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		<description>प्रकृति से प्रेरित समाचार</description>
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	<title>तमिलनाडु Archives - Mongabay हिन्दी</title>
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					<title>वैज्ञानिकों ने बिच्छुओं की प्रजाति से जुड़ी 110 साल पुरानी गलती को सुधारा, एक नई प्रजाति की भी खोज की</title>
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					<pubDate>30 मार्च 2026 06:54:22 +0000</pubDate>
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								<![CDATA[- नए शोध से पता चला है कि तमिलनाडु में पाई जाने वाली बिच्छू की प्रजाति चार्मस इंडिकस और श्रीलंका की चार्मस लेनियस असल में एक ही प्रजाति है। अब तक इन्हें अलग-अलग माना जाता था।<br />- इस अध्ययन के दौरान तमिलनाडु के सिरुमलाई से बिच्छू की एक बिल्कुल नई प्रजाति की भी पहचान की गई है, जिसे &#8216;चार्मस दक्षिणी&#8217; नाम दिया गया है।<br />- ये निष्कर्ष बिच्छुओं के संरक्षण, उनके भौगोलिक फैलाव को समझने और चिकित्सा अनुसंधान में काफी मददगार साबित हो सकते हैं।<br />]]>
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																						<content:encoded>
							<![CDATA[साल 1915 में, जब भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था, तब एक अंग्रेजी वैज्ञानिक स्टेनली हर्स्ट ने कोयंबटूर में बिच्छू की एक नई प्रजाति ‘चार्मस इंडिकस’ (सी. इंडिकस) की पहचान की थी। उनकी यह पूरी खोज बिच्छू के महज एक छोटे और अविकसित नमूने पर आधारित थी। साल 1916 में प्रकाशित ब्रिटिश संग्रहालय की एक रिपोर्ट के पीले पड़ चुके पन्नों में भी एरेक्निडा वर्ग के अंतर्गत इस प्रजाति का विशेष उल्लेख मिलता है। इस प्रजाति को कोलकाता और कोलंबो से प्राप्त परजीवी घुनों के साथ संग्रहालय को भेंट किया गया था। पुणे में इन-सर्च एनवायरनमेंटल सोसाइटी की स्कॉर्पियन सिस्टेमैटिक्स लैबोरेट्री (एसएसएल) के प्रमुख और प्रकृतिवादी शौरी सुलाखे ने बताया कि एक सदी से भी अधिक समय तक वैज्ञानिकों का यही मानना था कि सी. इंडिकस पूरे प्रायद्वीपीय भारत में पाया जाता है। लेकिन अब भारतीय शोधकर्ताओं ने फील्ड रिसर्च और डीएनए जांच के जरिए यह खुलासा किया है कि सी. इंडिकस की पहचान एक बड़ी गलतफहमी थी। असल में, यह वही प्रजाति है जिसे 1879 में जर्मनी के वैज्ञानिक फर्डिनेंड कार्च ने श्रीलंका में खोजा था और ’चार्मस लेनियस’ नाम दिया था। शोधकर्ताओं ने पाया कि इन दोनों की शारीरिक बनावट में कोई अंतर नहीं है। उनके डीएनए में भी बहुत कम अंतर पाया गया, जिससे यह साबित हो गया कि ये दोनों अलग नहीं, बल्कि एक ही प्रजाति हैं। यह निष्कर्ष मई 2025 में डाइवर्सिटी जर्नल में प्रकाशित एक शोध पत्र का हिस्सा है। शोध दल में शौरी सुलाखे, भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (जेडएसआई) के रिटायर्ड सीनियर वैज्ञानिक देशभूषण बस्तावड़े और शुभंकर&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/03/30/scorpion-species-misidentification-corrected-new-species-india/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>मैंग्रोव कितने प्रभावी हैं? तमिलनाडु के अध्ययन ने तटीय जोखिम घटने के संकेत दिए</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2026/03/10/mangroves-coastal-risk-protection-study-pichavaram-muthupet-tamil-nadu/</link>
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					<pubDate>10 मार्च 2026 08:16:38 +0000</pubDate>
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								<![CDATA[- तमिलनाडु के पिचावरम और मुथुपेट में स्थित मैंग्रोव की क्षमता का एक नया अध्ययन किया गया है। यह अध्ययन बताता है कि ये मैंग्रोव तूफानों, चक्रवातों और बाढ़ जैसी पर्यावरणीय आपदाओं से तट को बचाने में कितने सक्षम हैं।<br />- शोधकर्ताओं ने समुद्र-स्तर बढ़ने की तीन स्थितियों को ध्यान में रखते हुए यह मॉडल तैयार किया, ताकि यह पता लगाया जा सके कि इन स्थितियों में मैंग्रोव क्षेत्र कितना बदल सकता है।<br />- विशेषज्ञों का कहना है कि मैंग्रोव वनों की कटाई पर मानवीय गतिविधियों के प्रभाव की निगरानी करना, संरक्षण के लिए आर्थिक साधनों, मौजूदा नीतियों और प्रशासन की प्रभावशीलता का विश्लेषण करना और मैंग्रोव की आनुवंशिक विविधता पर ध्यान देना बहुत जरूरी है।<br />]]>
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							<![CDATA[तमिलनाडु के पिचावरम और मुथुपेट में मैंग्रोव सुनामी, चक्रवात, तटीय बाढ़ आदि जैसी बड़ी प्राकृतिक आपदाओं के खतरों की तीव्रता और बार-बार होने की संभावना को काफी हद तक कम कर देते हैं। इस बात की जानकारी भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान &#8211; दिल्ली (IIT-दिल्ली) के स्कूल ऑफ पब्लिक पॉलिसी, टोक्यो यूनिवर्सिटी व जापान के इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल एनवायरमेंटल स्ट्रैटेजीज के शोधकर्ताओं के साथ मिलकर किए गए एक हालिया अध्ययन में सामने आई है। इस अध्ययन में दक्षिणी राज्य में मैंग्रोव के कारण तटीय जोखिम को कम करने के प्रभाव का विश्लेषण किया गया है। साथ ही, चेतावनी दी गई है कि सदी के अंत तक समुद्र का स्तर बढ़ने से इन मैंग्रोव को भी बहुत नुकसान होगा। दुनिया भर में मैंग्रोव जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने में बहुत अहम भूमिका निभाते हैं। ये भूमि पर स्थित वनों की तुलना में लगभग पांच गुना ज्यादा कार्बन सोख सकते हैं। अंतर ज्वारीय क्षेत्रों में उगने वाले ये होलोफाइटिक पौधे तटवर्ती क्षेत्रों के लिए पहली सुरक्षा दीवार की तरह काम करते हैं और विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं से उन्हें बचाते हैं। प्रोग्रेस इन डिजास्टर साइंस में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, पिचावरम में मैंग्रोव की उपस्थिति से इस क्षेत्र का तटीय जोखिम का स्तर 3.47 से घटकर 2.80 और मुथुपेट का जोखिम स्तर 4.78 से घटकर 2.10 रह गया है। ये आंकड़े एक से पांच के पैमाने पर दिए गए हैं, जिसमें 5 का मतलब है &#8216;बहुत अधिक जोखिम&#8217; और 1 का मतलब है &#8216;बहुत कम जोखिम&#8217;। अध्ययन ने मौजूदा समय में उपलब्ध शोध&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2026/03/10/mangroves-coastal-risk-protection-study-pichavaram-muthupet-tamil-nadu/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>कॉफी के बागान कैसे बचा सकते हैं हमारे जंगल? वेस्टर्न घाट से आई नई रिसर्च</title>
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					<pubDate>27 अक्टूबर 2025 08:55:20 +0000</pubDate>
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								<![CDATA[- एक नए शोध में सुझाव दिया गया है कि ऐसे कॉफी के बागानों से, जहां छाया के लिए कई तरह के देशी पेड़ों की प्रजातियां लगाई जाती हैं, किसानों द्वारा आमतौर पर फेंक दिए जाने वाले बीजों को इकट्ठा किया जा सकता है।<br />- सर्वे में जिन कॉफी बागानों का अध्ययन किया गया, उनमें संरक्षण और बहाली के लिए उपयोगी प्रजातियों की संख्या, स्थानीय सार्वजनिक नर्सरी में मिलने वाली प्रजातियों से ज्यादा थी।<br />- पौध तैयार करने के लिए नर्सरी की कमी और कॉफी किसानों के अन्य प्रतिस्पर्धी हित इसमें एक बड़ी बाधा है।<br />]]>
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							<![CDATA[भारत में खास किस्म की कॉफी की बढ़ती मांग के साथ-साथ उसे पर्यावरण के अनुकूल तरीके से उगाने की मांग भी बढ़ रही है। वेस्टर्न घाट में हुए एक नए शोध से पता चलता है कि कॉफी बागान (एग्रोफार्म) न सिर्फ अलग-अलग तरह के पेड़-पौधे लगाकर प्रकृति को बचाने (इन-सीटू बायोडायवर्सिटी कंजर्वेशन) का काम कर सकते हैं बल्कि आसपास के जंगलों को फिर से हरा-भरा करने के लिए बीज और पौधे भी उपलब्ध करा सकते हैं। भारत में कॉफी आमतौर पर बारिश वाले इलाकों में पेड़ों की छाया के नीचे उगाई जाती है, इसलिए वेस्टर्न घाट के वर्षावन इसे उगाने के लिए एकदम उपयुक्त जगह हैं। छाया में कॉफी उगने में ज्यादा समय लगता है और धूप में उगाई जाने वाली कॉफी की तुलना में उसकी पैदावार कम होती है। लेकिन यह अच्छी क्वालिटी का बीन (कॉफी का बीज) पैदा करता है, जिसका स्वाद काफी बेहतर होता है। शोध में यह भी कहा गया है कि कॉफी के बागानों में, जहां छाया के लिए कई तरह की देशी पेड़ों की प्रजातियों लगाई जाती है, वहां पेड़ों की कटाई (कैनोपी प्रूनिंग) के दौरान जो बीज हटा दिए जाते हैं, उन्हें &#8220;बचाकर&#8221; वनों के संरक्षण और बहाली में मदद की जा सकती है। नेचर कंजर्वेशन फाउंडेशन (एनसीएफ) के वैज्ञानिक और अध्ययन के प्रमुख लेखक आनंद ओसुरी ने बताया, &#8220;अतीत में, उनमें से कुछ बीज बच गए होंगे और वे पेड़ उग आए होंगे, लेकिन आज उन्हें काटा जा रहा है क्योंकि किसान नहीं चाहते कि पेड़ ऐसी जगहों पर उगे जहां उनकी फसल&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2025/10/27/coffee-agrofarms-can-play-a-key-role-in-restoring-degraded-forest-study-says/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>सौर पार्कों में खरपतवार नाशक दवाओं का बढ़ता इस्तेमाल, लंबे समय में सेहत पर डाल सकता है असर</title>
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					<pubDate>24 सितम्बर 2025 12:03:11 +0000</pubDate>
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								<![CDATA[- तमिलनाडु के कई सौर पार्क वनस्पति नियंत्रण के लिए ग्लाइफोसेट-आधारित शाकनाशी का इस्तेमाल कर रहे है। इससे लंबे समय में सेहत पर पड़ने वाले असर के साथ-साथ भूजल प्रदूषण और वायु प्रदूषण को लेकर भी चिंताएं बढ़ी हैं।<br />- वनस्पति को पूरी तरह से साफ करने से हीट आइलैंड प्रभाव बढ़ जाता है। इसके बजाय सोलर ग्रेजिंग, खरपतवार काटने वाली मशीनें और एग्रीवोल्टेइक जैसे टिकाऊ तरीके बेहतर विकल्प हैं।<br />- विशेषज्ञ सौर पार्कों में शाकनाशी के इस्तेमाल से होने वाले पर्यावरणीय और स्वास्थ्य जोखिमों से निपटने के लिए कड़े नियमों की जरूरत पर जोर दे रहे हैं।<br />]]>
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							<![CDATA[जब पिछले साल तमिलनाडु के तिरुप्पुर जिले में 40 एकड़ का एक सौर पार्क बनाया गया, तो इस पार्क की सीमा से लगी एक कॉलोनी के निवासियों को इस बात का अंदाजा तक नहीं था कि उन्हें किन दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। फिलहाल, वे पार्क से आने वाली शाकनाशी की तेज गंध और संभावित स्वास्थ्य जोखिमों को लेकर खासे परेशान हैं। नल्लमपुरम कॉलोनी की रहने वाली 45 वर्षीय वानथी (उनकी पहचान छिपाने के लिए उनका नाम बदल दिया गया है) ने चिंता जताते हुए कहा, &#8220;छिड़काव के दिनों में इन दवाओं की तेज गंध आना आम है। और यह हर महीने की कहानी है। पिछले महीने भी कुछ ऐसा ही हुआ था, काफी दिनों तक इसकी बदबू चारो और फैली रही थी। गांव का ही एक व्यक्ति अक्सर पार्क में शाकनाशियों का छिड़काव करता हुआ आपको नजर आ जाएगा।&#8221; उन्होंने आगे बताया, &#8220;हमें डर है कि कहीं ये रसायन हमारे पानी में न मिल जाए। हो सकता है कि अभी इसका असर न दिखाई न दें, लेकिन आगे चलकर ये हमारी सेहत और पर्यावरण को बड़ा नुकसान पहुंचा सकते हैं।&#8221; वानथी के मुताबिक, शायद घर के अंदर इनका खतरा थोड़ा कम हो, लेकिन बाहर खेलने वाले बच्चे सीधे इन रसायनों के संपर्क में आ सकते हैं। कंगायम शहर के पास कुट्टापलायम गांव में बने सोलर पार्क को कॉलोनी से सिर्फ एक स्टील के तार की बाड़ से अलग किया गया है। कार्तिकेय शिवसेनापति के सेनापति कंगायम कैटल रिसर्च फाउंडेशन की जमीन सौर पार्क से सटी हुई है।&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2025/09/24/the-potential-toxic-fallout-of-herbicide-use-in-solar-parks/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>किसानों का मित्र मद्रास हेजहॉग, लेकिन घटती संख्या बढ़ा रही चिंता</title>
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					<pubDate>27 अगस्त 2025 10:16:51 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[तमिलनाडु]]>
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											<topic-tags>
							<![CDATA[वन्य जीव एवं जैव विविधता]]>
						</topic-tags>
					
