ऐसी पर्यावरणीय क्षति पैदा करेगी जिसकी भरपाई करना कठिन है। परियोजना से वन्यजीव, पहाड़, पेड़, श्यामरी व बराना नदी, 229 प्रकार के पक्षी, घड़ियाल, गिद्ध सब बुरी तरह प्रभावित हो जाएंगे।” “इस परियोजना के फायदे और नुकसान पर एक सार्वजनिक संवाद की जरूरत है। इस परियोजना की पूर्णता: बिना पर्यावरणीय, मानव, जीव-जन्तु, जैवविधता के विनाश के भी की जा सकती हैं। इसके लिए अलग से विकल्प तलाशने की जरूरत है,” उन्होंने आगे बताया।
बैनर तस्वीरः केन-बेतवा परियोजना से प्रभावित पलकोंहाँ गांव की कुछ महिलाएं। तस्वीर- सतीश भारतीय/मोंगाबे