- बिहार में 49.74 लाख बाढ़ प्रभावितों के लिए सिर्फ 13 राहत शिविर बनाए गए जबकि 2017 में 1238 राहत शिविर बनाए गए थे।
- राज्य की 575 पंचायतों में फैले बाढ़ पीड़ितों के लिए राहत व्यवस्था का बड़ा हिस्सा अब सामुदायिक रसोई और कैश ट्रांसफर पर निर्भर है।
- करीब 8.27 लाख परिवारों को सात-सात हजार रुपये राहत राशि खाते में पहुंचने के साथ ही राहत कैंप और कम्युनिटी किचन बंद होने लगे हैं। साथ ही बर्तन और कपड़ों के 3800 रुपये भी मिलना बंद हो गए हैं।
सितंबर की 16 तारीख, सुबह साढ़े आठ बजे का वक्त है। बिहार की राजधानी पटना के दीघा गंगा घाट के पास बने बाढ़ राहत केंद्र के टेंट खोले और सामान समेटा जा रहा है। इस शिविर में रहने वाले नकटा दियारा के बाढ़ पीड़ित अपना झोला-झपटा उठाए सपरिवार अपने घरों को लौट रहे हैं। ये परिवार पिछले 10-12 दिनों से इस शिविर में थे, मगर आज शिविर के बंद होने की घोषणा कर दी गई। ये सब ऐसे समय में हो रहा है जब बाढ़ का पानी इन लोगों के इलाकों में पूरी तरह से उतरा भी नहीं है।
“अभी कम से कम चार-पांच दिन रिलीफ कैंप को रहने देना चाहिए था। पांच रोज बाद तो हमलोग खुद चले जाते। अभी तक घर के पास जगह-जगह पानी अटका हुआ है। कई जगह पांच फीट से अधिक पानी है। बच्चा लोगों के डूबने का खतरा बना रहेगा। सबसे बड़ा दिक्कत है कि जानवर कहां रखेंगे, हम लोग तो चौकी पर चौकी डाल कर कैसे भी रह लेंगे,” राहत शिविर में एक कुर्सी पर बैठे रामा राय ने कहा।
इस शिविर से लगभग तीन किमी दूर जेपी गंगा पथ (जिसे पटना वाले मरीन ड्राइव कहते हैं) के किनारे-किनारे अभी भी पॉलिथीन का छप्पर लगाये 100 से अधिक बाढ़ पीड़ित परिवार दिख जाते हैं। वे पड़ोस के मोहल्ले बिंद टोली से आए हैं। कुछ दिन पहले सरकार ने इनके खाने की व्यवस्था के लिए वहीं पर एक कम्युनिटी किचन यानी सामूहिक रसोई शुरू की थी, जो अब बंद हो चुकी है। वहां मौजूद रामकली देवी कहती है, “पानी कम हुआ है, लेकिन अभी घर जाने लायक नहीं है। अगल-बगल में पानी है और घर में कीचड़। सांप-बिच्छू का खतरा है। रहेंगे कैसे, भले सरकार खाना बंद करे दे। हम तो अभी 10 दिन यहीं रहेंगे।”
बिहार में इस साल बाढ़ का पानी भले ही कई इलाकों में उतरने लगा हो, लेकिन हजारों परिवारों के लिए घर लौटना अभी सुरक्षित या संभव नहीं है। इसके बावजूद राज्य में राहत शिविर और सामुदायिक रसोई बंद किए जा रहे हैं। इस बीच सरकार ने लाखों बाढ़ प्रभावित परिवारों के खातों में राहत राशि भेजी है। सरकारी आंकड़ों और पिछले वर्षों के आंकड़ों की तुलना बताती है कि बाढ़ राहत का फोकस धीरे-धीरे राहत शिविरों से सामुदायिक रसोई और सीधे नकद सहायता की ओर खिसक रहा है।

यह हाल सिर्फ दीघा के इलाके का नहीं है। पटना, सारण, भोजपुर, जहानाबाद और आसपास के जिलों के सभी राहत केंद्र और सामूहिक रसोई बंद किए जा रहे हैं। पटना के आपदा प्रबंधन पदाधिकारी अमन कुमार बताते हैं, “जिले में कुल 39 कम्युनिटी किचन संचालित हो रहे थे, अब सभी को बंद कर दिया गया है। क्योंकि बाढ़ का पानी उतर गया है।”
