- छत्तीसगढ़ विधानसभा में सर्वसम्मति से हसदेव अरण्य के सभी कोयला खदानों को रद्द करने के शासकीय संकल्प के बाद, इस साल एक और नये कोयला खदान तारा की नीलामी को लेकर राजनीति गरमा गई है।
- तारा खदान को 2023 में राज्य सरकार ने नीलामी से बाहर रखने की मांग की थी और जैव विविधता, घने जंगल, हाथी कॉरिडोर के तर्क दिए थे। लेकिन दो साल बाद ही दूसरी सरकार ने अपनी तरफ़ से चिट्ठी लिख कर इस कोयला खदान को नीलामी प्रक्रिया में शामिल करने की मांग की।
- हसदेव में अभी तक बिजली उत्पादन के लिए कोयले की जरूरत का हवाला दे कर तीन खदान राजस्थान सरकार को आवंटित किए गए थे. लेकिन ताज़ा नीलामी पूरी तरह व्यावसायिक उपयोग के लिए की गई है।
छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित हसदेव अरण्य के जंगल में एक और नई कोयला खदान तारा की नीलामी को लेकर हसदेव से लेकर राजधानी रायपुर तक हंगामा मचा हुआ है। तारा कोयला खदान की व्यावसायिक नीलामी हो चुकी है। खदान अभी शुरू नहीं हुई है, लेकिन इसकी नीलामी ने हसदेव में खनन को लेकर सरकार के बदलते रुख पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
असल में तीन साल पहले ही राज्य सरकार ने केंद्रीय कोयला मंत्रालय से तारा इलाके की जैव विविधता का हवाला देते हुए, इसे नीलामी की प्रक्रिया से बाहर रखने का अनुरोध किया था। इसके बाद केंद्र ने तारा समेत उन सभी कोयला खदानों को नीलामी से बाहर कर दिया था, जो छत्तीसगढ़ के लेमरु हाथी कॉरिडोर के दायरे में आ रही थीं। लेकिन इस साल तारा कोयला खदान की नीलामी कर दी गई। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि हसदेव अरण्य में ऐसा क्या बदला है कि तारा की बोली लगा दी गई?
केंद्र सरकार के मुताबिक तारा कोयला खदान की 2026 में हुई वाणिज्यिक नीलामी में नौ बोलियां मिलीं और इसे 37.5 प्रतिशत राजस्व हिस्सेदारी पर अडानी समूह की सीजी सिनगैस एंड केमिकल्स लिमिटेड को दे दिया गया। लेकिन तारा की कहानी 2026 की नीलामी से शुरू नहीं होती। इसके पीछे 15 साल से अधिक पुराना विवाद है, जो वन संरक्षण, कोयले की जरूरत, हाथियों के आवागमन, आदिवासी अधिकार, खेती के लिए पानी और सरकारी नीतियों के बदलते रुख से जुड़ा हुआ है।

जून 2010 में कोयला मंत्रालय और वन-पर्यावरण मंत्रालय ने संयुक्त रुप से देश के नौ कोलफील्ड्स की कुल 602 कोयला खदानों का अध्ययन किया और इनमें से 153 कोयला खदान वाले इलाकों को ‘नो गो’ घोषित करते हुए, वहां खनन नहीं करने की अनुशंसा की। इन कोलफील्ड्स में छत्तीसगढ़ का हसदेव अरण्य देश का अकेला ऐसा इलाका था, जहां सभी 20 कोयला खदानों को ‘नो गो’ की श्रेणी में रखा गया था। लेकिन बाद में इस शर्त के साथ परसा ईस्ट केते बासन कोयला खदान को, राजस्थान सरकार को आवंटित किया गया कि भविष्य में हसदेव अरण्य में कोई और कोयला खदान आवंटित नहीं किया जाएगा। इस खदान में खनन का काम समाप्त भी नहीं हुआ था कि उससे पहले हसदेव अरण्य के परसा और केते एक्सटेंशन कोयला खदान को भी राजस्थान सरकार को आवंटित कर दिया गया। इन खदानों के लिए पेड़ों की कटाई चल ही रही है, इस बीच तारा कोयला खदान की नीलामी कर दी गई।

बिजली की जरूरत और तारा का फर्क
हसदेव में कोयला खनन को लेकर “देश को बिजली चाहिए” का तर्क लंबे समय से दिया जाता रहा है। लेकिन हसदेव के सभी कोयला खदानों की भूमिका एक जैसी नहीं है। राजस्थान की बिजली ज़रूरत से जुड़े परसा ईस्ट केते बासन खदान को लेकर छत्तीसगढ़ सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दे कर कहा कि इस खदान में उपलब्ध कोयला राजस्थान के 4,340 मेगावाट के संबंधित बिजलीघरों की जरूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त है। लेकिन इसके बाद भी परसा और केते एक्सटेंशन कोयला खदान, राजस्थान को आवंटित कर दिया गया।
