साल 2019 में लद्दाख के जम्मू और कश्मीर से अलग होकर एक अलग केंद्र शासित प्रदेश बनने के कुछ समय बाद यहां के लोगों को यह महसूस हुआ कि उनसे जुड़े फैसलों में उनके जनप्रतिनिधिओं की बजाए केंद्र सरकार और प्रशासनिक अधिकारिओं का प्रभाव ज़्यादा है। इसी के चलते लद्दाख में लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाले दो बड़े संगठन लेह एपेक्स बॉडी और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस, जो कभी राजनीतिक आधार पर एक-दूसरे के विरोधी थे, ने लद्दाख के लिए पूर्ण राज्य के दर्जे और छठी अनुसूची की मांग को आगे बढ़ाया।
इन मांगों को लेकर केंद्र सरकार और इन दोनों संगठनों के बीच कई चरणों की बातचीत हो चुकी है। हालांकि, इस मुद्दे पर अभी तक कोई सहमति नहीं बन पाई है।
“आर्टिकल 370 के जाने के बाद हमें लगा कि संविधान की छठी अनुसूची हमें जमीनी स्तर पर स्वायत्तता देती है और लोगों को अपने निर्णय लेने के लिए सशक्त बनाकर यहां की ज़मीन और संस्कृति की रक्षा करती है। चूँकि, अब हम जम्मू कश्मीर राज्य का हिस्सा भी नहीं हैं और न हमारे पास विधानसभा की ताकत है। ऐसे में अगर हम लद्दाख से सम्बंधित कोई भी कानून बनाना चाहें तो वो हम बना ही नहीं सकते हैं। छठी अनुसूची में हमें ये सभी चीजें मिलती हैं,” लेह अपैक्स बॉडी के को-चेयरमैन सेरिंग दोरजे ने मोंगाबे हिंदी को बताया।

भारतीय संविधान की छठी अनुसूची का उद्देश्य देश की जनजातियों, उनकी जनसंख्या और उनके हितों की रक्षा करना है। इसके लिए संवैधानिक रूप से एक विशेष प्रकार की स्वायत्त शासन संरचना अनिवार्य की गई है। यह अनुसूची स्वायत्त परिषदों की स्थापना करती है और इन परिषदों को व्यापक विधायी, न्यायिक, कार्यकारी और वित्तीय शक्तियां प्रदान करती है।
फिलहाल, छठी अनुसूची के अंतर्गत कुल 10 स्वायत्त परिषदें हैं, जिनमें असम, मेघालय और मिजोरम में तीन-तीन और त्रिपुरा में एक परिषद शामिल है।
यह जिला एवं क्षेत्रीय परिषदें प्रदेश के राज्यपाल की सहमति से कुछ कानून बनाने के लिए सशक्त की गई हैं। इनमें भूमि उपयोग के अधिकारों संबंधित कानून, वनों (आरक्षित वन के अलावा) के प्रबंधन सम्बन्धी कानून, कृषि के लिए नहर या जलमार्ग के उपयोग का कानून, खेती संबंधी कानून, एवं पुलिस और सार्वजनिक स्वास्थ्य एवं स्वच्छता सम्बन्धी कानून शामिल हैं।
इस मांग की शुरुआत और इसके पीछे के कारणों के बारे में बताते हुए दोरजे कहते हैं, “लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाने के ठीक बाद केंद्र सरकार ने हमसे सिक्स्थ शेड्यूल देने का वादा किया था। उसके बाद हमने इसे स्टडी करना शुरू किया। हमें लगा की ये शेड्यूल हमारे लिए सही है क्योंकि हमारे यहाँ 97% आबादी आदिवासी है। सिक्स्थ शेड्यूल के लिए जो भी जरूरतें हैं, जैसे आदिवासी आबादी, पहाड़ी इलाका, और बिखरी हुई आबादी, वो सभी लद्दाख पूरी करता है।”
