अगस्त 2023 में जब एवलिन नोंगक्सेह की नवजात बेटी को पीलिया हुआ, तो उनका छः सदस्यों का परिवार घबरा गया। तीस वर्षीय एवलिन ने दो हफ्ते पहले ही अपने तीसरे बच्चे को जन्म दिया था। वह तुरंत इलाज की उम्मीद में भारत के पूर्वोत्तर राज्य मेघालय के वेस्ट खासी हिल्स जिले में स्थित अपने गांव जैदो के ज्ञानाम्मा हेल्थ केयर सेंटर पहुंचीं।
लेकिन वहां पहुंचते ही उन्हें निराशा हाथ लगी। स्वास्थ्य केंद्र में बिजली नहीं थी, जिससे नवजात शिशुओं के पीलिया का इलाज करने वाली फोटोथेरेपी यूनिट बंद पड़ी थी। एवलिन उस समय को याद करते हुए कहती हैं, “मैं बहुत परेशान थी। बिजली नहीं थी और बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी। मुझे उस शाम बिना इलाज के ही घर लौटना पड़ा।”
अगली सुबह, स्वास्थ्य केंद्र की प्रशासक सहाय लिली ने सलाह दी कि जब तक पास के शहर नांगस्टोइन जाने के लिए किसी गाड़ी का इंतजाम नहीं हो जाता, तब तक बच्ची को सुबह की धूप में रखा जाए। नांगस्टोइन शहर वहां से महज 10 किलोमीटर दूर था, लेकिन तेज बारिश से सड़कें इतनी खराब हो चुकी थीं कि पहुंचने में करीब दो घंटे लग गए। आखिरकार नांगस्टोइन के अस्पताल में बच्ची का सही इलाज हुआ और वह ठीक हो सकी।
एवलिन बताती हैं, “हमारे गांव में बिजली जाना कोई नई बात नहीं है। सिर्फ मैं ही नहीं, कई माता-पिता ऐसी परेशानियों का सामना कर चुके हैं।” उनका यह अनुभव इस इलाके, जहां बार-बार बिजली कटौती से स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित होती रही हैं, के स्वास्थ्य कर्मियों और ग्रामीणों के लिए एक आम बात बन चुका था।

अंधेरे में डूबे स्वास्थ्य केंद्र
मेघालय के इस पहाड़ी और लगातार बारिश से प्रभावित इलाके में बिजली का बार-बार जाना एक आम बात रही है। इसकी मुख्य वजहें हैं, खराब मौसम के कारण बिजली के बुनियादी ढांचे को पहुंचने वाला नुकसान, दुर्गम इलाका और भारी बारिश का मुख्य रूप से जल-विद्युत प्रणाली पर पड़ने वाला असर। नतीजा यह हुआ कि यहां की स्वास्थ्य सेवाओं का कामकाज बुरी तरह प्रभावित होने लगा।
बिजली गुल होने के कारण स्वास्थ्यकर्मियों को मोमबत्ती की रोशनी में बच्चों की डिलीवरी करानी पड़ती थी। मेडिकल उपकरणों को स्टेरलाइज करने के लिए कोयले की आंच पर पानी उबालना पड़ता था और कई बार सुरक्षित इलाज संभव न होने पर मरीजों को वापस लौटाना पड़ता था। अक्सर रेफ्रिजरेटर बंद होने से वैक्सीन खराब हो जाते थे और आपातकालीन प्रक्रियाओं में या तो देरी होती थी या उन्हें पूरी तरह टालना पड़ता था।
तीन दशकों से अधिक का अनुभव रखने वाली नर्स लिली याद करते हुए बताती हैं, “रात में आने वाले मरीजों की जांच के लिए मेडिकल टीम को मोबाइल की टॉर्च और मोमबत्तियों का सहारा लेना पड़ता था। कई बार तो बच्चों की डिलीवरी घुप अंधेरे में कराई गई।
यह समस्या केवल कुछ दूर-दराज के छोटे केंद्रों तक ही सीमित नहीं थी। उप-स्वास्थ्य केंद्रों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर राज्य के बड़े अस्पतालों तक, सभी को अनिश्चित बिजली आपूर्ति के कारण संघर्ष करना पड़ता था।
लेकिन कोविड-19 महामारी के दौरान स्थितियों में सुधार आना शुरू हुआ।

सौर ऊर्जा को मिला बढ़ावा
जब पूरा देश और दुनिया कोविड-19 महामारी के संकट से जूझ रही थी, तब मेघालय भी सीमित संसाधनों, कुशल स्वास्थ्य कर्मियों की कमी और अपनी कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था के बीच एक बड़े आपातकाल का सामना कर रहा था।
