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प्रदूषण की गिरफ्त में पंजाब की सतलज नदी, सफाई अभियान में हो रही लेटलतीफी

  • सतलज नदी के प्रदूषित पानी की वजह से पंजाब और राजस्थान के हजारों लोग प्रभावित हैं। इसकी रोकथाम के लिए पंजाब सरकार ने वर्ष 2020 तक जरूरी कदम उठाने का वादा किया था।
  • सतलज नदी में सीवेज का न मिले इसलिए लुधियाना और जालंधर में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) और सामान्य अपशिष्ट उपचार संयंत्र (सीईटीपी) बनाया जाना है। इसे तैयार होने में अभी दो साल का वक्त लगेगा।
  • एनजीटी से किये गए वादे के बाद भी जमीन पर अब कुछ नहीं हुआ। काम में देरी को देखते हुए इलाके के समाजसेवी मुख्यमंत्री से मिलने की योजना बना रहे हैं।

कभी सतलज नदी के किनारे मेला लगा करता था पर आज यहां सिर्फ बर्बादी के मंजर दिखता है, कहते हैं गुरुचरण सिंह जो पंजाब के गौंसपुर गांव के पूर्व सरपंच रह चुके हैं।

अब सतलज नदी शहरों से निकलने वाले सीवेज, फैक्ट्रीयों से निकलने वाले केमिकल को अपने अंदर समाहित करती है। कभी इस नदी का पानी निर्मल हुआ करता था अब काला हुआ करता है। इसका पानी तो खैर लोगों ने बहुत पहले पीना बंद कर दिया था बावजूद इसके बीमारियों से छुटकारा नहीं है। पंजाब के कुछ क्षेत्र में लोग 400 फीट गहरे बोरिंग कराते हैं फिर भी यह हालत है।

मामला राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) तक पहुंचा। पंजाब सरकार को फटकार भी सुननी पड़ी। राज्य सरकार ने वादा किया था कि सतलज नदी की इस गंदगी की मुख्य वजह- बुड्ढा नाला की सफाई 2020 तक कर दी जाएगी। समय गुजर गया पर तक नतीजा अब तक सिफर ही रहा है।    

सतलज नदी तिब्बत से निकलकर हिमाचल प्रदेश को पार करते हुए लुधियाना में प्रवेश करती है। यहां इस सतलज नदी की रंगत बदल जाती है। इसके पीछे तमाम वजहें हैं। इनमें एक बुड्ढा नाला जो लुधियाना के मानेवाल गांव में नदी में आकार मिलता है। यह नाला यूं तो बरसात का पानी सतलज तक लाता रहा है, लेकिन अब इसमें फैक्ट्रियों से निकला लाखों लीटर प्रदूषित पानी बहता है।

पंजाब सरकार की रिपोर्ट कहती है कि लुधियाना में आने से पहले पानी का प्रदूषण स्तर बी कैटेगरी का रहता है। यह प्रदूषण का हल्का स्तर दर्शाता है। हालांकि, राज्य में प्रवेश करने के बाद रोपड़ नामक स्थान पर इसका स्तर ई श्रेणी में तब्दील हो जाता है। इसका तात्पर्य है कि पानी इतना प्रदूषित हो जाता है कि इंसानों के उपयोग लायक नहीं रह जाता। पीना तो दूर, सिंचाई तक के लिए भी उपयोग नहीं किया जा सकता।

लुधियाना के ताजपुर इंडस्ट्रियल एरिया से होकर गुजरता बुड्ढा नाला। इस नाले के जरिए प्रदूषित पानी सतलज नदी में मिलता है। तस्वीर- विवेक गुप्ता
लुधियाना के ताजपुर इंडस्ट्रियल एरिया से होकर गुजरता बुड्ढा नाला। इस नाले के जरिए प्रदूषित पानी सतलज नदी में मिलता है। तस्वीर- विवेक गुप्ता

