आदिवासी

मध्य प्रदेश की बैगा आदिवासी महिलाएं। बैगा मूलतः वनवासी हैं, जो जंगलों में प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर रहते हैं। लेकिन पिछले कुछ सालों में वनों की कटाई और विकास की गति ने उन्हें शहरों के नजदीकी स्थानों की ओर पलायन करने के लिए मजबूर कर दिया है। (प्रतीकात्मक इमेज) तस्वीर-सैंडी और व्याज/विकिमीडिया कॉमन्स

बेहतर वन प्रबंधन के लिए आदिवासी समुदाय का नजरिया शामिल करना जरूरी

भारत में जंगल में रहने वाले आदिवासी समुदायों के लिए जंगल का क्या मतलब है? क्या वे वन पारिस्थितिकी तंत्र को उसी तरह देखते हैं जैसे जंगल के बाहर के…
मध्य प्रदेश की बैगा आदिवासी महिलाएं। बैगा मूलतः वनवासी हैं, जो जंगलों में प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर रहते हैं। लेकिन पिछले कुछ सालों में वनों की कटाई और विकास की गति ने उन्हें शहरों के नजदीकी स्थानों की ओर पलायन करने के लिए मजबूर कर दिया है। (प्रतीकात्मक इमेज) तस्वीर-सैंडी और व्याज/विकिमीडिया कॉमन्स
धिनकिया में पोस्को के खिलाफ विरोध प्रदर्शन (2017 से पहले)। जेएसडब्ल्यू परियोजना के लिए भूमि पहले दक्षिण कोरियाई इस्पात प्रमुख पोस्को की परियोजना के लिए ली गई थी। समुदायों के एक दशक लंबे विरोध के चलते साल 2017 में पोस्को ने अपने कदम पीछे खींच लिए थे। तस्वीर - विशेष व्यवस्था के तहत।

ओडिशा में जेएसडबल्यू के प्रोजेक्ट पर एनजीटी ने लगाई रोक, प्रदर्शनकारियों को राहत

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने ओडिशा के जगतसिंहपुर जिले के पारादीप बंदरगाह पर जिंदल स्टील वर्क्स की सहायक कंपनी जेएसडब्ल्यू उत्कल की परियोजना को दी गई पर्यावरण मंजूरी (ईसी/EC) पर…
धिनकिया में पोस्को के खिलाफ विरोध प्रदर्शन (2017 से पहले)। जेएसडब्ल्यू परियोजना के लिए भूमि पहले दक्षिण कोरियाई इस्पात प्रमुख पोस्को की परियोजना के लिए ली गई थी। समुदायों के एक दशक लंबे विरोध के चलते साल 2017 में पोस्को ने अपने कदम पीछे खींच लिए थे। तस्वीर - विशेष व्यवस्था के तहत।
नर्सरी से लाने के बाद पौधों को लगाते लोग। तस्वीर- रवलीन कौर/मोंगाबे ।

मैंग्रोव के निर्माण से लाभान्वित हो रहा गुजरात का तटीय समुदाय, आजीविका के साथ पर्यावरण को फायदा

ऐसा लग रहा था कि यह दलदल कभी ख़त्म नहीं होगा। जब मैं घुटनों तक दलदल में चली गई, तो सिर्फ़ केकड़ ही मेरे साथ थे। मुझसे महज 10 फुट…
नर्सरी से लाने के बाद पौधों को लगाते लोग। तस्वीर- रवलीन कौर/मोंगाबे ।
झाबुआ जिले में सामुदायिक श्रमदान 'हलमा' में शामिल होने जा रहीं भील महिलाएं। झाबुआ-अलीराजपुर के 1,322 गांवों में 500 कुओं की मरम्मत और गहरीकरण,मेड बधान, नलकूप सुधारने, चैकडैम, बोरीबधान बनाने जैसी जल संरचनाओं के निर्माण का काम हलमा से भील समुदाय ने किए हैं। तस्वीर- सतीश मालवीय/मोंगाबे

