झालो देवी और उनके पति, बासु ओरांव, ने पांच साल तक हाइब्रिड धान उगाने की कोशिश की। नतीजा? कीटनाशकों का ज़्यादा इस्तेमाल, बढ़ी हुई लागत, और फसल में पोषक तत्वों की कमी। यह दोनों पति-पत्नी झारखंड के गुमला ज़िले के जाहुपकोकोटोली गांव के तीसरी पीढ़ी के ओरांव आदिवासी किसान हैं। राज्य के कई किसानों की तरह, उन्होंने भी आखिरकार एक फ़ैसला किया कि वे मॉडर्न हाइब्रिड को छोड़कर उस देसी चावल की खेती करेंगे जो उनके पुरखे पीढ़ियों से उगाते आ रहे थे।
“देखो ये चावल कितना बढ़िया है,” 64 साल की झालो देवी कहती हैं। झालो देवी जिस खेत में खड़ी होकर ये सब कुछ बताती हैं, उसकी तस्वीर आम-तौर पर धान के हरे-भरे खेतों से अलग है। सर्दियों की धूप में इस खेत की फसल काले हीरे की तरह चमक रही है। “यह हमारा देहाती धान (देशी धान), काला जीरा है।”
इसके कारण व्यावहारिक और गहरे दोनों हैं। साठ साल के बासु कहते हैं, “हाइब्रिड में बहुत सारी बीमारियाँ लगती हैं; वे कीटनाशकों के बिना नहीं उगते।” इसके विपरीत, उनका काला जीरा अच्छी पैदावार देता है, अच्छी कीमत पाता है, और उसे उर्वरक की ज़रूरत नहीं होती।
यह बदलाव सिर्फ़ परंपरा की वजह से नहीं है। यह जलवायु परिवर्तन और बढ़ती लागतों का एक सोचा समझा उपाय है। धान की देसी किस्में स्थानीय मुश्किलों का सामना करने के लिए विकसित हुई हैं। गुमला के कृषि विज्ञान केंद्र के साइंटिस्ट बृजेश पांडे बताते हैं, “उनमें पहले से ही प्रतिरोधक क्षमता होती है और उनमें अलग-अलग जीन होते हैं। सूखे, बाढ़ या कीड़ों के हमले के मामले में, ये किस्में हाइब्रिड से बेहतर काम करती हैं।” एग्रोइकोलॉजिस्ट देबल देब कहते हैं कि इन स्थानीय किस्मों में “अडैप्टेशन की कमाल की क्षमता” होती है, जो पीढ़ियों से यहां की मिट्टी, जलवायु और कीड़ों के हिसाब से बेहतर होती गई है।


ज़्यादा टिकाऊ है देसी धान
वे दोनों उन दिनों को याद करते हैं जब वे लाल और काले चावल की कई किस्में उगाते थे। झालो कहती हैं, “हमने एक बार नामरी नाम की एक किस्म उगाई, जो लाल थी, फिर कलमदानी, जो लाल थी, और करहनी, एक काला चावल जो विटामिन (न्यूट्रिशन) से भरपूर था।”
उन्होंने मेहिया, एक छोटी, सफेद दाने वाली किस्म, एक लाल दाने वाली किस्म, रामदी; और एक मीठा, काले दाने वाला चावल, गोपाल भोग भी उगाया। वह याद करती हैं, “पहले, हमारी फसल इतनी अच्छी होती थी कि तीन चटका (बांस का पारंपरिक अनाज रखने का सामान) अनाज से भर जाता था।” लेकिन समय के साथ, नई पीढ़ी ने खेती से दूरी बना ली। आज, झालो और बासु सात एकड़ में खेती करते हैं — छः एकड़ में देसी किस्म, काला जीरा और मेहिया, और एक एकड़ में हाइब्रिड धान।
“काले चावल का स्वाद बहुत अच्छा था। आज के हाइब्रिड चावल और पुरानी किस्मों में ज़मीन-आसमान का फ़र्क है,” वह कहती हैं। वह बताती हैं कि हाइब्रिड चावल जल्दी खराब हो जाते हैं। “अगर आप सुबह हाइब्रिड चावल पकाते हैं, तो यह शाम तक खराब हो जाएगा। लेकिन अगर आप काले चावल को पकाकर पानी में रखते हैं, तो यह तीन दिन बाद भी खराब नहीं होगा।” झालो ने करहनी के बीज भी संभालकर रखे हैं, यह एक काली किस्म है। उनका कहना है कि इस चावल में औषधीय गुण हैं। “हम इसे तभी खाते हैं जब कोई बीमार पड़ता है। यह डायबिटीज़ वाले लोगों और पीलिया जैसी बीमारियों में भी फ़ायदेमंद है,” वह आगे कहती हैं।

