Site icon Mongabay हिन्दी

रामसर साईट की दौड़ में पीछे छूटते बिहार के बड़े वेटलैंड्स, मानव निर्मित नागी-नकटी झील दावेदारी में आगे

चकैया गांव के किसान, जिनका कहना है कि बारिश के महीने में यह इलाका पानी में डूब जाता है। तस्वीर- राहुल सिंह/मोंगाबे

चकैया गांव के किसान, जिनका कहना है कि बारिश के महीने में यह इलाका पानी में डूब जाता है। तस्वीर- राहुल सिंह/मोंगाबे

  • बिहार ने अपने पांच वेटलैंड के लिए रामसर साइट का दर्जा की मांग करने से कदम पीछे खींच लिए हैं। इसमें बिहार के दो बड़े वेटलैंड बरैला व कुशेश्वरस्थान शामिल हैं। फिलहाल दो मानव निर्मित वेटलैंड नागी और नकटी को रामसर साइट का टैग दिलाने के लिए बिहार मशक्कत कर रहा है।
  • इसरो ने बिहार में कुल 21998 छोटे-बड़े वेटलैंड चिह्नित किए हैं। इनमें 133 वेटलैंड ऐसे हैं जो 100 हेक्टेयर से बड़े हैं और 17582 वेटलैंड ऐसे हैं जो ढाई हेक्टेयर से कम के हैं। बिहार के चार प्रतिशत भूभाग को वेटलैंड कवर करता है।
  • बिहार में वेटलैंड में पोस्ट मानूसन से प्री मानसून के बीच ओपन वाटर में 34 प्रतिशत तक की कमी आ जाती है। जल संपदा से संपन्न इस राज्य में वेटलैंड संरक्षण में विभिन्न हितधारकों के बीच टकराव, खर-पतवार होना व गाद जमा होना, पक्षी का अवैध शिकार, संरक्षण कार्य के लिए पैसों के पर्याप्त आवंटन की कमी प्रमुख वजहें हैं।

मई के आखिरी दिनों में बिहार की सबसे बड़ी झीलों या वेटलैंड (आर्द्र भूमि) में से एक बरैला ताल में जलस्रोत की तलाश करना काफी मशक्कत भरा काम था। बिहार के वैशाली जिले में स्थित बरैला ताल को उसके नाम के अनुरूप ताल के स्वरूप में तलाशने के लिए यह संवाददाता घंटों इस गांव से उस गांव भटकता रहा और लोगों से सवाल करता रहा कि यह झील कहां दिखेगी, पानी कहां से नजर आएगा और नाव खेते या मछली पकड़ते मल्लाह कहां दिखेंगे। इन सवालों के जवाब में लोग यह कहते – थोड़ा और आगे जाइए, अगले गांव से दिखेगा, तीन किमी और दूर जाना होगा! हालाँकि, घंटों भटकने और बरैला ताल के केंद्र में पहुंच जाने के बाद भी कहीं पानी नजर नहीं आया। पास स्थित धार्मिक स्थल जिमचधाम के पास एक दुकानदार ने बताया कि पानी थोड़ा आगे से दिखता है, लेकिन नरकट (खर-पतवार) बहुत है और अभी गर्मी भी बहुत है, इसलिए आपको नहीं दिखेगा।

बरैला में फैली यह खर-पतवार ही वो सबसे बड़ी वजह है जिसके कारण बिहार सरकार ने प्रदेश की दूसरी सबसे बड़ी झील होने के बावजूद भी इस झील का नाम रामसर साइट के प्रस्ताव  में शामिल नहीं किया। 

भारत में वर्तमान में 75 रामसर साइट हैं, लेकिन बेगूसराय जिले में स्थित कांवर झील बिहार की एकमात्र रामसर साइट है। क्षेत्रफल की दृष्टि से दरभंगा के कुशेश्वरस्थान (2921.43 हेक्टेयर) के बाद कांवर झील (2677 हेक्टेयर) और बरैला ताल (1625.34 हेक्टेयर) प्रदेश के दो सबसे बड़े और महत्त्वपूर्ण वेटलैंड हैं। 