हलमा: सामुदायिक भागीदारी से सूखे का हल निकालते झाबुआ के आदिवासी

मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले के सूखे पहाड़ गर्मी की शुरुआत में ही आग उगल रहे हैं। साढ़ गांव की बाड़ी बोदरी फलिया की एक बेहद जर्जर झोपड़ी में 12…
झाबुआ जिले में सामुदायिक श्रमदान 'हलमा' में शामिल होने जा रहीं भील महिलाएं। झाबुआ-अलीराजपुर के 1,322 गांवों में 500 कुओं की मरम्मत और गहरीकरण,मेड बधान, नलकूप सुधारने, चैकडैम, बोरीबधान बनाने जैसी जल संरचनाओं के निर्माण का काम हलमा से भील समुदाय ने किए हैं। तस्वीर- सतीश मालवीय/मोंगाबे
झारखंड, भारत में रांची जिले में हुंडरू झरने से ली गई एक घाटी। तस्वीर- अजय कुमार/विकिमीडिया कॉमन्स

झारखंड: लैंड बैंक से तैयार हो रही संघर्ष की नई ज़मीन!

इस साल 15 जुलाई को झारखंड में गोंदलपुरा के निवासियों ने हजारीबाग जिला कलेक्टर कार्यालय की ओर से रखी गई जनसुवाई के दौरान ‘अडानी कंपनी वापस जाओ’  के नारे लगाए।…
झारखंड, भारत में रांची जिले में हुंडरू झरने से ली गई एक घाटी। तस्वीर- अजय कुमार/विकिमीडिया कॉमन्स
तेंदू यानी डायोसपायरस मेलेनोक्ज़ायलोन के पत्तों का उपयोग बीड़ी बनाने के लिए किया जाता है। आदिवासी इलाकों में इसे हरा सोना भी कहा जाता है क्योंकि वनोपज संग्रह पर निर्भर एक बड़ी आबादी के लिए तेंदूपत्ता आय का सबसे बड़ा स्रोत है। तस्वीर- आलोक प्रकाश पुतुल/मोंगाबे

छत्तीसगढ़ में तेंदूपत्ता खुद बेचना चाहते है आदिवासी, सरकार को है ऐतराज

छत्तीसगढ़ के कांकेर ज़िले के डोटोमेटा के सरपंच जलकू नेताम खुश हैं कि इस बार उनके गांव के लोगों को तेंदूपत्ता की सही क़ीमत मिलेगी। उनका आरोप है कि वनोपज…
तेंदू यानी डायोसपायरस मेलेनोक्ज़ायलोन के पत्तों का उपयोग बीड़ी बनाने के लिए किया जाता है। आदिवासी इलाकों में इसे हरा सोना भी कहा जाता है क्योंकि वनोपज संग्रह पर निर्भर एक बड़ी आबादी के लिए तेंदूपत्ता आय का सबसे बड़ा स्रोत है। तस्वीर- आलोक प्रकाश पुतुल/मोंगाबे
छत्तीसगढ़ के सरगुजा ज़िले के साल्ही गांव से लगे हसदेव अरण्य के जंगल में आदिवासी पेड़ कटने का विरोध कर रहे हैं। पिछले कई दिनों से यहां प्रदर्शन हो रहे हैं। तस्वीर- आलोक प्रकाश पुतुल

कोयले के लिए हसदेव अरण्य में काटे जा सकते हैं साढ़े चार लाख पेड़, रात-दिन जागकर पेड़ों की रक्षा कर रहे हैं आदिवासी

देश में चारों तरफ लोगों को यह सलाह दी जा रही है कि जानलेवा धूप है, घर से ना निकालें। छत्तीसगढ़ में भी कई इलाकों में मौसम का पारा 46…
छत्तीसगढ़ के सरगुजा ज़िले के साल्ही गांव से लगे हसदेव अरण्य के जंगल में आदिवासी पेड़ कटने का विरोध कर रहे हैं। पिछले कई दिनों से यहां प्रदर्शन हो रहे हैं। तस्वीर- आलोक प्रकाश पुतुल
रोरो गांव के लोग खेती के अलावा जंगल के उत्पाद जैसे महुआ आदि पर निर्भर हैं। तस्वीर- मनीष कुमार/मोंगाबे