पटना के सर्वाधिक बाढ़ प्रभावित प्रखंड पुनपुन में पांच कम्युनिटी किचन चल रहे थे, उन्हें भी बंद कर दिया गया है। जबकि पुनपुन में 16 सितंबर को भी अकौना और सिसवा गांव जाने के रास्ते में पांच किमी तक दोनों तरफ तीन से चार फीट पानी जमा दिखता है।
उसी तरह सारण जिले के सोनपुर में संचालित दो राहत शिविरों को चार-पांच दिन पहले बंद कर दिया गया है। इनमें से एक वह राहत शिविर भी है, जहां मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के खाना परोसने की तस्वीर वायरल हुई थी। उस राहत शिविर के बाहर कई परिवार पन्नी बांधे नजर आते हैं।
भले ही रिलीफ कैंप और कम्युनिटी किचन बंद करके बाढ़ पीड़ितों को उनके घर भेजा जा रहा है, मगर आपदा प्रबंधन विभाग से जारी डेली फ्लड बुलेटिन के मुताबिक 16 सितंबर को भी राज्य की 49.74 लाख की आबादी बाढ़ पीड़ित बताई गई है और जिक्र है कि राज्य में इन पीड़ितों के लिए 11 राहत शिविर और 724 कम्युनिटी किचन संचालित हो रहे हैं।
50 लाख बाढ़ पीड़ित, सिर्फ 13 राहत शिविर
राहत शिविर और कम्युनिटी किचन को बंद करने का सिलसिला मुख्यतः 15 सितंबर के बाद शुरू किया गया, जब एक कार्यक्रम के दौरान सीएम सम्राट चौधरी ने राज्य के 8.27 लाख परिवारों के खाते में सात-सात हजार रुपये की अनुदान राशि ट्रांसफर कर दी। राज्य सरकार के आंकड़ों से जाहिर है कि राहत अभियान पहले भी नाकाफी था, अब पैसे ट्रांसफर करने के बाद उसे भी खत्म किया जा रहा है।
नदी जीवन अभियान से जुड़े महेंद्र यादव कहते हैं, “बिहार सरकार के आपदा जोखिम न्यूनीकरण रोडमैप में साफ जिक्र है कि बाढ़ पीड़ितों को जल्दबाजी में घर नहीं भेजना है। जब तक घर रहने लायक न हो, उन्हें रिलीफ कैंपों में ही रहने देना है। मगर इस बार तो स्थिति यह है कि राज्य में सिर्फ 13 रिलीफ कैंप खुले। बाकी जगह कम्युनिटी किचन चलते रहे। ऐसे में बाढ़ पीड़ित लोगों को रहने के लिए अपनी व्यवस्था करनी पड़ी। सरकार उन्हें सिर्फ दो वक्त का भोजन देती रही।” बाढ़ पीड़ितों को उनके घरों के सुरक्षित न हो जाने तक राहत शिविरों में रहने देने की बात का जिक्र आपदा प्रबंधन विभाग के बाढ़ को लेकर बने स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर में भी है।
राज्य सरकार द्वारा इस साल 15 जिलों की 575 ग्राम पंचायतों में फैले लगभग 50 लाख पीड़ितों के लिए सिर्फ 13 राहत केंद्र खोले गए। मोंगाबे-हिंदी द्वारा आपदा प्रबंधन विभाग से जिलावार राहत केंद्रों की सूची मांगे जाने पर विभाग ऐसी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं करा सका। हालाँकि, अलग-अलग जिलों की स्थानीय मीडिया और जिला प्रशासनों के सोशल मीडिया पेज पर मिली जानकारी के मुताबिक, 13 राहत केंद्रों में से सात केंद्र भागलपुर में खुले हैं, दो सारण जिले में, दो खगड़िया और एक लखीसराय जिले में खुला है। बचे हुए एक राहत केंद्र की जानकारी नहीं नहीं मिल पाई। इस तरह देखें तो इस साल बाढ़ से प्रभावित 15 जिलों में से कम से कम 10 जिलों में कोई राहत केंद्र नहीं खुला है।