					
												<description>
								<![CDATA[- भारत में हेजहॉग की तीन प्रजातियां हैं, जिनमें से बेयर बैलीड हेजहॉग या मद्रास हेजहॉग खासतौर पर दक्षिणी भारत में पाया जाता है।<br />- इनका शिकार अक्सर उनके मांस और मुलायम बालों के लिए किया जाता है, लेकिन उनकी आबादी के बारे में कम जानकारी होने के कारण, उनकी सुरक्षा की स्थिति को कम करके आंका जाता है।<br />- विशेषज्ञ बेयर बैलीड हेजहॉग के बेहतर संरक्षण की मांग करते हैं, जो एक खास तरह के वातावरण में रहने वाला जीव है और पारिस्थितिक तंत्र की सेहत का संकेत देता है।<br />]]>
							</description>
																						<content:encoded>
							<![CDATA[हेजहॉग सिर्फ &#8216;एलिस इन वंडरलैंड&#8217; की कहानी में दिखने वाले गोल-मटोल, प्यारा सा जीव नहीं हैं, न ही हॉलीवुड की एनिमेटेड फिल्मों में उनके मनमोहक कारनामे ही सब कुछ हैं। हेजहॉग पारिस्थितिकी तंत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, क्योंकि उनकी अपनी खास पारिस्थितिकी, खान-पान की आदतें और व्यवहार होते हैं। उन्हें पारिस्थितिक संकेतक माना जाता है। वे मिट्टी में रहने वाले कीड़ों को खाते हैं, इसलिए अगर हेजहॉग की संख्या में भारी कमी आती है, तो इसका मतलब है कि पर्यावरण की गुणवत्ता बहुत घट गई है। वे उन शुष्क इलाकों में, जहां वे पाए जाते हैं, शिकार और शिकारी दोनों की भूमिका निभाते हैं, जो पारिस्थितिक संतुलन के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। सिर्फ इतना ही नहीं, सर्वाहारी होने के कारण, वे कीड़ों-मकोड़ों को बहुत पसंद करते हैं और एक घंटे में 40 कीड़ों तक को चट कर सकते हैं। इसलिए, इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि उन्हें किसानों का सबसे अच्छा दोस्त माना जाता है, जो बहुत ही सटीकता के साथ प्राकृतिक कीट नियंत्रक का काम करते हैं। अपने नरम कांटेदार बालों वाले शरीर के बावजूद, वे घास के मैदानों, झाड़ियों और रेगिस्तानों में रहने वाले भारतीय लोमड़ी, सियार और नेवले जैसे शिकारियों की भूख मिटाते हैं। इनके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं चेहरे, पैरों और पेट के निचले हिस्से को छोड़कर, उनके पूरे शरीर पर नरम मुलायम कांटेदार बाल होते हैं और इनकी नाक सुअर जैसी होती है। हेजहॉग को यूलिपोटाइफला गण और एरिनेसिडी परिवार के अंतर्गत वर्गीकृत किया गया है और ये एशिया, अफ्रीका&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2025/08/27/bare-bellied-and-barely-seen-madras-hedgehog-needs-a-headcount/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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						<item>
					<title>भारत के मोरिंगा का बढ़ता बाजार, लेकिन किसानों के लिए चुनौतियां बरकरार</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2025/07/17/the-rise-of-indias-moringa-economy/</link>
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					<pubDate>17 जुलाई 2025 07:23:07 +0000</pubDate>
											<dc:creator>
							<![CDATA[Aditya Ansh]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Manish Chandra Mishra]]>
					</author>
							<category><![CDATA[समाधान]]></category>
		<category><![CDATA[किसान]]></category>
		<category><![CDATA[किसानी]]></category>
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		<category><![CDATA[ड्रमस्टिक]]></category>
		<category><![CDATA[मोरिंगा]]></category>
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		<category><![CDATA[सुपरफूड]]></category>
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							<![CDATA[तमिलनाडु और .भारत]]>
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												<description>
								<![CDATA[- मोरिंगा यानी सहजन को सुपरफूड के रूप में अंतर्राष्ट्रीय ख्याति मिल चुकी है और तमिलनाडु इस क्षेत्र में सबसे आगे है।<br />- तमिलनाडु सरकार ने हाल ही में मोरिंगा का उत्पादन और व्यापार बढ़ाने के लिए इसका निर्यात संवर्धन बोर्ड गठित किया है।<br />- हालांकि, तुड़ाई के बाद होने वाले नुकसान, कोल्ड स्टोरेज की कमी और छोटे किसानों का बाजार में शोषण बड़ी बाधाएं बनी हुई हैं।<br />]]>
							</description>
																						<content:encoded>
							<![CDATA[दक्षिण भारतीय रसोई की प्रमुख सब्जी सहजन या मोरिंगा (मोरिंगा ओलीफेरा) अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त कर चुका है। इसे अक्सर &#8220;सुपरफूड&#8221; कहा जाता है। इसे तमिलनाडु में स्थानीय रूप से मुरुंगई के नाम से जाना जाता है। यह राज्य भारत में मोरिंगा के उत्पादन और रकबे में सबसे आगे है। मोरिंगा भारत में पाई जाने वाली स्थानीय प्रजातियों में से एक है। अपने गुणों की वजह से यह लंबे समय से विभिन्न पारंपरिक प्रथाओं में मूल्यवान माना जाता रहा है। इस पौधे के विभिन्न भागों यानी बीज से लेकर जड़ तक का इस्तेमाल भोजन और इलाज में किया जाता है। इसे विटामिन, एंटीऑक्सीडेंट, अमीनो एसिड और खनिजों का स्रोत माना जाता है। &#8220;शोध के अनुसार, इसमें संतरे की तुलना में सात गुना ज्यादा विटामिन सी और दूध की तुलना में 17 गुना अधिक कैल्शियम होता है। इन्हीं गुणों ने मोरिंगा को लेकर दुनिया भर में खासकर स्वास्थ्य और प्राकृतिक स्वास्थ्य उद्योगों में दिलचस्पी पैदा की है।&#8221; भारत दुनिया में मोरिंगा का सबसे बड़ा उत्पादक है। मदुरै स्थित मोरिंगा निर्यात क्षेत्र (एमईजेड) और विशेष निर्यात सुविधा केंद्र का ध्यान तमिलनाडु से मोरिंगा निर्यात क्षमता बढ़ाने पर है। मोरिंगा की खेती के तहत आने वाले 19,867 हेक्टेयर क्षेत्र में से 93% इलाका एमईजेड जिलों में आता है, जिसमें तमिलनाडु के नौ प्रमुख जिले शामिल हैं। मोरिंग की बाड़ी। भारत सहजन का सबसे बड़ा उत्पादक है। हालांकि, इसकी खेती में चुनौतियां बनी हुई हैं। उदाहरण के लिए, किसान बताते हैं कि इसे अच्छी स्थिति में बाजार तक पहुंचाना मुश्किल है, क्योंकि अगर&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2025/07/17/the-rise-of-indias-moringa-economy/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>सिकुड़ते जंगल और बढ़ती मानव बस्तियां, लॉयन-टेल्ड मेकाक के लिए दोहरी चुनौती</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2025/06/20/lion-tailed-macaques-navigate-twin-hurdles/</link>
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					<pubDate>20 जून 2025 14:15:48 +0000</pubDate>
											<dc:creator>
							<![CDATA[Arathi Menon]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Manish Chandra Mishra]]>
					</author>
							<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>
		<category><![CDATA[वन्य जीव एवं जैव विविधता]]></category>
		<category><![CDATA[जंगल]]></category>
		<category><![CDATA[तमिलनाडु]]></category>
		<category><![CDATA[मेकाक]]></category>
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							<![CDATA[वन्य जीव एवं जैव विविधता]]>
						</topic-tags>
					
					
												<description>
								<![CDATA[- तमिलनाडु के वलपराई में लॉयन-टेल्ड मेकाक सिकुड़ते जंगलों और बढ़ती मानव बस्तियों के चलते मुश्किलों का सामना कर रहे हैं।<br />- लॉयन-टेल्ड मेकाक मादा अपने बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अपने व्यवहार में बदलाव कर रही हैं, जो प्रजाति की अनुकूलन क्षमता को दर्शाता है।<br />- हालाकि, अपने व्यवहार की इस विशेषता के चलते उनके सामने दुर्घटनाओं, स्वास्थ्य समस्याओं और मानवीय संघर्ष का खतरा बढ रहा है।<br />- उनके दीर्घकालिक अस्तित्व के लिए, विशेषज्ञों ने गलियारों को बहाल करने, कैनेपी कनेक्टिविटी को बेहतर करने और खराब हो चुके वन क्षेत्रों को फिर से हरा-भरा करने का सुझाव दिया है।<br />]]>
							</description>
																						<content:encoded>
							<![CDATA[जीव विज्ञान में परोपकारिता यानी एक दूसरे की मदद या भलाई लंबे समय से बहस का एक बड़ा मुद्दा रहा है। आमतौर पर माना जाता है कि लगभग सभी तरह की मदद आपस में जुड़ी होती है। वन्यजीव विज्ञानी आशिनी कुमार धवले कहती हैं, &#8220;या तो आप अपने रिश्तेदारों की मदद करते हो, या फिर ऐसे दोस्त की जो भविष्य में आपकी मदद कर सकता है।&#8221; लेकिन उन्होंने तमिलनाडु के वालपराई, पुथुतोत्तम में लुप्तप्राय लॉयन-टेल्ड मेकाक (मकाका सिलनेस) के व्यवहार में कुछ ऐसा देखा, जो इस आम सोच से बिल्कुल अलग था। मादा लॉयन-टेल्ड मेकाक बिना किसी रिश्तेदारी या दोस्ती के, एक अंजान मेकाक के बच्चों की देखभाल कर रही थी, बिल्कुल वैसे ही जैसे उसकी मां करती है। इसे एलोपैरेंटिंग या एलोमदरिंग कहते हैं। धवले के लिए ये अध्ययन का सबसे यादगार अनुभव रहा। धवले बताती हैं कि उन्होंने जुड़वां बच्चों वाली दो मादाओं और उनके बच्चे के एक साल का होने तक उनकी देखभाल के व्यवहार का अध्ययन किया। यह अध्ययन दो कारणों से खास था: पहला, प्राइमेट्स, खासकर लॉयन-टेल्ड मेकाक में जुड़वां बच्चों का होना एक दुर्लभ घटना है; दूसरा, बच्चे के जीवित बने रहने के लिए उनका पहला साल बहुत महत्वपूर्ण होता है और एक मां अक्सर तब तक उनकी देखभाल में बहुत मेहनत करती है जब तक वो इस मुश्किल पड़ाव को पार नहीं कर लेते हैं। अब तक इस प्रजाति में एलोपैरेंटिंग नहीं देखी गई थी। धवले कहती हैं, &#8220;इनके बीच बच्चों के जन्म के बीच का समय तीन साल का होता है, इसलिए&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2025/06/20/lion-tailed-macaques-navigate-twin-hurdles/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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						<item>
					<title>क्या ऑर्गेनिक फसलों के बाजार दिला पाएंगे नीलगिरि को रासायनिक खेती से मुक्ति?</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2025/04/28/can-organic-farmers-markets-encourage-chemical-free-farming/</link>
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					<pubDate>28 अप्रैल 2025 06:48:42 +0000</pubDate>
											<dc:creator>
							<![CDATA[Arathi Menon]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Manish Chandra Mishra]]>
					</author>
							<category><![CDATA[समाधान]]></category>
		<category><![CDATA[ऑर्गेनिक]]></category>
		<category><![CDATA[ऑर्गेनिक खेती]]></category>
		<category><![CDATA[जैविक खेती]]></category>
		<category><![CDATA[नीलगिरी]]></category>
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												<description>
								<![CDATA[- नीलगिरि में ऑर्गेनिक उत्पादों के बाजार किसानों को उनकी रसायन मुक्त उपज को सीधे ग्राहकों को बेचने की सुविधा प्रदान करते हैं।<br />- ऑर्गेनिक खेती अपनाने के प्रयासों के बावजूद भी इस क्षेत्र में रासायनिक खेती बेरोकटोक जारी है।<br />- विशेषज्ञ रसायनों पर इस निर्भरता का कारण लम्बे समय से चली आ रहे विभिन्न सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक कारकों को मानते हैं।<br />]]>
							</description>
																						<content:encoded>
							<![CDATA[तमिलनाडु के कूनूर में मशहूर सिम्स पार्क के सामने स्थित हॉर्टिकल्चर केंद्र पिछले साल जून में प्रदेश के नीलगिरि जिले से आए आर्गेनिक या जैविक खेती करने वाले किसानों के स्वागत के लिए तैयार था। इस केंद्र का मकसद किसानों के रसायनों से मुक्त उत्पादों को बेचने के लिए एक मंच प्रदान करना है। तमिलनाडु के हॉर्टिकल्चर विभाग और नीलगिरि आर्गेनिक हॉर्टिकल्चर फार्मर्स एसोसिएशन (TOHFA) द्वारा आयोजित कूनूर का यह किसान बाजार इस जिले में इस तरह का दूसरा आयोजन था। इससे पहले भी ऐसे ही एक बाज़ार का सफल आयोजन नीलगिरि जिले के ऊंटी (आधिकारिक नाम, उधागामंडलम) में किया गया था।  “ऊंटी का बाज़ार कई पर्यटकों को आकर्षित करता है, लेकिन हमें स्थानीय लोगों की भागीदारी की उम्मीद है,” बाजार के आयोजकों में से एक गैर सरकारी संस्था ‘द एअर्थ ट्रस्ट’ की निम्मी जॉन ने मोंगाबे इंडिया को बताया।  कूनूर में लगा आर्गेनिक किसानों का बाजार। नीलगिरि में रसायन मुक्त खेती को बढ़ावा देने और आर्गेनिक किसानों को बाज़ार मुहैया करवाने के लिए इस तरह के आयोजन किए जा रहे हैं। तस्वीर- अभिषेक चिन्नप्पा द्वारा मोंगाबे के लिए। अगले दिन सुबह 10 बजे, इस केंद्र पर जिले के अलग-अलग हिस्सों से आए कुछ किसान, और ताजे, रसायन मुक्त फल और सब्जियां खरीदने वाले ग्राहक आने लगे। यहां भाजियां, मौसमी फल, सब्जियां, अचार, सूखे मेवे, और मसाले उपलब्ध थे।  नाशपाती उगाने वाले किसान, अतिश्ता कुमार के सैकड़ों नाशपाती बाजार खुलने के पहले ही कुछ घंटो में बिक गए। “मेरे एक एकड़ के बागान में नाशपाती के 40 पेड़ हैं, जिनसे&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2025/04/28/can-organic-farmers-markets-encourage-chemical-free-farming/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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						<item>
					<title>मौसम के बारे में जानकारी, विविधता से मोटा अनाज उगाने वाले आदिवासियों को होगा फायदा</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2025/03/26/more-climate-literacy-and-diversification-could-help-tribal-millet-farmers-adapt-to-impacts/</link>
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					<pubDate>26 मार्च 2025 06:51:07 +0000</pubDate>
											<dc:creator>
							<![CDATA[Simrin Sirur]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Manish Chandra Mishra]]>
					</author>
							<category><![CDATA[जलवायु परिवर्तन]]></category>
		<category><![CDATA[अनाज]]></category>
		<category><![CDATA[किसान]]></category>
		<category><![CDATA[खेती]]></category>
		<category><![CDATA[मिलेट]]></category>
		<category><![CDATA[मोटा अनाज]]></category>
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							<![CDATA[तमिलनाडु]]>
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											<topic-tags>
							<![CDATA[आदिवासी, कृषि, जलवायु परिवर्तन, और समाधान]]>
						</topic-tags>
					