एसबेस्टस खनन के बंद होने के 39 साल बाद भी क्यों हो रहें हैं झारखंड के आदिवासी बीमार

मोहन सूंडी झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले के रोरो गांव के रहने वाले 35 वर्षीय युवक हैं। केरल के एक थिएटर में काम करते हैं और महीने भर पहले अपने…
रोरो गांव के लोग खेती के अलावा जंगल के उत्पाद जैसे महुआ आदि पर निर्भर हैं। तस्वीर- मनीष कुमार/मोंगाबे
[कॉमेंट्री] उदारीकरण के 30 साल: क्या कोविड-19 की दूसरी लहर भारतीय मध्य वर्ग की दिशा बदलेगी?

कोविड, किसान आंदोलन, उदारीकरण, पेसा, नेट जीरो से जोड़कर देखा जाएगा साल 2021

अभी 2022 दहलीज पर खड़ा है और इसके साथ ओमीक्रॉन भी। पूरी मानव सभ्यता इस उम्मीद में है कि कोविड के डेल्टा ने 2021 में जो तबाही मचाई वैसे आगे…
[कॉमेंट्री] उदारीकरण के 30 साल: क्या कोविड-19 की दूसरी लहर भारतीय मध्य वर्ग की दिशा बदलेगी?
60 वर्षीय जानकीअम्मा कभी शहद इकट्ठा करने का काम करती थीं, लेकिन आज वे एक अवॉर्ड विनिंग कंपनी की डायरेक्टर हैं। तस्वीर- आरथी मेनन

जानकीअम्माः शहद बटोरने वाली निरक्षर महिला से कंपनी डायरेक्टर का सफर, यूएन से मिला सम्मान

जीवन के 60 वसंत देख चुकी जानकीअम्मा आज एक कृषि उत्पाद कंपनी की डायरेक्टर हैं। दक्षिण भारत के आदिम जनजाति कुरुंबा से वास्ता रखने वाली अम्मा कभी शहद इकट्ठा करने…
60 वर्षीय जानकीअम्मा कभी शहद इकट्ठा करने का काम करती थीं, लेकिन आज वे एक अवॉर्ड विनिंग कंपनी की डायरेक्टर हैं। तस्वीर- आरथी मेनन
ग्राम सभा की बैठक के दौरान ग्रामीण और सुरक्षाबल। तस्वीर- राजाराम सुंदरेसन

ओडिशा: बॉक्साइट खनन को लेकर पुलिस तंत्र के साये में ग्राम सभा, आदिवासियों में रोष

मणिमा पटनायक एक आदिवासी समाज की महिला हैं जो कई वर्षो से माली पर्वत के नीचे स्थित अपने गांव मे अपने परिवार के साथ रहती हैं। पिछले महीने, नवम्बर 22…
ग्राम सभा की बैठक के दौरान ग्रामीण और सुरक्षाबल। तस्वीर- राजाराम सुंदरेसन
खनन के खिलाफ स्वदेशी समुदायों के सदस्यों के लिए कला का इस्तेमाल एक सशक्त हथियार है। तस्वीर- अमोल के. पाटिल। कॉपीराइट © प्रभाकर पचपुते, कोलकाता।

गांव छोड़ब नहीं: खनन से जुड़े प्रतिरोध में कला के सहारे बुलंद होती आवाज

“आगे मशीनीकरण के राज, जुच्छा कर देही सबके हाथ, बेरोजगारी हे अइसे बाढ़े हे, अउ आघु बढ़ जाही रे, मेहनतकश जनता हा, बिन मौत मारे जाही रे, फिर होही अनर्थ…
खनन के खिलाफ स्वदेशी समुदायों के सदस्यों के लिए कला का इस्तेमाल एक सशक्त हथियार है। तस्वीर- अमोल के. पाटिल। कॉपीराइट © प्रभाकर पचपुते, कोलकाता।
आदिवासी जंगल में जाते हुए। गढ़चिरौली के क्षेत्र में इन दिनों नए तरीके से शहद निकाला जा रहा है जो न केवल टिकाऊ है बल्कि रोजगार देने वाला भी है। तस्वीर तस्वीर- सौरभ कटकुरुवार