हालांकि, बिहार सरकार द्वारा रामसर साइट के लिए “दावेदारी पेश करने के संकल्प” के लिहाज से कुशेश्वरस्थान कांवर व बरैला के बाद तीसरे नंबर पर आता है।

वैशाली जिले का बरैला ताल का दृश्य, जहां खर-पतवार की वजह से पानी थम नहीं पाता। तस्वीर- राहुल सिंह/मोंगाबे
वैशाली जिले का बरैला ताल का दृश्य, जहां खर-पतवार की वजह से पानी थम नहीं पाता। तस्वीर- राहुल सिंह/मोंगाबे

जनवरी 2022 में बिहार राज्य आर्द्र भूमि प्राधिकरण (बिहार स्टेट वेटलैंड ऑथिरिटी) की हुई दूसरी बैठक में पांच वेटलैंड को रामसर साइट का दर्जा देने के लिए दावा करने का प्रस्ताव पारित किया गया था। इसके लिए बरैला के 1204 हेक्टेयर, कुशेश्वरस्थान के 863 हेक्टेयर, गोगा बिल के 137 हेक्टेयर, नागी डैम के 192 हेक्टेयर और नकटी डैम के 333 हेक्टेयर क्षेत्र को चिह्नित किया गया। 

जुलाई 2023 को हुई तीसरी बैठक में उदयपुर झील (पश्चिम चंपारण), विक्रमशीला डॉलफिन आश्रयणी (भागलपुर), गोगाबिल (कटिहार) और गोकुल जलाशय (बक्सर) को रामसर साइट घोषित करने के लिए कार्रवाई शुरू करने का संकल्प लिया गया।

हालांकि, जमीनी हालात की वजह से बिहार अपने आर्द्र भूमि प्राधिकरण की दूसरी बैठक के संकल्प के अनुरूप सभी पांच झीलों के लिए रामसर साइट के टैग की दावेदारी नहीं कर सका है।

अगले रामसर साइट टैग के लिए बिहार की उम्मीदें फिलहाल मानव निर्मित दो वेटलैंड नागी और नकटी पक्षी विहार से ही जुड़ी हैं जो जमुई जिले में स्थित हैं। बिहार में वेटलैंड को लेकर विभिन्न हितधारकों में टकराव, पक्षियों का शिकार, किसानों का वेटलैंड क्षेत्र के आसपास कृषि पर जोर, वेटलैंड प्रबंधन के लिए धन का अभाव, वेटलैंड के संरक्षण व उसे व्यवस्थित करने में प्रमुख अवरोध हैं।

बिहार के प्रधान मुख्य वन संरक्षक (क्लाइमेट चेंज एंड वेटलैंड) एन जवाहर बाबू ने मोंगाबे हिंदी से बातचीत में कहा, “बरैला और कुशेश्वरस्थान अभी रामसर साइट के पैरामीटर पर फीट नहीं बैठते हैं, हम लोगों ने दो वेटलैंड नागी और नकटी को रामसर साइट का दर्जा देने का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा है। अबतक हमने बिहार के 60 वेटलैंड को टेकअप कर उसकी जानकारी केंद्र सरकार की वेबसाइट पर लोड कर दी है।”

हालांकि, केंद्र सरकार की वेबसाइट के डैशबोर्ड पर अभी बिहार के 20 वेटलैंड की ही जानकारी दिखती है। केंद्र की वेबसाइट पर बिहार के जिन वेटलैंड के के हेल्थकार्ड को अपलोड किया गया उनका क्षेत्रफल 12350.23 हेक्टेयर है।

