सिर पर पगड़ी की तरह बांधा गया गमछा। तन ढकने के लिए हाफ बांह की टी-शर्ट और हाफ-पैंट। दर्द से बचाव के लिए घुटनों पर पट्टी। कमर में बंधी हुई बांस की टोकरी और उसमें हसिया, कुल्हाडी और बांस से बने कई दूसरे औजार।
ये हैं पश्चिम बंगाल में बगुरान जलपाई गांव के शिवली (sapper) अजय शीट। शिवली ऐसे लोग होते हैं जो पारंपरिक रूप से खजूर के पेड़ से रस इकट्ठा करने, उससे अलग-अलग तरह का गुड़ बनाकर अपनी आजीविका चलाते हैं।
पूर्वी मेदिनीपुर जिले के अजय अपने परिवार में दूसरी पीढ़ी के और शायद आखिरी शिवली हैं, क्योंकि जलवायु परिवर्तन से ठंड के घटते दिन, खजूर के पेड़ में घटते रस और जमीन पर बदलते हालात के बाद उनके बेटे अनिमेष ने यह काम करने से साफ मना कर दिया है।
घटती ठंड
पश्चिम बंगाल में खजूर के पेड़ से रस जमा करने की सदियों पुरानी परंपरा है। इसे ग्रामीण अर्थव्यवस्था की धुरी माना जाता है। बंगाल के पूर्ब और पश्चिमी मेदिनीपुर, बांकुड़ा, नादिया, पुरुलिया और झारग्राम जैसे जिलों में भूमिहीन, आदिवासी और गरीब समुदाय इस रस से गुड़ बनाने का काम करते हैं।
वैसे दुनिया भर में खजूर के पेड़ की तीस से ज्यादा प्रजातियां हैं, लेकिन बंगाल में सेंधी या सिल्वर डेट पाम (फीनिक्स सिल्वेस्ट्रिस) की बहुतायत है। इस पेड़ से ठंड में रस जमा किया जाता है और 14 डिग्री तापमान आदर्श माना जाता है।
लेकिन, पिछले कुल सालों में ठंड की अवधि घटने से खजूर रस पर निर्भर समुदायों की आमदनी घट रही है। पहले यह काम पांच महीनों तक चलता था, लेकिन अब यह ढाई से तीन महीने तक सिमट गया है। 28 सालों से यह काम कर रहे अजय अपने अनुभव से बताते हैं, “मेरे पिताजी ने 55 साल तक यह काम किया। उनके समय में काली पूजा के बाद गुड़ बनना शुरू हो जाता था और होली तक बनता था। इस साल हमने 25 नवंबर से काम शुरू किया है और जनवरी के बाद रस मिलना बंद हो जाएगा।”

दरअसल, खजूर गुड़ के लिए 14 डिग्री सेल्सियस से कम का तापमान सबसे अच्छा माना जाता है। लेकिन, पिछले कुछ सालों में तापमान के पैटर्न में बदलाव से रस मिलने के दिन घट गए हैं। अगर मेदिनीपुर में इस साल दिसंबर के आंकड़ों को देखें, तो ज्यादातर दिनों में न्यूनतम तापमान 14 डिग्री या उससे ज्यादा रहा है।
खजूर गुड़ बनाने से जुड़े पारंपरिक ज्ञान पर रिसर्च करने वाले कूचबिहार स्थित उत्तर बंग कृषि विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर देबब्रत बासु ने मोंगाबे-हिंदी से कहा, “पेड़ में रस पूरा हो, इसके लिए रात का तापमान 15-16 डिग्री से ज्यादा नहीं होना चाहिए। अगर रात का तापमान 20 डिग्री से ऊपर रहता है, तो रस सूख जाएगा।”
बासु अपने पुश्तैनी जिला नादिया का उदाहरण भी देते हैं, जहां पहले खजूर के कई पेड़ थे। वह कहते हैं कि पहले मार्च तक रस मिलता था, लकिन अब जनवरी तक ही मिलता है।
बगुरान जलपाई गांव से कुछ दूरी पर गुड़ बनाने वाले राजू दास भी मानते हैं कि गर्मी बढ़ने पर गाछ में रस आना बंद हो जाता है।
घटता रस
तापमान में बदलाव का असर खजूर रस पर भी दिख रहा है। पहले एक पेड़ से 15 से 20 किलो तक रस मिल जाता था, लेकिन अब यह घटकर 5 से 15 किलो तक रह गया है।
अजय ने 27 दिसंबर को 18 पेड़ में 15-15 किलो वाले डिब्बे लगाए थे। 28 दिसंबर को सुबह रस उतारने के बाद उन्होंने मोंगाबे-हिंदी से कहा, “आज इन पेड़ से पांच डिब्बे यानी 75 लीटर रस मिला है। मेरे पिता के समय में इतने ही पेड़ से दोगुना रस मिलता था।” अजय का मानना है कि रस प्राकृतिक वजहों से कम हो रहा है।
