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गर्मियों के मौसम में वायनाड हाथियों की पसंदीदा जगह

वायनाड पठार के कई हिस्सों को हाथी वन क्षेत्रों में आने-जाने के लिए इस्तेमाल करते हैं। एक हालिया अध्ययन में कहा गया है कि फिलहाल इस्तेमाल में लाए जा रहे ऐसे कॉरिडोर को ऐतिहासिक एलिफेंट कॉरिडोर की तरह पहचाना और संरक्षित किया जाना चाहिए। तस्वीर -अनूप एन.आर. 

वायनाड पठार के कई हिस्सों को हाथी वन क्षेत्रों में आने-जाने के लिए इस्तेमाल करते हैं। एक हालिया अध्ययन में कहा गया है कि फिलहाल इस्तेमाल में लाए जा रहे ऐसे कॉरिडोर को ऐतिहासिक एलिफेंट कॉरिडोर की तरह पहचाना और संरक्षित किया जाना चाहिए। तस्वीर -अनूप एन.आर. 

  • एक नए अध्ययन से पता चला है कि गर्मियों के मौसम में हाथी वायनाड के पठारों पर अपना समय गुजारना ज्यादा पसंद करते हैं। नीलगिरि के आसपास के क्षेत्रों की तुलना की जाए तो इस मौसम में यहां आने वाले हाथियों की संख्या काफी अधिक है।
  • शोधकर्ताओं का कहना है कि पहाड़ी इलाके के कुछ वन क्षेत्र हाथियों की आवाजाही के लिए कॉरिडोर की तरह काम करते हैं। इन रास्तों को ऐतिहासिक एलिफेंट कॉरिडोर के समान मान्यता दिए जाने की जरूरत है।
  • क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन को ध्यान में रखते हुए अध्ययन में प्रजातियों के संरक्षण के लिए रणनीतिक संरक्षित क्षेत्र के विस्तार और वन क्षेत्रों के करीब दलदलों और तटवर्ती जंगलों के अधिग्रहण की बात कही गई है।

गर्मियों के दिनों में हाथी वायनाड के आद्र पहाड़ी इलाकों में आना पसंद करते हैं। इसकी वजह तटवर्ती जंगल और यहां मौजूद दलदलीय इलाके हैं, जो पास के मैसूर और नीलगिरि के सिगुर पठारों पर मौजूद सूखे जंगलों की तुलना में इन जगहों को ठंडा और आद्र बनाते हैं। हाल ही में किए गए एक अध्ययन से यह जानकारी सामने आई है।

अध्ययन के मुताबिक, प्रायद्वीपीय भारत के ब्रह्मगिरि-नीलगिरि-पूर्वी घाट में स्थित वायनाड पठार विश्व स्तर पर एशियाई हाथियों (एलिफस मैक्सिमस) की सबसे बड़ी प्रजनन आबादी के लिए जाने जाते हैं। इस इलाके में हाथियों के लिए साल भर पानी और चारा मौजूद रहता है।

वायनाड में हाथियों का झुंड। हाथियों के आवासों को काफी नुकसान पहुंचा है इसलिए ये जानवर संरक्षित क्षेत्रों से बाहर चले गए हैं। तस्वीरें-अनूप एन.आर.
वायनाड में हाथियों का झुंड। हाथियों के आवासों को काफी नुकसान पहुंचा है इसलिए ये जानवर संरक्षित क्षेत्रों से बाहर चले गए हैं। तस्वीरें-अनूप एन.आर.

एशियाई हाथी विश्व स्तर पर लुप्तप्राय प्रजाति है। सिर्फ 50,000 एशियाई हाथी ही जंगल में बचे हैं। इसकी तकरीबन 60 फीसद आबादी भारत में है, जिसमें से 25 प्रतिशत पश्चिमी घाट के वैश्विक जैव विविधता हॉटस्पॉट में है। ऐतिहासिक रूप से एशियाई हाथी नौ मिलियन वर्ग किमी से अधिक क्षेत्र में रहते आए हैं। लेकिन 2003 में किए गए एक अध्ययन से पता चलता है कि पिछले तीन सहस्राब्दियों में यह इलाका घटकर 500,000 वर्ग किमी तक रह गया है।