वेटलैंड के मामले में कितना संपन्न है बिहार

इसरो के द्वारा 2006-07 में किए गए रिमोट सेंसिंग डाटा आधारित सर्वेक्षण के आधार पर 2010 में प्रकाशित नेशनल वेटलैंड एलटस: बिहार में बिहार में 4,03,209 हेक्टेयर का क्षेत्र वेटलैंड के अंतर्गत चिह्नित किया गया। यह बिहार के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 4.4 प्रतिशत है। इस सर्वेक्षण में 4,416 वेटलैंड चिह्नित किए गए और इसके अलावा  17,582 ऐसे वेटलैंड को चिह्नित किया गया, जिनका आकार 2.5 हेक्टेयर से कम है। 

जमुई जिले के नकटी वेटलैंड का एक दृश्य। तस्वीर- राहुल सिंह/मोंगाबे
जमुई जिले के नकटी वेटलैंड का एक दृश्य। तस्वीर- राहुल सिंह/मोंगाबे
जमुई जिले का नागी वेटलैंड। तस्वीर- राहुल सिंह/मोंगाबे
जमुई जिले का नागी वेटलैंड। तस्वीर- राहुल सिंह/मोंगाबे

साल 2020 में बिहार वेटलैंड ऑथिरिटी की पहली बैठक में वेटलैंड के संरक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण निर्णय यह लिया गया कि वेटलैंड की जमीन को सांख्यिकी एवं भूमि सुधार एवं राजस्व विभाग के दस्तावेज में आर्द्रभूमि के रूप में ही वर्गीकृत किया जाएगा। इससे पहले इसे बेकार-अनुपयोगी भूमि के रूप में वगीकृत किया जाता था और खेती या कृषि उत्पादन प्रणालियों को बढ़ावा दिया जाता था। इस बैठक में शहरी वेटलैंड का जीर्णाेद्धार किए जाने का सुझाव भी विशेषज्ञों द्वारा दिया गया ताकि बाढ़ नियंत्रण में मदद मिले।

बरैला ताल के साथ क्या दिक्कते हैं?

स्थानीय लोगों के अनुसार, बरैला ताल में पानी आसपास की कई नदियों से आता है, लेकिन उसका ठहराव नहीं होता। पातेपुर प्रखंड के चकैया गांव के निवासी राकेश सिंह कहते हैं, “यहां बूढी गंडक, नून नदी और बाया नदी का पानी ताल में आता है, लेकिन वह गंगा में चला जाता है।”

आइयूसीएन स्पीशीज सर्वाइवल कमीशन के सदस्य व बिहार के प्रमुख पक्षी एवं वेटलैंड विशेषज्ञ अरविंद मिश्रा ने मोंगाबे हिंदी से कहा, “किसी वेटलैंड के लिए रामसर साइट का दर्जा का दावा किये जाने के लिए उसके मानकों को पूरा करना जरूरी है, लेकिन बरैला के साथ दिक्कते हैं। वहां नरकट काफी अधिक है, वे 20 फीट तक ऊपर हैं। ये जमीन का पानी सोख लेते हैं और वेटलैंड एरिया में ओपन वॉटर को नहीं रहने देते हैं।”

नेशनल वेटलैंड एलटस: बिहार के अध्ययन में यह पाया गया कि मानसून के बाद वेटलैंड में ओपन वॉटर 58 प्रतिशत होता है तो प्री-मानसून में 38 प्रतिशत। पोस्ट मानसून के स्तर को आधार मानने पर पोस्ट मानसून से प्री-मानसून तक ओपन वाटर की मात्रा में उल्लेखनीय रूप से 34 प्रतिशत तक कमी आ जाती है।


और पढ़ेंः बिहार को मिले पहले रामसर स्थल से क्यों खुश है मछुआरे


मिश्रा यह भी कहते हैं कि बरैला के लिए वास्तविक वेटलैंड एरिया से काफी कम क्षेत्र के लिए अधिसूचना जारी की गयी है।

एक स्थानीय मल्लाह युवक हेमंत साहनी ने कहा कि ताल में नरकट (जलीय खरपतवार) बहुत हो गया है और यह सूख गया है, इस कारण मछली नहीं होती और इस इलाके से मछुआरा समुदाय के करीब 10 हजार लोगों ने रोजगार के लिए अन्य राज्यों में पलायन किया है। 