सफाई की योजना कागजों पर है मौजूद

पंजाब सरकार के सतलज एक्शन प्लान का मुख्य केंद्र बुड्ढा नाला की सफाई है। वर्ष 2019 में यह कार्य योजना एनजीटी की सख्ती के बाद सामने आई थी। वर्ष 2018 में एनजीटी ने राज्य सरकार पर 50 करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया था। इस कार्य योजना के तहत वर्ष 2020 तक नाले को साफ कर देना था। हालांकि, अब तक इस काम में कोई खास सफलता नहीं मिली है।

नाले में बहाया गया प्रदूषित जल सीधे नदी में न मिले इसके लिए सरकार ने दो नए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) और वाटरवेस्ट प्लांट लगाने की योजना बनाई थी। इस प्लांट की क्षमता 28.5 करोड़ लीटर प्रति दिन प्रस्तावित है। इसके अलावा, चार एसटीपी का जीर्णोद्धार भी करना है जिनकी क्षमता 40 करोड़ लीटर प्रति दिन की है।

बुड्ढा नाला की सफाई में 500 करोड़ रुपए की लागत की योजना की शुरुआत महज चार महीने पहले ही शुरु की गयी है। इसलिए ये काम पूरा होने में वर्ष 2023 की पहली तिमाही तक का समय लगना संभावित है। योजना में आ रही कई तरह की रुकावटों की वजह से इसका समय पर पूरा होना मुश्किल प्रतीत होता है।

घरेलु मलजल के अलावा बुड्ढा नाला में कपड़ा उद्योग से निकला प्रदूषित पानी भी बहाया जाता है। लुधियाना कपड़ा उद्योग का एक बड़ा केंद्र है और नाले के आसपास 250 से अधिक रंगाई वाले कारखाने लगे हैं। इनमें से तकरीबन 10 करोड़ लीटर प्रतिदिन पानी नाले में बहता है।

हालांकि, इन उद्योगों से निकले गंदे पानी की सफाई कर नाले में बहाने की एक कोशिश हुई थी। वर्ष 2017 में नौ करोड़ लीटर प्रतिदिन क्षमता का एक जल उपचार केंद्र लगाया जाना था। वर्ष 2019 तक यह काम हो जाना था पर लेटलतीफी की वजह से इस काम में काफी समय लगा। अब एनजीटी की सख्ती के बाद अब यह प्लांट बनकर तैयार हो गया है।

पर अभी भी इस प्लांट ने काम करना शुरु नहीं किया है। क्योंकि यहां बिजली नहीं है। दूसरा मलजल उपचार केंद्र के तैयार होने में करीब एक साल का समय लगना है। ऐसा बताया जा रहा है।

लुधियाना के रंगाई उद्योग के प्रतिनिधि राहुल वर्मा ने मोंगाबे-हिन्दी से बताया कि ये लोग कोशिश में है कि जल्द से जल्द बिजली की सुविधा बहाल हो।

“हम उम्मीद कर रहे हैं कि प्रदूषित पानी को साफ करने वाला केंद्र जल्दी शुरू हो जाए। जून तक इसके चालू होने की उम्मीद है। इसके बाद दूसरा केंद्र भी जल्दी तैयार हो जाएगा,” उन्होंने बताया।

लुधियाना में रंगाई कारखानों के पास अपशिष्ट उपचार केंद्र बनाया जा रहा है। काम में देरी की वजह से इसे अभी चालू होने में समय लगेगा। तस्वीर- विवेक गुप्ता
लुधियाना में रंगाई कारखानों के पास अपशिष्ट उपचार केंद्र बनाया जा रहा है। काम में देरी की वजह से इसे अभी चालू होने में समय लगने वाला है। तस्वीर- विवेक गुप्ता

कहां से आता है सतलज में प्रदूषण

बुड्ढा नाला सतलज में प्रदूषित जल लाने का एक बड़ा स्रोत है। इसके अतिरिक्त अन्य स्रोत भी हैं जो इस नदी में गंदगी प्रवाहित कर रहे हैं। दूसरी बरसाती नदियां जैसे चिट्टी बेई, काला संघियन नाला का भी सतलज को प्रदूषित करने में अहम भूमिका है।

