- भारत में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म वन्यजीवों के शिकार और उनके शोषण से जुड़ी सामग्री का केंद्र बनते जा रहे हैं। इसमें इंस्टाग्राम पर बड़ी संख्या में रील्स की जानकारी मिली है।
- भारत में साइबर के जरिए होने वाले वन्यजीव अपराध के पैमाने को किसी भी अध्ययन ने व्यवस्थित रूप से नहीं मापा है। वहीं, मौजूदा शोध छोटी-छोटी केस स्टडी तक ही सीमित हैं।
- जानकार मौजूदा वन्यजीव कानून में संशोधन, वन विभाग के कर्मचारियों को प्रशिक्षण देने, सोशल मीडिया कंपनियों को जवाबदेह बनाने और जागरूकता पैदा करने जैसे उपायों का सुझाव देते हैं।
बात साल 2025 की है। पी.एम. मुथन्ना की नजर इंस्टाग्राम पर एक ऐसी रील पर गई, जिसमें किसी व्यक्ति को जंगली जानवरों को पकड़ने का तरीका बताते हुए दिखाया गया था। यह ऐसी गतिविधि थी, जिससे न सिर्फ वन्यजीवों को नुकसान पहुंच सकता था, बल्कि वन्यजीव संरक्षण कानूनों का उल्लंघन भी हो सकता था। कर्नाटका में स्थित वन्यजीव संगठन सेंटर फॉर वाइल्डलाइफ स्टडीज (CWS) में फील्ड कंजर्वेशन की अगुवाई करने वाले मुथन्ना उस रील को नजरअंदाज नहीं कर सके जो जानवरों को अवैध तरीके से पकड़ने और उनके साथ व्यवहार को सामान्य दिखाती प्रतीत होती थी। वह कहते हैं, “मैंने और मेरे सहकर्मियों ने सोशल मीडिया, खासकर इंस्टाग्राम पर प्रसारित हो रहे ऐसे वीडियो की जांच और उनका संकलन शुरू किया।”
उन्हें मिली रील्स में एक ऐसी रील भी थी, जिसमें जबड़े वाले फंदे में फंसी कस्तूरी बिल्ली दिखाई गई थी। उस रील को 25,000 से ज्यादा लाइक मिले थे। इसके अलावा, कुछ रील में लोग मॉनिटर लिज़र्ड या गोह का शिकार करते, जबड़े वाले फंदे बनाने की कार्यशाला और ऐसी ही अन्य गतिविधियां दिखा रहे थे। फरवरी 2026 में उन्होंने वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो (WCCB) को चिट्ठी लिखी। यह सरकारी निकाय है, जो संगठित वन्यजीव अपराध से निपटता है। पत्र में उन्होंने आठ इंस्टाग्राम अकाउंट के खिलाफ कार्रवाई का आग्रह किया, जो जानवरों को घायल या नुकसान पहुंचाने वाले उपकरण दिखाते और बेचते हैं और गोह के अवैध शिकार का प्रदर्शन करते हैं। गोह वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची I के तहत संरक्षित हैं।
पूरे भारत में ऐसी रील्स लोगों के स्क्रीन पर चल रही हैं। इनके क्रिएटर की जिंदगी के सामान्य पलों के रूप में पेश की जाने वाली इन सामग्रियों में अवैध रूप से रखे गए भारतीय स्टार कछुए के खान-पान से लेकर शिकार पर जाने तक की गतिविधियां शामिल हैं। ऐसे अपराधों से निपटने के लिए भारतीय कानून की पर्याप्तता पर शोध कर रहीं पीएच.डी. शोधार्थी प्रदिप्ति भारद्वाज का कहना है कि भारत में साइबर के जरिए होने वाला वन्यजीव अपराध तेजी से उभरता हुआ खतरा है, जो बारीक व परिष्कृत है। इसे कभी-कभी पहचानना मुश्किल होता है। वह ब्रिटेन स्थित चैरिटी लैंगलैंड कंजर्वेशन के साथ भी काम करती हैं।
जंगल की प्रजातियों को उनके प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र से बाहर ले जाने से रोगजनकों को अलग-अलग प्रजातियों के बीच फैलने का अवसर मिल सकता है। इससे मनुष्यों और अन्य जानवरों में रोग फैलने का खतरा बढ़ जाता है। अवैध वन्यजीव व्यापार दुनिया भर में चौथी सबसे बड़ी अवैध अंतरराष्ट्रीय गतिविधि है। गैर-लाभकारी संस्था इंटरनेशनल फंड फॉर एनिमल वेलफेयर (IFAW) की ओर से प्रकाशित 2021 की एक जांच में अमेरिका स्थित 34 ऑनलाइन मार्केटप्लेस पर संरक्षित प्रजातियों के लगभग 2,400 जानवरों, उनके अंगों, उनसे बने उत्पादों और अन्य संबंधित उत्पादों वाले करीब 1,200 ऑनलाइन विज्ञापन पाए गए।