यू-ट्यूब पर हमारे वीडियोज देखने के लिए यहां क्लिक कर चैनल सब्सक्राइब करें।

कवई बरैला गांव की मल्लाह महिला शीला देवी ने कहा कि पानी नहीं है तो मछली नहीं होती, इसलिए उनके पति चंद्रशेखर साहनी व दो बेटे कमाने पंजाब चले गए हैं। वहीं, एक अन्य मल्लाह महिला अनीता देवी ने कहा कि उनके पति सुखन साहनी कमाने गुजरात चले गए हैं।

ज्यादातर वेटलैंड की तरह इस इलाके में भी किसानों और मछुआरों के बीच टकराव की स्थिति है। किसान चाहते हैं कि खेती के लिए पानी निकल जाए, जबकि मछुआरे चाहते हैं कि पानी का अधिक जमाव हो ताकि वे मछली का शिकार कर सकें। 

 कवई बरैला गांव की मछुवारा महिलाएं शीला देवी व अनीता देवी जिनके पति कमाने बाहर चले गए हैं। तस्वीर- राहुल सिंह/मोंगाबे
कवई बरैला गांव की मछुवारा महिलाएं शीला देवी व अनीता देवी जिनके पति कमाने बाहर चले गए हैं। तस्वीर- राहुल सिंह/मोंगाबे

ग्रामीणों का आरोप है कि क्षेत्र के मछुआरे  प्लास्टिक व बांस आदि से पानी को रोक देते हैं ताकि वे मछली का शिकार कर सकें, लेकिन इससे खेती को नुकसान होता है। हालांकि, एक स्थानीय मछुआरे राम इकबाल साहनी ने कहा, “हमलोग पुल को घेर कर पानी नही रोकते हैं, इस क्षेत्र में बारिश में पानी का जमाव होता है तो सावन से आश्विन के महीने तक हम मछली का शिकार करते हैं।”

स्थानीय किसान उमेश सिंह कहते हैं, “दहाड़ (बाढ) में यह क्षेत्र पानी में डूब जाता है, इसलिए हमारे यहां खरीफ की खेती अच्छी नहीं होती, पानी उतरने पर रबी की फसल अच्छी होती है।”

बिहार वेटलैंड संरक्षण के लिए किस तरह प्रयास कर रहा है?

बिहार में वेटलैंड को संरक्षित करने और उनके विकास के लिए वर्ष 2019 में बिहार वेटलैंड ऑथिरिटी का गठन किया गया। इसके तहत बिहार के वेटलैंडों को चिह्नित करने, उसकी जैवविविधता और क्षेत्रफल का आकलन करने सहित अन्य काम को अधिक व्यवस्थित रूप देने का प्रयास किया जा रहा है। वेटलैंड ऑथिरिटी के अध्यक्ष राज्य के वन एवं पर्यावरण मंत्री होते हैं और साल में इसकी एक बैठक कम से कम होने का प्रावधान है। जुलाई में इसकी तीसरी बैठक हुई।

बिहार सरकार के राजस्व विभाग ने राज्य में 4106 वेटलैंड को चिह्नित किया है। इनमें 133 वेटलैंड ऐसे हैं जो 100 हेक्टेयर एरिया से अधिक के हैं। बिहार सरकार का जोर पहले इन वेटलैंड को संरक्षित करने पर है। बिहार वन विभाग के डायरेक्टर( इकोलॉजी) सुरेंद्र सिंह ने मोंगाबे हिंदी से कहा, “हमने 60 वेटलैंड का हेल्थ कार्ड तैयार कर लिया है। उन्होंने कहा कि इसके तहत उक्त वेटलैंड में पाए जाने वाली पक्षी, वनस्पति आदि की प्रजाति का आकलन किया जाता है।” सुरेंद्र सिंह बताते हैं कि वेटलैंड के साथ पानी का प्रवाह रुक जाना, अवांछित खरपतवार का होना, वेटलैंड में अवांछित वनस्पति प्रजातियों का होना व चिड़िया की जो प्रजाति चाहिए उसका न होना जैसी दिक्कते हैं।