					
												<description>
								<![CDATA[- तमिलनाडु के कोल्ली हिल्स में मोटा अनाज उगाने वाले ज्यादातर किसानों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन से खेती के सभी कामों पर असर होता है। सर्वे के मुताबिक बार-बार आने वाले सूखे से पैदावार घट रही है।<br />- जानकार कहते हैं कि मोटे अनाज को बढ़ावा देने वाली योजनाएं अनजाने में पसंदीदा किस्मों को लेकर एकरूपता ला सकती हैं।<br />- कोल्ली हिल्स में लंबी अवधि तक किए गए अध्ययन में पता चला कि फसलों की कटाई के बाद सहायता और बीजों को संरक्षित करने से इस खेती को बनाए रखने में मदद मिली, क्योंकि मोटे अनाज की विविधता मौसम में होने वाले बदलावों के अनुकूल है।<br />]]>
							</description>
																						<content:encoded>
							<![CDATA[तमिलनाडु के नमक्कल जिले का पहाड़ी इलाका कोल्ली हिल्स समुद्र तल से 1,200 मीटर की ऊंचाई पर है। यह इलाका मोटे अनाज की खेती का गढ़ है। यहां की पहाड़ियों पर रहने वाले मलायाली आदिवसी समुदाय पीढ़ियों से अलग-अलग तरह के मोटे अनाजों की खेती करते आ रहे हैं। लेकिन, जलवायु परिवर्तन ने खेती में चुनौतियां बढ़ा दी हैं और इससे होने वाले दुष्प्रभावों पर ध्यान नहीं दिया गया है। भारत ने साल 2023 में मोटे अनाज के लिए मिशन शुरू किया था। इसका मकसद देशभर में मोटे अनाज को लेकर जागरूकता पैदा करके पैदावार और उपभोग बढ़ाना था। तमिलनाडु जैसे राज्यों ने इसका फायदा उठाया। राज्य ने ऐसी योजनाएं शुरू की जिनमें सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए मोटा अनाज बांटा गया। साथ ही, महीने दाने वाले मोटे अनाज की प्रोसेसिंग पर सब्सिडी की पेशकश की गई।   हालांकि, एम. एस. स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन (एमएसएसआरएफ) में जैव-विविधता के निदेशक इजराइल ओलिवर किंग ई.डी. ने कहा कि ये योजनाएं कोल्ली हिल्स जैसी जगहों पर मोटा अनाज उगाने वाले किसानों के लिए हमेशा सही नहीं होती हैं। किंग कहते हैं, “उस कृषि पारिस्थितिकी का सम्मान किया जाना चाहिए, जहां आदिवासी समुदाय कम लोकप्रिय किस्मों के साथ अलग-अलग तरह का मोटा अनाज उगा रहे हैं। इसे प्रोत्साहन भी दिया जाना चाहिए। मिशन-आधारित योजनाओं से लोकप्रिय किस्मों को पसंद किए जाने का जोखिम है।” वह आगे कहते हैं, “मोटे अनाज की अतिरिक्त पैदावार को खरीदना जरूरी करने या प्रोसेसिंग सुविधाओं तक पहुंच में से किसी एक को प्रोत्साहन देने से फसलों की विविधता और लचीलेपन&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2025/03/26/more-climate-literacy-and-diversification-could-help-tribal-millet-farmers-adapt-to-impacts/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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						<item>
					<title>गहरे समुद्र में खनन से जुड़ी तकनीक में आगे बढ़ रहा भारत</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2024/12/24/india-advances-with-deep-sea-mining-technology/</link>
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					<pubDate>24 दिसम्बर 2024 09:05:22 +0000</pubDate>
											<dc:creator>
							<![CDATA[Priyanka Shankar]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Manish Chandra Mishra]]>
					</author>
							<category><![CDATA[प्राकृतिक संसाधन]]></category>
		<category><![CDATA[खोज]]></category>
		<category><![CDATA[गहरा समुद्र]]></category>
		<category><![CDATA[डीप सी]]></category>
		<category><![CDATA[समुद्र]]></category>
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							<![CDATA[तमिलनाडु और .भारत]]>
						</locations>
					
											<topic-tags>
							<![CDATA[ऊर्जा, प्राकृतिक संसाधन, और समुद्र तट]]>
						</topic-tags>
					
					
												<description>
								<![CDATA[- राष्ट्रीय समुद्र प्रौद्योगिकी संस्थान ने पिछले दिनों अंडमान सागर में गहरे समुद्र में परीक्षण कर खनन करने की संभावना तलाशी है।<br />- हालांकि, अंतर्राष्ट्रीय समुद्रतल प्राधिकरण ने अभी तक वाणिज्यिक उद्देश्यों के लिए खनन संहिता को आखिरी रूप नहीं दिया है, लेकिन अन्वेषण लाइसेंसधारक अंतर्राष्ट्रीय जल में खनन करने का परीक्षण कर रहे हैं।<br />- पर्यावरण पर दुष्प्रभाव का हवाला देते हुए गहरे समुद्र में खनन का विरोध भी बहुत तेज हो गया है।<br />]]>
							</description>
																						<content:encoded>
							<![CDATA[इस साल अक्टूबर में राष्ट्रीय समुद्र प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईओटी) ने अंडमान सागर में समुद्र तल से पॉलीमेटेलिक नोड्यूल्स हासिल करने के लिए सफल अन्वेषणात्मक खनन परीक्षण किया। यह महासागर में संसाधनों की खोज और उनके दोहन के लिए टेक्नोलॉजी के विकास के लिए काम करने वाला संगठन है। यह परीक्षण भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) के सर्वे और भारत के एक्सक्लूसिव आर्थिक क्षेत्र (ईईजेड) के भीतर पॉलीमेटेलिक नोड्यूल्स की पहचान के बाद किया गया। भारत सरकार के पास समुद्र में संसाधनों के लिए इस क्षेत्र का अन्वेषण करने का अधिकार है, जो लगभग 200 समुद्री मील तक फैला हुआ है। इस क्षेत्र में बंगाल की खाड़ी और अंडमान सागर में अंडमान और निकोबार द्वीप समूह और लक्षद्वीप सागर में लक्षद्वीप द्वीप समूह शामिल हैं। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधीन एनआईओटी के वैज्ञानिकों ने इस जगह के लिए खास तौर पर डिजाइन की गई वराह-3 नामक मशीन का इस्तेमाल किया। एनआईओटी में गहरे समुद्र में खनन करने वाली टीम के वरिष्ठ वैज्ञानिक ने बताया, &#8220;ऐसी मशीन विकसित की गई है जो अंडमान सागर की कठोर परिस्थितियों का सामना कर सकती है, क्योंकि यह चट्टानी क्षेत्र है, जो गहरे मैदान में पाई जाने वाली नरम मिट्टी से बहुत अलग है और पर्यावरण पर कम से कम दुष्प्रभाव के साथ खनन भी कर सकती है।&#8221; वराह-3 का वजन पानी के अंदर छह से सात टन है और इसमें समुद्र तल से दबे हुए नोड्यूल्स को बाहर निकालने के लिए कंघी की तरह का का कलेक्टर तंत्र है। पॉलीमेटेलिक नोड्यूल क्या हैं? समुद्र तल में&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2024/12/24/india-advances-with-deep-sea-mining-technology/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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						<item>
					<title>तमिलनाडु में चराई पर प्रतिबंध से वनवासियों के अधिकारों और आजीविका को खतरा</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2024/12/09/tamil-nadus-grazing-ban-threatens-rights-livelihoods-of-forest-dwellers/</link>
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					<pubDate>09 दिसम्बर 2024 07:38:21 +0000</pubDate>
											<dc:creator>
							<![CDATA[George Rajasekaran]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
					</author>
							<category><![CDATA[प्राकृतिक संसाधन]]></category>
		<category><![CDATA[किसानी]]></category>
		<category><![CDATA[खेती]]></category>
		<category><![CDATA[घास के मैदान]]></category>
		<category><![CDATA[चरवाहा]]></category>
		<category><![CDATA[चरवाही]]></category>
		<category><![CDATA[चारागाह]]></category>
		<category><![CDATA[पशुपालन]]></category>
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							<![CDATA[तमिलनाडु]]>
						</locations>
					
					
					
												<description>
								<![CDATA[- मवेशियों को चराना, खासतौर पर वनवासी समुदायों के लिए, पारंपरिक रूप से आजीविका का एक प्रमुख स्रोत रहा है।<br />- विशेषज्ञों का कहना है कि इस प्रतिबंध से हाशिए पर रहने वाले पशु पालकों की आजीविका और वन पारिस्थितिकी खतरे में पड़ गई है, साथ ही संरक्षण प्रयासों में भी बाधा उत्पन्न हो रही है।<br />- वन अधिकारी चराई के लिए बफर जोन बनाने, आक्रामक प्रजातियों को हटाने और आदिवासी लोगों के लिए वैकल्पिक आजीविका को बढ़ावा देने का सुझाव देते हैं।<br />]]>
							</description>
																						<content:encoded>
							<![CDATA[थानथाई पेरियार वन्यजीव अभयारण्य की घोषणा और 2022 के मद्रास उच्च न्यायालय द्वारा वन क्षेत्रों में मवेशियों को चराने पर प्रतिबंध लगाने के बाद से तमिलनाडु के इरोड जिले में बरगुर हिल्स के निवासियों की आजीविका खतरे में है। ओराली जनजाति के 61-वर्षीय देसन के मुताबिक, उन्हें अपनी तत्काल जरूरतों को पूरा करने के लिए बरगुर नस्ल की अपनी आठ गायों को बेचना पड़ा था। वह कहते हैं, &#8220;अगर वे हमारे मवेशियों को जंगलों में चरने की अनुमति नहीं देंगे, तो मुझे अपने बाकी गायों को बेचने के लिए भी मजबूर होना पड़ेगा। मैं उनके लिए चारा कहां से लाऊंगा।&#8221;  &nbsp; पशुपालक मधु (51) धर्मपुरी जिले में जंगल के किनारे के एक गांव में छायादार पेड़ों के नीचे अपनी अलाम्बादी नस्ल के मवेशियों के झुंड को आराम कराते हुए। तस्वीर: डी. मुनिराज, मोंगाबे के लिए। मवेशियों को चराना पारंपरिक रूप से आजीविका का एक प्रमुख स्रोत रहा है, खासतौर पर जंगलों में रहने वाले समुदायों के लिए। एक संरक्षणवादी जी. थिरुमुरुगन की ओर से जुलाई 2020 में दायर एक जनहित याचिका के जवाब में, मार्च 2022 में मद्रास उच्च न्यायालय ने वन क्षेत्रों में मवेशियों को चराने पर प्रतिबंध लगा दिया था। याचिका में पालतू मवेशियों से वन्यजीवों में बीमारियों के फैलने और घास के मैदानों को खतरा बताया गया था। हालांकि, थिरुमुरुगन ने सिर्फ श्रीविल्लिपुथुर-मेघमलाई बाघ अभयारण्य के एक हिस्से ‘मेघमलाई वन्यजीव प्रभाग और अभयारण्य’ में चराई पर प्रतिबंध लगाने की मांग की थी, लेकिन बाद में अदालत ने इस प्रतिबंध को राज्य के पूरे 22,877 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र में&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2024/12/09/tamil-nadus-grazing-ban-threatens-rights-livelihoods-of-forest-dwellers/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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						<item>
					<title>जैवविविधता से समृद्ध वेड्ज बैंक में तेल और गैस की खोज की योजना चिंता का विषय</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2024/09/25/plans-to-explore-oil-and-gas-in-biodiversity-rich-wadge-bank-raises-concerns/</link>
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					<pubDate>25 सितम्बर 2024 10:37:16 +0000</pubDate>
											<dc:creator>
							<![CDATA[K.A. Shaji]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
					</author>
							<category><![CDATA[वन्य जीव एवं जैव विविधता]]></category>
		<category><![CDATA[कन्याकुमारी]]></category>
		<category><![CDATA[जैैव विविधता]]></category>
		<category><![CDATA[वेड्ज बैंक]]></category>
		<category><![CDATA[समुद्र]]></category>
		<category><![CDATA[समुद्री तट]]></category>
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							<![CDATA[केरल और .तमिलनाडु]]>
						</locations>
					
											<topic-tags>
							<![CDATA[ऊर्जा, खनन, प्राकृतिक संसाधन, वन्य जीव एवं जैव विविधता, और समुद्र तट]]>
						</topic-tags>
					