महाराष्ट्र के आदिवासी जिलों में शहद निकालने का आया एक नया टिकाऊ तरीका

पूर्वोत्तर महाराष्ट्र में स्थित गढ़चिरौली जिले के आदिवासी परिवार शहद निकालने का एक ऐसा तरीका अपना रहे हैं जिसमें मधुमक्खियों को नुकसान नहीं होता। यहां के आदिवासी परिवार आसपास के…
आदिवासी जंगल में जाते हुए। गढ़चिरौली के क्षेत्र में इन दिनों नए तरीके से शहद निकाला जा रहा है जो न केवल टिकाऊ है बल्कि रोजगार देने वाला भी है। तस्वीर तस्वीर- सौरभ कटकुरुवार
23-वर्षीय एलिस बरवा ने शनिवार को विरोध प्रदर्शन में आदिवासी युवाओं का प्रतिनिधित्व किया। उनके नेतृत्व में गांव छोड़ब नहीं और हसदेव अरण्य बचाओ जैसे पोस्टर्स प्रदर्शनी में शामिल किए गए। तस्वीर- प्रियंका शंकर/मोंगाबे

कॉप-26 में गूंजा ‘गांव छोड़ब नहीं’ की धुन, युवाओं ने भी संभाला मोर्चा

यह ग्लासगो में जलवायु सम्मेलन कॉप 26 का दूसरा सप्ताह है। विश्व के नेताओं ने ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने की आवश्यकता के साथ अपने देशों…
23-वर्षीय एलिस बरवा ने शनिवार को विरोध प्रदर्शन में आदिवासी युवाओं का प्रतिनिधित्व किया। उनके नेतृत्व में गांव छोड़ब नहीं और हसदेव अरण्य बचाओ जैसे पोस्टर्स प्रदर्शनी में शामिल किए गए। तस्वीर- प्रियंका शंकर/मोंगाबे
साबरमती नदी किनारे स्थित थर्मल पावर स्टेशन। देश में कोयले की कमी की चर्चा के बीच कई ऊर्जा संयंत्र बंद होने की कगार पर हैं। तस्वीर- कोशी/विकिमीडिया कॉमन्स

क्या देश में कोयला संकट से तैयार हो रहा कानूनों में परिवर्तन का रास्ता?

पिछले कुछ दिनों से, देश के ताप विद्युत संयत्रों में कोयले की कमी की चर्चा जोरों पर है। यह अनुमान लगाया जा रहा है कि इसकी वजह से देश में…
साबरमती नदी किनारे स्थित थर्मल पावर स्टेशन। देश में कोयले की कमी की चर्चा के बीच कई ऊर्जा संयंत्र बंद होने की कगार पर हैं। तस्वीर- कोशी/विकिमीडिया कॉमन्स
भारत सरकार के आदिवासी मामलों के मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक बिहार में फरवरी, 2021 तक वनाधिकार को लेकर सिर्फ 8022 दावे पेश किये गये थे, दिलचस्प है कि इनमें से बिहार सरकार ने सिर्फ 121 दावों को स्वीकृत किया है। तस्वीर- जगदरी/फ्लिकर

[वीडियो] 13 साल बाद भी बिहार में सिर्फ 121 परिवार हासिल कर पाये वनाधिकार

दीपनारायण प्रसाद कहते हैं, हमारे इलाके से सात से आठ हजार के करीब लोगों ने वनाधिकार पट्टे के लिए आवेदन दिया था। मगर मेरी जानकारी में वाल्मिकीनगर के जंगल में…
भारत सरकार के आदिवासी मामलों के मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक बिहार में फरवरी, 2021 तक वनाधिकार को लेकर सिर्फ 8022 दावे पेश किये गये थे, दिलचस्प है कि इनमें से बिहार सरकार ने सिर्फ 121 दावों को स्वीकृत किया है। तस्वीर- जगदरी/फ्लिकर
हसदेव अरण्य का जंगल। यह प्राचीन जंगल पर्यावरण के लिहाज से बेहद संवेदनशील है। तस्वीर- मयंक अग्रवाल/मोंगाबे