और पढ़ेंः [वीडियो] मिथिला मखानः सांस्कृतिक पहचान को बचाने की राह में अनेक चुनौतियां


हालांकि पिछले तीन-चार सालों से शुरू हुई ये कोशिशें वेटलैंड के संरक्षण के लिए नाकाफी हैं। इसके लिए अत्यधिक योजनाबद्ध और प्रभावी पहल की जरूरत है। वेटलैंड के सरकार व समुदाय के स्तर पर कई हितधारक (स्टेकहोल्डर) होते हैं, जिससे टकराव की स्थिति दोनों स्तरों पर बनती है। बिहार में वेटलैंड के साथ जमीन का विवाद,  गाद जमा होना जैसी चुनौतियां भी हैं। वेटलैंड के संरक्षण के लिए पर्याप्त धन की उपलब्धता भी एक समस्या है। एक अधिकारी ने बताया अगर कुछ लाख खर्च कर किसी वेटलैंड के लिए काम कर दिया तो उससे उसका संरक्षण नहीं हो सकता, उसके लिए धन की सतत उपलब्धता चाहिए ताकि काम में निरंतरता बनी रहे। 

वेटलैंड विशेषज्ञ अरविंद मिश्र भी कहते हैं कि बरैला ताल से जंगली खरपतवार को हटाया जा सकता है, लेकिन उसके लिए काम करना होगा।

नागी-नकटी झील का दावा क्यों मजबूत हुआ 

नागी और नकटी वेटलैंड, नागी और नकटी नदी पर सिंचाई के लिए बनाए गए डैम हैं। ये दोनों डैम एक-दूसरे से करीब ढाई-तीन किमी की दूरी पर हैं और दोनों का रख-रखाव व प्रबंधन एक साथ ही होता है। 

नागी को पक्षी विहार के रूप में विकसित किया गया है और यहां पर्यटकों के लिए एक पार्क भी बनाया गया है। यह जगह जैव विविधता से संपन्न है। जमुई के डीएफओ पीयूष वर्णवाल ने मोंगाबे हिंदी से कहा, “एशियन वॉटर सेंसस में यहां लगातार पक्षी के प्रकार में वृद्धि दर्ज की गयी है, अवैध रूप से मछली मारे जाने की गतिविधियों को हमने नियंत्रित किया है और यहां की जैवविविधता व लैंडस्कैप अच्छी है।”

वर्ष 2021 की गणना के अनुसार, यहां 137 प्रकार के पक्षी थे, 2022 में 145 प्रकार के और वर्ष 2023 की एशियन बर्ड काउंटिंग की गणना में 155 प्रकार के पक्षी यहां दर्ज किए गए।

जमुई जिले के नकटी वेटलैंड में पक्षी का प्रिय भोजन हाइड्रोफाइट्स प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। यहां पक्षी की संख्या में लगातार वृद्धि दर्ज की गयी है। तस्वीर- राहुल सिंह/मोंगाबे
जमुई जिले के नकटी वेटलैंड में पक्षी का प्रिय भोजन हाइड्रोफाइट्स प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। यहां पक्षी की संख्या में लगातार वृद्धि दर्ज की गयी है। तस्वीर- राहुल सिंह/मोंगाबे

नागी और नकटी वेटलैंड के प्रभारी फॉरेस्टर अनीश कुमार के अनुसार, दोनों वेटलैंड में हाइड्रोफाइट्स घास प्रचुर मात्रा में है, जो पक्षी का मुख्य भोजन है। नागी व नकटी में पक्षी के प्रकार की गणना के क्रम में लगातार वृद्धि दर्ज की गयी। 

इन दोनों वेटलैंड के साथ कम मानव हस्तक्षेप एक सुखद बात है। टकराव की स्थिति यहां भी है, लेकिन वह उत्तर बिहार के प्रमुख वेटलैंडों की तुलना में कम है। 