तारा का मौजूदा मामला इन सबसे अलग है। साल 2026 में इसकी नीलामी व्यावसायिक कोयला खनन के लिए हुई है। यानी निकाला गया कोयला किसी एक निर्दिष्ट बिजलीघर की ज़रूरत तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे व्यावसायिक उपयोग के लिए बाजार में बेचा जा सकता है। यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हसदेव में नई खदान की जरूरत का सवाल केवल “कोयला चाहिए या नहीं” का सवाल भर नहीं है। सवाल यह भी है कि किस उपयोग के लिए कितना कोयला चाहिए और उसके लिए किस इलाके को कितनी कीमत चुकानी होगी।
यही कारण है कि 2011 में परसा ईस्ट केते बासन, तारा और परसा से जुड़े वन मंजूरी के फैसलों को लेकर काफी विवाद हुआ। परसा ईस्ट केते बासन की वन मंजूरी के खिलाफ 2012 में दायर याचिका पर 2014 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने हस्तक्षेप किया और जैव-विविधता तथा वन्यजीवों से जुड़े सवालों पर दोबारा विचार करने को कहा। इसी न्यायिक प्रक्रिया के बाद हसदेव के व्यापक जैव-विविधता अध्ययन की जमीन तैयार हुई।
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के निर्देश के बाद हसदेव-अरण्य के जैव-विविधता पर भारतीय वन्यजीव संस्थान और भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद ने अध्ययन किया और 2021 में तैयार रिपोर्ट में कहा कि हसदेव-अरण्य कोयला क्षेत्र और उसके आसपास का 80 प्रतिशत से अधिक भूभाग वनाच्छादित है।
अध्ययन में इस इलाके में 25 से अधिक स्तनधारी प्रजातियां दर्ज की गईं, जिनमें नौ ऐसी थीं, जिन्हें वन्यजीव संरक्षण कानून की अनुसूची-I में उच्चतम कानूनी संरक्षण हासिल था। रिपोर्ट में कहा गया कि देश के केवल 1 फीसदी हाथी छत्तीसगढ़ में हैं लेकिन देश में मानव-हाथी संघर्ष की 15 फ़ीसदी से अधिक घटनाएं यहां दर्ज की गई हैं। अध्ययन के दौरान इस इलाके में पक्षियों की 92, सरीसृप की 23, तितलियों की 43, पेड़ों की 74 और 31 प्रजाति के स्तनपायी जीव भी मिले।

भारतीय वन्यजीव संस्थान को सबसे ज़्यादा फिक्र इस बात की थी कि जंगल बीच-बीच में से कटकर छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटते जा रहे हैं। रिपोर्ट में कहा गया कि हसदेव-अरण्य और आसपास का इलाका हाथियों और दूसरे बड़े स्तनधारियों के लिए महत्वपूर्ण है और खनन तथा उससे जुड़ी गतिविधियां उनके आवागमन को प्रभावित कर सकती हैं। भारतीय वन्यजीव संस्थान के अध्ययन में 2018 से 2020 के दौरान क्षेत्र के 647 वन खंडों में से 148 में हाथियों की सक्रिय मौजूदगी पाई गई। रिपोर्ट की सिफारिश थी कि पहले से चालू परसा ईस्ट केते बासन खदान के अलावा हसदेव-अरण्य के बाकी हिस्से को खनन से बचाया जाए। हालाँकि भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के आदेश से परे जा कर, अपनी तरफ से परसा ईस्ट केते बासन, परसा, केते एक्सटेंशन के साथ-साथ तारा कोयला खदान में शर्तों के साथ खनन की पेशकश की।
सरकार की न
इन सबके बीच हसदेव में आदिवासियों का आंदोलन तेज़ होता चला गया। इसके बाद 26 जुलाई 2022 को छत्तीसगढ़ विधानसभा ने सर्वसम्मति से हसदेव क्षेत्र में आवंटित सभी कोयला खदान को रद्द करने का शासकीय संकल्प पारित किया। अगले वर्ष, 16 जुलाई 2023 को राज्य सरकार के सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देते हुए कहा कि पहले से संचालित परसा ईस्ट केते बासन कोयला खदान से राजस्थान की संबंधित बिजलीघरों की जरूरत करीब 20 वर्षों तक पूरी की जा सकती हैं, इसलिए हसदेव में नए कोयला खदान की जरूरत नहीं है।