					
												<description>
								<![CDATA[- जानकारों का कहना है कि वेड्ज बैंक में तेल खोजने से इस संवेदनशील समुद्री क्षेत्र की जैव विविधता पर असर पड़ेगा। साथ ही, तमिलनाडु तथा केरल में फैले भारत के सुदूर दक्षिणी जिलों के असंख्य मछली श्रमिकों की आजीविका प्रभावित होगी।<br />- वेड्ज बैंक सुदूर दक्षिण में स्थित बहुत बड़ा समुद्री क्षेत्र है।  यह 10,000 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। यह जगह देश में मछली की किस्मों का सबसे बड़ा स्रोत होने के लिए मशहूर है।<br />- इस क्षेत्र में अनेक रीफ सिस्टम हैं जो 200 से ज्यादा दुर्लभ मछली प्रजातियों और 60 से ज्यादा अन्य प्रकार के जलीय जीवों के लिए आवास का काम करते हैं।<br />]]>
							</description>
																						<content:encoded>
							<![CDATA[इस साल की शुरुआत में भारत सरकार ने हाइड्रोकार्बन अन्वेषण एवं लाइसेंसिंग नीति (HELP) 2016 के प्रावधानों के तहत कन्याकुमारी तट पर तीन तेल और गैस ब्लॉकों में खोज और विकास की अनुमति दी है। इस फैसले से तमिलनाडु के कन्याकुमारी व तिरुनेलवेली और केरल के तिरुवनंतपुरम व कोल्लम जिलों के मछली श्रमिक अपनी आजीविका को लेकर चिंतित हो गए हैं। संवेदनशील समुद्री क्षेत्र का अध्ययन करने वाले जानकारों ने पुष्टि की है कि प्रस्तावित मेगा-तेल खोज से वेड्ज बैंक के पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान हो सकता है। तेल खोज से होने वाली औद्योगिक गतिविधि और प्रदूषण से समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर अप्रत्याशित नतीजे हो सकते हैं। केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय की ओर से जारी किए गए नोटिस आमंत्रण प्रस्ताव (NIO) के अनुसार, कन्याकुमारी तट पर 27,154 वर्ग किलोमीटर के कुल क्षेत्रफल वाले तीन ब्लॉकों को खोज के तहत लाया जाएगा। केरल के विझिनजाम में मछलियां लेकर आने वाली नावों का इंतजार करते मछुआरे। तेल की खोज से वेड्ज बैंक को नुकसान हो सकता है, जो तमिलनाडु और केरल में मछुआरा समुदाय की आजीविका के लिए महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र है। तस्वीर &#8211; के.ए.शाजी। तमिलनाडु के सेवानिवृत्त सिविल सेवा अधिकारी और पर्यावरण कार्यकर्ता एम.जी. देवसहायम ने कहा है कि वेड्ज बैंक आजीविका के लिए अहम है और पोषक तत्वों से भरपूर भोजन का स्रोत है और तेल की खोज नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को खत्म कर सकती है, जिससे मछुआरा समुदाय बहुत ज्यादा गरीबी में जा सकता है। देवसहायम ने केंद्रीय मछली विभाग और पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय को&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2024/09/25/plans-to-explore-oil-and-gas-in-biodiversity-rich-wadge-bank-raises-concerns/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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						<item>
					<title>वाटर डिवाइनिंगः नारियल और सूखी टहनियों से भूजल खोजने का पारंपरिक तरीका</title>
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					<pubDate>04 सितम्बर 2024 07:24:13 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Simrin Sirur]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Manish Chandra Mishra]]>
					</author>
							<category><![CDATA[प्राकृतिक संसाधन]]></category>
		<category><![CDATA[लोग]]></category>
		<category><![CDATA[समाधान]]></category>
		<category><![CDATA[जल]]></category>
		<category><![CDATA[पानी]]></category>
		<category><![CDATA[पानी की खोज]]></category>
		<category><![CDATA[भूजल]]></category>
		<category><![CDATA[वॉटर डिवाइनर्स]]></category>
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							<![CDATA[तमिलनाडु]]>
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											<topic-tags>
							<![CDATA[आदिवासी, गाँव, जल प्रदूषण, जल संरक्षण, पानी, प्रदूषण, प्राकृतिक संसाधन, लोग, और समाधान]]>
						</topic-tags>
					
					
												<description>
								<![CDATA[- कठोर चट्टानी इलाकों में रहने वाले लोगों के बीच पारंपरिक ‘वॉटर डिवाइनिंग’ तरीका खासा लोकप्रिय है। बिना किसी वैज्ञानिक उपकरणों या तकनीकों के भूजल का पता लगाने वाली इस तकनीक को काफी सटीक माना जाता है।<br />- यहां के लोग ‘वॉटर डिवाइनर’ यानी जल वेत्ताओं पर काफी भरोसा जताते हैं और पारंपरिक तरीके से जमीन के अंदर पानी की खोज करने के लिए उनकी मदद लेते हैं। जल वेत्ताओं की सेवाएं अक्सर वैज्ञानिक तरीके से भूजल की खोज करने वाले तरीकों की तुलना में कम खर्चीली और अधिक सुलभ होती हैं।<br />- आजकल, कुछ वॉटर डिवाइनर &#8220;वैज्ञानिक&#8221; ढंग से पानी खोजने के लिए मशीनों और तकनीकों का इस्तेमाल करने लगे हैं, जैसे इलेक्ट्रिकल रेसिस्टिविटी मीटर। लेकिन वैज्ञानिकों की मानें तो ये तरीके कारगर नहीं हैं। वे भूजल के अत्यधिक दोहन के संभावित खतरों के बारे में भी चेतावनी दे रहे हैं।<br />]]>
							</description>
																						<content:encoded>
							<![CDATA[शनमुगन ने अपनी धोती ऊपर उठाई और बड़ी ही सावधानी से अपना एक पैर जमीन पर रखा। कुछ महसूस न होने पर वह दूसरी दिशा की ओर बढ़ गए। फिर कुछ देर रुके और बड़े ही आत्मविश्वास के साथ बोले, &#8220;यहां&#8230; यहां अधिक मजबूत है।&#8221; उनके हाथ में चैन से बंधा चाबियों का एक गुच्छा है, जिसे उन्होंने पैंडलूम की तरह पकड़ा हुआ था। 47 साल के शनमुगन जमीन के अंदर पानी की खोज कर रहे हैं। उनके मुताबिक, उनकी ये काबिलियत उनके लिए भगवान की किसी नेमत से कम नहीं है।  शनमुगन एक &#8220;वॉटर डिवाइनर&#8221; यानी जल वेत्ता हैं, जो वैज्ञानिक उपकरणों या तकनीक के बिना ही जमीन के अंदर पानी की तलाश करता है। तमिलनाडु के सूखाग्रस्त इलाके धरमपुरी जिले में वह लोगों के बीच खासे लोकप्रिय हैं। धरमपुरी के धाथानाइक्कनपट्टी गांव के ही रहने वाले शनमुगन के पड़ोसी पोन्नी ने बताया, &#8220;कोई भी जल वेत्ता के बिना बोरवेल खोदने की हिम्मत नहीं करता है।&#8221; उन्होंने भी बोरवेल खोदने के लिए शनमुगन की मदद ली थी। वॉटर डिवाइनिंग यानी &#8220;डोजिंग&#8221; भूजल खोजने का एक पारंपरिक तरीका है। लेकिन भूगर्भशास्त्रियों और जलविज्ञानियों के मुताबिक, यह एक तरह का झूठा विज्ञान है। इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। यह महज एक संयोग से ज्यादा कुछ नहीं है। जल वेत्ता शनमुगन फोन पर अपने किसी ग्राहक से बात करते हुए। तस्वीर- सिमरिन सिरुर/मोंगाबे लेकिन कठोर चट्टानी इलाकों में रहने वाले कई लोगों के लिए, भूजल खोजने का यह पारंपरिक तरीका ही एकमात्र विश्वसनीय तरीका है। एक बोरवेल खोदने की ऊंची लागत&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2024/09/04/trust-cost-go-greater-depths-to-sustain-unscientific-water-divining-practice/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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						<item>
					<title>मीठे पानी के जलाशयों के बाद समुद्री जल में डेरा डालती तिलापिया मछली</title>
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					<pubDate>17 जून 2024 11:18:51 +0000</pubDate>
											<dc:creator>
							<![CDATA[Sneha Mahale]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
					</author>
							<category><![CDATA[वन्य जीव एवं जैव विविधता]]></category>
		<category><![CDATA[अतिक्रमण]]></category>
		<category><![CDATA[आक्रामक जीव]]></category>
		<category><![CDATA[आक्रामक मछली]]></category>
		<category><![CDATA[जैव अतिक्रमण]]></category>
		<category><![CDATA[तालाब]]></category>
		<category><![CDATA[तिलापिया]]></category>
		<category><![CDATA[नदी]]></category>
		<category><![CDATA[पर्यावरण]]></category>
		<category><![CDATA[मछली]]></category>
		<category><![CDATA[समुद्र]]></category>
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							<![CDATA[तमिलनाडु]]>
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											<topic-tags>
							<![CDATA[वन्य जीव एवं जैव विविधता]]>
						</topic-tags>
					
					
												<description>
								<![CDATA[- तमिलनाडु के देवीपट्टिनम के पास समुद्री जल में हाल ही में तिलापिया मछली के देखे जाने के बाद से उनके रहन-सहन और बसेरा बनाने के तरीकों की पड़ताल शुरू हो गई है।<br />- पर्यवेक्षणों से मिली जानकरी के अनुसार यहां विभिन्न आकारों की मछलियां पाई गईं हैं। उन इलाकों में भी इन मछलियों की आबादी दिखी है जहां वे आमतौर पर नहीं पाई जाती थीं। ये मछलियां पाक खाड़ी के समुद्री जल में अपने आहार और प्रजनन व्यवहार को बदल रही हैं।<br />- कम रोग दर और उच्च प्रजनन क्षमता के चलते तिलापिया मछली को 1950 के दशक से भारत में कृत्रिम रूप से पाला जाता रहा है। इसका आर्थिक महत्व भी काफी ज्यादा है।<br />]]>
							</description>
																						<content:encoded>
							<![CDATA[तिलापिया मछली पाक खाड़ी के तटीय जल में अपने लिए नई जगह बना रही हैं। वो न सिर्फ इस नए क्षेत्र में बस रही हैं बल्कि प्रजनन भी कर रही हैं। इसका अंदाजा यहां मिली विभिन्न आकारों की मछलियां से लगाया जा सकता है जिनमें युवा और बड़ी मछलियां शामिल हैं। इन मछलियों की आबादी उन क्षेत्रों में भी मिली हैं जहां वे आमतौर पर नहीं पाई जाती थीं। मदुरै कामराज यूनिवर्सिटी के समुद्री और तटीय अध्ययन विभाग के मुथुसामी आनंद कहते हैं, &#8220;इस खोज ने उनकी जनसंख्या की विभिन्न विशेषताओं का अध्ययन करने के लिए प्रेरित किया है।” आनंद तमिलनाडु के पाक खाड़ी क्षेत्र में जुलाई 2023 में किए गए अध्ययन के प्रमुख लेखक भी है। यह अध्ययन तेजी से अपनी आबादी बढ़ाने वाली तिलापिया मछली के परिवेश बदलने की क्षमता और उनके जीन में होने वाले परिवर्तन के बारे में बताता है। आनंद ने कहा, इस अध्ययन में पाक खाड़ी क्षेत्र में समुद्री जल में प्राकृतिक रूप से प्रवेश करने वाली मछलियों की उपस्थिति पर प्रकाश डालने के लिए उनकी बढ़ती संख्या, उनके आहार (GaSI), नर और मादा का अनुपात, आकार में भिन्नता और परिपक्वता स्तर का विश्लेषण किया गया है। तिलापिया मछली, जो पहले सिर्फ मछली पालन के लिए मीठे जलाशयों में पाई जाती थी, अब समुद्र में भी फैल रही है। इससे समुद्री जीवन और मछली पालन व्यवसाय को नुकसान हो सकता है। इस स्थिति को समझने और इसका समाधान खोजने के लिए जरूरी हो जाता है कि इनके लिए अध्ययन और प्रबंधन योजनाएं बनाई जाएं।&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2024/06/17/tilapia-highly-adaptable-and-invasive-fish-found-growing-in-marine-waters/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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														</item>
						<item>
					<title>तमिलनाडु में चक्रवात ओखी के छह साल बाद भी मानसिक स्वास्थ्य से जूझते लोग</title>
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					<pubDate>16 फरवरी 2024 12:55:22 +0000</pubDate>
											<dc:creator>
							<![CDATA[Gowthami Subramaniam]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
					</author>
							<category><![CDATA[जलवायु परिवर्तन]]></category>
		<category><![CDATA[लोग]]></category>
		<category><![CDATA[ओखी]]></category>
		<category><![CDATA[चक्रवात]]></category>
		<category><![CDATA[तमिलनाडु]]></category>
		<category><![CDATA[तूफान]]></category>
		<category><![CDATA[मछली]]></category>
		<category><![CDATA[मछुआरा]]></category>
		<category><![CDATA[मानसिक स्वास्थ्य]]></category>
		<category><![CDATA[मुआवजा]]></category>
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							<![CDATA[तमिलनाडु]]>
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											<topic-tags>
							<![CDATA[गाँव, पानी, प्राकृतिक संसाधन, मछली, लोग, और समुद्र तट]]>
						</topic-tags>
					