लुधियाना के बाद नदी का पानी आगे भी ई श्रेणी का ही रहता है। जालंधर में गिद्दरपिंडी गांव के पास चिट्टी बेई नदी मिलती है। चिट्टी बेई नदी से होते हुए जालंधर के चमड़ा उद्योग से निकलने वाला केमिकल और अन्य अपशिष्ट आगे जाकर सतलज में समाहित हो जाता है।

इस नदी पर बने ट्रीटमेंट प्लांट पर 29 करोड़ रुपये खर्च कर इसे बेहतर बनाने की योजना है। इस बाबत सरकार ने करीब 6 महीने पहले एक टेंडर भी जारी किया था पर किसी ने उसमें रुचि नहीं दिखाई।

पंजाब लेदर गुड्स फेडरेशन, जालंधर के सचिव अजय शर्मा के मुताबिक चमड़ा उद्योग से जुड़े लोग ही मलजल उपचारित करने वाले संयंत्र को दुरुस्त करने की योजना बना रहे हैं। 

जालंधर में रहने वाले समाजिक कार्यकर्ता कुलविंदर सिंह का कहना है कि चिट्टी बेई नदी का पानी कोविड-19 की वजह से लगाए गए लॉकडाउन के दौरान साफ हो गया था। क्योंकि इस दौरान इलाके की तमाम फैक्ट्रीयां बंद पड़ी थीं।

“लॉकडाउन खत्म होने के बाद उद्योग-धंधे पुनः शुरू हुए और चिट्टी बेई नदी फिर से गंदी हो गई। फैक्ट्री से निकलने वाले केमिकल की वजह से यहां की आबो-हवा का काफी नुकसान होता है। पर्यावरण पर दुष्प्रभाव पड़ने के बावजूद सरकार इस तरफ ध्यान नहीं दे रही है,” सिंह ने कहा।

बुड्ढा नाला और चिट्टी बेई नदी के अलावा ऐसे दर्जनों नाले हैं जिससे मार्फत मल-जल बहकर सतलज नदी में आता है।

इन नालों में घरेलू कचरा शामिल है जो कि घरों से निकलकर नालों के जरिए नदी तक जाता है। इस स्थिति को बेहतर करने के लिए 101 एसटीपी की जरूरत होगी। इसमें से 69 एसटीपी शहरी क्षेत्र में लगाने होंगे जिसकी जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासन पर है। इसके अलावा कई ऐसे नाले हैं जिनपर पेय जल, स्वच्छता और ग्रामीण विकास विभाग को काम करना है।


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क्यों हो रही है देरी

सरकार की तरफ से प्राप्त जानकारी के मुताबिक 43 एसटीपी पर काम शुरू हो गया है। करीब 10 और प्लांट हैं जिनपर अभी योजना स्तर पर ही काम चल रहा है। इसके अलावा, नौ प्लांट का टेंडर जारी किया गया है।

पर्यावरणविद् और एनजीटी के द्वारा स्थापित मॉनीटरिंग कमेटी के सदस्य संत बलवीर सिंह सीचेवाल ने मोंगाबे-हिन्दी से बातचीत में माना कि उम्मीद के मुताबिक काम नहीं हुआ है।

“चिट्टी बेई, काला संघियन का पानी लॉकडाउन के दौरान साफ दिखने लगा था। इसकी वजह फैक्ट्रियों का बंद होना है,” उन्होंने कहा।

कमेटी नदी की सफाई की स्थिति पर एक रिपोर्ट एनजीटी को सौंपेगी। “देखते हैं एनजीटी क्या फैसला लेती है,” सीचेवाल कहते हैं।

पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव करुणेश गर्ग कहते हैं कि कई मामलों में देरी पैसों की कमी की वजह से हुई। कुछ मामलों में योजना के स्तर पर काफी समय लग गया।

“आने वाले दो वर्ष में सतलज के पानी में काफी परिवर्तन आएगा। हमें उम्मीद है कि लुधियाना और जालंधर शहर से निकलने वाले प्रदूषण को कम करने में सफलता मिलेगी, जिससे नदी की हालत में काफी सुधार आएगा,” उन्होंने बताया।