लद्दाख के लोगों की यह मांग अपनी संस्कृति, पर्यावरण, आजीविका, और जमीन से जुड़े मामलों में स्वायत्ता और निर्णायक भूमिका को लेकर है। यह सभी मुद्दे एक दुसरे से जुड़े हुए हैं और यहां के पहाड़, ग्लेशियर, पठार, जल संसाधनों, जंगलों और वन्यजीवों पर गहरा प्रभाव डालते हैं।
हालांकि, इस संवैधानिक सुरक्षा की माँग का लद्दाख के प्रत्येक क्षेत्र के लिए क्या अर्थ है, और हर क्षेत्र इसके माध्यम से क्या संरक्षित करने की आशा रखता है, यह बताता है कि इस मुद्दे पर लद्दाख की एकता उसकी अनेक विविधताओं में किस प्रकार मिली हुई है।

लेह: प्रशासन और अर्थव्यवस्था का बोझ
लेह में छठी अनुसूची की मांग इस सवाल से जुड़ी है कि इस क्षेत्र के भविष्य का फैसला कौन करेगा। लद्दाख के प्रशासनिक और आर्थिक केंद्र के रूप में, लेह लंबे समय से राजनीतिक मसलों का केंद्र रहा है। केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद, दिल्ली और पुडुचेरी की तरह विधानसभा की मौजूदगी की जरुरत को सबसे पहले यहीं महसूस किया गया था।
इस संवैधानिक सुरक्षा के न होने की स्थिति की बात करते हुए दोरजे बाहरी हस्तक्षेप को सबसे बड़ी समस्या मानते हैं। “अगर बहुत सारे लोग बाहर से आकर यहाँ बस जाएँ तो लद्दाख का डेमोग्राफिक सिचुएशन बदल जायेगा और हम अपने ही इलाके में माइनॉरिटी में चले जायेंगे,” उन्होंने कहा।
लद्दाख के GDP में पर्यटन का एक बहुत बड़ा योगदान है और इस पर्यटन का एक बड़ा भाग लेह से आता है। ऐसे में इस मांग का असर लद्दाख की अर्थव्यवस्था के इस सबसे बड़े स्तम्ब पर भी पड़ेगा।
“टूरिज्म को भी इससे सेफ़गार्ड मिलता है क्योंकि सिक्स्थ शेड्यूल में ट्रेड और कॉमर्स को ऑटोनोमस कौंसिल रेगुलेट करता है। अभी लदाख में जितने भी होटल्स और गेस्ट हाउस हैं वो स्थानीय लोगों के हैं लेकिन अभी कुछ लोग अपने बिज़नेस बाहर के कुछ बड़े होटल चेन्स को दे रहे हैं। ट्रांसपोर्ट भी लद्दाख के लिए एक बड़ा सेक्टर है। टूरिज्म के आलावा सेना में भी यहां की गाड़ियां काम आती हैं लेकिन बहार के लोगों के इस सेक्टर में आने के कारण वो भी हमारे हाथ से जाने का डर है। सिक्स्थ शेड्यूल इन सभी को काफी हद तक प्रोटेक्ट करता है।”

कारगिल: धर्म से परे जनजातीय पहचान
यदि लेह की छठी अनुसूची लागू करने की मांग प्रशासन और पर्यावरण संबंधी चिंताओं से उपजी है, तो कारगिल की समस्यांए कुछ अलग हैं। साल 2019 में लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद से, कारगिल के कई लोगों को लगता है कि निर्णय लेने में उनकी भूमिका लगातार कम होती जा रही है। हालांकि, छठी अनुसूची की मांग में लेह और कारगिल दोनों का साझा प्रतिनिधित्व होने के कारण कारगिल के लोगों का राजनीतिक और प्रशासनिक मामलों में हाशिए पर धकेल दिए जाने का डर पिछले कुछ दिनों में दूर हुआ है।
“सिक्स्थ शेड्यूल की मांग लेह और कारगिल की एक साझा मांग है। वैसे तो हमें इस मांग को लेह और कारगिल को अलग करके देखने की ज़रुरत नहीं है। लेकिन, ज़्यादातर हमें ऐसा दिखाई देता है कि लेह के हवाले से सिक्स्थ शेड्यूल की बातें ज़्यादा आ रही हैं और कारगिल से कम आ रही हैं, लेकिन ऐसा नहीं है,” मुस्तफा हाजी ने बताया।