					
												<description>
								<![CDATA[- 2017 में चक्रवात ओखी के दौरान कन्याकुमारी में कई लोगों की जान गई। लेकिन जो बच गए गए, वो छह साल बाद भी मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से उबर नहीं पाए हैं।<br />- मानसिक स्वास्थ्य के जानकारों का कहना है कि जिन लोगों ने किसी आपदा के दौरान ज्यादा समस्याएं झेली हों, उन्हें लंबे समय तक बार-बार पुरानी बातों के याद आने, अनिद्रा और नकारात्मक विचार जैसी समस्याओं से जूझना पड़ता है। इसके अलावा उन्हें डिप्रेशन और पोस्ट- ट्रोमैटिक डिसऑर्डर का सामना करना पड़ सकता है। इन सबसे बचने के लिए अक्सर बेहतर इलाज की जरूरत होती है।<br />- जिस तरह से जलवायु परिवर्तन हो रहा है और चरम मौसम की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं, इसे देखते हुए डॉक्टरों और मनोविज्ञान शोधकर्ताओं का मानना है कि आपदाओं से प्रभावित लोगों को आर्थिक मुआवजे के साथ-साथ लंबे समय तक मानसिक स्वास्थ्य सहायता भी दी जानी चाहिए।<br />]]>
							</description>
																						<content:encoded>
							<![CDATA[इस लेख में आपदा से बचे लोगों की मानसिक सेहत पर चर्चा की जा रही है। कुछ घटनाएं पाठकों को परेशान कर देने वाली हो सकती हैं। 30 नवंबर, 2017 का दिन था, भारत के दक्षिणी छोर पर तटीय जिले कन्याकुमारी के गहरे समुद्र के मछुआरों ने खुद को एक बहुत ही खतरनाक चक्रवाती तूफान में फंसा पाया। भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने एक दिन पहले यानी 29 नवंबर, 2017 को भारी बारिश और तेज हवाओं की चेतावनी जारी कर दी थी। मछली पकड़ने वाले समुदाय को दोपहर 2:30 बजे के आसपास &#8216;समुद्र में न जाने&#8217; के खास निर्देश दिए गए थे। लेकिन जो मछुआरे गहरे समुद्र में दूर तक जा चुके थे, उन्हें सचेत करना अव्यावहारिक हो गया। क्योंकि उन्हें वापस लौटने में आमतौर पर 25 से 45 दिन लग जाया करते हैं।  चक्रवात ओखी अपने रास्ते पर था और आगे बढ़ने लगा। लेकिन इन मछुआरों को इसकी खबर नहीं थी। वो बेपरवाह अपने रास्ते पर चल रहे थे। अचानक एक तेज तूफान आया और उनके जीवन को तहस-नहस कर गया। इस घटना को बीते छह साल हो चुके हैं, लेकिन उनके दिलो-दिमाग से आज भी वह दर्दनाक हादसा उतरा नहीं है।  चक्रवात ओखी ने तमिलनाडु और केरल राज्यों में 35,000 से अधिक लोगों को प्रभावित करते हुए, 365 लोगों की जान ले ली थी। तमिलनाडु के कन्याकुमारी जिले में सबसे ज्यादा असर पड़ा। इसके चलते 177 लोगों की जान चली गई और कई अन्य घायल और परेशान हुए। तमिलनाडु के कन्याकुमारी जिले के एराइविपुथेनथुराई गांव में सालों&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2024/02/16/six-years-on-cyclone-ockhi-survivors-battle-lingering-mental-health-impacts/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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														</item>
						<item>
					<title>मुश्किल में समुद्री शैवाल की खेती से जुड़ी महिलाएं</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2024/01/22/women-seaweed-farmers-seek-other-jobs-while-india-plans-industry-expansion/</link>
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					<pubDate>22 जनवरी 2024 07:54:19 +0000</pubDate>
											<dc:creator>
							<![CDATA[Almaas Masood]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
					</author>
							<category><![CDATA[वन्य जीव एवं जैव विविधता]]></category>
		<category><![CDATA[तमिलनाडु]]></category>
		<category><![CDATA[रामनाथपुरम]]></category>
		<category><![CDATA[शैवाल]]></category>
		<category><![CDATA[समुद्री शैवाल]]></category>
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							<![CDATA[तमिलनाडु]]>
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											<topic-tags>
							<![CDATA[कृषि, जल प्रदूषण, जल संरक्षण, जलवायु परिवर्तन, पानी, प्रदूषण, प्राकृतिक संसाधन, और वन्य जीव एवं जैव विविधता]]>
						</topic-tags>
					
					
												<description>
								<![CDATA[- समुद्री शैवाल की खेती तमिलनाडु के रामनाथपुरम जिले में कई महिलाओं की आमदनी का एक बड़ा जरिया है। लेकिन बढ़ती पर्यावरणीय और सामाजिक चुनौतियों के चलते समुद्री शैवाल निकालने का ये काम मुश्किल होता जा रहा है।<br />- बढ़ते चक्रवातों के कारण काम के घटते दिन, समुद्री शैवाल की खेती के लिए जगह का कम होना, ग्लोबल वार्मिंग के कारण समुद्री शैवाल की घटती गुणवत्ता और समाज में महिला और पुरुष के बीच भेदभाव, महिला किसानों को दूसरे कामों की तरफ जाने के लिए विवश कर रही है।<br />- लेकिन वहीं दूसरी तरफ भारत ने 2025 तक समुद्री शैवाल उत्पादन को कम से कम दस लाख टन सालाना तक बढ़ा लेने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस सिलसिले में तमिलनाडु में देश के पहले बहुउद्देशीय समुद्री शैवाल पार्क का निर्माण भी शुरू हो चुका है।<br />]]>
							</description>
																						<content:encoded>
							<![CDATA[“मेरी मां समुद्री शैवाल इकट्ठा किया करती थीं। उस समय मेरी उम्र काफी कम थी लेकिन फिर भी उन के साथ जाती और उनकी मदद करती थी। तभी से मैं समुद्री शैवाल की खेती करती आ रही हूं।” समुद्री शैवाल के बारे में एक स्वयं सहायता समूह को प्रशिक्षण देने वाली 45 साल की आर. सुगंती ने याद करते हुए बताया। वह तमिलनाडु के रामनाथपुरम जिले में स्थित रामेश्वरम द्वीप (जिसे पम्बन भी कहते हैं) पर समुद्र के किनारे अपना जीवन यापन कर रही हैं। प्रचुर मात्रा में मौजूद प्राकृतिक समुद्री शैवाल रामेश्वरम के तट पर महिलाओं के लिए आसानी से उपलब्ध है। जहां पुरुष समुद्र में गहराई में जाकर काम करते हैं, वहीं महिलाएं तटरेखा के नजदीक पानी की गहराई में बिछे समुद्री शैवाल को इकट्ठा करती हैं। यह उनकी आय का बड़ा जरिया है। इनमें से कई महिलाओं ने किशोरावस्था में ही समुद्री शैवाल की खेती शुरू कर दी थी और आज पचास की उम्र को पार कर चुकी हैं। वे समुद्री शैवाल निकालने के लिए पानी के भीतर गोता लगाती हैं और उन्हें दो तरह से बेचती हैं। सूखे समुद्री शैवाल के लिए उन्हें बाजार में प्रति किलोग्राम के हिसाब से 110-115 रुपये मिलते हैं। वहीं ताजा समुद्री शैवाल काफी कम यानी 60 प्रति किलोग्राम के हिसाब से बिकता है।  समुद्री शैवाल की खेती करने वाली एक अन्य महिला किसान उषा मुनीस्वामी ने बताया, “हमारा दिन जल्दी शुरू होता है। हम पाक खाड़ी पर ओलाईकुडा तक समुद्र की ओर तीन किलोमीटर चलते हैं। वहां पहुंचकर पानी में&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2024/01/22/women-seaweed-farmers-seek-other-jobs-while-india-plans-industry-expansion/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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						<item>
					<title>तेल रिसने से मछली पकड़ने का काम बंद, एन्नोर में मछुआरों पर आजीविका का संकट</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2024/01/08/oil-spill-in-ennore-brings-fishing-to-a-standstill/</link>
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					<pubDate>08 जनवरी 2024 08:39:00 +0000</pubDate>
											<dc:creator>
							<![CDATA[Laasya Shekhar]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Manish Chandra Mishra]]>
					</author>
							<category><![CDATA[ऊर्जा]]></category>
		<category><![CDATA[खनन]]></category>
		<category><![CDATA[आजीविका]]></category>
		<category><![CDATA[एन्नोर]]></category>
		<category><![CDATA[तेल]]></category>
		<category><![CDATA[मछली]]></category>
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							<![CDATA[तमिलनाडु]]>
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											<topic-tags>
							<![CDATA[जल प्रदूषण, जल संरक्षण, और नदी]]>
						</topic-tags>
					
					
												<description>
								<![CDATA[- सार्वजनिक क्षेत्र की रिफाइनिंग कंपनी से कथित तौर पर कच्चा तेल चेन्नई के उत्तर में कोसस्थलैयार नदी, जैव विविधता वाले एन्नोर क्रीक और बंगाल की खाड़ी में रिस गया। इससे प्रदूषण फैलने के साथ-साथ मछली पकड़ने का काम रुक गया।<br />- इस घटना से कम से कम 2,301 मछुआरा परिवार प्रभावित हुए हैं और 787 नावें खराब हो गई हैं। मछली पकड़ने का काम बंद होने से इस समुदाय को बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। मछुआरा समुदाय का कहना है कि उन्हें दिया गया मुआवजा पर्याप्त नहीं है।<br />- पारिस्थितिकी विज्ञानियों ने तेल रिसने से इलाके में मैंग्रोव पर असर पड़ने को लेकर चिंता जताई है। मैंग्रोव, मछलियों के प्रजनन के लिए जरूरी जगह होने के साथ-साथ समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र का एक अहम हिस्सा है।<br />]]>
							</description>
																						<content:encoded>
							<![CDATA[कड़ाके की ठंड वाले दिसंबर की 21 तारीख की शाम को 38 साल के मछुआरे एम संतोष कुमार ने कातर नजरों से कोसस्थलैयार नदी का सामना किया। नदी चेन्नई शहर के उत्तर में बहती है और बंगाल की खाड़ी में गिरती है। यह नदी कुमार के लिए आजीविका का सबसे अहम साधन है। अब इस नदी में दिसंबर की शुरुआत में चेन्नई में आए चक्रवात मिचौंग के बाद आई बाढ़ के पानी के साथ बड़े पैमाने पर तेल रिसाव के निशान मौजूद हैं। दिसंबर की शुरुआत से ही कुमार और एन्नोर (उत्तरी चेन्नई के पास बसा इलाका) के नौ गांवों के मछुआरे मछली पकड़ने के लिए कोसस्थलैयार नदी, एन्नोर क्रीक और बंगाल की खाड़ी में नहीं गए हैं। भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) ने चक्रवात मिचौंग से पहले रेड अलर्ट जारी किया था। मिचौंग के चलते तीन और चार दिसंबर के दरम्यान 36 घंटों में हुई 45 सेमी की जोरदार बारिश ने चेन्नई को तबाह कर दिया। इससे शहर में पानी भर गया। तूफान के चलते मछुआरे एक सप्ताह तक मछली पकड़ने नहीं जा सके। चक्रवात के गुजरने के बाद हुए तेल रिसाव के चलते पानी मछली पकड़ने लायक नहीं रहा। इससे एन्नोर में मछुआरों की जिंदगी पूरी तरह से रुक गई है। चार दिसंबर को सार्वजनिक क्षेत्र की रिफाइनिंग कंपनी चेन्नई पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (सीपीसीएल) से कच्चा तेल कथित तौर पर कोसस्थलैयार नदी, एन्नोर क्रीक और समुद्र में लीक हो गया। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान &#8211; मद्रास (आईआईटी-एम) के एक विशेषज्ञ ने नाम नहीं छापने की शर्त पर मोंगाबे-इंडिया से इसकी&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2024/01/08/oil-spill-in-ennore-brings-fishing-to-a-standstill/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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						<item>
					<title>अंधेरे में रहने वाले चमगादड़ों के लिए कृत्रिम रोशनी कितनी नुकसानदायक</title>
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					<pubDate>19 दिसम्बर 2023 13:06:16 +0000</pubDate>
											<dc:creator>
							<![CDATA[Vasudevan Sridharan]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
					</author>
							<category><![CDATA[वन्य जीव एवं जैव विविधता]]></category>
		<category><![CDATA[आवास]]></category>
		<category><![CDATA[घर]]></category>
		<category><![CDATA[चमगादड़]]></category>
		<category><![CDATA[तमिलनाडु]]></category>
		<category><![CDATA[बैट]]></category>
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							<![CDATA[वन्य जीव एवं जैव विविधता]]>
						</topic-tags>
					