2017 में 1238 राहत शिविर, अब 13
साल 2017 में बिहार में जब भीषण बाढ़ आई थी, तब 16 जिलों की 98.22 लाख की आबादी बाढ़ से प्रभावित थी। उस वक्त 1238 राहत केंद्र खोले गये थे, जिनमें 3.10 लाख से अधिक लोग रह रहे थे। जबकि इस वक्त सरकारी आंकड़ों के हिसाब से 10,353 लोग ही राहत शिविरों में रह रहे हैं। (इसका दस्तावेज भेज रहा हूं.) इसके बदले सरकार ने इस साल 1251 सामुदायिक रसोई केंद्र खोले। जहां सिर्फ दो वक्त का भोजन मिलता है। जबकि राहत शिविरों में भोजन-नास्ता, रहने की व्यवस्था, शौचालय, पीने का शुद्ध पानी, बच्चों के लिए दूध, पशुओं के लिए चारा, स्वास्थ्य शिविर, बच्चों की पढ़ाई की व्यवस्था आदि कई तरह के इंतजाम होते हैं।
यह बात 2017 की बाढ़ के आंकड़ों में भी दिखती है, जब 1238 राहत शिविरों के साथ-साथ 1646 सामुदायिक रसोई खोले गये थे। मगर 2021 के बाद से राहत शिविरों की संख्या में गिरावट आने लगी। साल 2025 के आंकड़ों के मुताबिक उस साल 23 जिलों की 48 लाख की आबादी बाढ़ प्रभावित थी, मगर उस साल भी 18 राहत केंद्र ही खुले थे, जकि 1169 सामुदायिक किचन खोले गये थे।
राहत शिविरों की जगह सामुदायिक रसोई
महेंद्र यादव कहते हैं, “दरअसल सरकार ने इतनी लंबी चौड़ी जिम्मेदारी से बचने के लिए राहत शिविर के बदले अपना फोकस सामुदायिक रसोई पर कर रखा है। अधिकारी कहते हैं कि लोग राहत शिविरों में रहने नहीं आते। मैं पूछता हूं, क्या आपके पास कोई आंकड़ा है कि सरकार ने राहत शिविर खोला और वे खाली रह गए। वैसे भी सामुदायिक रसोई का जिक्र तो सरकार की पॉलिसी में था ही नहीं, यह तो अलग से जोड़ा गया है।”
आपदा प्रबंधन विभाग के पूर्व सचिव ब्यासजी भी यह मानते हैं कि सामुदायिक रसोई का प्रावधान अलग से जोड़ा गया है। वे कहते हैं, “दरअसल इसकी शुरुआत 2016 में पूर्णिया से हुई। जब अमौर के बाढ़ पीड़ित अपना घर छोड़कर राहत शिविर में आने के लिए तैयार नहीं हुए तो हम लोगों ने एक लंगर जैसी व्यवस्था कर दी कि लोग वहां जाकर दो वक्त का खाना खा लें।” ब्यासजी का कहना है कि दियारा और नदियों के इलाके के लोग बाढ़ के अभ्यस्त होते हैं। वे चोरी के डर से राहत शिविरों में नहीं रहना चाहते। इसलिए सरकार ने सामुदायिक रसोई की वैकल्पिक व्यवस्था की थी।
जब राहत शिविर महीनों तक चलते थे
जानकार बताते हैं कि शुरुआती दिनों में बाढ़ पीड़ितों को उनके घर वापस भेजे जाने की हड़बड़ी नहीं रहती थी। जब तक घर रहने लायक नहीं होते, उन्हें रिलीफ केंद्र में रखा जाता था। साल 2008 की कोसी आपदा के वक्त बाढ़ पीड़ित तीन महीने तक राहत केंद्रों में रहे थे।
टाटा सामाजिक संस्थान के पूर्व प्राध्यापक पुष्पेंद्र भी कहते हैं, “सरकार को भी राहत की सुविधा देने के लिए धनराशि पीड़ितों के खाते में भेज देना सुविधाजनक लगता है। कई दफा लोग भी खाते में पैसे देखकर संतुष्ट हो जाते हैं।”