मुस्तफा बताते हैं कि कारगिल के लोगों की ये मांग उनकी आदिवासी पहचान, गाँवों की साझा जमीनों, और प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के लिए है। इसके लिए उन्हें अपने इलाकों में होने वाले बदलावों और विकास परियोजनाओं के निर्णयों में शामिल होने और अपना मत रखने के अधिकार की सख्त ज़रूरत है।
“कारगिल में जहाँ से मैं आता हूँ उस इलाके में हमारे चारागाह हैं यानी गाँव वाले सब मिलकर अपने भेड़ बकरियों को वहां ले जाते हैं। ऐसे जगह-जगह पर लोगों ने निर्णय लिया है कि यहां से घास लाएंगे, हमारे जानवर क्या खाएंगे, हमारे लोगों को क्या चाहिए। अगर सिक्स्थ शेड्यूल नहीं होगा तो ये कॉमन लैंड, स्टेट का लैंड हो जायेगे। ये स्टेट लैंड UT गवर्नमेंट किसी को भी देगा उसकी मर्ज़ी है। कल वो बोलेंगे की हमारे पहाड़ जहाँ हमारे सेंटीमेंट्स जुड़े हैं, हमारे चरागाह हैं वहां से बोलेंगे की हम रोड लेकर जायेंगे। अगर आपके पास सिक्स्थ शेड्यूल नहीं है तो सरकार मनमर्जी से बिना जरुरत के कुछ भी कर सकती है,” उन्होंने बताया।

लद्दाख के दो जिले, लेह और कारगिल को अधिकतर धार्मिक आधार पर भी अलग-अलग देखा जाता है। लेह जिले में जहां बौद्ध धर्म को मानने वाले अधिक हैं, वहीं कारगिल जिले की बड़ी आबादी शिया मुसलमानों की है जो जिले की जनसंख्या का करीब 77% हैं।
लेकिन, मुस्तफा का मानना है कि कारगिल की इस मांग को उसकी मुस्लिम जनसँख्या और धार्मिक पहचान के नजरिए से देखना सही नहीं होगा। “हमारी मांग हमारी आदिवासी पहचान को लेकर है। ऐसे में हम बुद्धिस्ट हों या मुस्लिम हों हमारी मांग धर्म के आधार पर नहीं है। अगर कोई कॉर्पोरेट यहाँ पर आएगा तो वो ये नहीं देखेगा कि ये बुद्धिस्ट की ज़मीन है या मुस्लिम की ज़मीन है,” उन्होंने कहा।
“लद्दाख अपनी वाइल्डलाइफ के लिए जाना जाता है। ट्राइबल आइडेंटिटी का मतलब सिर्फ लोग नहीं है, इस आइडेंटिटी का मतलब हमारे चरागाह, रास्ते, नदी, नहर, चश्मे और वाइल्डलाइफ है। अगर सिक्स्थ शेड्यूल नहीं होगा तो हमारी इन चीज़ों को खतरा है,” उन्होंने आगे बताया।
मुस्तफा ने ये भी बताया कि फ़िलहाल हर छोटे से छोटे सरकारी काम के लिए कारगिल के लोगों को लेह जाना पड़ता है। यहां के मौसम और प्राकृतिक बनावट की वजह से ये सफर कठिन और लम्बा होता है, सर्दियों में ये समस्या और बढ़ जाती है। सिक्स्थ शेड्यूल की वजह से जिलों के निर्णय बहुत हद तक जिले की स्वायत्त सरकारें ही लेंगी और लोगों को प्रशासनिक कामों के लिए लेह जाने की जरुरत नहीं पड़ेगी।
चांगथांग में भविष्य नहीं, वर्तमान है चुनौतीपूर्ण
लेह और कारगिल के मुद्दे जो निकट भविष्य को चिंताजनक बनाते हैं, उनसे कहीं दूर लद्दाख के कुछ इलाकों की चिंताएं वर्तमान में दिखाई देती हैं। अपनी घाटियों, खानाबदोश जीवन, जैव विविधता और विश्व प्रसिद्ध पश्मीना के लिए मशहूर चांगथांग का इलाका उनसे में एक क्षेत्र है। पूर्वी लद्दाख में चीन की सीमा के पास का चांगथांग के इलाके के रहवासी अपने मवेशिओं के साथ खानाबदोशों का जीवन जीते हैं और जलवायु परिवर्तन से सबसे ज़्यादा प्रभावित समुदायों में से एक हैं।