झालो अपने अनुभव से जो जानती हैं, वह साइंटिफिक डेटा से भी साबित होता है। चावल और गेहूं, जो भारत की रोज़ाना की ऊर्जा जरूरतों के 50% से ज़्यादा को पूरा करते हैं – पिछले 50 सालों में अपनी पोषण क्षमता का 45% तक खो चुके हैं। चावल में ज़िंक की मात्रा 33%, आयरन की मात्रा 27% कम हो गई है, और चिंता की बात यह है कि आर्सेनिक का लेवल 1,493% बढ़ गया है। इस रफ़्तार से, शोधकर्ताओं का अंदाज़ा है कि 2040 तक अनाज इंसानों के खाने के लिए पोषण के मामले में कमज़ोर हो सकते हैं।
ICAR-नेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट, कटक के प्रिंसिपल साइंटिस्ट लंबोदर बेहरा कहते हैं, “देशी धान का स्वाद हाइब्रिड किस्मों से बेहतर होता है।” “काले और लाल चावल में अक्सर एंटीऑक्सीडेंट और औषधीय गुण होते हैं। ये डायबिटीज वाले लोगों के लिए फायदेमंद हो सकते हैं, इनमें एंटी-इंफ्लेमेटरी कंपाउंड होते हैं और ये जोड़ों के दर्द में मदद कर सकते हैं। लाल या काला रंग जितना गहरा होगा, न्यूट्रिशन उतना ही ज़्यादा होगा; कुछ की खुशबू भी अच्छी होती है, बासमती से भी बेहतर।”
साल 2021 की एक स्टडी में पाया गया कि पारंपरिक काले चावल में, आमतौर पर खाए जाने वाले सफेद चावल की किस्मों की तुलना में ज़्यादा पोषक तत्व होते हैं, और इसमें ज़्यादा विटामिन, मिनरल, एंटीऑक्सीडेंट और औषधीय गुण होते हैं। झालो ने बासु को चिढ़ाते हुए कहा, “मैं उससे कहती हूँ कि सिर्फ़ देसी किस्में ही उगाए, लेकिन यह बूढ़ा आदमी सुनता नहीं है।” “लेकिन जब मैं उसे हाइब्रिड चावल देती हूँ, तो वह उसे नहीं खाता, और कहता है कि इसमें कोई स्वाद नहीं है।”
यह सिर्फ़ स्वाद और सेहत की बात नहीं है; काले धान की कीमत भी अच्छी मिलती है। बासु कहते हैं, “यह चावल बाज़ार में आसानी से ₹80-120 प्रति किलो बिक जाता है।” वह अपनी उपज लोहरदग्गा और बनारी के स्थानीय बाज़ारों में बेचते हैं। “हर कोई हमारे चावल को पसंद करता है और अक्सर त्योहारों और खास मौकों पर इसकी मांग करता है।”


मौसम की मार झेलने की क्षमता ज़्यादा
पिछले साल के मानसून में, झारखंड में लगभग 1,200 mm बारिश (जून-सितंबर) हुई जो सामान्य से 17% ज़्यादा है और 2001 के बाद तीसरी सबसे ज़्यादा है, जिससे पूरे राज्य में खरीफ की फसलों, खासकर धान और मक्का को नुकसान हुआ है।
लातेहार ज़िले के चोरकाखार गांव के 32-वर्षीय किसान दीनभरन नागेशिया, जो अपने 5.5 एकड़ में देसी धान उगाते हैं, बताते हैं कि लाल चावल सांपिया और काले चावल की किस्में करहनी, बागपंजारा, जीरा फूल और रानी कजरा जैसी पारंपरिक किस्में कभी उनके खाने में आम थीं। पिछले दशक में, कई गांववालों ने हाइब्रिड धान अपना लिया। लेकिन दीनभरन और उनके कुछ पड़ोसी जो देसी किस्मों पर ही टिके रहे, पिछले साल की बारिश में सही साबित हुए। वे कहते हैं, “जिन किसानों ने हाइब्रिड धान उगाया, उनकी फसल खराब हो गई, जबकि देसी किस्मों वाले किसानों की फसल अच्छी हुई।”
“हमने हाइब्रिड बीज खरीदा और तीन एकड़ में बोया। इस साल वे फेल हो गए,” उसी गांव के 42 साल के दासी किसान, जिन्होंने इस सीजन में धान पर ₹30,000 से ज़्यादा खर्च किए थे, बताते हैं। दो खेतों के बीच खड़े होकर, दीनभरन बताते हैं, “यह पारंपरिक धान बिना खाद के भी अच्छा हो रहा है। वह हाइब्रिड खेत? खत्म हो गया।”
झारखंड के लिए, देसी किस्मों की मज़बूती मायने रखती है। यह राज्य मौसम के बदलावों से बहुत ज़्यादा प्रभावित है और पिछले 25 सालों में 10 बार सूखा झेल चुका है। जैसे-जैसे मौसम में बदलाव बढ़ रहे हैं, दीनभरन जैसे किसान दिखा रहे हैं कि पुराने बीज नए बीजों की तुलना में ज़्यादा ज़िंदा रह सकते हैं। फिर भी, कई देसी किस्में पहले ही खत्म हो चुकी हैं। भारत के जाने-माने धान विशेषज्ञों में से एक, आर.एच. रिछारिया ने अपने करियर में लगभग 19,000 किस्मों को डॉक्यूमेंट और इकट्ठा किया, और अनुमान लगाया कि भारत में कभी धान की 2,00,000 किस्में थीं।