भारत में सोशल मीडिया पर साइबर माध्यम से होने वाले वन्यजीव अपराध के पैमाने को व्यवस्थित रूप से मापने वाला कोई अध्ययन नहीं है। मौजूदा शोध छोटे-छोटे केस स्टडी तक सीमित हैं, जो किसी खास प्लेटफॉर्म पर केंद्रित हैं और आधिकारिक तौर पर दर्ज मामलों की संख्या पर निर्भर करते हैं। फिलहाल, इस समस्या से निपटने के लिए बहुत कम पहल की गई हैं। WCCB का ऑपरेशन वाइल्डनेट ऐसी ही पहल है। इस कार्रवाई के तहत 2017 से 2021 के बीच अधिकारियों ने साइबर माध्यम से होने वाले वन्यजीव अपराध के करीब 80 मामले दर्ज किए थे, लेकिन ऐसी पहल अभी भी अपवाद हैं।

सोशल मीडिया पर बढ़ता वन्यजीव अपराध
वन्यजीव संरक्षण के लिए काम करने वाला गैर-लाभकारी संगठन वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया (WTI) पिछले डेढ़ साल से सोशल मीडिया पर होने वाले वन्यजीव अपराधों पर लगातार नजर रख रहा है। WTI के वन्यजीव अपराध नियंत्रण प्रभाग के प्रमुख देबब्रत सरकार का कहना है कि भारत में डेटा की पहुंच बढ़ने के साथ हाई-स्पीड इंटरनेट के आने से सामग्री बनाने में मदद मिली है। उन्होंने मोंगाबे-इंडिया को बताया कि भारत में अवैध वन्यजीव सामग्री दिखाने के लिए फेसबुक, यूट्यूब और इंस्टाग्राम समेत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किया जाता है। इनमें इंस्टाग्राम ऐसी सामग्री के लिए सबसे प्रमुख प्लेटफॉर्म है।
सरकार का कहना है कि वन्यजीवों के खिलाफ अपराधों को दिखाने वाले वीडियो की व्यापक श्रृंखला मौजूद है। इनमें शिकार दिखाने वाले वीडियो भी शामिल हैं, जैसे किसी जानवर का पीछा करने के लिए उसके ऊपर ड्रोन उड़ाना, शिकार के लिए कुत्तों का इस्तेमाल करना और जमीन से गोह को खोदकर निकालना; जबड़े वाले फंदे और दूसरे फंदे जैसे नुकसानदायक शिकार उपकरणों का विज्ञापन करने वाले वीडियो, जिन्हें अक्सर फसलों पर वन्यजीवों के हमले से निपटने के उपाय के रूप में प्रचारित किया जाता है; ऐसे वीडियो जिनमें लोगों को खाल, मांस और वसा जैसे वन्यजीव उत्पाद निकालते और उन्हें पकाने का तरीका बताते हुए देखा जा सकता है। आखिर में, विदेशी पालतू जानवरों वाले वीडियो, जिनमें यह स्पष्ट नहीं होता कि यह जानवर कहां से हासिल किया गया। ये सभी वीडियो आसानी से देखे जा सकते हैं और अक्सर इन्हें हजारों लाइक मिलते हैं इन पर सैकड़ों कमेंट्स आती हैं, जो इनके बढ़ते दर्शक वर्ग की ओर इशारा करता है। सरकार कहते हैं, “आप कमेंट्स में देख सकते हैं कि लोग पूछ रहे हैं, ‘इसकी कीमत कितनी है और इसे कहां से हासिल किया जा सकता है।’ कमेंट सेक्शन पूरी तरह एक बाजार है।” वह आगे बताते हैं कि इंस्टाग्राम के जरिए खरीदारों और विक्रेताओं के जुड़ने के बाद वे बातचीत को व्हाट्सऐप, सिग्नल या टेलीग्राम जैसे एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म पर ले जाते हैं।