					
												<description>
								<![CDATA[- शहरीकरण, चमकदार रोशनी का इस्तेमाल, मंदिरों के नवीनीकरण और पेड़ों को काटने की वजह से तमिलनाडु के कुछ हिस्सों में चमगादड़ों की आबादी में गिरावट आ रही है।<br />- तिरुनेलवेली, तूतीकोरिन और तेनकासी जिले चमगादड़ प्रजातियों का घर हैं। ये चमगादड़ न सिर्फ कीटों के नियंत्रण और परागण जैसे विभिन्न पारिस्थितिक लाभ देते हैं, बल्कि उनका खासा सामाजिक महत्व भी है।<br />- इस क्षेत्र में चमगादड़ों के लिए पुराने मंदिरों की दरारें और वीरान पड़े कमरे उनके आश्रय स्थल बने हुए हैं। लेकिन फिलहाल मंदिरो की दरारों को सीमेंट से भरा जा रहा है और कृत्रिम रोशनी लगाई जा रही है। माना जा रहा है कि जिस तरह से पुराने मंदिरों का नवीनीकरण किया जा रहा है, वह चमगादड़ों के रहने या भोजन के लिए अनुकूल नहीं है।<br />- विशेषज्ञों का मानना है कि चमगादड़ों और जूनोटिक बिमारियों के बारे में फैली गलत धारणाएं मानव-चमगादड़ सहजीवी संबंधों को और नुकसान पहुंचा रही हैं। यह पारिस्थितिकी तंत्र पर हानिकारक प्रभाव डाल सकता है।<br />]]>
							</description>
																						<content:encoded>
							<![CDATA[जब 2022 में चो धर्मन का उपन्यास ‘वाव्वल देसम’ (चमगादड़ों की दुनिया) प्रकाशित हुआ, तो इसने चमगादड़ों के भयानक चित्रण के लिए तमिल साहित्यिक हलकों में सनसनी फैला दी थी। साहित्य अकादमी विजेता उपन्यासकार धर्मन ने इस उपन्यास को लिखने के पीछे की वजह बताते हुए कहा था, “जहां अन्य प्रजातियां सीधी चलती हैं, चमगादड़ उलटे लटके रहते हैं। जब दुनिया रात भर सोती है, वे घूमते हैं। अधिकांश प्रजातियां हवादार जगहों में रहना पसंद करती हैं, चमगादड़ वीरान पड़ी जगहों औऱ पुरानी इमारतों को चुनते हैं। मैं इस विरोधाभासी स्वभाव को अपने उपन्यास में कैद करना चाहता था। इसलिए, मैंने प्रतीक के रूप में चमगादड़ को चुना।” लेखक दक्षिण भारत के उस इलाके में रहते है जहां चमगादड़ प्राचीन इमारतों, वीरान घरों और मंदिर की दरारों में अपना घर बनाकर रहते हैं।  तिरुनेलवेली, तूतीकोरिन और तेनकासी जिले तमिलनाडु की एकमात्र बारहमासी नदी ‘थमीराबारानी’ के किनारे बसे हुए हैं। ये इलाके कई अनोखी चमगादड़ों की प्रजातियों के घर के रूप में जाने जाते हैं। यहां चमगादड़ों की दो प्रमुख जातियां पाई जाती हैं। एक प्रजाति कीटभक्षी है जो कीड़ों पर निर्भर हैं। वहीं दूसरी प्रजाति फल खाने वाली है। इसके अलावा भी यहां कई प्रजातियों को देखा गया है। इनमें हिप्पोसाइडेरोस स्पियोरिस, रूसेटस लेसचेनॉल्टी, टाफोज़स मेलानोपोगोन, मेगाडर्मा लाइरा, टैडारिडा एजिपियाका, पिपिस्ट्रेलस और राइनोपोमा हार्डविकी प्रमुख हैं। इनमें से हिप्पोसाइडेरोस स्पियोरिस की संख्या सबसे अधिक है। ये चमगादड़ों की आबादी का लगभग आधा हिस्सा हैं। उनके मुख्य आश्रय स्थल पुराने मंदिर और पेड़ हैं। मदुरै, तमिलनाडु के एक मंदिर में रूसेटस&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/video/2023/12/darkness-loving-bats-are-being-nudged-out-of-the-shadows/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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						<item>
					<title>चेन्नई में पर्यावरण और जलवायु साक्षरता बेहतर कर रहा प्रकृति-आधारित पढ़ाई का तरीका</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2023/08/31/nature-based-learning-programmes-improve-environment-and-climate-literacy-in-chennai/</link>
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					<pubDate>31 अगस्त 2023 13:27:56 +0000</pubDate>
											<dc:creator>
							<![CDATA[Aparna Ganesan]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
					</author>
							<category><![CDATA[जलवायु परिवर्तन]]></category>
		<category><![CDATA[पढ़ाई]]></category>
		<category><![CDATA[पर्यावरण]]></category>
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						</locations>
					
											<topic-tags>
							<![CDATA[जलवायु परिवर्तन]]>
						</topic-tags>
					
					
												<description>
								<![CDATA[- समुद्र तट पर बसे शहर चेन्नई में प्रकृति-आधारित शिक्षक पर्यावरण और जलवायु साक्षरता में सुधार के लिए काम कर रहे हैं। वे कक्षाओं में प्रकृति शिक्षा को मुख्यधारा में लाने के लिए भी कदम उठा रहे हैं।<br />- उन्नीस किलोमीटर लंबी तटरेखा वाला चेन्नई, सबसे अधिक जोखिम वाले तटीय शहरों में से एक है। प्रकृति शिक्षकों का मानना ​​है कि भविष्य में जोखिमों को कम करने के लिए लोगों का प्रश्न पूछना और अपने परिवेश को जानना महत्वपूर्ण है।<br />- चेन्नई के तटीय जीवों के लिए एक द्विभाषी गाइड (तमिल और अंग्रेजी में) बनाने वाले प्रकृतिवादियों का कहना है कि स्थानीय भाषा में किसी क्षेत्र की जैव विविधता का दस्तावेजीकरण करने का मतलब स्थानीय ज्ञान का दस्तावेजीकरण करना भी है।<br />- प्रकृति-आधारित शिक्षण कार्यक्रम विभिन्न आयु समूहों के अनुसार तैयार किए गए हैं। बच्चों के लिए उद्देश्य उनके परिदृश्य के साथ उत्साह और आश्चर्य की भावना पैदा करना है, जबकि वयस्कों के लिए, उन्हें उस स्थान की आवश्यकता को समझने में मदद करना और फिर उसकी वकालत करना है।<br />]]>
							</description>
																						<content:encoded>
							<![CDATA[प्रकृतिवादी, शिक्षक और कार्यकर्ता, युवान एवेस बच्चों के 18 सदस्यीय समूह के साथ तमिलनाडु के चेन्नई में इलियट समुद्र तट के किनारे घूम रहे हैं। वह बच्चों को एक सीप दिखते हुए पूछते हैं, “ओह! तो, यह दिलचस्प है। क्या आप जानते हैं कि इस सीप में छेद क्यों है?” बेसेंट नगर में मछुआरा बस्ती उरूर ओल्कोट कुप्पम के 15 वर्षीय तमिलसेल्वन हंसते हुए जवाब देते हैं, &#8220;हम्म&#8230; शायद इसमें एक चेन डालकर इसे गले में पहन लिया जाए?&#8221; एवेस एक सेकंड के लिए रूककर तमिलसेल्वन को चकित होकर देखते हैं जिससे पूरा समूह हँसने लगता है। इसके बाद एवेस ने चेन्नई में पाए जाने वाले सामान्य तटीय जीवों की फोटो और नामों के साथ एक पुस्तिका खोली। वह ब्लैडर मून घोंघे की फोटो की ओर इशारा करते हुए बताते हैं, “निलानाथई जैसे मांसाहारी समुद्री शैवाल अपने शिकार के खोल में घुसने और अंदर के नरम मांस को खाने के लिए हाइड्रोक्लोरिक एसिड छोड़ते हैं।&#8221; अगले चालीस मिनट तक, चकित तमिलसेल्वन एवेस के पीछे घूमते रहे, सवाल पूछते रहे और जिज्ञासा से भरे रहे क्योंकि वे तट के किनारे जैव विविधता का पता लगाना जारी रखते थे। युवान (बाएं) युवा जलवायु प्रशिक्षुओं को विभिन्न प्रकार के सीपियों के बारे में बताते हैं। तस्वीर- अपर्णा गणेशन। समुद्र तट की सैर में भाग लेने वाले युवाओं की उम्र 13 से 24 वर्ष के बीच होती है, जिन्हें जलवायु के प्रति संवेदनशील समुदायों से चुना जाता है और उन्हें &#8216;युवा जलवायु प्रशिक्षु&#8217; कहा जाता है। वे पल्लुइर ट्रस्ट फॉर नेचर एजुकेशन एंड रिसर्च&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2023/08/31/nature-based-learning-programmes-improve-environment-and-climate-literacy-in-chennai/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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														</item>
						<item>
					<title>[टिप्पणी] भारत के सबसे दक्षिणी जिले में एक परिवार के सौर ऊर्जा अपनाने की कहानी</title>
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					<pubDate>30 अगस्त 2023 05:57:49 +0000</pubDate>
											<dc:creator>
							<![CDATA[Geetha Iyer]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Manish Chandra Mishra]]>
					</author>
							<category><![CDATA[ऊर्जा]]></category>
		<category><![CDATA[Energy]]></category>
		<category><![CDATA[solar energy]]></category>
		<category><![CDATA[सोलर]]></category>
		<category><![CDATA[सौर ऊर्जा]]></category>
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											<reporting-project>
							<![CDATA[क्लीन एनर्जी और .जस्ट ट्रांजिशन]]>
						</reporting-project>
					
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							<![CDATA[तमिलनाडु]]>
						</locations>
					
											<topic-tags>
							<![CDATA[ऊर्जा]]>
						</topic-tags>
					
					
												<description>
								<![CDATA[- भारत को प्रचुर मात्रा में धूप मिलती है जिसका उपयोग ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए किया जा सकता है। हालाँकि, सौर ऊर्जा प्रणाली स्थापित करने के संबंध में बहुत सारी जानकारी है, लेकिन विवरण बहुत हद तक तकनीकी हैं।<br />- ग्राहकों के पास फोटोवोल्टिक (पीवी) सौर पैनलों से लेकर ग्रिड या ऑफ-ग्रिड विकल्पों तक कई विकल्प हैं।<br />- इस टिप्पणी में, लेखिका, जो कन्याकुमारी जिले के सुचिन्द्रम में रहती हैं, सौर ऊर्जा के उपयोग पर एक उपभोक्ता के दृष्टिकोण को प्रस्तुत करती हैं, जिसमें इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि सौर ऊर्जा स्थापित करने में क्या शामिल है, नुकसान, सब्सिडी और ग्रिड से ग्रिड में स्थानांतरित होने पर सौर ऊर्जा उपयोग का प्रबंधन कैसे किया जाए।<br />- टिप्पणी में विचार लेखिका के हैं।<br />]]>
							</description>
																						<content:encoded>
							<![CDATA[भारत की भौगोलिक स्थिति उष्ण कटिबंध में है। मानसून के मौसम के कुछ दिनों को छोड़कर, सूरज पूरे साल चमकता रहता है। अनुमान के मुताबिक, भारत को सालाना लगभग 3000 घंटे धूप मिलती है। ऊर्जा उत्पादन के संदर्भ में, यह 5,000 ट्रिलियन kWh ऊर्जा है जो सौर विकिरण से वार्षिक रूप से उत्पन्न की जा सकती है। निःसंदेह, ये अनुमानित गणनाएँ हैं। लेकिन यह पुष्टि करता है कि सूर्य एक ऊर्जा स्रोत है जिसका हमें उपयोग करना चाहिए। पर्यावरण को होते नुकसान को देखते हुए, जीवाश्म ईंधन से उत्पन्न बिजली की जगह सौर ऊर्जा को एक स्वच्छ और नवीकरणीय विकल्प के रूप में देखा जाता है। यदि कोई सौर ऊर्जा उत्पादन की प्रक्रिया की जांच करता है, तो सोलर सेल्स या सोलर पैनल के निर्माण से लेकर इसकी स्थापना और अंतिम उपयोग तक, यह कहना मुश्किल है कि यह पर्यावरणीय क्षरण को रोक देगा या यह पूरी तरह से एक &#8216;हरित&#8217; ऊर्जा है। हालांकि, इन संदेहों को एक तरफ रखते हुए, मैं इस प्रश्न का जवाब देना चाहूंगी कि एक आम व्यक्ति के लिए सौर ऊर्जा से उत्पन्न ऊर्जा प्रणाली का क्या मतलब है? एक ऐसे व्यक्ति के रूप में, जिसने बहुत सोच-विचार के बाद, अपने घरेलू उपयोग के लिए छत पर सौर ऊर्जा प्रणाली स्थापित करने का निर्णय लिया है, मैं इस प्रणाली और इसमें शामिल प्रक्रियाओं के बारे में अपने विचार और अनुभव साझा करना चाहती हूँ। हम वर्षों से विद्युत ग्रिड से सौर ऊर्जा की ओर बढ़ने पर विचार कर रहे थे। लेकिन भारी लागत की वजह&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2023/08/30/commentary-living-off-the-grid-in-indias-southernmost-district/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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														</item>
						<item>
					<title>मैंग्रोव रोपाई के लिए प्लास्टिक की जगह लेते ताड़ के पत्तों से बने नर्सरी बैग</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2023/08/25/palmyra-leaf-bags-substitute-plastic-nursery-bags-to-support-sustainable-mangrove-restoration/</link>
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					<pubDate>25 अगस्त 2023 10:04:36 +0000</pubDate>
											<dc:creator>
							<![CDATA[M.T. Saju]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
					</author>
							<category><![CDATA[प्राकृतिक संसाधन]]></category>
		<category><![CDATA[समाधान]]></category>
		<category><![CDATA[Mangrove]]></category>
		<category><![CDATA[प्रदूषण]]></category>
		<category><![CDATA[प्लास्टिक]]></category>
		<category><![CDATA[मैंग्रोव]]></category>
		<category><![CDATA[समुद्र]]></category>
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											<topic-tags>
							<![CDATA[जल संरक्षण, जलवायु परिवर्तन, पानी, प्राकृतिक संसाधन, और समाधान]]>
						</topic-tags>
					