पुष्पेंद्र भी कहते हैं, “बाढ़ पीड़ितों के लिए राहत शिविर ही आदर्श हैं। मगर सरकार वहां व्यवस्था ठीक नहीं कर पाती और जिम्मेदारी से बचने के लिए वह सामुदायिक रसोई खोलती है और राहत राशि बंटवा देती है।”
महेंद्र यादव कहते हैं, “अब राहत केंद्रों को सिर्फ इसलिए खोला जाता है कि वहां जाकर सीएम उद्घाटन करें और मीडिया में यह मैसेज दिया जा सके कि राहत केंद्र खोले गये हैं।”

राहत राशि भी हुई कम
हालाँकि, पीड़ित परिवारों के खाते में पैसे भेजने को लेकर भी कई सवाल हैं। महेंद्र यादव कहते हैं, “कुछ साल पहले तक 6000 रुपये की राशि ग्रेटुशियस फंड या जीआर फंड (अनुग्रह राहत या मुफ्त सहायता राशि ) के तौर पर दी जाती थी और उसके साथ में 3800 रुपये बरतन और कपड़ों के एवज में दिए जाते थे। इसलिए तब बाढ़ पीड़ितों को 9800 रुपये मिलते थे। अब सिर्फ 7 हजार रुपये मिलते हैं। जबकि महंगाई बढ़ी है। पैसे बढ़ने चाहिए थे।”
ब्यासजी इस राशि का गणित बताते हुए कहते हैं, “इसकी शुरुआत इस रूप में हुई थी कि (पूर्व मुख्यमंत्री) नीतीश कुमार राहत शिविर से लौटने वाले हर परिवार को 50 किलो चावल और 50 किलो गेहूं देते थे। ताकि वे घर जायें तो खाना पकाने के लिए अनाज उनके साथ रहे। इसके अलावा बरतन और कपड़े भी दिये जाते थे। मगर जब खाद्य सुरक्षा कानून लागू होने के बाद अनाज मिलने में दिक्कत होने लगी तो उसके बदले 6000 रुपये अनाज के और 3800 रुपये बरतन और कपड़े के दिये जाने लगे।”
केंद्र सरकार द्वारा 2022 में निर्धारित मानदर के अनुसार बाढ़ पीड़ितों को 2500 रुपये कपड़े के और 2500 बरतन के दिये जाने हैं। मगर वह अब बिहार के बाढ़ पीड़ितों को नहीं मिलता।

सरकार का जवाब
इन तमाम सवालों को लेकर मोंगाबे-हिंदी ने बिहार के आपदा प्रबंधन मंत्री रत्नेश सदा से बातचीत की। करीब 50 लाख बाढ़ पीड़ितों के लिए सिर्फ 13 राहत केंद्र खोलने के सवाल पर वे कहते हैं, “13 नहीं 15 राहत केंद्र खुले हैं और जितने की जरूरत थी। उतने ही राहत केंद्र खोले गये हैं।” इस साल 12 सितम्बर को जारी की गई पहली दैनिक फ्लड रिपोर्ट में खोले गए राहत शिविरों की संख्या 13 है जो कि इस साल खोले गए राहत शिविरों की अधिकतम संख्या है।
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बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में बाढ़ का पानी ठीक से नहीं उतरने और रहने लायक स्थिति नहीं होने के बावजूद राहत केंद्रों और सामुदायिक रसोईयों को बंद किये जाने के सवाल पर वे कहते हैं, “लोग खुद अपने घर की रखवाली करने के लिए चले जाते हैं। हमने वैसे अपने अधिकारियों से कह दिया है कि जब तक लोग रहें, किसी को जाने के लिए नहीं कहा जाए।”
राहत राशि में बरतन और कपड़ों का पैसा न दिये जाने के सवाल पर वे कहते हैं, “इसका जबाव हमारा शीर्ष नेतृत्व ही दे सकता है।”
बैनर तस्वीरः पटना के जेपी गंगा पथ के किनारे अस्थायी झुग्गियां बनाकर रह रहे बाढ़ प्रभावित परिवार। इनके लिए चल रहा सामुदायिक किचन बंद कर दिया गया है। तस्वीर- पुष्यमित्र