कोयला खनन की आशंकाओं से अंधकार में है छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य का भविष्य

छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य के जंगल काफी प्रचीन है। जैव-विविधता और पारिस्थितिकी से संपन्न। कोयला खनन को लेकर पिछले एक दशक से यह जंगल बहस के केंद्र में रहा है।…
हसदेव अरण्य का जंगल। यह प्राचीन जंगल पर्यावरण के लिहाज से बेहद संवेदनशील है। तस्वीर- मयंक अग्रवाल/मोंगाबे
[कॉमेंट्री] मार्फत कामोद सिंह गोंड, मध्य प्रदेश में वन अधिकारों की जमीनी सच्चाई

[कॉमेंट्री] मार्फत कामोद सिंह गोंड, मध्य प्रदेश में वन अधिकारों की जमीनी सच्चाई

50 वर्षीय कामोद सिंह गोंड अब हताश हो चुके हैं। दमोह जिले की तेंदूखेड़ा तहसील के गुबरा गांव के रहने वाले कामोद सिंह का दसियों साल का संघर्ष दाव पर…
[कॉमेंट्री] मार्फत कामोद सिंह गोंड, मध्य प्रदेश में वन अधिकारों की जमीनी सच्चाई
रोजी-रोटी के लिए वन गुज्जर मवेशियों पर निर्भर है। वन विभाग की सख्ती की वजह से वे मवेशी चराने के लिए जंगल नहीं जा सकते। तस्वीर- निशांत सैनी

जंगल की रक्षा करने वाले शिवालिक के टोंगिया और वन गुर्जरों का वनाधिकार अधर में

अप्रैल की अलसाई दोपहरी में उत्तराखंड के हरिद्वार के हरिपुर टोंगिया गांव की महिला पाल्लो देवी (52) बैठी जूट की रस्सियां बुन रही थीं। बदन पर गुलाबी सलवार-कुर्ती और चेहरे…
रोजी-रोटी के लिए वन गुज्जर मवेशियों पर निर्भर है। वन विभाग की सख्ती की वजह से वे मवेशी चराने के लिए जंगल नहीं जा सकते। तस्वीर- निशांत सैनी
छत्तीसगढ़ के इंद्रावती नदी का चित्रकोट वाटरफाल। चार दशक पहले इंद्रावती नदी पर ही बोधघाट बांध बनना तय हुआ था। छत्तीसगढ़ सरकार इसे पुनः शुरू करने जा रही है। तस्वीर: Ishant46nt/विकिमीडिया कॉमनस

मार्फत बोधघाट परियोजना, छत्तीसगढ़ का आदिवासी समाज और कांग्रेस सरकार के ढाई साल

बस्तर के ककनार गांव के चैतराम इस बात से नाराज़ हैं कि आदिवासियों के विरोध के बाद भी राज्य सरकार बार-बार बस्तर में बोधघाट इंदिरा सरोवर जल विद्युत परियोजना को…
छत्तीसगढ़ के इंद्रावती नदी का चित्रकोट वाटरफाल। चार दशक पहले इंद्रावती नदी पर ही बोधघाट बांध बनना तय हुआ था। छत्तीसगढ़ सरकार इसे पुनः शुरू करने जा रही है। तस्वीर: Ishant46nt/विकिमीडिया कॉमनस
जंगल के बारे में इन महिलाओं की समझ पहले से ही काफी अच्छी थी। ट्रेनिंग के बाद उनका ज्ञान और भी बढ़ा जिससे पर्यटकों को वह आसानी से जंगल के बारे में बता पाती हैं। तस्वीर- देवज्योति बैनर्जी