					
												<description>
								<![CDATA[- तमिलनाडु में प्रयोग के तौर पर मैंग्रोव पौधों के पोषण और उन्हें फिर से लगाने के लिए प्लास्टिक की जगह ताड़ के पत्तों से बने नर्सरी बैग इस्तेमाल किए जा रहे हैं। यह प्रयोग पारिस्थितिकी तंत्र को बेहतर बनाने के लिए किया जा रहा है।<br />- प्लास्टिक की थैलियों की तरह ही मैंग्रोव पौधों में अच्छी बढ़ोतरी देखी गई और बाढ़ के दौरान उनका स्थायित्व भी ज़्यादा रहा। साथ ही, ताड़ की थैलियों में जड़ें भी बेहतर तरीके से फैल रही थीं।<br />- ताड़ के पत्तों से जुड़ा पारंपरिक शिल्प तंजावुर जिले में स्थानीय लोगों के लिए आजीविका का एक अहम साधन है।<br />]]>
							</description>
																						<content:encoded>
							<![CDATA[फूस से बनी अपनी झोपड़ी के पास बैठकर, अचिक्कन्नु मछली पकड़ने के टूटे हुए जाल से बने बाड़ पर रखे ताड़ के सूखे पत्ते (बोरासस फ्लेबेलिफ़र) की तरफ हाथ बढ़ाती हैं। वह पत्तियों को बराबर हिस्सों में काटती हैं। बार-बार बुखार से जूझने के बावजूद, वह ताड़ के सूखे पत्तों से 40 मिनट में एक नर्सरी बैग तैयार कर सकती हैं। तमिलनाडु के तंजावुर जिले के एक तटीय गांव कोल्लुक्काडु की कई महिलाओं की तरह, 70 साल की अचिक्कन्नु आजीविका के लिए इन पत्तियों पर निर्भर हैं। उन्हें एक बैग बनाने के लिए 15 रुपए मिलते हैं। ताड़ के पत्तों से बैग बनाती महिलाएं। तस्वीर- बालाजी वेदराजन। वैसे लंबे वक्त से घर की छतों को ढकने के साथ टोकरियां, चटाइयां और क्रॉकरी बनाने के लिए ताड़ की सूखी पत्तियों का इस्तेमाल किया जाता रहा है। हालांकि, अचिक्कन्नु पत्तियों का इस्तेमाल एक अलग उद्देश्य के लिए कर रही हैं। इनका इस्तमाल पौधे रोपने के लिए नर्सरी बैग बनाने में होगा। इन बैग का इस्तेमाल तमिलनाडु के तट पर पाक की खाड़ी के किनारे मैंग्रोव के पौधों को फिर से लगाने के लिए किया जाएगा। इससे प्लास्टिक बैग पर निर्भरता कम होगी। आम तौर पर नर्सरी में प्लास्टिक बैग का ही इस्तेमाल होता है। ताड़ के पत्तों से बने नर्सरी बैग के प्रभाव की जांच दरअसल कटाव, तूफान और तटीय बाढ़ के असर को कम करने में मैंग्रोव की भूमिका को तेजी से पहचाना जा रहा है। इसके चलते देश के लंबे समुद्र तट पर मैंग्रोव बहाली अभियान जोर-शोर से आगे बढ़&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2023/08/25/palmyra-leaf-bags-substitute-plastic-nursery-bags-to-support-sustainable-mangrove-restoration/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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						<item>
					<title>खराब अपशिष्ट प्रबंधन की कीमत चुकाता नीलगिरी जिले का एक पहाड़ी शहर</title>
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					<pubDate>27 जुलाई 2023 11:37:31 +0000</pubDate>
											<dc:creator>
							<![CDATA[Arathi Menon]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
					</author>
							<category><![CDATA[प्राकृतिक संसाधन]]></category>
		<category><![CDATA[अपशिष्ट. पहाड़ी]]></category>
		<category><![CDATA[कचरा]]></category>
		<category><![CDATA[प्रदूषण]]></category>
		<category><![CDATA[शहर]]></category>
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							<![CDATA[तमिलनाडु]]>
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							<![CDATA[कचरा प्रबंधन, जल प्रदूषण, प्रदूषण, प्राकृतिक संसाधन, और वन्य जीव एवं जैव विविधता]]>
						</topic-tags>
					
					
												<description>
								<![CDATA[- नीलगिरी जिले का पहाड़ी शहर कोटागिरी में मनुष्य और वन्यजीव के आमने-सामने आने की खबरें बढ़ रही हैं।<br />- अपने खंडित वन खंडों के लिए मशहूर इस पहाड़ी शहर में खुले में कचरा डाला जाता है तो आस-पास कई लैंडफिल भी हैं। ये जगहें वन्यजीवों को खाने के लिए अपनी ओर खींचती हैं।<br />- मनुष्य और वन्यजीव बढ़ते शहरों में अपनी-अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। तो वहीं इस मसले से निपटने के लिए वन विभाग और स्थानीय अधिकारियों की तैयारी पर सवाल उठाया जा रहा है।<br />]]>
							</description>
																						<content:encoded>
							<![CDATA[38 साल की जयासुधा इसे अपना सौभाग्य मानती हैं कि 11 दिसंबर, 2020 की रात वह घर पर नहीं थीं। उस रात तमिल नाडू के नीलगिरी जिले के कोटागिरी शहर की एक आवासीय कॉलोनी, इंदिरा नगर में दो शावकों के साथ एक भालू उनके घर में घुस आया और वहां से कुछ खाने का समान लेकर चला गए। उन्होने बताया, “मैं और मेरी बेटियां एक सप्ताह तक घर वापस नहीं गए। जब तक कि मेरे पति ने टूटा हुआ दरवाज़ा ठीक नहीं कर दिया। हम सब काफी डरे हुए थे।” एक अन्य घटना में, एक भालू 54 साल के रामर के घर में घुस आया था। उस समय उनका पांच लोगों का परिवार सो रहा था। उनके 26 वर्षीय बेटे रंजीत ने कहा, &#8220;हम चिल्लाने लगे, जिससे वह आगे बढ़ने से रुक गया।&#8221; जब तक गांव के लोग भालू को भगाते, तब तक वह चार और घरों एवं कुछ दुकानों को तोड़ चुका था। वन विभाग ने भालुओं के लिए जाल बिछाया और जल्द ही, उन्हें पास के मिलिधाने गांव में पकड़ लिया गया। बाद में भालुओं को नीलगिरी जिले के पश्चिमी जलग्रहण क्षेत्र में ऊपरी भवानी में स्थानांतरित कर दिया गया। कोटागिरी के इंदिरा नगर कॉलोनी के निवासी दोराईसामी ने बताया कि रात में जब वह सो रहे थे तो अचानक से एक गौर उनकी छत से नीचे आ गिरा था। तस्वीर- अभिषेक एन चिन्नप्पा/मोंगाबे इंदिरा नगर के निवासियों के लिए वन्यजीवों से इतनी नजदीकी कोई नई बात नहीं है। दूर तक फैले चाय के बागानों और एक आरक्षित&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2023/07/27/a-hill-town-in-nilgiris-district-pays-the-price-for-poor-waste-management/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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						<item>
					<title>प्रदूषण, नियमों की अनदेखी और भूमि रूपांतरण की वजह बनते रामेश्वरम के झींगा फार्म</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2023/06/06/shrimp-farms-behind-polluted-groundwater-in-rameshwaram/</link>
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					<pubDate>06 जून 2023 05:58:24 +0000</pubDate>
											<dc:creator>
							<![CDATA[Priyanka Shankar]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
					</author>
							<category><![CDATA[जलवायु परिवर्तन]]></category>
		<category><![CDATA[प्राकृतिक संसाधन]]></category>
		<category><![CDATA[वन्य जीव एवं जैव विविधता]]></category>
		<category><![CDATA[झींगा]]></category>
		<category><![CDATA[झींगा फार्म]]></category>
		<category><![CDATA[समुद्र]]></category>
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							<![CDATA[तमिलनाडु]]>
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							<![CDATA[जलवायु परिवर्तन और .वन्य जीव एवं जैव विविधता]]>
						</topic-tags>
					
					
												<description>
								<![CDATA[- तमिलनाडु में झींगा पालन की ओर रुझान बढ़ रहा है। इसकी एक वजह है मछली की तुलना में झींगा कम समय में तैयार हो जाती है।<br />- केंद्र और राज्य दोनों सरकारें वित्तीय सब्सिडी और बीमा योजनाओं से मछली पालन को बढ़ावा दे रही हैं।<br />- झींगा फार्म से समुद्र की पारिस्थितिकी को कई तरह के नुकसान हो सकते हैं। जलवायु परिवर्तन से पहले से ही मीठे पानी के प्रवाह में और कमी होने की आशंका है। इससे खारेपन वाले क्षेत्र और बढ़ेंगे।<br />- अवैध रूप से झींगा पालन के मामले भी बढ़ रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक तमिलनाडु के सभी 12 तटीय जिलों (चेन्नई को छोड़कर) में 2086 झींगा फार्म काम कर रहे हैं। लेकिन इनमें से केवल 852 झींगा फार्म (40%) को सीएए से मंजूरी मिली है।<br />]]>
							</description>
																						<content:encoded>
							<![CDATA[भारत में, पिछले कुछ वर्षों में, केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा मत्स्य पालन को प्रोत्साहित करने के लिए अलग-अलग योजनाएं चलाई गई हैं। इन अनुकूल नीतियों के चलते  देश में झींगा पालन, मुख्य रूप से व्हाइटलेग झींगा (लिटोपेनियस वन्नामेई) की खेती, तेजी से बढ़ रही है। साल 2021-22 में इस झींगे का निर्यात 5,15,907 मीट्रिक टन से 25% बढ़कर 6,43,037 मीट्रिक टन हो गया। इसके कुल निर्यात में से, लगभग 59.05% (यूएस डॉलर मूल्य में) संयुक्त राज्य अमेरिका को निर्यात किया गया। इसके बाद चीन को 14.59%, यूरोपीय संघ को 8.16%, दक्षिण पूर्व एशिया को 4.78%, जापान को 3.61%, जापान को 3.17% निर्यात किया गया। समुद्री उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (MPEDA) के आंकड़ों के अनुसार, मध्य-पूर्व और अन्य देशों में 6.64% निर्यात हुआ। केंद्र और राज्य दोनों सरकारें वित्तीय सब्सिडी और बीमा योजनाओं से मछली पालन को बढ़ावा दे रही हैं। इससे पारंपरिक मछुआरा समुदाय चिंतित है। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना को हाल ही में केंद्रीय बजट से 6,000 करोड़ रुपये का आवंटन प्राप्त हुआ। वहीं तमिलनाडु जहां देश में दूसरी सबसे लंबी तट रेखा है, तेजी से मछली पालन उद्योग को रोजगार सृजन के लिए अहम और बढ़ती आबादी के लिए खाद्य सुरक्षा के स्रोत के रूप में देख रहा है। साल 2018 में प्रकाशित एक अध्ययन &#8211; जिसमें पांच तटीय राज्यों-पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, गुजरात और ओडिशा में झींगा फार्म के विकास के बाद भूमि उपयोग परिवर्तन (साल 1988 से 2013 तक) का विश्लेषण किया गया – में पाया गया कि तटीय समुदायों के लिए अहम सामुदायिक&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2023/06/06/shrimp-farms-behind-polluted-groundwater-in-rameshwaram/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>झींगा फार्म के विरोध में क्यों हैं रामेश्वरम के पारंपरिक मछुआरे</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2023/06/05/artisanal-fishers-of-rameswaram-resist-the-polluting-shrimp-farms-on-the-island/</link>
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					<pubDate>05 जून 2023 11:11:47 +0000</pubDate>
											<dc:creator>
							<![CDATA[Priyanka Shankar]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
					</author>
							<category><![CDATA[जलवायु परिवर्तन]]></category>
		<category><![CDATA[वन्य जीव एवं जैव विविधता]]></category>
		<category><![CDATA[Rameshwaram]]></category>
		<category><![CDATA[Shrimp farming]]></category>
		<category><![CDATA[झींगा फार्म]]></category>
		<category><![CDATA[रतमिलनाडु]]></category>
		<category><![CDATA[रामेश्वरम]]></category>
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							<![CDATA[तमिलनाडु]]>
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							<![CDATA[वन्य जीव एवं जैव विविधता]]>
						</topic-tags>
					
					
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								<![CDATA[- तमिलनाडु के रामेश्वरम में अरियानकुंडु के पारंपरिक मछुआरों का आरोप है कि उनके गांव के पीछे झींगा पालने वाले फार्म ने भूजल को प्रदूषित कर दिया है। उनकी सामुदायिक जगहों (कॉमन) का अतिक्रमण कर लिया है। कुछ फार्म सरकारी नियमों का पालन भी नहीं कर रहे।<br />- मछुआरों की शिकायत है कि झींगा पालन से होने वाले प्रदूषण के चलते उनकी आजीविका प्रभावित हो रही है। हालांकि झींगा पकड़ने वाले मछुआरों का कहना है कि यह व्यवसाय कमाई  के लिहाज से आकर्षक है लेकिन आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण है।<br />- शोधकर्ता झींगा के लिए ऐसा चारा विकसित कर रहे हैं जो पानी को प्रदूषित नहीं करेगा। वे जमीन के इस्तेमाल में बदलाव की निगरानी के लिए रिमोट-सेंसिंग टूल का इस्तेमाल करने की सलाह देते हैं। साथ ही झींगा पालन को पर्यावरण के अनुकूल बनाने के लिए गंदे पानी को साफ करने वाली प्रणालियों के लिए मजबूत नियमों की वकालत करते हैं।<br />- इन सबके बीच, भारत में झींगा पालन तेजी से बढ़ रहा है। झींगा मछली का निर्यात हर साल बढ़ता जा रहा है। केंद्र और राज्य सरकार दोनों की नीतियां मछली पालन के विकास को बढ़ावा दे रही हैं।<br />]]>
							</description>
																						<content:encoded>
							<![CDATA[समुद्र के बीच में बसे तमिलनाडु के रामेश्वरम में यह सूरज के साथ आंख-मिचौली कर रहे बादलों के कारण यह एक धूप-छाँव वाला दिन था। भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे अब्दुल कलाम के मेमोरियल के कारण पर्यटकों को आकर्षित करने वाला गांव अरियानकुंडु है। इस गांव से कुछ आगे जमीन का एक हिस्सा है जहां कीचड़ से भरी सड़के समुद्री की तरफ जाती हैं। इन सड़कों के दोनों ओर काले और भूरे-हरे पानी के कई कुंड दिखाई देते हैं। वे क्षेत्र के कुछ झींगा फार्म से निकलने वाले गंदे पानी से भरे हुए हैं। कभी यह इलाका नारियल और खजूर के पेड़ और मूंगफली, मक्का व बाजरा जैसी फसलों के लिए जाना जाता था। अब यह इलाका बंजर पड़ा है। अब इसके समुद्र तट पर झींगा पालन होता है। झींगा फार्म से निकलने वाला पानी जहां रुकता है वहां बुलबुले पैदा होते हैं। पूरे इलाके में सूखे पेड़, प्रदूषित मिट्टी, शैवाल के फूल और सूखे हुए तालाब दिखाई देते हैं। सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस (सीटू) के सचिव और रामेश्वरम के निवासी करुणामूर्ति कहते हैं, &#8220;यह पंचकल्याणी है। इससे इलाके के पानी की जरूरत पूरी होती है।&#8221; करुणामूर्ति दशकों से द्वीप पर झींगा पालन के विस्तार का विरोध कर रहे हैं। भारत और श्रीलंका के बीच रामेश्वरम द्वीप। डाटावर्पर के साथ बनाया गया नक्शा। अरियानकुंडु और आसपास के गांवों के निवासी ज्यादातर ईसाई हैं। ये रामेश्वरम में धार्मिक अल्पसंख्यक हैं। रामेश्वरम में अधिकतर लोग हिंदू हैं। गांव के मछुआरे पहले आसपास के तट पर मछली पकड़ते थे और खेती&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2023/06/05/artisanal-fishers-of-rameswaram-resist-the-polluting-shrimp-farms-on-the-island/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>वन समुदाय के अधिकार और तमिलनाडु में स्लेंडर लोरिस का संरक्षण, समझिए क्या है समस्या</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2023/01/24/what-protecting-the-slender-loris-could-mean-for-forest-communities-in-tamil-nadu/</link>
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					<pubDate>24 जनवरी 2023 09:22:00 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[CATHERINE GILON]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
					</author>
							<category><![CDATA[वन्य जीव एवं जैव विविधता]]></category>
		<category><![CDATA[तमिलनाडु]]></category>
		<category><![CDATA[पंचनथंगी]]></category>
		<category><![CDATA[वन्यजीव]]></category>
		<category><![CDATA[संरक्षण]]></category>
		<category><![CDATA[स्लेंडर लॉरिस]]></category>
		<category><![CDATA[स्लेंडर लोरिस]]></category>
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							<![CDATA[तमिलनाडु]]>
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											<topic-tags>
							<![CDATA[आदिवासी, कृषि, प्राकृतिक संसाधन, लोग, वन, वन अधिकार, वन्य जीव, वन्य जीव एवं जैव विविधता, और वन्य जीव संरक्षण अधिनियम]]>
						</topic-tags>
					
