- काज़ीरंगा नेशनल पार्क और टाइगर रिज़र्व में फिशिंग कैट्स के एक सर्वे से पुष्टि हुई है कि यह प्रजाति रिज़र्व के बाढ़ वाले इलाकों में बड़े पैमाने पर फैली हुई है और वहाँ सक्रिय रूप से प्रजनन कर रही हैं।
- शोधकर्ताओं ने बड़ी बिल्लियों (बाघों) के लिए बनाए गए कैमरा-ट्रैप सर्वे के डेटा का इस्तेमाल किया। इसलिए, हो सकता है कि इनकी संख्या असलियत से कम आंकी गई हो।
- हालाँकि, नतीजे काज़ीरंगा में स्वस्थ वेटलैंड्स (आर्द्रभूमि) की ओर इशारा करते हैं, लेकिन वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि सड़क दुर्घटनाएँ और रहने की जगह में बदलाव अभी भी फिशिंग कैट्स के लिए खतरा बने हुए हैं।
असम के काज़ीरंगा नेशनल पार्क (केएनपी) और टाइगर रिज़र्व में फिशिंग कैट (Prionailurus viverrinus) का पहला वैज्ञानिक सर्वे किया गया, जिसमें 57 बिल्लियाँ देखी गईं। इस सर्वे से मिली जानकारियों से इस बात की पुष्टि होती है कि यह प्रजाति काज़ीरंगा के बाढ़ वाले मैदानों (फ्लडप्लेन) में बड़े पैमाने पर फैली हुई है और वहाँ सक्रिय रूप से प्रजनन कर रही है।
काज़ीरंगा के टाइगर सेल ने ‘फिशिंग कैट प्रोजेक्ट’ के साथ मिलकर यह सर्वे किया और इसकी रिपोर्ट 22 फरवरी – यानी ‘इंटरनेशनल फिशिंग कैट डे’ के दिन जारी की।
“मीठे पानी वाले बाढ़ के मैदानों में यह (फिशिंग कैट की) संख्या सबसे ज़्यादा है, जो काज़ीरंगा को इनके लिए सबसे अच्छे आवासों में से एक के तौर पर फिर से स्थापित करती है। हमारे लिए यह जानना ज़रूरी है कि ये फिशिंग कैट के लिए अच्छे आवास हैं,” काज़ीरंगा नेशनल पार्क और टाइगर रिज़र्व की डायरेक्टर सोनाली घोष ने मोंगाबे-इंडिया को बताया।
कैमरा ट्रैप तस्वीरों का विश्लेषण
इस सर्वे में जिन कैमरा ट्रैप के डेटा का इस्तेमाल किया गया, उन्हें असल में बाघों की निगरानी के लिए लगाया गया था। “केएनपी में पाई जाने वाली हर प्रजाति के लिए अलग से सर्वे करना मुमकिन नहीं है, क्योंकि इसके लिए संसाधनों और समय की सीमाएं होती हैं। हमें कैमरा ट्रैप से मिली 14 लाख से ज़्यादा तस्वीरों का अध्ययन करना पड़ा,” घोष ने बताया।
‘फिशिंग कैट प्रोजेक्ट’ की को-फाउंडर और वाइल्ड लाइफ़ बायोलॉजिस्ट तियासा आध्या कहती हैं कि इन तस्वीरों का विश्लेषण करने में कुछ चुनौतियां आईं। वे कहती हैं, “अगर मौसम में धुंध हो, तो अच्छी तस्वीरें नहीं मिलतीं। बारिश होने पर भी दिक्कत होती है। कभी-कभी जानवर ट्रैप (कैमरा) के बहुत करीब आ जाता है, तो कभी शरीर का सिर्फ़ कुछ हिस्सा ही दिखाई देता है।”
चूंकि कैमरा-ट्रैप ग्रिड को शुरू में बड़ी बिल्लियों (फेलिड्स), जैसे बाघ और तेंदुए के लिए सेट किया गया था, इसलिए अधिकारियों का मानना है कि फिशिंग कैट की असल संख्या 57 से ज़्यादा हो सकती है। हालाँकि, 57 के इस छोटे आंकड़े की वजह से अनिश्चितता बनी रहती है, लेकिन यह समय के साथ बाढ़ के बदलते पैटर्न, जलवायु परिवर्तन और नदी में होने वाले बदलावों से मीठे पानी के हैबिटैट पर पड़ने वाले संभावित असर की निगरानी के लिए एक ज़रूरी बेसलाइन भी तय करता है।

असम की लोक-कथाओं में ‘मेसेका’ के नाम से जानी जाने वाली फिशिंग कैट, पर्यावरण की सेहत का संकेत देती है। इसकी बड़ी संख्या में मौजूदगी स्वस्थ वेटलैंड्स और बाढ़ के मैदानों की सही कार्यप्रणाली का संकेत देती है।