अचानकमार टाइगर रिजर्वः जिस जंगल में बचपन बीता वहीं फॉरेस्ट गाइड बन गईं ये महिलाएं

“हम इस जंगल के चप्पे-चप्पे की खबर रखते हैं। जंगली जानवरों के साथ हमारा बचपन बीता है,” यह कहते हुए 19 वर्ष की परमेश्वरी आत्मविश्वास से भर उठती है। परमेश्वरी…
जंगल के बारे में इन महिलाओं की समझ पहले से ही काफी अच्छी थी। ट्रेनिंग के बाद उनका ज्ञान और भी बढ़ा जिससे पर्यटकों को वह आसानी से जंगल के बारे में बता पाती हैं। तस्वीर- देवज्योति बैनर्जी
साबुन-शैम्पू से लेकर खाद्य पदार्थ तक, कहां नहीं है पाम ऑयल!

साबुन-शैम्पू से लेकर खाद्य पदार्थ तक, कहां नहीं है पाम ऑयल!

भारतीय बाजार में पाम ऑयल कहां नहीं हैं! सरकार की सार्वजनिक वितरण प्रणाली से लेकर हमारे दैनिक उपभोग की वस्तुएं जैसे शैम्पू, सौंदर्य प्रसाधन के सामान, साबुन, डिटर्जेंट, टूथपेस्ट और…
साबुन-शैम्पू से लेकर खाद्य पदार्थ तक, कहां नहीं है पाम ऑयल!
लक्षद्वीप की कोरल रीफ या प्रवाल समूह को समुद्र का पानी गर्म होने की वजह से सफेद होते हुए देखा जा रहा है। इसका मतलब प्रवाल भित्तियां बीमार हो रही हैं। तस्वीर- रोहन आर्थर

[कॉमेंट्री] लक्षद्वीप के अनकहे संकट

लक्षद्वीप में चल रहे ताजा घटनाक्रमों के बीच एक ऐसी त्रासदी धीरे-धीरे इस जगह को प्रभावित कर रही है, जिससे आने वाले दिनों में इन द्वीपों पर मनुष्य का निवास…
लक्षद्वीप की कोरल रीफ या प्रवाल समूह को समुद्र का पानी गर्म होने की वजह से सफेद होते हुए देखा जा रहा है। इसका मतलब प्रवाल भित्तियां बीमार हो रही हैं। तस्वीर- रोहन आर्थर
हीरे की खातिर दाव पर बुंदेलखंड का बकस्वाहा जंगल, विरोध में आए लोग

[वीडियो] हीरे की खातिर दाव पर बुंदेलखंड का बकस्वाहा जंगल, विरोध में आए लोग

मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले का बकस्वाहा जंगल चर्चा में है। इसकी वजह है इस जंगल की कोख में दबा करोड़ों कैरेट हीरा और इसके खनन का हो रहा विरोध।…
हीरे की खातिर दाव पर बुंदेलखंड का बकस्वाहा जंगल, विरोध में आए लोग
पीएम किसान योजना: क्या झारखंड के आदिवासी किसानों के साथ हो रहा सौतेला व्यवहार?

पीएम किसान योजना: क्या झारखंड के आदिवासी किसानों के साथ हो रहा सौतेला व्यवहार?

झारखंड के खूंटी जिले के रहने वाले साठ वर्षीय समसोन तोपनो को जब खबर मिली की केंद्र सरकार अब किसानों को हर साल 6,000 रुपये देगी तो उन्हें लगा कि…
पीएम किसान योजना: क्या झारखंड के आदिवासी किसानों के साथ हो रहा सौतेला व्यवहार?
छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले में हुए गोंड महासम्मेलन में समाज के प्रतिनिधियों ने शव को न जलाने का फैसला लिया। तस्वीर- सर्व आदिवासी समाज, छत्तीसगढ़/फेसबुक