अध्ययन से पता चलता है कि हाथियों के मौजूदा आवासों के उजड़ने के पीछे जहां एक तरफ जलवायु परिवर्तन जैसे कारक हैं, वहीं इंसानों का जंगलो में बढ़ता हस्तक्षेप भी इसकी एक बड़ी वजह है। अपने आवास खोने या उजड़ने के कारण हाथियों की इंसानी इलाकों में गतिविधियां और उनके साथ संघर्ष की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। हाथी जिन वन क्षेत्रों में आवाजाही कर रहे हैं, उन्हें संरक्षित करना जरूरी हो गया है। क्योंकि उनमें से कुछ प्रजातियों के लिए ये इलाके भले ही थोड़े समय के लिए सही, लेकिन मौसमी आवास की तरह काम करते हैं। 

जल स्रोत और पेड़ गर्मियों में हाथियों को ठंडक देते हैं

अशोक ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकोलॉजी एंड द एनवायरनमेंट (ATREE) और वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन ट्रस्ट के शोधकर्ताओं ने वायनाड में किए गए अपने अध्ययन में कहा है कि तटवर्ती जंगल और दलदल हाथियों को गर्मी से राहत देने और कीचड़ में लथपथ होने की जगह देते हैं। फिर भी इस इलाके की काफी उपेक्षा की गई है और इसकी सुरक्षा के लिए बहुत कम संरक्षण प्रयास किए गए हैं। अध्ययन प्रमुख अनूप एन.आर. ने कहा, “गर्मियों के दौरान हाथी इस रास्ते का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करते हैं। लेकिन नीलगिरि इलाकों के पूर्व में मौजूद अन्य आवासों (इसमें बांदीपुर और नागराहोल बाघ अभयारण्य जैसे संरक्षित क्षेत्र शामिल हैं) में चारे की उपलब्धता के कारण वे मानसून में इन इलाकों में जाने से बचते हैं।”

एक अध्ययन में पाया गया है कि वायनाड पठार के तटवर्ती जंगल और दलदल हाथियों को छाया और पानी मुहैया करता है। यह इलाका उन्हें गर्मी से राहत दिलाने में मददगार साबित होता हैं। तस्वीर-अनूप एन.आर.
एक अध्ययन में पाया गया है कि वायनाड पठार के तटवर्ती जंगल और दलदल हाथियों को छाया और पानी मुहैया करता है। यह इलाका उन्हें गर्मी से राहत दिलाने में मददगार साबित होता हैं। तस्वीर-अनूप एन.आर.

जाने-माने इकोलॉजिस्ट और हाथी विशेषज्ञ रमन सुकुमार ने बताया कि हाथियों के इस मौसमी प्रवास का खुलासा 1999 में बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी द्वारा किए गए हाथियों के पहले टेलीमेट्री अध्ययन में हुआ था। 1999 के अध्ययन में पाया गया कि आर्द्रभूमि और कई बारहमासी जलधाराओं की उपलब्धता, भले ही वायनाड पठार के 2000 वर्ग किमी क्षेत्र का सिर्फ 13 फीसद है, लेकिन गर्मियों के दौरान हाथियों की गतिविधियों पर खासा असर डालती है। उन्होंने कहा कि जब मई 2017 में हाथियों की जनगणना की गई थी, तो वायनाड में हाथियों की संख्या काफी अधिक थी। खासतौर पर 2016 के सूखे के बाद, जिसने पड़ोसी राज्य कर्नाटक में बांदीपुर और नागरहोल बाघ अभयारण्यों जैसे अन्य हाथियों के आवासों को प्रभावित किया था। एटीआरईई के एक वैज्ञानिक टी. गणेश भी इस अध्ययन का हिस्सा थे। उन्होंने कहा, हम ये तो जानते थे कि वायनाड के पठार हाथियों के लिए एक महत्वपूर्ण निवास स्थान है, लेकिन इसे मान्य करने के लिए कई वैज्ञानिक पड़ताल नहीं की गईं थीं।

वायनाड पठार को बेहतर सुरक्षा और संरक्षण उपायों की जरूरत

इतना महत्वपूर्ण इलाका होने के बावजूद, समय के साथ इस क्षेत्र के ज्यादातर हिस्से में बागान बना दिए गए हैं। अनूप ने कहा, “वायनाड वन्यजीव अभयारण्य के 344 वर्ग किमी में से, लगभग 100 वर्ग किमी क्षेत्र में बड़े-बड़े बागान हैं।” उन्होंने कहा कि वह यह जानना चाहते थे कि हाथी बाकी हिस्से का इस्तेमाल कैसे कर रहे हैं। उजड़ते जंगल इंसान और हाथियों के बीच बढ़ते संघर्ष का एक मुख्य कारण है। हाल के दिनों में बेहतर सुरक्षा उपायों की वजह से हाथी, खास तौर पर नर हाथियों की बढ़ती आबादी, आक्रामक पौधों की प्रजातियों का प्रसार, शाकाहारी पौधों की प्रजातियों की कमी, जंगल में आग लगने की बढ़ती घटनाएं आदि हाथियों को जंगलों से बाहर खेतों और मानव बस्तियों की ओर धकेल रहे हैं।