WTI ऐसे अकाउंट के बारे में जानकारी इकट्ठा करता है, ताकि कानून लागू करने वाली एजेंसियों को अलर्ट करने के लिए सबूत जुटा सके। साथ ही, वह ऐसी सामग्री को हटाने के लिए सोशल मीडिया कंपनियों को जानकारी भी देता है। जनवरी 2025 से, इसने यूट्यूब के एक हजार वीडियो की शिकायत की है और उनमें से 90% से ज्यादा को हटवाने में कामयाबी मिली है। हालाँकि, मेटा के मालिकाना हक वाले फेसबुक और इंस्टाग्राम पर चिन्हित की गई सामग्री में से सिर्फ 15% ही हटवाए जा सके।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म सामग्री मॉडरेशन का काम नहीं कर पा रहे हैं। WTI ने सामग्री की रिपोर्टिंग करते समय एक पैटर्न देखा। जब उन्होंने वन्यजीव अपराध से संबंधित सामग्री की शिकायत की, तो मेटा ने सिर्फ जीवित वन्यजीवों की बिक्री और शिकार से संबंधित वीडियो हटाए, लेकिन वन्यजीवों के दांत, पंजे या उनके अन्य अंगों और उनसे निकाले गए उत्पादों को दिखाने वाले वीडियो नहीं हटाए। इंस्टाग्राम की घोषित नीति में वन्यजीव संगठनों के साथ मिलकर अवैध शिकार, जानवरों के साथ दुर्व्यवहार और लुप्तप्राय प्रजातियों की बिक्री दिखाने वाली सामग्री को हटाने की बात कही गई है। इसके बावजूद, मुथन्ना द्वारा WCCB को दी गई शिकायत में सूचीबद्ध अकाउंट अभी भी सक्रिय हैं और उनकी सामग्री देखी जा सकती है। इससे यह सवाल उठता है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इस नीति को कैसे और किस हद तक लागू करता है।
स्वतंत्र टेक्नोलॉजिस्ट और शोधकर्ता रोहिणी लक्षणे ने मोंगाबे-इंडिया को ईमेल में बताया कि शिकार के ग्राफिक वीडियो और विदेशी जानवरों से जुड़ी सामग्री पर लोगों की मजबूत प्रतिक्रिया मिल सकती है, जिसे मॉडरेटर के हस्तक्षेप से पहले सिफारिश करने वाले एल्गोरिदम अनजाने में और ज्यादा लोगों तक पहुंचा सकते हैं। वह कहती हैं, “चूंकि मॉडरेशन सिस्टम मुख्य रूप से आतंकवाद, अश्लीलता, धोखाधड़ी या राजनीतिक हेरफेर जैसे अधिक चर्चित नुकसान के मामलों पर केंद्रित होते हैं, इसलिए वन्यजीव तस्करी पर तुलनात्मक रूप से कम निवेश और निगरानी हो सकती है।” उनका कहना है कि प्लेटफॉर्म ने हाल के सालों में अपनी सामग्री मॉडरेशन टीमों में भी छंटनी की है और वहां कर्मचारियों की कमी है। वह आगे कहती हैं कि प्लेटफॉर्म मॉडरेशन के लिए एआई का इस्तेमाल भी बढ़ा रहे हैं, जिसके कारण ऐसी सामग्री की नजर से बच निकलने की संभावना हो सकती है।
फिलहाल, भारत में ऐसा कोई कानून नहीं है जो खास तौर पर साइबर के जरिए होने वाले वन्यजीव अपराधों को शामिल करता हो। हालाँकि, मौजूदा कानूनों, जैसे कि वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत मामले दर्ज किए जा सकते हैं। इसका इस्तेमाल करके वन विभाग सोशल मीडिया कंपनियों से संपर्क कर सकता है, लेकिन भारद्वाज का कहना है कि वन विभाग के अधिकारियों को अक्सर इस प्रक्रिया और टेक्नोलॉजी की जानकारी नहीं होती है।
कानून और उसके लागू करने में आने वाली बाधाओं के कारण ऐसे अपराधों पर रोक लगाना मुश्किल है। भारद्वाज कहती हैं, “वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम व्यापक है, लेकिन इसमें इलेक्ट्रॉनिक या ऑनलाइन अपराधों के लिए खास प्रावधान नहीं हैं, क्योंकि 1972 में कानून बनाए जाने के समय इन पर विचार नहीं किया गया था।”
वह इस बात पर जोर देती हैं कि अन्य चुनौतियों में ऑनलाइन सामग्री और असल दुनिया में होने वाले अपराधों के बीच संबंध साबित करना तथा वन्यजीव से संबंधित वस्तुओं की भौतिक जब्ती के बिना मामले दर्ज करने में मुश्किल शामिल है, जबकि कानून के तहत यह एक मुख्य शर्त है। उनका कहना है कि इसके अलावा, भारतीय कानून में वन्यजीवों से संबंधित विज्ञापनों पर स्पष्ट रूप से प्रतिबंध नहीं है, जिससे स्थिति और जटिल हो जाती है।

साइबर वन्यजीव अपराध की रोकथाम