“पूर्वी लद्दाख की आजीविका मुख्य रूप से मवेशिओं पर निर्भर है। यहां के लोगों को चांगपा जनजाति कहा जाता है जो मवेशिओं के साथ घूमते हैं,” चांगथांग की चुशुल घाटी के चुशुल गांव के पूर्व पार्षद कोंचक स्टैंज़िन ने बताया।
वर्तमान में चांगथांग लेह जिले के अंतर्गत आता है। हालाँकि, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने अगस्त 2024 में पांच नए जिले बनाने की घोषणा की थी जिनके गठन का काम अभी पूरा नहीं हुआ है। ज़ांस्कर, शम, नुब्रा, द्रास और चांगथांग ये नए जिले होंगे।

“हमारे यहां के जितने भी इलाके हैं वो चराई के इलाके हैं। ये चराई के इलाके इसलिए ज़रूरी हैं क्योंकि हमें अपने मवेशियों को एक ही दिन में 20-30 किलोमीटर के इलाके में लेकर जाना पड़ता हैं तब जाकर हमारे मवेशिओं को पेट भर चारा मिल पाता है। अगर हमारे इन चराई के इलाकों पर कोई प्रभाव पड़ता है तो उससे हमारे मवेशिओं पर प्रभाव पड़ेगा और उससे हमारी आजीविका पर। इस कारण से भी हमें सिक्स्थ शेड्यूल की जरूरत है,” स्टैंज़िन ने बताया।
स्टैंज़िन का कहना है कि लेह, नुब्रा या कारगिल के मुकाबले चांगथांग में जमीन की उपलब्धता काफी अधिक है। इस कारण से आने वाले समय में किसी भी विकास या औद्योगिक परियोजना के लिए यह इलाका पहली प्राथमिकता हो सकता है।
“अभी पूर्वी लद्दाख में एक 13 गीगावाट का सोलर पावर प्लांट लगाया जा रहा है। वो और कहीं पर नहीं लगाया जा सकता था। इस ही तरह बहुत से और भी डेवलपमेंट पूर्वी लद्दाख में होंगे। इसलिए हम चाहते हैं कि ऐसे जो भी डेवलपमेंट हो वो लोगों की सहमति से और उनके हित के लिए हों,” उन्होंने कहा।
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जलवायु परिवर्तन के कारण हो रहे बदलावों के बारे में बात करते हुए उन्होंने बताया कि पिछले कुछ सालों चांगपाओं द्वारा किये जाने वाले पशुपालन में कमी आई है। और ये कमी पिछले आठ या 10 सालों में काफी तेज़ हुई है। लद्दाख एक ठंडा रेगिस्तानी इलाका है जो अपनी पानी की ज़रूरतों के लिए बर्फ़बारी और ग्लेशियर पर निर्भर रहता है। पिछले कुछ सालों में बर्फ़बारी में आई कमी के चलते चांगथांग में मवेशिओं के लिए घास की उपलब्धता में कमी देखी गई है।
बहरहाल, लद्दाख के लोगों की इस संवैधानिक सुरक्षा की मांग का यहां के प्रत्येक क्षेत्र के लिए क्या अर्थ है, और हर क्षेत्र इसके माध्यम से क्या संरक्षित करने की आशा रखता है, यह बताता है कि इस मुद्दे पर लद्दाख की एकता उसकी अनेक विविधताओं में किस प्रकार मिली हुई है।
बैनर तस्वीरः पूर्वी लद्दाख के चांगथांग में चांगपा समुदाय के कैंप में पश्मीना बकरी। इस क्षेत्र में छठी अनुसूची की मांग पशुपालन आधारित जीवन और चरागाहों की रक्षा से जुड़ी है। तस्वीर- मनीष चंद्र मिश्र