अजय की बात से बासु भी सहमत हैं। वह कहते हैं कि चूंकि खजूर के पेड़ तालाब, बेकार पड़ी जमीन या खेत की मेड़ पर होते हैं, इसलिए इस पर शोध लगभग नहीं के बराबर है। जब जलवायु परिवर्तन का असर सबकुछ पर दिख रहा है, तो खजूर का पेड़ भी इससे अछूता नहीं है।
हालांकि, बासु खेती के तौर-तरीकों में आए बदलाव को भी इससे जोड़कर देखते हैं। वह कहते हैं, “पहले बंगाल में सिंचाई की सुविधा नहीं होने से सिर्फ एक फसल ही होती थी। गरीबों के लिए यह रस दूसरी फसल की तरह था। अब सिंचाई की सुविधा बढ़ने और भूजल के अधिकाधिक उपयोग से तीन-तीन तक फसलें होने लगी हैं। दूसरी तरफ, खजूर के पेड़ को बहुत पानी चाहिए। इसलिए पानी कम मिलने से रस कम बनता है।” उनके मुताबिक इसकी जड़ें जमीन में बहुत नीचे तक नहीं जाती हैं, इसलिए इसे पानी कम मिल पाता है।
बगुरान से 20 किलोमीटर दूर कोंटाई बाजार में 57 साल से परचून की दुकान चलाने वाले उत्तम कुमार बेरा कहते हैं, “पहले हमारे बाजार में 50 से 60 लोग गुड़ बेचने आते थे। अब इनकी संख्या घटकर दो-तीन पर आ गई है। इससे पता चलता है कि रस धीरे-धीरे खत्म हो रहा है।”
रस कम होने के साथ-साथ इसमें गुड़ भी कम बैठने लगा है। अजय का दावा है कि जहां पहले 10 किलो रस में दो किलो तक गुड़ बन जाता था, वहीं अब डेढ़ किलो तक ही बन पाता है।
घटते पेड़
रस के साथ खजूर के पेड़ भी कम हो रहे हैं। दरअसल, यह पेड़ प्राकृतिक रूप से ही उगता है। इसे कोई नहीं लगाता है। इसलिए जितने पेड़ सूख रहे हैं, उतने उग नहीं रहे हैं।
अजय के बेटे अनिमेष शीट इसकी एक और वजह बताते हैं, “रस जमा करने के अलावा इसकी दूसरी उपयोगिता नहीं है। सामान्य खजूर के विपरीत इन पेड़ में लगने वाले फल में 90 फीसदी बीज होता है और गुद्दा महज 10 फीसदी होता है। इसलिए कोई इसे खाता नहीं है। पहले इनके पत्तों या तनों का इस्तेमाल झोपड़ी या दूसरी चीजें बनाने में होता था। अब ये चीजें भी धीरे-धीरे खत्म हो रही है। इसलिए इसे नजरअंदाज किया जाता है।”
बासु पेड़ों के खत्म होने के लिए खपरैल के भट्टों को भी जिम्मेदार ठहराते हैं, “इसकी लकड़ी धीरे-धीरे जलती है और कम आंच देती है जो खपरैल बनाने के लिए बहुत अच्छी होती है। इस वजह से भी कई लोग इसकी लकड़ी बेच देते हैं।”

अजय कहते हैं कि खजूर रस जमा करने का एक तरीका है जो पेड़ को स्वस्थ रखने के लिए जरूरी है। वह पुरखों से विरासत में मिले ज्ञान का हवाला देते हुए बताते हैं, “हम एक पेड़ से लगातार दो दिन तक रस लेते हैं और फिर उसे चार दिन छोड़ देते हैं, ताकि वह खुद को स्वस्थ रख सके। लेकिन, आजकल लोग चौबीसों घंटे रस जमा करते रहते हैं जिससे पेड़ खुद को स्वस्थ नहीं रख पाते और सूख जाते हैं।”
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बंगाल में 2021 में आए तूफान के दौरान भी कई पेड़ गिर गए। इस तूफान के बाद इलाके में बनने वाले नोलेन गुड़ में नमकीनपन भी बढ़ गया है। अजय कहते हैं कि बंगाल की खाड़ी से बेहद नजदीक होने से यहां गुड़ में हमेशा नमकीनपन रहा है, लेकिन तूफान से पहले इसका पता नहीं चलता था। अब यह चीज पता चलने लगी है।
हालांकि, बासु इसे अलग नजरिए से देखते हैं, “इसका कारण भी जलवायु परिवर्तन है। पूर्वी मेदिनीपुर बंगाल की खाड़ी से बहुत नजदीक है। यहां नदियों में खारापन बढ़ गया है जो मिट्टी में आ गया है। दूसरी बात यह है कि बंगाल के हर इलाके में खजूर गुड़ का अपना अलहदा स्वाद है।”
कम होते शिवली