सर्वेक्षण के अनुसार, काज़ीरंगा जलीय प्रजातियों (खासकर मछली, जो फिशिंग कैट का मुख्य भोजन है) के लिए भारत के प्रमुख फ्लडप्लेन आवासों में से एक है। यहाँ इनकी संख्या उत्तर प्रदेश के किशनपुर और दुधवा जैसे अन्य प्रसिद्ध वेटलैंड्स की तुलना में अधिक है। हालाँकि, काज़ीरंगा में मछलियों की भारी मौजूदगी के बावजूद, सुंदरबन जैसे मुहाने वाले इकोसिस्टम (estuarine ecosystems) में मछलियों का घनत्व अभी भी अधिक है।
खतरे और चुनौतियां
भारत के वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की पहली अनुसूची के तहत संरक्षित, फिशिंग कैट को इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (IUCN) की रेड लिस्ट में ‘वल्नरेबल’ (खतरे की आशंका वाली प्रजाति) के तौर पर वर्गीकृत किया गया है। दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में अपने पूरे इलाके में इसे रहने की जगह खत्म होने और शिकार किए जाने का खतरा है।
आध्या कहती हैं, “फिशिंग कैट्स लंबे और ऊँचे, गीले जलोढ़ घास के मैदानों या दलदली इलाकों में रहना पसंद करती हैं। हाल के अध्ययनों से पता चला है कि कम बारिश वाले सालों में जंगल और घास के मैदानों के संतुलन में बदलाव आ सकता है, यानी दलदली इलाकों की जगह जंगल ले सकते हैं।” इस बदलाव से फिशिंग कैट्स पर क्या असर पड़ता है, इस पर स्टडी करने की ज़रूरत है। वह आगे कहती हैं, “हालाँकि, काज़ीरंगा एक संरक्षित इलाका है, इसलिए यहाँ उनके रहने की जगह (हैबिटैट) को कोई नुकसान नहीं पहुँचता और यहाँ फिशिंग कैट्स का शिकार भी बिल्कुल नहीं होता।”
सड़क दुर्घटनाएं भी इस प्रजाति के लिए एक खतरा हैं और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में इनकी मौत की वजह बनी हैं। काज़ीरंगा में, 24 सितंबर 2024 को NH-75 पर एक फिशिंग कैट की मौत का मामला सामने आया था। स्थानीय संरक्षणवादी मनोज बरुआ का कहना है कि इस इलाके में फिशिंग कैट के सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाने के और भी कई मामले हुए हैं जिनकी रिपोर्ट नहीं की गई, खासकर बाढ़ के दौरान।

मछुआरों के साथ सह-अस्तित्व
चूंकि मछली पकड़ने वाली इन बिल्लियों का मुख्य भोजन मछली है, इसलिए स्थानीय मछुआरा समुदायों के साथ इनके टकराव की संभावना बनी रहती है। हालाँकि, काज़ीरंगा के स्थानीय पर्यावरणविद् और वन अधिकारी इस संभावना को खारिज करते हैं।
काज़ीरंगा के पूर्व मानद वन्यजीव वार्डन, उत्तम सैकिया का कहना है कि काज़ीरंगा के अंदर फिशिंग कैट की आबादी पूरी तरह सुरक्षित है, जबकि पार्क के बाहर रहने वाली बिल्लियाँ असुरक्षित वेटलैंड्स, तालाबों और दलदली इलाकों में शिकार करती हैं और छोटे सरीसृपों व कृंतकों (जैसे चूहे) को भी खाती हैं। वे कहते हैं, “बाहर मछली पालन केंद्र हैं, लेकिन वे जाली से अच्छी तरह सुरक्षित हैं, इसलिए फिशिंग कैट्स की पहुँच से बाहर हैं।”
बागोरी के रेंजर बिजीत डिहिंगिया कहते हैं, “कोहोरा में मौजूद मिहिबील नाम के वेटलैंड (आर्द्रभूमि) में फिशिंग कैट्स की अच्छी-खासी आबादी है। कंचनजुरी टी एस्टेट और बुरापहाड़ टी एस्टेट के बीच कुछ नहरें हैं। उन इलाकों में कई मछली पालन केंद्र भी हैं। हालाँकि, मछुआरों का फिशिंग कैट्स से कोई तनाव या टकराव नहीं होता है। फिशिंग कैट्स के मुकाबले ऊदबिलाव ज़्यादा मछलियाँ खाते हैं।” वे आगे बताते हैं कि उनके अधिकार क्षेत्र में 40 से ज़्यादा वेटलैंड्स हैं, जहाँ फिशिंग कैट्स के लिए शिकार की कोई कमी नहीं है।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 5 मई 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: काज़ीरंगा में एक कैमरा ट्रैप में कैद हुई एक फिशिंग कैट की तस्वीर। तस्वीर – काज़ीरंगा नेशनल पार्क और टाइगर रिज़र्व द्वारा।