महामारी के दौरान अस्पतालों में मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ी, तो मेघालय सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के साथ मिलकर बिजली की अनिश्चित सप्लाई की भरपाई के लिए एक भरोसेमंद बैकअप व्यवस्था बनाने की योजना बनाई।
मेघालय में एनएचएम की स्टेट प्रोग्राम मैनेजर इबामनलंग नोंगरी कहती हैं, “यह सचमुच जिंदगी और मौत का सवाल था। स्वास्थ्य सेवाओं के संचालन के लिए बिना रुकावट बिजली मिलना बेहद जरूरी है, क्योंकि हम इंसानी जिंदगी से जुड़े काम कर रहे होते हैं।”
उस समय, कोयले से बनने वाली बिजली पर निर्भरता कम करने के लिए विभिन्न क्षेत्रों, खासकर स्वास्थ्य सुविधाओं में नवीकरणीय ऊर्जा को अपनाने पर जोर दिया जा रहा था। ऐसे में, सौर ऊर्जा एक आसान और व्यावहारिक समाधान के रूप में सामने आई। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत के 87% अस्पताल मुख्य रूप से ग्रिड की बिजली पर ही निर्भर हैं।
इसके तुरंत बाद, एनएचएम और मेघालय मुख्यमंत्री सोलर मिशन (सीएमएसएम) के तहत राज्य सरकार ने सेल्को फाउंडेशन के साथ मिलकर स्वास्थ्य केंद्रों में सोलर पावर सिस्टम लगाना शुरू किया। सेल्को फाउंडेशन एक गैर-लाभकारी संगठन है, जो विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा प्रणालियों के जरिए टिकाऊ विकास के लिए काम करता है।


वर्ष 2023 में शुरू किया गया मुख्यमंत्री सोलर मिशन पांच वर्षों के लिए ₹500 करोड़ की एक योजना है। इस मिशन के तहत अस्पतालों, स्वास्थ्य सुविधाओं और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को सोलर हाइब्रिड सिस्टम के लिए 50 से 70 प्रतिशत तक सब्सिडी दी जाती है, ताकि राज्य के बिजली संकट को खत्म किया जा सके, चौबीसों घंटे बिजली की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके और स्वास्थ्य सेवाएं निर्बाध रूप से चल सकें।
एनएचएम की अधिकारी नोंगरी बताती हैं, “पहले चरण में री-भोई और ईस्ट गारो हिल्स जिलों से शुरुआत करते हुए लगभग 100 स्वास्थ्य केंद्रों को सौर ऊर्जा से जोड़ा गया था।”
तब से लेकर अब तक इस कार्यक्रम का विस्तार राज्य के 530 से भी अधिक स्वास्थ्य केंद्रों तक हो चुका है, जिनमें मेघालय के लगभग सभी उप-स्वास्थ्य केंद्र और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र शामिल हैं। अब योजना इस क्षेत्र में नए बने उप-स्वास्थ्य केंद्रों को भी जल्द से जल्द सौर ऊर्जा से लैस करने की है।
अब अंधेरे में नहीं होती डिलीवरी
ज्ञानाम्मा हेल्थकेयर सेंटर, जहां से बिजली न होने के कारण एक बार एवलिन नोंगक्सेह को बिना इलाज के लौटना पड़ा था, अब सौर ऊर्जा की बदौलत चौबीसों घंटे काम कर रहा है। मेघालय सरकार के सौर ऊर्जा अभियान के तहत फरवरी 2025 में यहां क्रिश्चियन हेल्थ एसोसिएशन ऑफ इंडिया और शोध संस्थान वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट (डब्ल्यूआरआई) इंडिया के सहयोग से सोलर पैनल लगाए गए थे।
इसके तुरंत बाद, इस स्वास्थ्य केंद्र के कामकाज में बड़ा बदलाव आ गया। यह केंद्र लगभग 4,000 से 5,000 की कुल आबादी वाले आठ से दस गांवों को स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान करता है।