खनन वाले इलाकों के लिए वरदान
देसी किस्मों में न सिर्फ मौसम के हिसाब से ज़्यादा रेजिस्टेंस होता है, बल्कि उनमें खुद को ढालने की काबिलियत भी बहुत अच्छी होती है। काले चावल की ऐसी ही एक किस्म है गौड़ा धान, जो पाट इलाके में मिलती है। गौड़ा धान दक्षिणी गुमला जिले, जो छोटानागपुर पठार का हिस्सा है और ओपन-कास्ट बॉक्साइट खदानों से खराब हो गया है, में खूब उगता है। कुजाम गांव की 56 साल की सुखानी असुर कहती हैं, “हम कम से कम पांच पीढ़ियों से गौड़ा धान उगा रहे हैं।” वह असुर जनजाति से हैं, जिन्हें खास तौर पर कमजोर आदिवासी ग्रुप (PVTG) में रखा गया है।
गांव वाले सिर्फ़ खरीफ़ की फ़सल उगाते हैं; रबी की खेती नामुमकिन है। वह कहती हैं, “यहां पानी का कोई साधन नहीं है।” वहां के लोगों के लिए, गौड़ा धान का मतलब ज़िंदा रहना है।
हज़ारीबाग में ICAR–नेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट के साइंटिस्ट सोमनाथ रॉय कहते हैं, “हमें गौड़ा जीनोटाइप को बचाना होगा।” “वे सूखा और फ़ॉस्फ़ोरस की कमी झेल लेते हैं, जो एसिडिक माइनिंग मिट्टी में आम है। उनकी लंबी जड़ें गहरी परतों से फ़ॉस्फ़ोरस निकालती हैं।”
सुंदरबन की पारंपरिक चावल की किस्मों पर एक अध्ययन में पाया गया कि किसान कई स्थानीय किस्में उगाते हैं जो नमकीन मिट्टी के लिए सही हैं। लेकिन ये आजकल की ज़्यादा पैदावार वाली किस्मों से कम पैदावार देती हैं, इसलिए ज़्यादातर किसानों ने ज़्यादा पैदावार के लिए नई किस्मों की तरफ़ रुख किया।
फिर भी पुरानी किस्में बनी रहती हैं। वे नमक को अच्छी तरह झेल लेती हैं, और बाढ़ और तूफ़ान के दौरान फसलों को बचाती हैं। किसान भी उनके स्वाद को महत्व देते हैं, जो बचपन की याद दिलाता है। बीज की कोई कीमत नहीं होती — किसान उन्हें कटाई के बाद बचा लेते हैं। इन किस्मों को बहुत कम खाद या कीटनाशक की ज़रूरत होती है, जिससे लागत कम रहती है।

लातेहार ज़िले में पाट इलाके से करीब 50 km दूर विजयपुर है। इस गांव में सिर्फ़ देसी देहाती धान उगाया जाता है। पाट इलाके की तरह, यहां भी रबी के मौसम में पानी की कमी की वजह से कोई फ़सल नहीं उगाई जाती। लेकिन गांव के लोग सूखे का सामना करने का अपना तरीका अपनाते हैं। कुछ लोग साठी (60 दिन में उगने वाला, सूखे से बचने वाला चावल) और फकठी (70-90 दिन में देर से बोया जाने वाला) उगाते हैं। सैंतीस साल के किसान जोसेफ़ कुजूर कहते हैं, “ऊंचे खेतों या सूखे सालों में भी, साठी बोने पर अच्छी पैदावार देता है।”
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सोमनाथ रॉय बताते हैं, “पानी की कमी होने से पहले ही साठी अपना लाइफ साइकिल पूरा कर लेता है।” “अगर अगस्त के बीच तक बारिश नहीं होती है, तो किसान साठी या फकठी बाद में बोते हैं। यह फिर भी बच जाता है।” कुछ किस्में ज़्यादा बारिश में भी अच्छी तरह उगती हैं। जोसेफ कहते हैं, “करहनी ज़्यादा बारिश वाले निचले खेतों में अच्छी तरह उगता है।” “यह जल्दी पक जाता है और अच्छी पैदावार देता है।”
देसी धान ज़्यादा मज़बूत होता है और उसमें बीमारी लगने का खतरा कम होता है। जोसेफ कहते हैं, “तूफ़ान के बाद भी दाने नहीं गिरते।” “आप कटाई में एक हफ़्ता देर कर सकते हैं और फिर भी पूरी फसल पा सकते हैं। हाइब्रिड में वह मज़बूती नहीं होती। उनके बीज अगर गिर भी जाएं तो अंकुरित हो जाते हैं।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 11 दिसंबर, 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: जीरा फूल, काले चावल की एक किस्म का खेत। तस्वीर – अश्विनी कुमार शुक्ला।