प्रदूषित सतलज से इंसानी आबादी प्रभावित

वर्ष 2014 में इंसानों पर सतलज के प्रदूषण का प्रभाव आंकने के लिए एक अध्ययन हुआ। इसके परिणामों को वर्ल्ड जर्नल ऑफ फार्मास्युटिकल रिसर्च में प्रकाशित हुए। अध्ययन में पाया गया कि बुड्ढा नाला, बैई और काला संघियन नाले से सटे इलाके के भूजल में पारा, सीसा, क्रोमियम, कैडमियम और अन्य हैवी मेटल की मात्रा सीमा से अधिक है। 

अध्ययन में हैवी मेटल और रसायन जानवरों को चारे, सब्जियों, दूध, मूत्र और खून में भी पाया गया।

अध्ययन में शामिल स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान संस्थान (पीजीआई), चंडीगढ़ के चिकित्सकों के मुताबिक प्रदूषित पानी से गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल, पानी से संबंधित, आंख, त्वचा और हड्डियों के रोग की आशंका बढ़ जाती है। चिकित्सक जमीनी स्तर पर वर्ष 2005 से 2007 तक इलाके में जांच करने के बाद इस नतीजे पर पहुंचे।

यह है लुधियाना का मानेवाल गांव जहां सतलज नदी में बुड्ढा नाला मिलता है। इस स्थान पर पानी के दो अलग-अलग रंग दिखते हैं। तस्वीर- विवेक गुप्ता
यह है लुधियाना का मानेवाल गांव जहां सतलज नदी में बुड्ढा नाला मिलता है। इस स्थान पर पानी के दो अलग-अलग रंग दिखते हैं। तस्वीर- विवेक गुप्ता

नरोहा पंजाब मंच नामक संस्था के गुरप्रीत सिंह चंदबाजा कहते हैं कि यह अध्ययन पुराना जरूर है लेकिन आज भी प्रासंगिक है।

“सतलज और इन नालों से लगे किसी भी गांव में आप जाओ, आपका वहां लोगों में चर्म रोग, पेट की बीमारियां और कैंसर की शिकायत खूब मिलेगी,” वह कहते हैं।

“हम जल्दी ही केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के मंत्री और वरिष्ठ पदाधिकारियों से मिलकर जमीनी सच्चाई बताएंगे और नदी को साफ करने में उनकी मदद मांगेंगे,” चांदबाजा कहते हैं।

बुड्ढा नाला के किनारे बसे गौंसपुर गांव के पूर्व सरपंच गुरुचरण सिंह कहते हैं, “नदी का गंदा पानी भूजल तक पहुंच गया है। लोग 400 मीटर भीतर से पानी निकालते हैं लेकिन तब भी बिना फिल्टर के उसे पीना मुश्किल है।”

एक दूसरे ग्रामीण मनदीप सिंह ने कहा कि किसान इसी गंदे पानी से फसलों की सिंचाई करते हैं, जिससे बीमारियां फैल रही हैं। जानवर भी यही पानी पीते हैं।

सतलज नदी फिरोजपुर जिले के हरिके में ब्यास नदी से मिलती है। यहां से पानी इंदिरा गांधी नहर के द्वारा राजस्थान पहुंचता है।

राजस्थान में पानी के मुद्दे पर काम करने वाले रमजान अली कहते हैं कि राजस्थान में कई लोग प्रदूषित पानी पीने को मजबूर हैं। इसकी वजह से उन्हें कई बीमारियां हो रहीं हैं।  

“पंजाब सरकार ने एनजीटी से वादा किया था कि एसटीपी और सीईटीपी बनाने का काम 31 मार्च 2021 से पहले कर लिया जाएगा। पर ऐसा हुआ नहीं। हम एनजीटी और केंद्रीय जल संसाधन मंत्री तक अपनी बात पहुंचाएंगे,” अली कहते हैं।

 

बैनर तस्वीरः पंजाब के स्थानीय किसान नाले के गंदे पानी से खेतों की सिंचाई करने को मजबूर हैं। इससे उनकी फसल भी खराब हो जाती है। प्रदूषित पानी से इलाके के लोगों का स्वास्थ्य खराब हो रहा है। तस्वीर- विवेक गुप्ता

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