इसके कुछ ही सप्ताह पहले, 23 जून 2023 को राज्य के खनिज संसाधन विभाग ने केंद्र से तारा समेत नौ ब्लॉकों को नीलामी से बाहर रखने का अनुरोध किया था। नतीजा यह हुआ कि केंद्र ने तारा को 2023 की नीलामी की प्रक्रिया से हटा दिया। लेकिन उसी साल राज्य की सत्ता से कांग्रेस की विदाई हो गई। इसके बाद सत्ता में भारतीय जनता पार्टी की विष्णुदेव साय सरकार आई।
कोयला मंत्रालय के अनुसार, 11 दिसंबर 2025 को राज्य सरकार ने केंद्र को चिट्ठी लिख कर कहा कि तारा कोयला खदान लेमरू हाथी गलियारे के बाहर है और उसे आगामी नीलामी में रखा जा सकता है। मंत्रालय के अनुसार इसी अनुरोध के बाद ब्लॉक की सीमा बदली गई और तारा को 15वें व्यावसायिक कोयला खनन में शामिल किया गया।

छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के आलोक शुक्ला का कहना है कि अभी तक बिजली की ज़रुरत का हवाला दिया जाता था। लेकिन अब पैसे कमाने के लिए हसदेव को उजाड़ने की तैयारी चल रही है। उन्होंने मोंगाबे हिंदी से कहा, “2900 हेक्टेयर परसा ईस्ट केते बासन, 1252 हेक्टेयर परसा कोल ब्लॉक, केते एक्सटेंशन लगभग 1760 हेक्टेयर और अब 2400 हेक्टेयर वाला तारा कोल ब्लॉक की तबाही पर मुहर लग गई है। अनुमान है कि इन चारों खदानों में 22 से 25 लाख पेड़ कटेंगे। तारा तो पूरे देश में सर्वधिक जंगल वाला दूसरे नंबर का खदान है। लेकिन अब लग रहा है कि यह इतिहास में दफ़न हो कर रह जाएगा।”
राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल कहते हैं, “राज्य सरकार विधानसभा से बड़ी नहीं है। सत्ता पक्ष और विपक्ष, सबने मिलकर विधानसभा में सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पारित किया था कि यहां अब इसमें कोई कोयला खनन नहीं होगा। उसको दरकिनार करते हुए 11 दिसंबर 2025 को राज्य की साय सरकार ने केंद्र को पत्र लिखा। एक तो यह विधानसभा की अवमानना है, दूसरा यह जनभावनाओं के भी विरुद्ध है।”
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छत्तीसगढ़ खनिज विकास निगम के अध्यक्ष सौरभ सिंह इस बात का जवाब तो नहीं देते कि आखिर तारा की नीलामी के लिए राज्य की भाजपा सरकार ने चिट्ठी क्यों लिखी? लेकिन उनका तर्क है कि कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में भी तारा के खनन की कोशिश की गई थी।
सौरभ सिह कहते हैं, “जून 2021 में तत्कालीन मुख्यमंत्री ने केंद्रीय कोयला मंत्री के समक्ष तारा कोल ब्लॉक छत्तीसगढ़ खनिज विकास निगम को देने की मांग रखी थी। अभी तारा में वास्तविक खनन प्रारंभ करने से पहले वन स्वीकृति सहित सभी आवश्यक वैधानिक एवं पर्यावरणीय परीक्षण, अनुमतियां और निर्धारित शर्तों की पूर्ति अभी शेष है। इसलिए कांग्रेस द्वारा ऐसा वातावरण बनाया जाना कि नीलामी होते ही जंगल काटने और खनन की अनुमति दे दी गई है, सफेद झूठ है।”
ज़ाहिर है, तारा की असली परीक्षा अब शुरू होगी। नीलामी के बाद उसके नक्शे, वन क्षेत्र, ग्राम सभा की भूमिका, पर्यावरणीय प्रभाव और अदालतों में लंबित सवाल एक-एक करके सामने आएंगे। लेकिन इन सवालों पर होने वाले फैसले सिर्फ तारा में खनन की शर्तें तय नहीं करेंगे, बल्कि हसदेव में आदिवासी, जंगल, हाथियों और खनन का भविष्य भी तय करेंगे।
बैनर तस्वीरः खनन क्षेत्र के पास कटे हुए पेड़। हसदेव में कोयला खनन के विस्तार को लेकर वन कटाई प्रमुख चिंताओं में शामिल है। तस्वीर: आलोक प्रकाश पुतुल/मोंगाबे