वर्ष 1987 में नागी और नकटी को पक्षी आश्रयणी बनाने की अधिसूचना बिहार सरकार द्वारा जारी की गई। इसके लिए सिंचाई विभाग ने नागी में 191 हेक्टेयर भूमि पक्षी विहार के लिए वन विभाग को स्थानांतरित की। हालांकि इन दोनों डैम से सिंचाई के लिए पानी की आपूर्ति अभी भी की जाती है। यहां इको डेवलपमेंट कमेटी है, जिसके अध्यक्ष स्थानीय ग्रामीण व सचिव फॉरेस्टर होते हैं। उसके जरिये लोगों को न सिर्फ जैव विविधता व पर्यावरण के लिए संवेदनशील बनाया जाता है, बल्कि इसके संरक्षण में उनकी भागीदारी भी सुनिश्चित की जाती है। इस समिति में एक तिहाई महिलाएं सदस्य होती हैं और कोशिश यह होती है कि 18 से 25 साल के युवा का प्रतिनिधित्व हो। इस समिति में भूमिहीन, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति वर्ग के लोगों को भी प्रतिनिधित्व दिया जाता है।

रामसर साइट घोषित करने के मानक

किसी भी वेटलैंड को अंतरराष्ट्रीय महत्व (रामसर साइट) के वेटलैंड का दर्जा देने के लिए रामसर कन्वेंशन ने नौ महत्वपूर्ण मानक तय किए हैं, जो दो श्रेणी में हैं। पहला, वेटलैंड का दुर्लभ व प्राकृतिक उदाहरण और दूसरा, प्रजातियों एवं पारिस्थितिकी तंत्र पर आधारित मानदंड, जिसमें जलपक्षी, मछली व अन्य पारिस्थितिकी समुदाय का मानदंड शामिल है। 

इसके प्रमुख मानक इस प्रकार हैं – उपयुक्त जैव भौगोलिक क्षेत्र में जैव विविधता का दुर्लभ या अनोखा उदाहरण; अगर वह संकटग्रस्त, लुप्तप्राय या गंभीर रूप से लुप्तप्राय प्रजातियों का समर्थन करता हो; यदि वह ऐसे पौधों, पशुओं या प्रजातियों का समर्थन करता हो जो जैव विविधता को बनाये रखने के लिए जरूरी है। यदि कोई पौध या पशु प्रजाति अपने जीवन चक्र को प्रतिकूल परिस्थितियों में आश्रय प्रदान करता हो; अगर वह नियमित रूप से 20 हजार या उससे अधिक पक्षियों को आश्रय प्रदान करता हो; यदि वह नियमित रूप से एक प्रजाति या जलपक्षी की उप-प्रजाति की आबादी में एक प्रतिशत का समर्थन करता हो; अगर वह देशी मछली की उप-प्रजातियों, प्रजातियों का समर्थन करता हो; अगर वहां मछलियां भोजन, अंडा देने के लिए निर्भर हों; अगर वह नियमित रूप से वेटलैंड पर निर्भर नॉन एवियन (गैर पक्षी) पशु प्रजातियों की एक प्रजाति या उप-प्रजाति के एक प्रतिशत हिस्से का समर्थन करता हो।

 

बैनर तस्वीरः चकैया गांव के किसान, जिनका कहना है कि बारिश के महीने में यह इलाका पानी में डूब जाता है। तस्वीर- राहुल सिंह/मोंगाबे

पर्यावरण से संबंधित स्थानीय खबरें देश और वैश्विक स्तर पर काफी महत्वपूर्ण होती हैं। हम ऐसी ही महत्वपूर्ण खबरों को आप तक पहुंचाते हैं। हमारे साप्ताहिक न्यूजलेटर को सब्सक्राइब कर हर शनिवार आप सीधे अपने इंबॉक्स में इन खबरों को पा सकते हैं। न्यूजलेटर सब्सक्राइब करने के लिए यहां क्लिक करें।

Exit mobile version