खजूर गुड़ बनाने में मेहनत बहुत लगती है और यह लगभग दो दिन का काम है। पहले दिन दोपहर के बाद पेड़ से रस जमा करने के लिए उसके सबसे ऊपर डिब्बा लगाना पड़ता है। दूसरे दिन पौ-फटने से पहले इसे उतारा जाता है।
फिर इसे छानकर बड़े से चौकोर परात में चूल्हे पर चढ़ाया जाता है और धीमी आंच में कम से कम दो-तीन घंटे तक पकाया जाता है। पकने के बाद इसे उतारा जात है और फिर अलग-अलग तरह का गुड़ बनाया जाता है।
इसलिए युवा इस काम से दूरी बना रहे हैं। अनिमेष कहते हैं, “मैं कॉलेज छात्र हूं, लेकिन मेरे मन में शिवली बनने का विचार कभी नहीं आया। यह बहुत मेहनत का काम है। एक दिन पहले से काम में लग जाना पड़ता है। मार्केट में मांग है, लेकिन मेहनत के हिसाब से कीमत नहीं मिल पाती है। इस कमाई से पूरे साल गुजारा मुश्किल है।“
अजय पेड़ पर चढ़ने और उतरने दोनों को कला और तकनीक का संगम बताते हैं। वह कहते हैं कि आपको 20 फीट तक ऊपर चढ़ना होता है, इसलिए अगर आप पारंगत नहीं हैं, तो चढ़ते या उतरते समय हादसा होने का डर बना रहता है। उतरते समय जोखिम ज्यादा रहता है, क्योंकि आपके कमर में रस से भरा डिब्बा बंधा होता है।
बढ़ती मिलावट
खजूर रस से नोलेन गुड़ यानी झोला गुड़, दानेदार गुड़ और पटाली या ढेला गुड़ बनाया जाता है। खास पकवान जैसे खीर बनाने के लिए नोलेन गुड़ का इस्तेमाल किया जाता है। मकर संक्राति आते ही इस गुड़ की मांग कई गुना बढ़ जाती है।
लेकिन, जमीन पर हो रहे बदलावों से खजूर गुड़ के स्वाद में भी थोड़ा-बहुत बदलाव आया है। कोंटाई बाजार में रुचिरा मिष्ठा भंडार के मैनेजर सुब्रत गोराई कहते हैं, “”गुड़ की क्वालिटी और स्वाद में फर्क आया है। पहले गुड़ की क्वालिटी अच्छी थी। मिलावट से बचने के लिए हमलोग सामने गुड़ बनवाते हैं।“
रांची में 1951 में शुरू हुए उदय मिष्ठान भंडार के संचालक रविशंकर गुइन कहते हैं, “पहले जो गुड़ आता था, वह एकदम शुद्ध होता था। अब इसमें कुछ लोग चीनी भी मिला रहे हैं।“
दरअसल, हाल के समय में इस गुड़ में चीनी की मिलावट बड़ी समस्या बनकर उभरी है। मीडियो रिपोर्ट के मुताबिक बाजार में बिकने वाला तीन-चौथाई से ज्यादा गुड़ मिलावटी होता है। बासु कहते हैं कि रस से गुड़ बनाते समय इसमें चीनी मिलाई जाती है जो 50 रुपए किलो आती है और इससे यह बहुत सस्ता हो जाता है। वह कहते हैं कि आज खजूर का शुद्ध गुड़ 600 से 700 रुपए किलो से कम नहीं मिलेगा।

हालांकि, गुईन इससे सहमत नहीं है कि उत्पादन घट रहा है। वह कहते हैं, “पहले खजूर गुड़ बनाना महज कुछ इलाकों तक सीमित था। लेकिन अब बांकुड़ा जैसे जिलों से लोग आते हैं, पेड़ किराए पर लेते हैं और गुड़ बनाते हैं। उदाहरण के तौर पर झारखंड के टुंडी जंगल को लिया जा सकता है। इसलिए उत्पादन पहले से ज्यादा है।”
इन सबके बीच खजूर गुड़ को लेकर बंगाल के लोगों का प्यार कम नहीं हुआ है। सर्दियों में इससे खीर, पीठा, रसगुल्ला, पका हुआ रसगुल्ला, संदेश जैसी मुंह में पानी लाने वाली मिठाइयां बनती हैं।
नेशनल फेडरेशन ऑफ स्मॉल स्केल फिशवर्कर्स के पूर्वी जोन के उपाध्यक्ष और बगुरान जलपाई के निवासी देबाशीष श्यामल कहते हैं, “बंगाल में गुड़ का महत्व हमेशा से रहा है। नोलेन गुड़ तो खुशी और उत्सव का प्रतीक है। यह गुड़ सर्दियों में ही आता है और इस मौसम में बंगाल में कई परब मनाए जाते हैं। इसलिए यह खान-पान का अहम हिस्सा है।”
बैनर तस्वीरः पूर्ब मेदिनीपुर के बगुरान जलपाई गांव के अजय शीट जो शिवली हैं। शिवली ऐसे लोगों को कहा जाता है जो खजूर के पेड़ से रस जमा करके उससे गुड़ बनाने का काम करते हैं। अब शिवली की संख्या भी घट रही है। तस्वीर – विमल राय/मोगाबे