शोधकर्ताओं ने खासतौर से जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में नीलगिरि इलाके में हाथियों के लिए शुष्क मौसम के आवास के रूप में वायनाड के महत्व को पूरी तरह से समझने के लिए दीर्घकालिक शोध की बात कही है। अनुप ने कहा, “हाथी एक लंबे समय तक जीवित रहने वाली प्रजाति हैं। अपने आवासों के साथ उनके जटिल संबंधों और उनके इस्तेमाल की बेहतर समझ के लिए, कम से कम तीन दशकों तक चलने वाला दीर्घकालिक अध्ययन जरूरी है।”

सुकुमार 2013 के एक अध्ययन की ओर इशारा करते हैं जिसमें अगले तीन दशकों में भारत के पश्चिमी तट पर मानसून के समग्र रूप से कमजोर होने और वर्षा में कमी की भविष्यवाणी की गई है। उन्होंने कहा, “यह समझने के लिए अध्ययन किया जाना चाहिए कि बारिश में यह बदलाव भविष्य में हाथियों की आवाजाही और आवास के इस्तेमाल को कैसे प्रभावित करेगा।”

वायनाड में अपने एक बच्चे के साथ खेलते हुए दो हाथी। तस्वीर-अनूप एन.आर.
वायनाड में अपने एक बच्चे के साथ खेलते हुए दो हाथी। तस्वीर-अनूप एन.आर.

शोधकर्ताओं के अनुसार, अध्ययन के निष्कर्ष काफी मायने रखते हैं क्योंकि ये क्षेत्र हाथियों के वो गलियारे हैं जिनका इस्तेमाल वे वन क्षेत्रों के बीच घूमने के लिए करते हैं। इन्हें ऐतिहासिक एलिफेंट कॉरिडोर की तरह पहचानने की जरूरत है। अध्ययन संरक्षण के लिए रणनीतिक संरक्षित क्षेत्र के विस्तार और वन क्षेत्रों के करीब दलदलों और तटीय जंगलों के अधिग्रहण का सुझाव देता है।

अन्य सुझावों में पर्यावरण को बहाल करने की योजनाओं के जरिए आक्रामक पौधों के प्रसार, मवेशियों का चराई के लिए जंगलों में जाना, एक ही प्रकार की फसल उगाना, इंसानो द्वारा लगाई गई आग आदि जैसे विभिन्न कारकों से उनके आवासों को होने वाले नुकसान को कम करने के तरीके ढूंढना शामिल है। गणेश ने कहा कि वायनाड के जंगल उजड़ रहे हैं और नीतिगत हस्तक्षेपों के जरिए इन गलियारों को जोड़ने के तरीकों पर गौर करना चाहिए। अध्ययन में यह भी सुझाव दिया गया है कि वन विभाग संरक्षित क्षेत्रों के बाहर बफर जोन बनाए और उन्हें सुरक्षित रखे। इसमें हाथियों के सुरक्षित इस्तेमाल के लिए कृषि क्षेत्र भी शामिल हैं।

अनूप ने कहा कि पर्यावरण की बहाली के लिए सामुदायिक भागीदारी के साथ मिलकर काम करना होगा। साथ ही इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि समुदायों को संरक्षण निधि की कुछ राशि भी आवंटित की जाए। उन्होंने कहा, “जब समुदायों को हाथियों के कारण हुए नुकसान की भरपाई की जाएगी तभी वे जानवरों के प्रति सहनशील होंगे।”

 

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बैनर तस्वीर: वायनाड पठार के कई हिस्सों को हाथी वन क्षेत्रों में आने-जाने के लिए इस्तेमाल करते हैं। एक हालिया अध्ययन में कहा गया है कि फिलहाल इस्तेमाल में लाए जा रहे ऐसे कॉरिडोर को ऐतिहासिक एलिफेंट कॉरिडोर की तरह पहचाना और संरक्षित किया जाना चाहिए। तस्वीर -अनूप एन.आर. 

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