नर्स लिली बताती हैं, “अब रात के समय बच्चों की डिलीवरी तेज रोशनी में कराई जाती है।” बिना किसी रुकावट के चलने वाले विशेष आइस-लाइन्ड रेफ्रिजरेटरों में वैक्सीन पूरी तरह सुरक्षित रखी जाती हैं। उन्होंने बताया कि अब मरीजों को नेबुलाइजेशन, खून की जांच, फोटोथेरेपी और लैब से जुड़े काम दिन या रात के किसी भी समय किए जा सकते हैं।
वह आगे कहती हैं, “जब पूरे गांव में अंधेरा छाया होता है, तब भी यह स्वास्थ्य केंद्र रोशनी से जगमगाता रहता है।” इसके अलावा, टीकाकरण अभियान और स्वास्थ्य जांच शिविर, जो पहले कम रोशनी और अनिश्चित बिजली वाले छोटे हॉलों में लगते थे, अब इसी ज्ञानाम्मा केंद्र में आयोजित किए जा रहे हैं।

पूरे मेघालय में सौर ऊर्जा का विस्तार
ईस्ट खासी हिल्स जिले के मावलिंगंगाड उप-स्वास्थ्य केंद्र में भी ऐसे ही बड़े बदलाव देखने को मिले हैं। कम्युनिटी हेल्थ ऑफिसर ओनिका वंकर वर्ष 2020 से यहां कार्यरत हैं।
वह बताती हैं कि जब उन्होंने काम शुरू किया था, तब यहां सोलर सिस्टम नहीं था। उमियम बांध के पावर स्टेशन से आने वाली बिजली बार-बार कटती थी। ओनिका कहती हैं, “जब भी बांध में पानी कम होता, बिजली की सप्लाई बंद कर दी जाती थी।” इससे डिलीवरी कराना बहुत मुश्किल हो जाता था। वह याद करते हुए बताती हैं, “हमें मोमबत्तियों और मोबाइल की टॉर्च के सहारे काम करना पड़ता था। यहां तक कि नवजात बच्चे को गर्मी देने के लिए और मेडिकल उपकरणों को स्टरलाइज करने के लिए कोयला तक जलाना पड़ता था।”
लेकिन वर्ष 2023 में जब स्वास्थ्य केंद्र की टीन की छत पर सोलर पैनल लगाए गए, तो स्थितियां बदल गईं। ओनिका बताती हैं, “ओपीडी में आने वाले मरीजों की संख्या जो पहले रोजाना केवल 10 से 20 होती थी, अब बढ़कर 40 से 50 हो गई है। अब हमारे पास चौबीसों घंटे बिजली रहती है, जिससे रात के समय काम करना सुरक्षित और आसान हो गया है। इस वजह से अब इस स्वास्थ्य केंद्र पर स्थानीय लोगों का भरोसा भी काफी बढ़ गया है।
फंडिंग और निगरानी की जरूरत
ऑक्सीजन कंसंट्रेटर, स्टेरिलाइज़र, रेडिएंट वार्मर और वैक्सीन फ्रिज जैसे उपकरण जो पहले बिजली के अभाव में बेकार पड़े रहते थे, अब बिना किसी रुकावट के चल रहे हैं। ज्ञानाम्मा केंद्र में 22.6 किलोवाट-घंटे की बैटरी स्टोरेज के साथ 6 किलोवाट का सोलर प्लांट लगाया गया है, जो बादलों वाले दिनों में भी तीन दिनों तक का पावर बैकअप देता है।
डब्ल्यूआरआई इंडिया के प्रोग्राम मैनेजर ऋषिकेश मिश्रा कहते हैं, “हमारा उद्देश्य यह देखना था कि यह स्वास्थ्य केंद्र नेट-जीरो बिजली की तरफ कैसे बढ़ सकता है।” बता दें कि डब्ल्यूआरआई इंडिया संस्था तकनीकी मदद, आंकड़े और नीतिगत मार्गदर्शन देकर मेघालय जैसे दुर्गम इलाकों में सौर ऊर्जा के विस्तार के लिए काम कर रही है।
आज सौर ऊर्जा इस केंद्र की रोशनी और कूलिंग से लेकर जरूरी मेडिकल उपकरणों को चलाने तक की लगभग सभी जरूरतों को पूरा कर रही है। मिश्रा बताते हैं, “पिछले तीन महीनों में यहां सामान्य ग्रिड बिजली का इस्तेमाल घटकर शून्य हो गया है।”
हालाँकि, वह यह भी कहते हैं, “सौर ऊर्जा को मौजूदा बिजली व्यवस्था को खत्म करने के लिए नहीं, बल्कि उसके सहयोगी के रूप में देखा जाना चाहिए।” उनका मानना है कि जरूरत के हिसाब से सिस्टम का डिजाइन, समय पर फंडिंग और निगरानी ही इन सोलर प्रणालियों को लंबे समय तक टिकाऊ बनाए रख सकती है।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 31 मार्च 2026 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: मेघालय के एक स्वास्थ्य केंद्र की छत पर लगे सोलर पैनल। तस्वीर: प्रतीक चक्रवर्ती