भारद्वाज भारत में साइबर माध्यम से होने वाले वन्यजीव अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए कई उपाय सुझाती हैं। कानून में संशोधन कर इसमें ऑनलाइन पहलू को शामिल करना, भारतीय कानून के आधार पर सोशल मीडिया नीतियों को अपडेट करना, वन्यजीव कानून के तहत विज्ञापनों को विनियमित करना और वन विभाग को ऑनलाइन अपराधों का पता लगाने तथा अदालत में डिजिटल सबूत को प्रभावी तरीके से पेश करने के लिए प्रशिक्षित करना इन उपायों में शामिल है। वह आगे कहती हैं कि वन्यजीव प्रजातियों को रखना गैरकानूनी है, इस बारे में भी लोगों में जागरूकता फैलाने की जरूरत है।
सरकार के अनुसार, सोशल मीडिया कंपनियों को भारत में संरक्षण संगठनों, वन्यजीव विशेषज्ञों और कार्यकर्ताओं के साथ साझेदारी करनी चाहिए और उन्हें “भरोसेमंद शिकायतकर्ता (ट्रस्टेड फ्लैगर)” के रूप में नियुक्त करना चाहिए। यह दर्जा 2025 में यूरोपीय संघ में नागरिक समाज संगठनों को दिया गया, जिससे वे प्लेटफॉर्म पर अवैध गतिविधियों की पहचान कर उनकी रिपोर्ट कर सकते हैं। चूंकि भारत में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है, इसलिए WTI यूट्यूब के प्रायोरिटी फ्लैगर कार्यक्रम में शामिल होने की कोशिश कर रहा है। इसके तहत सरकारी एजेंसियां और गैर-लाभकारी संगठन यूट्यूब के सामुदायिक दिशानिर्देशों का उल्लंघन करने वाली सामग्री के बारे में सीधे यूट्यूब से संपर्क कर सकते हैं। जून 2026 में WTI ने नागरिकों से ऑनलाइन वन्यजीव अपराधों की रिपोर्ट करने और प्लेटफॉर्म से जवाबदेही की मांग करने के लिए एक अभियान भी शुरू किया।
मुथन्ना का मानना है कि सोशल मीडिया की बड़ी कंपनियों की नैतिक जिम्मेदारी है कि वे ऐसी सामग्री को हटा दें। लेकिन भारद्वाज बताती हैं कि सूचना प्रौद्योगिकी (इंटरमीडियरी गाइडलाइंस एंड डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड) नियम, 2021 के तहत सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही उचित सावधानी बरतने और अवैध सामग्री की जानकारी मिलने के बाद कार्रवाई करने तक सीमित है। हालाँकि, वह आगे कहती हैं कि दुनिया भर में वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में सोशल मीडिया कंपनियों को अवैध गतिविधियों को बढ़ावा देने में उनकी भूमिका के लिए अधिक जवाबदेह ठहराने को लेकर चर्चा जारी है।
मुथन्ना को WCCB को जबड़े वाले फंदों और शिकार के वीडियो पोस्ट करने वाले इंस्टाग्राम अकाउंट्स के बारे में पत्र भेजे छः महीने से अधिक समय हो चुका है। और उन्हें अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है।
वह कहते हैं, “मेटा की तुलना में हमारे जैसे गैर-सरकारी संगठन बहुत छोटे हैं। हम छोटे-छोटे क्षेत्रों में काम करते हैं और मेटा जैसी कंपनियों से निपटने के लिए हमारे पास संसाधन नहीं हैं। हमारी उम्मीद वन विभाग, WCCB, सीमा शुल्क विभाग और पुलिस पर टिकी है। उनके पास इनसे निपटने के लिए पर्याप्त क्षमता और साधन हैं।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 27 अगस्त 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: अवैध रूप से रखे गए पालतू भारतीय स्टार कछुए से संबंधित इंस्टाग्राम पर पोस्ट की गई सामग्री। भारतीय स्टार कछुआ भारत के वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम के तहत संरक्षित है और इसे रखना या इसका व्यापार करना कानूनी नतीजों का कारण बन सकता है। स्क्रीनग्रैब: इंस्टाग्राम।