हरियाली बचाने के वास्ते गोंड समुदाय ने शवों को नहीं जलाने का लिया फैसला

देश के सबसे बड़े आदिवासी समाज के तौर पर गोंड समुदाय की पहचान होती है। हाल ही में इस समुदाय ने शवों के अंतिम संस्कार की अपनी वर्षों पुरानी परंपरा…
छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले में हुए गोंड महासम्मेलन में समाज के प्रतिनिधियों ने शव को न जलाने का फैसला लिया। तस्वीर- सर्व आदिवासी समाज, छत्तीसगढ़/फेसबुक
सुभद्रा सान्याल और गीता मंडल सुंदरबन के सतजेलिया गांव में रहती हैं। दोनों महिलाओं के पति बाघ के हमले में मारे गए। गीता आज भी जंगल के उत्पादों से जीवन यापन करती हैं, लेकिन सुभद्रा के मन मस्तिष्क पर बाघ के हमले का गहरा असर हुआ और अब वह जंगल जाने से डरती हैं। तस्वीर- कार्तिक चंद्रमौली/मोंगाबे

सुंदरबन में भ्रांति और अनदेखी के बीच पिसती ‘बाघ विधवाएं’

रॉयल बंगाल टाइगर के घर सुंदरबन के सतजेलिया गांव में सूरज ढलते ही लोगों के बीच अजीब सी मायूसी छा जाती है। मछली और केकड़ा पकड़कर पेट पालने वाली गीता…
सुभद्रा सान्याल और गीता मंडल सुंदरबन के सतजेलिया गांव में रहती हैं। दोनों महिलाओं के पति बाघ के हमले में मारे गए। गीता आज भी जंगल के उत्पादों से जीवन यापन करती हैं, लेकिन सुभद्रा के मन मस्तिष्क पर बाघ के हमले का गहरा असर हुआ और अब वह जंगल जाने से डरती हैं। तस्वीर- कार्तिक चंद्रमौली/मोंगाबे
सुंदरबन

सुंदरबनः कहानी एक शिकारी के हृदयपरिवर्तन की, हत्या छोड़ अपनाई संरक्षण की राह

यह कहानी एक शिकारी के हृदय परिवर्तन की है। ऐसा हृदय परिवर्तन जिसने पूरे गांव को अपना पुश्तैनी शिकार का काम छोड़, वन्यजीवों के संरक्षण के लिए प्रेरित किया। यह…
सुंदरबन
पन्ना के हीरा खदान में रामप्यारे मिट्टी से सने कंकड़ों को धो रहे हैं। इन्हीं कंकड़ों में से हीरा मिलने की संभावना रहती है। तस्वीर- मनीष चंद्र मिश्र/मोंगाबे-हिन्दी

[वीडियो] पन्ना के हीरा खदानों से निकलती बेरोजगारी, गरीबी और कुपोषण

जनवरी में पड़ने वाली सर्दी की एक ढलती हुई शाम जब कुसुम बाई (बदला हुआ नाम) अपने कच्चे घर के बाहर चारपाई पर बैठी हुई हैं। पन्ना जिले के कल्याणपुर…
पन्ना के हीरा खदान में रामप्यारे मिट्टी से सने कंकड़ों को धो रहे हैं। इन्हीं कंकड़ों में से हीरा मिलने की संभावना रहती है। तस्वीर- मनीष चंद्र मिश्र/मोंगाबे-हिन्दी
बीज का संग्रहण, उसकी रोपाई और खेती के अन्य मौके डोंगरिया के लिए त्योहार की तरह हैं।

प्रकृति पूजक डोंगरिया आदिवासी सहेज रहे बीजों की विरासत, बदलते मौसम में भी बरकरार पैदावार

नियमगिरि पहाड़ियों पर सुंदर और घने वनों के बीच आधुनिकता से दूर एक आदिवासी समाज रहता है। अपने में अनोखे इस समाज को डोंगरिया कोंध के नाम से जानते हैं।…
बीज का संग्रहण, उसकी रोपाई और खेती के अन्य मौके डोंगरिया के लिए त्योहार की तरह हैं।