					
												<description>
								<![CDATA[- हाल ही में तमिलनाडु के डिंडीगुल जिले में पंचनथंगी के पास स्लेंडर लोरिस के लिए एक अभयारण्य बनाने की अधिसूचना जारी की गई। इसके बाद से सवाल उठ रहे हैं कि नया संरक्षित क्षेत्र बनाए जाने का स्थानीय लोगों की आजीविका पर क्या असर पड़ेगा।<br />- बीते कुछ सालों में इस इलाके में स्लेंडर लोरिस की जनसंख्या कम होती जा रही है। रासायनिक खेती के चलते इस जीव का जहरखुरानी का शिकार होना इसका मुख्य कारण है। साथ ही, जंगल काटे जाने, इनका शिकार किए जाने और सूखे जैसे हालात की वजह से भी इनकी संख्या कम हो रही है।<br />- स्थानीय स्तर पर हो रहे संरक्षण के प्रयासों और जागरूकता अभियानों की वजह से इनके प्राकृतिक निवासों की हालात बेहतर हो रही है और इन स्तनधारी जीवों के प्रति लोगों का नजरिया भी बदल रहा है।<br />- इस क्षेत्र के आस-पास के लोगों की आजीविका पशुपालन पर निर्भर है। यहां अभयारण्य बनाए जाने की खबरों के बीच स्थानीय लोगों की चिंता यह है कि वहां जानवरों को चराने की अनुमति होगी या नहीं।<br />]]>
							</description>
																						<content:encoded>
							<![CDATA[तमिलनाडु के डिंडीगुल जिले का पंचनथंगी इलाका सुदूर क्षेत्र में बसा हुआ एक छोटा सा गांव है। यह गांव हरी-भरी और छोटी-मोटी पहाड़ियों से घिरा हुआ है। यहां पहुंचना बेहद मुश्किल है। चार पीढ़ियों से कनगराज और उनके पड़ोसी यहां काफी शांत और आधुनिक युग के हस्तक्षेप से दूर अपना जीवन व्यतीत करते आ रहे हैं। चालीस साल के कनगराज कहते हैं, “हमारा परिवार यहां लगभग 200 सालों से रह रहा है।” वह याद करते हैं कि जब वह पांच साल के थे तब वह अपने दादा के साथ आस-पास की पहाड़ियों पर शहद निकालने जाया करते थे। वह बताते हैं, &#8220;हम वहां पेड़ के खोखले हिस्सों और कोटरों में मिलने वाले छत्तों से शहद निकालते थे। ऊंचाई पर मौजूद पहाड़ों के बीच में भी शहद मिल जाता था।&#8221; कनगराज कहते हैं कि बचपन में उनका सबसे पसंदीदा काम कंद खोदना और जंगल से फल बीनना था। अब शहद निकालने का काम तो काफी हद तक कम हो गया है लेकिन इस पीढ़ी के युवा और बच्चे अभी भी पहाड़ों पर जाते हैं। ये बच्चे वहां से टर्की बेरी, कंद और कई तरह की जड़ी-बूटियां लाते हैं। इन चीजों का खाने-पीने और व्यापार में इस्तेमाल किया जाता है। इस तरह खाने-पीने की चीजें ढूंढने के अलावा पंचनथंगी गांव के ज्यादातर लोग छोटे स्तर की खेती और पशुपालन भी करते हैं। कनगराज के पास सब्जियों का एक छोटा सा खेत और लगभग 40 भेड़ें हैं। वह पास में मौजूद एक छोटी सी पहाड़ी की ओर इशारा करके दिखाते हैं कि वह&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2023/01/24/what-protecting-the-slender-loris-could-mean-for-forest-communities-in-tamil-nadu/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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														</item>
						<item>
					<title>वन्यजीवों के साथ इंसानी गतिविधियों को लंबे वक़्त से कैमरे में कैद करने वाले फोटोग्राफर से एक बातचीत</title>
					<link>https://hindi.mongabay.com/2022/10/27/a-photographer-on-his-long-term-effort-to-document-human-wildlife-interactions/</link>
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					<pubDate>27 अक्टूबर 2022 05:38:04 +0000</pubDate>
											<dc:creator>
							<![CDATA[Arathi Menon]]>
						</dc:creator>
										<author>
						<![CDATA[Shailesh Shrivastava]]>
					</author>
							<category><![CDATA[वन्य जीव एवं जैव विविधता]]></category>
		<category><![CDATA[Biodiversity]]></category>
		<category><![CDATA[photography]]></category>
		<category><![CDATA[tiger]]></category>
		<category><![CDATA[Wildlife]]></category>
		<category><![CDATA[टाइगर]]></category>
		<category><![CDATA[फोटोग्राफी]]></category>
		<category><![CDATA[बाघ]]></category>
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											<topic-tags>
							<![CDATA[प्राकृतिक संसाधन, लोग, वन अधिकार, वन्य जीव, वन्य जीव एवं जैव विविधता, और वन्य जीव संरक्षण अधिनियम]]>
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								<![CDATA[- तमिलनाडु के डॉक्यूमेंट्री फोटोग्राफर सेंथिल कुमारन वर्ल्ड प्रेस फोटो कॉन्टेस्ट-2022 (विश्व प्रेस फोटो प्रतियोगिता-2022) के विजेताओं में से एक हैं। यह पुरस्कार उन्हें भारत में मानव-बाघ संघर्ष  की विजुअल डॉक्यूमेंट्री के लिए दिया गया है।<br />- एक दशक से अधिक समय से इंसानों और जंगली जीवों के टकराव का दस्तावेजीकरण (डॉक्यूमेंटिंग) करने के अपने अनुभव के आधार पर, कुमारन बताते हैं कि बाघों और हाथियों जैसे मेगाफौना (महाप्राणी) के दीर्घजीवीता के मुद्दे को हल करने की आवश्यकता है।<br />- हालांकि पिछले दशक में देश में बाघों की संख्या दोगुनी हो गई है, लेकिन कुमारन का कहना है कि जंगलों के ह्रास के कारण जानवर मानव-प्रधान भू-भाग के करीब आ रहे हैं। जिससे नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।<br />- इस इंटरव्यू में, फोटोग्राफर ने वाइल्ड-लाइफ स्टोरीज का डॉक्यूमेंटेशन करने के महत्त्व और इससे जुडी चुनौतियों और उनका समाना करने की अपनी कोशिशों के बारे में बात-चीत की है।<br />]]>
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							<![CDATA[मानव-वन्यजीव संपर्क बढ़ रहा है। लेकिन उनमें से सभी सकारात्मक नहीं हैं। भारत में हर साल इंसानों और जानवरों के बीच टकराव के कारण सैकड़ों लोगों और जानवरों की मौत हो जाती है। जंगली जानवरों के टकराव के कारण उनके अस्तित्व और संख्या पर दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है। हालाँकि, दुनिया भर में कुछ इलाके दूसरे इलाकों की तुलना में अधिक जोखिम भरे हैं। दुनिया के दो-तिहाई एशियाई हाथियों और बाघों का आवास, 1.4 अरब लोगों के साथ साझा जगहों में है। प्रत्येक वर्ग किलोमीटर में 400 से अधिक लोगों का उच्च-घनत्व है। भारत से जुड़ी इस तरह की वास्तविकताओं पर तत्काल वैश्विक रूप से ध्यान देने की आवश्यकता है। डॉक्यूमेंट्री फोटोग्राफर सेंथिल कुमारन इन वास्तविकताओं को बड़े पैमाने पर दर्शकों को दिखाने का इरादा रखते हैं। देश के विभिन्न हिस्सों में मानव-बाघ टकराव को एक दशक तक अपने कैमरे में कैद करने के लंबे प्रयास के बाद कुमारन, ने ‘बाउंड्रीज़: ह्यूमन-टाइगर कॉन्फ्लिक्ट’ नामक एक प्रभावशाली डॉक्यूमेंट्री बनाया है। जिसकी वजह से उन्हें फोटो जर्नलिज्म का सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार मिला। वर्ल्ड प्रेस फोटो 2022 के 24 विजेताओं में एक नाम उनका भी है।  कुमारन के लिए पुरस्कार कोई नई बात नहीं है, उन्हें अब तक 20 अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं। मोंगाबे-इंडिया के साथ अनौपचारिक बात-चीत के दौरान फोटोग्राफर ने भारत में मानव-वन्यजीव संघर्षों, उनकी लंबी और थकाऊ कार्य प्रक्रिया और दो दशकों के अपने करियर के अनुभवों के बारे में बताया।  फोटोग्राफर सेंथिल कुमारन, विश्व प्रेस फोटो प्रतियोगिता 2022 के विजेता और मदुरै, तमिलनाडु से नेशनल ज्योग्राफिक एक्सप्लोरर हैं।&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2022/10/27/a-photographer-on-his-long-term-effort-to-document-human-wildlife-interactions/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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					<title>ताउते तूफान ने बताया कितना संवेदनशील है भारत का पश्चिमी तट</title>
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					<pubDate>26 मई 2021 07:43:14 +0000</pubDate>
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							<![CDATA[Supriya Vohra]]>
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						<![CDATA[Kundan Pandey]]>
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							<category><![CDATA[जलवायु परिवर्तन]]></category>
		<category><![CDATA[climate change]]></category>
		<category><![CDATA[COVID-19]]></category>
		<category><![CDATA[अरब सागर]]></category>
		<category><![CDATA[क्लाइमेट चेंज]]></category>
		<category><![CDATA[चक्रवात]]></category>
		<category><![CDATA[ताउते तूफान]]></category>
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							<![CDATA[केरल, गुजरात, तमिलनाडु, भारत, और महाराष्ट्र]]>
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								<![CDATA[- वर्ष 1998 के बाद अरब सागर का पांचवां सबसे ताकतवर चक्रवाती तूफान ताउते 17 मई को भारत के पश्चिमी तट से टकराया।<br />- इस तूफान ने केरल, कर्नाटक, गोवा, महाराष्ट्र और गुजरात में लगभग 91 जिंदगियों लेने के साथ हजारों इमारतें, नाव और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया।<br />- ओएनजीसी के बार्ज पर तूफान की वजह से एक हादसा हुआ जिसके बाद से 45 कर्मचारी अब भी लापता है। इसके अलावा, कन्याकुमारी तट से 17 मछुआरों के गायब होने की सूचना है।<br />- जानकार मानते हैं कि उष्णकटिबंधीय चक्रवाती तूफान का आना एक सामान्य घटना होती जा रही है, ऐसे में तटीय क्षेत्र में विषम विकास की परियोजनाएं और आर्थिक नीतियां विनाश को न्यौता दे रही हैं।<br />]]>
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							<![CDATA[“तट पर 25 नाव कतार से लगी थी तभी एक जोर का तूफान आया। हवा का जोर इतना अधिक था कि ये सारी नावें आपस में टकराकर टूट गईं। मैं बढ़ा-चढ़ा कर नहीं बोल रहा हूं बल्कि सारी नाव सच में टुकड़ों में टूटकर बिखर गईं। कुछ नहीं बचा,” ये शब्द हैं मुंबई के मड आइलैंड निवासी मछुआरे किरण कोहली के जिन्होंने ताउते चक्रवाती तूफान का विध्वंस अपनी आंखों से देखा। ऐसे समय में जब देश कोरोना वायरस की दूसरी लहर की चपेट में बुरी तरह फंसा है और मौत का आंकड़ा तीन लाख के पार पहुंच चुका है, चक्रवाती तूफान रूपी आफत ने देश के समुद्री तटों पर दस्तक दे दी और अच्छी-खासी तबाही मचाई। 14 मई से चक्रवात ने अपना असर दिखाना शुरू किया और 17 मई को इसका एक जोरदार प्रहार गुजरात के पोरबंदर और महुवा तटों पर हुआ। चक्रवात की वजह से अरब सागर में लक्षद्वीप के पास दबाव बनना शुरू हुआ। तूफानी हवा की रफ्तार 230 किमी प्रति घंटे तक पहुंच गई, जिसकी वजह से समुद्र की लहरें तीन मीटर तक उठ गईं। गुजरात के तटों के टकराने के साथ तूफान ने तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, गोवा, महाराष्ट्र के तटों पर भी भयानक रूप ले लिया। “इस चक्रवाती तूफान को पश्चिमी समुद्री तट पर सबसे लंबा सफर करने वाला तूफान माना जाएगा,” कहते हैं के एस होसालिकर, जो भारतीय मौसम विज्ञान विभाग, पुणे के क्लाइमेट रिसर्च एंड सर्विस प्रभाग के प्रमुख हैं। “इस दौरान हमने हर तीन घंटे में बुलेटिन जारी किया। 16 मई को स्थिति&hellip;This article was originally published on <a href="https://hindi.mongabay.com/2021/05/26/cyclone-tauktae-barrels-the-west-coast-exposes-a-vulnerable-coastline/" data-wpel-link="internal">Mongabay</a>]]>
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